जानते-बूझते होती है ऐसी ‘चूक’
   दिनांक 02-जुलाई-2018
मीडिया का भारतीयता विरोध धीरे-धीरे अपने चरम पर पहुंचने लगा है और सेकुलर पत्रकार अपना एजेंडा साधने लगे हैं। सामयिक मुद्दों पर मीडिया के रुख और रुखाई की परतें खंगालता यह स्तंभ समर्पित है विश्व के पहले पत्रकार कहे जाने वाले देवर्षि नारद के नाम। मीडिया में वरिष्ठ पदों पर बैठे, भीतर तक की खबर रखने वाले पत्रकार इस स्तंभ के लिए अज्ञात रहकर योगदान करते हैं और इसके बदले उन्हें किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया जाता।


पिछले कुछ अरसे से इसके ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे। मीडिया क्या दिखाता है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वह क्या छिपाता है। ‘दलितों’ पर अत्याचार की कोई घटना भाजपा शासित राज्य में हो तो वह बड़ी खबर है, लेकिन कांग्रेस या उसके किसी सहयोगी दल के राज्य में हो तो खबर दिखाने लायक नहीं मानी जाती। बीते दिनों महाराष्ट्र और गुजरात में दलितों से मारपीट की दो घटनाओं को मीडिया ने खूब उछाला। आजतक चैनल ने इसके लिए 'हिंदुत्व की राजनीति' को दोषी ठहराते हुए धर्म पर ऐसी भद्दी टिप्पणियां कीं, जिन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता। दोनों में से एक मामले में दलित समुदाय के लोग ही दोषी थे, जबकि दूसरे मामले में निजी दुश्मनी की बात सामने आई है। ऐसी ज्यादातर खबरें बिना पुलिस का पक्ष बताए दिखाई जाती हैं।

परेशानी वाली बात यह है कि एक दिन पहले ही बंगाल और बिहार में दलितों की हत्या की खबरें आई थीं। उनमें आरोपी मुसलमान थे। लिहाजा मीडिया ने उसे गायब कर दिया। किसी ने थोड़ा-बहुत दिखाया भी तो यह छिपाते हुए कि हत्यारे कौन थे। यह रवैया खतरनाक है, जो दलितों पर अत्याचार जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भेदभाव कर रहा है। उनकी रुचि दलितों के सम्मान और सुरक्षा में होती तो वे बंगाल और बिहार की घटनाओं को भी दिखाते। दरअसल, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पंजाब जैसे राज्यों में तो दलितों पर अत्याचार की खबरों पर एक तरह का अघोषित प्रतिबंध लगा हुआ है। पंजाब में तो एक दलित लड़के को थाने में बंद करके बिजली के झटके दिए जाने का मामला सामने आया। उसका वीडियो भी सभी चैनलों के पास था, लेकिन किसी अदृश्य शक्ति के इशारे पर यह खबर गायब कर दी गई, शायद डर था कि इससे दलितों के नए-नवेले हितैषी राहुल गांधी की पोल खुल जाएगी।

दलितों की ही तरह महिलाओं के मुद्दे पर भी तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया दोहरे रवैये का शिकार है। बाड़मेर में एक दलित बच्ची से बलात्कार हुआ, तो ज्यादातर अखबारों और चैनलों ने आरोपी राशिद खान का नाम नहीं छापा। जबकि यह वही मीडिया है, जो कुछ दिन पहले कठुआ मामले में आरोपियों के धर्म पर सबसे ज्यादा जोर दे रहा था। केरल के चर्च में 'कन्फेशन' करने आई युवती का पांच पादरियों ने यौन शोषण किया। चर्च ने इसे अंदरूनी मामला बताकर पुलिस में शिकायत तक दर्ज नहीं करवाई। हिंदू धर्माचार्यों के मामले में नमक-मिर्च लगाकर अफवाहें फैलाने वाले मीडिया ने इस घटना को एक तरह से दबा दिया। झारखंड के खूंटी जिले में चर्च और नक्सलियों का गठजोड़ सामने आया, जहां एक पादरी ने एक एनजीओ से जुड़ी लड़कियों का अपहरण करवा उनसे सामूहिक बलात्कार करवाया। यह बर्बर घटना भी दिल्ली के अखबारों और चैनलों में खास जगह नहीं पा सकी।

दरअसल जिन खबरों से चर्च, मदरसों और मस्जिदों में यौन शोषण की घटनाएं सामने आती हों, मुख्यधारा मीडिया उन्हें दबा देता है। जैसे थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन नाम की संस्था ने भारत को दुनिया भर में महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित जगह बताया, तो चैनलों और अखबारों ने उसे खूब उछाला। बिना यह सोचे कि तथ्यात्मक रूप से गलत इस 'सर्वे' के पीछे कोई बदनीयती छिपी हो सकती है। भारत विरोधी चैनल एनडीटीवी ने तो इस पर बाकायदा बहस आयोजित की और पूरे कार्यक्रम में सर्वे करने वालों से एक बार भी यह नहीं पूछा कि उनके आंकड़े क्या हैं? जहां तक हमारी जानकारी है, इस सर्वे को तूल देने के लिए संकेत कांग्रेस की तरफ से आया था। इसी उद्देश्य से इसे राहुल गांधी ने ट्वीट भी किया। देश की छवि को दुनियाभर में धूमिल करने की यह सोची-समझी साजिश थी, जिसमें मीडिया ने भी अपनी भूमिका निभाई।

लखनऊ पासपोर्ट कार्यालय में हिंदू नाम वाली एक मुस्लिम महिला ने गलत पहचान से पासपोर्ट बनवाने की कोशिश की। वह सफल नहीं हो पाई तो उसने सताए जाने का वह दांव चला जो अक्सर कट्टरपंथी और जिहादी चला करते हैं। लखनऊ के टाइम्स आॅफ इंडिया और एनडीटीवी के पत्रकारों ने निजी रुचि लेते हुए इस मामले को मजहबी रंग दे दिया। इस दौरान बड़ी सफाई से पासपोर्ट अधिकारी का पक्ष छिपाया गया। लेकिन अगले दिन तक सचाई सामने आ गई। इसके बाद बाकी चैनलों के तेवर ढीले पड़ गए, लेकिन आजतक चैनल ने जिस तरह के जहरीले और भड़काऊ कार्यक्रम प्रसारित किए, उससे पता चलता है कि उसकी वास्तविक नीयत क्या है।

ऐसा नहीं है कि पासपोर्ट विवाद के बाद मीडिया आगे सबक लेगा और बिना सभी पक्षों से बात किए ऐसी झूठी खबरें नहीं चलाएगा। यह बात लगातार सामने आ रही है कि लोकसभा चुनाव से पहले कुछ मीडिया संस्थान और पत्रकार सीधे तौर पर कांग्रेस के इशारे पर काम कर रहे हैं। इन मीडिया संस्थानों में पिछले दिनों में संपादकीय नीति से जुड़े कई औपचारिक आदेश भी जारी किए गए हैं। सबसे ‘क्रांतिकारी’ चैनल में प्रधानमंत्री मोदी से जुड़े सीधे प्रसारणों में कटौती के मौखिक आदेश दिए गए हैं। इसके तहत इंदौर दौरे पर प्रधानमंत्री की रैली को नहीं दिखाया गया। इसी तरह उनके रेडियो कार्यक्रम मन की बात को भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। मीडिया क्या दिखाए, क्या न दिखाए यह उसकी मर्जी होनी चाहिए, लेकिन वह अपनी संपादकीय नीतियां किसी राजनीतिक दल को खुश करने की मंशा से बनाता है तो यह चिंता की बात है।
 
कर्नाटक में जनता दल-एस और कांग्रेस ने सत्ता मिलते ही 'हिंदू आतंक' की थ्योरी को पुनर्जीवित करने का काम शुरू कर दिया है। किसी ने भी इसके विरोध में अगर कुछ कहा तो मीडिया उसे 'विवादित' बयान बताकर खारिज कर रहा है। यही मीडिया तब कान में तेल डाल लेता है जब कर्नाटक का ही एक मौलाना भरी सभा में कहता है,‘‘इस बार बकरीद पर गाय काटो और किसी ने आपत्ति की तो हो सकता है कि उसे भी काटना पड़ जाए।’’ इस दौरान कर्नाटक सरकार का एक मंत्री भी बगल में चुपचाप बैठा था। इसी तरह गुजरात की एक कांग्रेस विधायक ने भाजपा के सभी नेताओं की हत्या करने की ‘इच्छा’ जताई। ये दोनों ही खबरें मुख्यधारा मीडिया ने जान-बूझकर गायब कर दीं।

रोहित वेमुला की खबर कुछ दिन पहले तक मीडिया की प्राथमिकता में सबसे ऊपर हुआ करती थी। जैसे ही पता चला कि वह दलित नहीं था, मीडिया ने लीपापोती शुरू कर दी। अब पता चला है कि केरल की पार्टी मुस्लिम लीग ने रोहित वेमुला की मां को 20 लाख रुपये देने का वादा किया था। जाहिर है, इसके बदले में उनका इस्तेमाल हिंदू धर्म के खिलाफ दुष्प्रचार के लिए किया गया। यह पैसा भी उन्हें नहीं दिया गया। रोहित वेमुला की खुदकुशी को अंतरराष्ट्रीय घटना बना देने वाले ज्यादातर मीडिया संस्थानों ने उसकी मां से हुए धोखे की खबर को छुआ तक नहीं। पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या पर दिल्ली का मीडिया लगभग चुप्पी साध गया। कोई विरोध-प्रदर्शन या हत्यारों को पकड़ने की मांग नहीं सुनाई दी। जिन्हें हम 'बड़ा पत्रकार' समझते हैं उनमें से कई बेहद संदिग्ध हैं।

मीडिया का एक बड़ा वर्ग तथाकथित सेकुलर और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर गिरोह की तरह काम करता है। दुबई के एक पांच सितारा होटल में काम करने वाले भारतीय अतुल कोचर को दबाव बनाकर नौकरी से निकलवा दिया गया। उनकी गलती इतनी थी कि उन्होंने प्रियंका चोपड़ा को ट्विटर पर यह सलाह दे दी थी कि ‘आपको अपने देश में हिंदुओं पर मुसलमान शासकों के अत्याचार का दौर याद रखना चाहिए था।’ उनकी इस राय को फौरन ‘इस्लाम विरोधी’ करार दिया गया। इसमें तमाम अखबार और चैनल सबसे आगे थे। वे पत्रकार भी जो हिंदू धर्म और देश के खिलाफ बोलने को अभिव्यक्ति की आजादी का हिस्सा मानते हैं।

उधर, दिल्ली के ‘अराजक’ मुख्यमंत्री के लिए मीडिया का विचित्र प्रेम जारी है। उपराज्यपाल आवास में उनके धरने को अच्छी खासी ‘कवरेज’ मिली। इसी दौरान देश की राजधानी में पानी के लिए झगड़े में एक व्यक्ति की हत्या की खबर आई। लेकिन किसी चैनल या अखबार ने इसे ज्यादा तूल नहीं दिया, क्योंकि उत्तरदायित्व मुख्यमंत्री का बनता था। ज्यादातर संस्थानों में ‘ऊपर’ के इशारे पर खबर हटा ली गई। एक चैनल ने तो इस हत्या के लिए शहरीकरण और बढ़ती जनसंख्या को जिम्मेदार ठहरा दिया। वैसे भी दिल्ली में बिजली-पानी के भयानक संकट पर खबरें जिस तरह से चैनलों और अखबारों से गायब हैं, उससे समझा जा सकता है कि मामला क्या है।