तेल और गैस पर वैश्विक जंग
   दिनांक 18-जुलाई-2018
मध्य एशिया और अफगानिस्तान में गैस और तेल पर वर्चस्व के खेल की दूसरी बाजी शुरू हो चुकी है। इस लड़ाई में यूरेशिया का भविष्य और लगभग 5 खरब डॉलर कीमत वाले तेल और गैस के व्यापार पर दबदबा दाव पर लगा है। किसी भी देश की तरक्की में तेल और गैस का बड़ा हाथ रहता है, इसलिए इस जंग के बादल मंडराने लगे हैं
 अमेरिका द्वारा निर्मित बाकू केहान पाइप लाइन
 
1904 में रॉयल जियोग्राफिकल सोसाइटी के तत्वावधान में भूगोल के प्रोफेसर सर फोर्ड मैकिन्डर ने एक व्याख्यान दिया था। विषय था, 'इतिहास की भौगोलिक धुरी।'इस व्याख्यान ने 20वीं और अब 21वीं सदी के सभी प्रमुख राजनीतिकों को प्रेरित किया। क्रीमिया का युद्ध, दोनों विश्वयुद्ध, कोसोवो, जॉर्जिया और फिलिस्तीन के युद्ध काफी हद तक इसी राजनीतिक सिद्धांत से प्रभावित थे। मैकिन्डर द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत बहुत आसान है, लेकिन प्रभाव दूरगामी। मैकिन्डर का कहना था:
—जिसका यूरोपीय भू-भाग पर अधिकार होगा, उसका मध्य एशिया पर नियंत्रण रहेगा।
—जिसका यूरोप और मध्य एशिया पर अधिकार होगा उसका यूरेशिया पर नियंत्रण रहेगा।
—जिसका यूरेशिया पर अधिकार होगा उसका विश्व पर नियंत्रण रहेगा।
मैकिन्डर के अनुसार, यूरोपीय भू-भाग (मैकिन्डर ने 'पूर्वी यूरोप' शब्द का प्रयोग किया था) फ्रांस से पोलैंड तक का समस्त क्षेत्र, मध्य एशिया, रूस एवं बाल्कन देश, यूरेशिया, अटलान्टिक महासागर से प्रशांत महासागर के बीच का समूचा भू-भाग, समस्त यूरोप एवं एशिया (भारत और चीन) समेत थे।
 
मैकिन्डर सिद्धांत का जन्म 20वीं शताब्दी में जरूर हुआ पर उस पर अमल की शुरुआत 19वीं शताब्दी में ही हो गई थी। ब्रिटिश इतिहासकारों ने रूस और ब्रिटेन के बीच चल रही इस स्पर्धा को 'ग्रेट गेम' का नाम दिया है। मध्य एशिया और अफगानिस्तान 19वीं शताब्दी से ही इस ग्रेट गेम के केन्द्र्र रहे हैं। 19वीं शताब्दी में खिलाड़ी थे रूसी त्जार साम्राज्य और ब्रिटिश साम्राज्य, जिन्होंने लगभग एक शताब्दी तक इस इलाके में वर्चस्व कायम करने के लिये प्रभाव की लड़ाई लड़ी। ब्रिटिश-भारत व अफगान युद्ध के बाद इस खेल की पहली बाजी का अंत 1909 में डूरंड लाइन के जन्म के साथ, एक तरह से बराबरी पर हुआ।
 
आज मध्य एशिया और अफगानिस्तान में इस खेल की दूसरी बाजी शुरू हो चुकी है। दांव पर है यूरेशिया का भविष्य और लगभग 5 खरब अमेरिकी डॉलर कीमत वाले तेल और गैस के व्यापार पर आधिपत्य। पुराने खिलाडि़यों के साथ इस बार कुछ नये खिलाड़ी भी मैदान में हैं। लेकिन बिसात आज भी पुरानी जगह पर ही है। खिलाडि़यों में अमेरिका, चीन, ईरान और भारत का भी समावेश हो गया है। पुराने खिलाड़ी रूस और ब्रिटेन तो हैं ही, ब्रिटेन के साथ पूरा नाटो समुदाय भी शामिल हो गया है।
21वीं शताब्दी की दूसरी बाजी के मूल मे दो ऐतिहासिक घटनाएं हैं।
—1990 मे सोवियत संघ के विघटन के साथ मध्य एशिया के गणतंत्रों का स्वतंत्र राष्ट्रों के रूप में जन्म।
—1996 के बाद इन गणराज्यों में मुख्य रूप से तुर्कमेनिस्तान एवं कजाकिस्तान में विपुल मात्रा में प्राकृतिक गैस और तेल की खोज।
आज इस क्षेत्र में लगभग 30 अरब बैरल कच्चा तेल और 12,000 अरब घनफुट प्राकृतिक गैस का भंडार आंका जा रहा है। संयोगवश यह सारा इलाका समुद्र से सटा नहीं है। तेल और गैस को पाइपलाइन के द्वारा उपभोक्ता या बंदरगाह तक पहुंचाना पड़ता है, जहां से उसे टैंकरों मे भरकर बाजार तक पहुंचाया जा सके। यहीं से शुरू होती है पाइपलाइनों की राजनीति, उस इलाके में जिसे ब्राजीलियाई पत्रकार पेपे एस्कोबार ने 'पाइपलाइनिस्तान' नाम दिया है। यह नाम इतना लोकप्रिय हो गया कि यदि आप गूगल पर खोजें तो 10 लाख से अधिक हिट मिलते हैं।
वास्तव में पाइपलाइन का संभावित इलाका और जिहादी आंतक से प्रभावित इलाका काफी हद तक मेल खाते हैं। यह पूरा इलाका कोसोवो से सिंक्यिांग (चीन) तक आतंकवादियों के प्रभाव वाला इलाका है, इस तथ्य ने पाइपलाइन की राजनीति को कहीं अधिक रोचक और हिंसात्मक बना दिया है। इस खेल को समझने के लिये हमें कुछ तथ्यों को ध्यान में रखना होगा। ये तथ्य हैं-
—रूस विश्व का सबसे बड़ा ऊर्जा उत्पादक है।
—चीन ऊर्जा का सबसे बड़ा खरीदार है।
—रूस के द्वारा पाइपलाइन से यूरोप को 41 प्रतिशत गैस की आपूर्ति की जा रही है।
—गैस के सबसे बड़े उपभोक्ता पश्चिम में यूरोपीय संघ एवं पूर्व मंे चीन और भारत हैं।
—तेल और गैस की संभावित आपूर्ति से संभावित मांग कहीं ज्यादा है, और यह मांग दिनोदिन बढ़ने वाली है।
ऊर्जा के दूसरे नये साधनों की खोज की रफ्तार बहुत धीमी है।
—ऊर्जा की मांग में एशिया की हिस्सेदारी दिनोदिन बढ़ती जा रही है।
खेल मे प्रमुख खिलाडि़यों के तौर पर हैं रूस, चीन, ईरान एवं अमेरिका। नाटो देश, भारत, पाकिस्तान हाशिये पर हैं।
अभी तक गैस का मुख्य उपभोक्ता यूरोपीय संघ और मुख्य आपूर्तिकर्ता रूस था। चूंकि रूस ही विश्व में गैस का सबसे बड़ा उत्पादक भी है अत: सब कुछ बहुत सीधा-सरल था।
मध्य एशिया के देशों के स्वतंत्र होने के बाद कैस्पियन सागर एवं तुर्कमेनिस्तान के इलाके में विपुल मात्रा में तेल और गैस मिलने के बाद उसे बाजार तक कौन पहुंचाये, इस पर होड़ लग गई है। रूस की इच्छा, स्वभावत: गैस वितरण पर अपनी अगुआई कायम रखने की है। उसके पास साइबेरिया के गैस क्षेत्रों से यूरोप के लिए यूक्रेन और बेलारूस होकर पाइपलाइन है ही। मध्य एशिया के गैस क्षेत्रों को इस लाइन से आसानी से जोड़ा जा सकता है। अमेरिका के लिये इसमें मुश्किल आती है। उसे पाइपलाइन का सीधा रास्ता लेने के लिये या तो रूस या ईरान की भूमि से जाना पड़ता है। अमेरिका को ये दोनों बातें नागवार हैं। रूस और ईरान दोनों की भूमि से पाइपलाइन को बचाने के लिये अमेरिका ने बाकू-त्ब्लीत्सी-केहान पाइपलाइन तैयार की। 1767 किमी लम्बी, 4.4 मीटर चौड़ी यह सर्पाकार पाइपलाइन बाकू के दक्षिण से शुरू होकर जार्जिया गणराज्य होते हुये तुर्की के केहान बंदरगाह पर खत्म होती है। वहां से यूरोप का बाजार खुला हुआ ही है। 10 लाख बैरल प्रतिदिन क्षमता की लगभग 30,000 करोड़ रु. की लागत की यह पाइपलाइन अभी शुरू भी नहीं हुई थी कि जार्जिया में रूस के सैन्य हस्तक्षेप से सारी योजना गड़बड़ा गई। यही नहीं, ईरान ने दौलताबाद-सरख-खंगिरान पाइपलाइन पूरी कर तुर्कमेनिस्तान के गैस क्षेत्र को अपने गैस क्षेत्र से जोड़ दिया है, जहां दैत्याकर पार्स गैस क्षेत्र वर्षों से उपभोक्ता की तलाश में है। यह गैस क्षेत्र ईरान को विश्व आर्थिक समुदाय से अलग-थलग करने की अमेरिकी-इस्रायली योजना को मुश्किल बना देता है। ईरान से पाकिस्तान होते हुये आई.पी.आई. (ईरान-पाकिस्तान-इंडिया) गैसलाइन से भारत को विमुख करने के लिये ही अमेरिका ने इतनी जद्दोजहद करके भारत के साथ परमाणु करार किया था। अब पार्स का गैस क्षेत्र फिर से भारत को ललचाने लगा है। भारत और ईरान के बीच समुद्र्री पाइपलाइन द्वारा ईरानी गैस भारत लाने की संभावना के बारे में बातचीत लगातार चल रही है। अमेरिका को यह फूटी आंखों नहीं सुहाता। पर क्या करे, गैस का मामला है, गैस सभी को चाहिये। चीन को ही देख लें। अमेरिका चाहता है कि भारत और पाकिस्तान अपने पड़ोसी ईरान को भूलें और 'तापी' (तुर्कमानिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इंडिया) पाइपलाइन के द्वारा गैस तुर्कमेनिस्तान गैस क्षेत्र से लंे। इसके लिए अगर अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की आहुति देनी पड़े, तो भी ठीक है। आखिर 3,50,000 करोड़ रु. के व्यवसाय का मामला है। इसे छोड़ा कैसे जा सकता है।
 
अमेरिका पूरी तरह ईरान पर हवाई हमले के लिये उतावला है। इस्रायली वायुसेना को आगे रखकर। परंतु यह हमला तेहरान को ही नहीं, मास्को, दिल्ली और बीजिंग, सभी को प्रभावित करेगा। फिर ईराक, विश्व में दूसरा सबसे बड़ा तेल क्षेत्र होने के बावजूद, में उसे मजबूरन 2 खरब 9000000 करोड़ रुपये की वापसी अमेरिकी इरादों पर ठंडा पानी डाल देती है। बाजी अभी शुरू ही हुई है। मोहरे चले जा रहे हैं। खेल की आगे की चालें जानने के लिये शायद हमें विश्वनाथन आनंद और गैरी कास्पारोव, दोनों की मदद लेनी पड़े। खैर, अगली खेप में हम 'पाइपलानिस्तान' को लेकर अमेरिका की बढ़ती हुई बेचैनी के बारे में जानेंगेे।