पत्रकारिता से गायब होती नैतिकता
   दिनांक 18-जुलाई-2018
 
यह कटु सच है कि सेकुलर मीडिया गैर-जिम्मेदार संस्था बन चुका है, ऐसी स्थिति में जनता और सरकार को यह जिम्मेदारी संभालनी होगी और उन्हें सही रास्ते पर लाने के लिए दबाव बनाए रखना होगा
 
ऐसे समय में जब तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया नए-नए बनावटी मुद्दे खड़े करने में पूरी ऊर्जा लगा रहा है, क्षेत्रीय समाचार पत्र और चैनल एक उम्मीद बनकर उभरे हैं। खासतौर पर भारतीय भाषाओं से जुड़ा मीडिया देश के मुद्दों की ज्यादा वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत कर रहा है। रांची के ‘मिशनरीज आॅफ चैरिटी’ में जब बच्चों को बेचे जाने का भंडाफोड़ हुआ तो दैनिक भास्कर के झारखंड संस्करण ने इसे मुख्य समाचार बनाया। जबकि दिल्ली के लगभग सभी अखबार राष्ट्रीय महत्व की इस खबर को अंदर के पन्नों में छिपाने में जुटे हुए थे। चैनलों को तो मानो सांप ही सूंघ गया। मुख्यधारा मीडिया से जुड़े लोग अच्छी तरह जानते हैं कि ईसाई मिशनरीज के खिलाफ समाचार देने का क्या मतलब होता है।
चर्च में ‘बच्चों की मंडी’ के विषय पर ‘जी न्यूज’ और ‘रिपब्लिक टीवी’ ने जिम्मेदार पत्रकारिता का परिचय दिया। उन्होंने बिना किसी सनसनी के पूरा समाचार दिया, जिसे बाकी मीडिया छिपाने में जुटा था। ‘सबसे तेज’ चैनल ‘आजतक’ ने करीब हफ्ता भर इंतजार करने के बाद इस खबर को हाथ लगाया। वह भी तब जब लोगों ने सोशल मीडिया के जरिए सवाल पूछना शुरू कर दिया कि जो चैनल हिंदू संतों या आश्रमों में होने वाली किसी घटना को नमक-मिर्च लगाकर सालों-साल दिखाते रहते हैं, वे मिशनरी में हो रहे इस पाप पर चुप क्यों हैं? इसी चैनल से जुड़े विवादित पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने तो ट्वीट करके मानव तस्करी के इस मामले में आरोपियों का बचाव करने की कोशिश की, जबकि बाकी मामलों में वे सीधे हिंदू धर्म को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। शायद चैनल ने उनसे ऐसा रणनीतिक तौर पर करवाया होगा, ताकि थोड़ी-बहुत खबर दिखाने पर ईसाई संस्थाएं नाराज न हों।
पिछले ही दिनों पत्रकारिता से जुड़ी एक बड़ी खबर को पूरे मीडिया ने छिपाया। गाजियाबाद की अदालत में फर्जी स्टिंग आॅपरेशन के मामले में राजदीप सरदेसाई और आशुतोष को आत्मसमर्पण करना पड़ा, जहां उन्हें जमानत पर छोड़ दिया गया। आरोप है कि 2006 में वे जिस चैनल के संपादक थे, उसने नोएडा के एक डॉक्टर से वसूली की कोशिश की थी। सफलता नहीं मिली तो डॉक्टर को बदनाम करने के लिए फर्जी स्टिंग आॅपरेशन करवाया गया। अदालत में पेशी की यह खबर सिर्फ ‘दैनिक जागरण’ में जगह बना पाई। लेकिन सोशल मीडिया की मेहरबानी से खबर दब नहीं पाई।
अब फर्जी खबरों पर संपादकीय भी लिखे जाने लगे हैं। ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ अखबार ने संपादकीय में ‘नमो एप’ को सरकारी खर्च पर चलने वाला बताया। इसी तरह प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों से जुड़ी खबरों से भी खिलवाड़ का काम शुरू हो चुका है।
लालू यादव और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं के साथ साठगांठ करते रंगे हाथ पकड़े जा चुके एक ‘क्रांतिकारी’ पत्रकार ने किसानों से प्रधानमंत्री की बातचीत को काट-छांट कर यह साबित करने की कोशिश की कि उस कार्यक्रम में सवाल पहले से तय थे।
खुद सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) राज्यवर्धन राठौड़ ने एबीपी न्यूज चैनल की इस पीत पत्रकारिता पर आपत्ति जताई। मीडिया में ऐसी चर्चा है कि कार्यक्रमों के लिए कांग्रेस दफ्तर से खबर, वीडियो और आंकड़े भेजे गए थे।
महाराष्ट्र के धुले में भीड़ के हाथों हत्या के मामले में एनडीटीवी ने झूठी तस्वीर लगाई। इस पर भी सूचना और प्रसारण मंत्री ने ट्वीट करके सवाल उठाया तो चैनल ने चुपके से तस्वीर बदल दी। उनमें इतनी नैतिकता भी नहीं बची कि अपनी गलती स्वीकार करते हुए खेद प्रकट कर सकें।