विपक्ष जानता है औंधे मुंह गिरेगा अविश्वास प्रस्ताव पर फिर भी...
   दिनांक 20-जुलाई-2018
 
सियासत भी अजीब शै है। विपक्ष को पता है कि लोकसभा में तेलगु देशम पार्टी का अविश्वास प्रस्ताव औंधे मुंह गिरना तय है, फिर भी ये प्रस्ताव लाया गया है और नरेंद्र मोदी सरकार ने बड़ी दरियादिली दिखाते हुए प्रस्ताव को बहस और वोटिंग के लिए मंज़ूरी दिलवा भी दी। तकनीकी बात यह है कि टीडीपी का अविश्वास प्रस्ताव मंज़ूर किया गया है, तो बहस की शुरुआत करने का मौक़ा उसे ही मिलेगा। बाक़ी पार्टियों को बाद में। जो पार्टी बहस की शुरुआत करती है, उसे पर्याप्त समय बोलने के लिए मिलता है और बाक़ी पार्टियों के लिए समय निर्धारित होता है। उससे ज़्यादा बोलने की अनुमति उन्हें नहीं मिलती। एक और तकनीकी बात ये है कि टीडीपी का अविश्वास प्रस्ताव आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं देने के विरोध में है। इसलिए ये तय है कि उसका नुमाइंदा अपनी इसी मांग के पक्ष में प्रमुखता से दलीलें देगा। कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों का एजेंडा उसके लिए माइने नहीं रखेगा। कहीं ऐसा तो नहीं है कि एनडीए में शामिल रही टीडीपी अब भी मोदी सरकार को लेकर सहानुभूति रखती है, लेकिन राज्य के लोग नाराज़ न हों, इसलिए ये सब कौतुक किया जा रहा है?
आज़ादी के बाद से अभी तक लोकसभा में 26 बार अविश्वास प्रस्ताव लाए गए हैं। 21 बार अविश्वास प्रस्तावों पर वोटिंग हुई है। साल 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार एक वोट से हार गई थी। लेकिन यह जानकर आपको ताज्जुब होगा कि 26 बार लाए गए अविश्वास प्रस्तावों में से सबसे ज़्यादा 15 बार अविश्वास प्रस्ताव इंदिरा गांधी की सरकारों के ख़िलाफ़ लाया गया। यानी आज की कांग्रेस की प्रथम पुरोधा की सरकारों के ख़िलाफ़। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब उसके विपक्ष को सरकार पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं रहता था। मोदी सरकार के ख़िलाफ़ ये पहला अविश्वास प्रस्ताव है।
अब एक बड़ा सवाल और भी है, जो टीडीपी और बीजेपी की अंदरूनी नज़दीकी की बात साबित करता है। वो सवाल ये है कि अगर लोकसभा में तेलगु देशम पार्टी का नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव संख्या बल की वजह से गिरना तय है, तो फिर टीडीपी ये प्रस्ताव लाई ही क्यों है या फिर पिछले सत्र में भी उसने ऐसी कोशिश क्यों की थी? और सरकार भी इस बार आसानी से प्रस्ताव पर बहस और वोटिंग के लिए तैयार क्यों हो गई? लोकसभा में अकेली बीजेपी के सांसदों की संख्या 273 है और बहुमत की संख्या 268 है। एनडीए के सभी दलों के सांसदों की संख्या 312 है।
बड़ी सीधी बात है कि अगले साल यानी 2019 में आम चुनाव होना है। प्रसंगवश ये भी बता दूं कि हो सकता है कि लोकसभा चुनाव 2018 के अंत में कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ ही संपन्न हो जाए। बहरहाल, हम अभी तो अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा कर रहे हैं, तो लोकसभा में जब अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा होगी, तो सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को अपनी ताक़त तौलने का स्पष्ट मौक़ा मिल जाएगा। सरकार को पता चल जाएगा कि एनडीए में शामिल कौन सी पार्टी का साफ़-साफ़ रुख़ क्या है? उसे ये भी पता चल जाएगा कि अभी तक केंद्र सरकार में शामिल शिवसेना क्या रास्ता अख़्तियार करती है और बीजेपी में रहते हुए भी जो सांसद बाग़ी सुर में बोल रहे हैं, उनका रवैया क्या रहता है? अभी तक एआईएडीएमके ने अपना कोई रुख़ विपक्षी पार्टियों के गठबंधन में शामिल होने के बारे में स्पष्ट नहीं किया है। एआईएडीएमके अगर मोदी सरकार के पक्ष में किसी भी तरह नर्मी दिखाती है, तो ये एनडीए के लिए बहुत अच्छी बात इस माइने में होगी कि उसके सांसदों की संख्या शिवसेना के सांसदों से कहीं ज़्यादा है। तो कुल मिलाकर ये अविश्वास प्रस्ताव देश भर में हक़ीक़त की ज़मीन पर बिछी सियासत की बिसात पर लड़ी जाने वाली लड़ाई का एक मिनी रिहर्सल कहा जा सकता है। इस लिहाज़ से आप क्या मानेंगे कि 2019 में (या 2018 के अंत में) होने वाले आम चुनाव में मोदी सरकार फिर से बन जाएगी?
( रवि पराशर जी के फेसबुक वाल से सभार)