पेट्रो डॉलर के लोभ में लाद रहे अरबी लिबास

भारत में अरबी लिबास वाले मुसलमानों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। जानकारों का कहना है कि पेट्रो डॉलर के लोभ में लोग असहजता के बावजूद अरबी वेशभूषा अपना रहे हैं

कुछ दिन पहले मैं दक्षिण भारत के विभिन्न इलाकों में सफर कर रहा था। मेरी ज्यादातर यात्रा ट्रेन से हुई, पर कभी-कभी बस और टैक्सी से भी। यात्रा के दौरान मुझे भारत में इस्लामी रहन-सहन के कई पहलुओं को नजदीक से देखने का मौका मिला।

लिबास और आचार-व्यवहार में इन दिनों एक नया चलन देखने को मिल रहा है। हालांकि, पहनावे और आचार-व्यवहार में भारतीय इतिहास और संस्कृति की निरंतर विकास यात्रा के दौरान हमेशा बदलाव होते रहे हैं, लेकिन यह बदलाव धन और बल के बूते हो रहा है जो असहज करता है। सुनने में आया है कि यह दबाव हज पर जाने के लिए मिलने वाली अनुमति से जुड़ा है। लोगों पर इस बात के लिए जोर डाला जाता है कि वे अपने परिवार के सदस्यों, खास तौर पर महिलाओं को सऊदी अरब में लागू कड़े ड्रेस कोड का पालन करने का निर्देश दें। अन्यथा, उन्हें अनुमति मिलने में विलंब हो सकता है। भारत के विभिन्न हिस्सों में अरबी लिबास पहने वाले महिला-पुरुष की संख्या में जबरदस्त इजाफा हुआ है। अक्सर ऐसा महसूस होता है कि हम मध्ययुगीन कालखंड में हिंद महासागर के पश्चिम में विशाल रेगिस्तान में बसे देशों के किसी तटीय शहर में जी रहे हैं। यह भी महसूस होता है कि अगर आप अरबी लिबास में हैं, सिर पर गोल टोपी पहन रखी है तो आपको हेल्मेट नहीं पहनने और दोपहिया वाहनों पर तीन लोगों को बैठाने की छूट मिल जाती है। जबकि भारतीय परिधान पहने दूसरे लोगों के खिलाफ इन्हीं लापरवाहियों पर अगले चौराहे पर धड़ाधड़ चालान काटे जा रहे हैं।

इस बात में संदेह नहीं कि भारत में हमें इस बात की आजादी है कि मर्यादा के दायरे में रहते हुए हम जो चाहें पहनें, जैसा चाहें व्यवहार करें, लेकिन यह ध्यान में रखना होगा कि इस अरबी लिबास का प्रचलन जहां से शुरू हुआ, वहां हमें एक भारतीय होने के नाते कुछ भी पहनने की छूट नहीं है। भारत के लिए यह अरबी लिबास मानो असमानता का प्रतीक है जो बेशक विवाद का विषय न हो, लेकिन अनुचित है और अप्रिय भी। मेरा आशय यह है कि अगर एक भारतीय महिला माथे पर बिंदी या अपनी बांह के खुले हिस्से पर भारतीय मूल की कोई धार्मिक आकृति या सामान्य भारतीय पहनावा नहीं पहन सकती तो अरबी लिबास को भारतीय महिलाओं पर थोपना सही नहीं है। अगली दलील यह है कि लोग भारत में अपनी मर्जी और पंसद से ऐसे लिबास पहनते हैं। अगर आप सच में ऐसा मानते हैं तो आप बहुत अबोध हैं। मेरा मानना है कि हममें से हरेक को भारत में अरबी लिबास पहनने वालों से विनम्रतापूर्वक यह पूछना चाहिए कि क्या वे भारतीय हैं, या अरब, या कुछ और? अगर उत्तर भारतीय है, तो फिर विनम्रता के साथ उनके सामने अगला सवाल रखना चाहिए कि क्या उनके पिता और दादा भी ऐसे अरबी लिबास पहनते थे या उन्होंने हाल में इसे अपनाया है और अगर ऐसा है तो क्यों?

भारतीय जीवनशैली या पहनावे में कभी भी महिलाओं को कपड़ों से पूर्णत: ढके रहने का कठोर नियम नहीं बनाया गया। इसलिए यह ईमानदार और नम्र और सादा सवाल बहुत औचित्यपूर्ण है कि आखिर इन लोगों ने अरबी लिबास का चलन कैसे और क्यों शुरू किया?

अगर जवाब में क्रोध के अंगारे भड़क जाएं तो समझ लीजिए कि आपका निशाना सही है और अगर जवाब अधकचरा या बेतुका है तब भी आपकी ही बात सही साबित होती है। अगर कोई भी वाकई जवाब देता है तो कृपया इस लेखक को बताइएगा कि जवाब क्या था, और अगर जवाब यह है कि अरबी लिबास पहनने के पीछे एक विदेशी शक्ति के हुक्म की तामील करने का जज्बा है तो भारतीय कौन है या भारतीयता क्या है, यह सवाल ही एक प्रश्नचिह्न बन जाएगा।