‘श्रीराम’ की शरण में सीपीएम
   दिनांक 20-जुलाई-2018
           
भारतीय जनता पार्टी के लगातार बढ़ते समर्थन के बावजूद वामपंथी बुद्धिजीवी और राजनीतिक दल अब भी जहां राम और कृष्ण जैसे आस्था के प्रतीकों को मिथकीय चरित्र ही मान रहे हैं, वहीं केरल में इसके ठीक उलट हो रहा है। केरल की सत्ताधारी मार्क्सवादी पार्टी श्रीराम की शरण में जाती दिख रही है। मलयालम कैलेंडर के आखिरी महीने करकीडक्कम को रामायण महीने को राजकीय तौर पर मना रही है। ऐसा नहीं कि केरल में यह आयोजन पहली बार हो रहा है। हैरतअंगेज यह है कि पहली बार इसे उस पार्टी की सरकार का आधिकारिक समर्थन मिल रहा है, जो कार्ल मार्क्स के विचारों के मुताबिक चलती रही है। अपने दार्शनिक प्रेरक मार्क्स की तरह जिसके लिए धर्म अफीम रहा है, अफीम यानी नशे में डुबाने वाला। 
मानसूनी झड़ी के आखिरी महीने करकीडक्कम में केरल में अध्यात्म रामायण के मलयाली संस्करण के पाठ की सैकड़ों साल पुरानी परंपरा रही है। उत्तर भारत के अधिकांश हिंदू घरों में जिस तरह तुलसीदास कृत रामचरित मानस को एक पावन ग्रंथ के तौर पर पूजाघर में आसंदी मिली होती है, कुछ उसी तरह केरल के अधिकांश हिंदू परिवारों में पवित्र अध्यात्म रामायणम की प्रतिष्ठा है। उत्तर भारत में भी चातुर्मास शुरू होते ही सावन के महीने में रामचरित मानस का पारायण पाठ सार्वजनिक तौर पर होता है, कुछ इसी अंदाज में करकीडक्कम में रामायण पाठ का पवित्र चलन है। इसे मलयालम साहित्य के सबसे क्लासिक्स में से एक माना जाता है। रामायणम का पाठ केरल के हिंदू परिवारों में तो होता ही है, मंदिरों में भी होता है। परिवारों में इसका पाठ जहां कुछ सदस्यों द्वारा होता है, वहीं मंदिरों में ज्यादातर नीलविलाक्कु (पवित्र दीपक) को प्रकाशित करने के बाद सुबह के समय में बुजुर्गों द्वारा पाठ होता है। केरल में इस पाठ की महत्ता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि करकीडक्कम के दौरान लगभग सभी रेडियो स्टेशन और टेलीविजन चैनल रामायणम के लिए सुबह एक घंटे का स्लॉट समर्पित कर देते हैं। 
अब तक इस सांस्कृतिक परंपरा को मनाने से कम्युनिस्ट पार्टी बचती रही है। लेकिन अब उसने अपना विचार बदल दिया है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने संस्कृत संघम् के बैनर तले राज्यभर के संस्कृत, हिंदी और मलयालम शिक्षकों के जरिए रामायण महीने के दौरान राम के चरित्र को लोगों के बीच समझाने का फैसला किया है। दशकों से धर्म को अफीम मानकर खासकर हिंदू संस्कृति को प्रगतिशीलता के नाम पर नकारने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीएम अगर ऐसे कदम उठाएगी तो जाहिर है कि सवाल उठेंगे ही, सवाल उठ भी रहे हैं। लेकिन तर्क गढ़ने में माहिर सीपीएम नेता इसका जवाब भी ढूंढ़ चुके हैं।
संस्कृत संघम् से जुड़े टी. थिलाराज का यह कहना कि रामायण कोई धार्मिक किताब नहीं है, इसमें धर्मनिरपेक्षता का तत्व भी है, दरअसल सीपीएम का अपना अब तक के धर्मविरोधी चेहरे को छिपाने की कोशिश है। सीपीएम के सांसद एम बी राजेश भी कुछ इसी अंदाज में अपना प्रगतिशील चेहरा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि इन कार्यक्रमों को आयोजित करने के पीछे इन ग्रंथों के बहुसंख्यकवाद को कायम रखने का उद्देश्य है। 
मार्क्सवादी जब भी फंसते हैं, तब वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर अनरगल आरोप लगाते हैं। एम बी राजेश का यह कहना भी उसी का विस्तार है। राजेश यह नहीं मानते कि दरअसल उनकी संस्कृति विरोधी विचारधारा की कलई केरल में उतरने लगी है। इसलिए उनकी पार्टी को उसी हिंदुत्व की शरण में जाना पड़ रहा है, जिसका अब तक वह विरोध करती रही है।
आखिर केरल में यह बदलाव क्यों आया है? यह समझने में कोई चूक नहीं होनी चाहिए। केरल की जनसंख्या का 46 प्रतिशत ईसाई और मुसलमान हैं। जिन पर कांग्रेस और सीपीएम दोनों का असर रहा है। लेकिन सीपीएम को राज्य के 56 फीसद हिंदुओं की करीब 80 प्रतिशत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी का समर्थन रहा है। लेकिन अब इस वर्ग का मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से मोहभंग हो रहा है। माना जा रहा है कि राज्य के पिछले विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को जो करीब 16 फीसद लोगों का समर्थन मिला, उसमें बड़ी भागीदारी इसी वर्ग के लोगों की थी। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी इससे चिंतित है और वह अपना आधार बचाने के लिए उसी हिंदुत्व की ओर मुड़ रही है, जिसका वह विरोध करती रही है। 
ऐसा नहीं कि कम्युनिस्ट पार्टी ऐसा पहली बार कर रही है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में शारदीय नवरात्र के दौरान होने वाली दुर्गापूजा का सत्ता में रहते वक्त कम्युनिस्ट पार्टी परोक्ष समर्थन करती रही है। पूजा के दौरान लंबी छुट्टियां, कर्मचारियों को भत्ते देने के अलावा पूजा पंडालों की व्यवस्था में सीपीएम की स्थानीय इकाइयां ना सिर्फ सहयोग करती रही हैं, बल्कि व्यवस्था पर अपनी पकड़ भी रखती रहीं। पूजा के दौरान स्थानीय समितियां मोटी कमाई भी करती थीं। सीपीएम के नेता भले ही सार्वजनिक तौर पर पूजा पांडालों में हिस्सा नहीं लेते थे, लेकिन उनके परिजन और उनके घरों में पूजा होती रही। 
भारतीय विचारक रामेश्वर मिश्र पंकज का कहना है कि भारतीय मार्क्सवाद की सोच ही गलत है। उनका कहना है कि मार्क्स ने धर्म को नहीं, पंथ यानी रिलीजन को अफीम कहा है। मिश्र का तर्क है कि चूंकि मार्क्स ने हिंदुत्व को देखा ही नहीं था, इसलिए उसके विचार हिंदुत्व को लेकर है भी नहीं। मार्क्स ने चूंकि ईसाइयत और उसके मध्यकालीन क्रूर व्यवहार को देखा था, इसलिए उसने रिलीजन के ओपीयम यानी अफीम बताया। पंकज के मुताबिक, इसे समझे बिना मार्क्स के भारतीय पुजारियों ने हिंदुत्व की गलत व्याख्या की। मार्क्स अपने एक लेख में पंथ को उत्पीड़ितों की आह के रूप में भी देखा है। भारतीय मार्क्सवादी इस तर्क को भी भारतीयता की अवधारणा वाले धर्म के संदर्भ में ना सिर्फ आत्मसात करते रहे हैं, बल्कि उसकी व्याख्या भी करते रहे हैं। लेकिन भारतीय परपंरा में धर्म पीड़ितों की आह नहीं, बल्कि आत्म का विस्तार है। 
भारत में इन्हीं संदर्भों में मार्क्सवादी दर्शन पर आधारित कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीति को संदर्भहीन बताया जाता रहा है। वैसे भी जैसे-जैसे राजनीतिक चेतना का विस्तार हो रहा है, वैसे-वैसे मार्क्सवाद क यूरोपीय संदर्भों और उन्हें भारत में थोपने की कलई खुल रही है। इसलिए मार्क्सवाद भारत में नाकाम साबित हो रहा है। इसीलिए अब मार्क्सवादी दर्शन पर चलने का दावा करने वाली पार्टियां भी उसी हिंदुत्व की ओर लौट रही हैं, जिनका वे अब तक विरोध करके सत्ता और संपत्ति पर कब्जा जमाती रही हैं। केरल में रामायणम् मेला को सीपीएम का समर्थन इसी बदलती सोच का विस्तार है। बहरहाल इसका स्वागत किया जाना चाहिए। आखिर धर्म को अफीम मानने वाले भी मानने को मजबूर हुए कि धर्म संस्कृति चेतना का वाहक है, अलगाव फैलाने का सूत्र नहीं।
(लेखक आकाशवाणी के मीडिया कंसल्टेंट हैं)