जहां आग वहां अग्निवेश

 

अग्निवेश, इस बार फिर चर्चा में हैं। मंगलवार को उनके द्वारा दिए गए भाषण और इसके बाद उनके साथ हुई मारपीट की घटना के बाद अग्निवेश सुर्खियों में बने हुए हैं। जो हुआ गलत हुआ। लोकतंत्र में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है, और यदि सभ्य समाज में कोई भी व्यक्ति या संगठन क़ानून हाथ में लेने की कोशिश करे तो उसकी हर स्तर पर भर्त्सना होनी चाहिए, उसका सतत विरोध किया जाना चाहिए. हालांकि ऐसा करते समय हमें यह अवश्य पता होना चाहिए कि आखिर दोषी कौन है और घटनाओं के मूल में आखिर है क्या?

मंगलवार की बात है. झारखंड के उत्तरी इलाके में पाकुड़ जिला है, जहां स्वामी अग्निवेश पहुंचे थे, वहां उन्होंने सनातन धर्म, संस्कृति आदि को लेकर कुछ आपत्तिजनक बातें कीं। इसका साक्ष्य वह वीडियो है जो इंटरनेट पर इस घटना के बाद से वायरल हुआ है। लोग लगातार इस घटना पर टिप्पणी कर रहे हैं।

इंटरनेट पर दोनों वीडियो मौजूद हैं पहला जिसमें अग्निवेश सनातन धर्म और संस्कृति अपने शब्द बाणों से घातक प्रहार कर रहे हैं तो दूसरी वह जिसमें उनके साथ मारपीट की गई। उनके कपड़े फाड़ दिए गए. पगड़ी उछाल दी गई. हमले के बाद अग्निवेश ने आरोप लगाया कि हमला करने वाले भाजयुमो के लोग थे। हालांकि आरोपित पक्ष का कहना है कि वे केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए वहां पहुंचे थे। उनके साथ जो हाथापाई हुई उससे उनका कुछ लेना देना नहीं है।

झारखंड शासन के मंत्री सीपी सिंह के इस बयान के बाद मामला और संदेहास्पद हो गया जिसमें उन्होंने अधिकृत रूप से, सुर्खियां बटोरने के लिए स्वामी पर ही हमले की साज़िश कराने का आरोप लगाया। बकौल मंत्री श्री सिंह ‘अग्निवेश एक धोखेबाज़ हैं। मैं उन्हें पिछले 40 वर्षों से जानता हूं। इस हमले में भाजयुमो का कोई कार्यकर्ता शामिल नहीं है। उन्होंने ही स्वयं पर हमले की साज़िश रची थी.’ श्री सिंह ने इसके अलावा विदेशी फंड लेकर प्रदेश-देश को अस्थिर करने का आरोप भी श्री अग्निवेश पर लगाया। झारखंड की रघुवर सरकार ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं।

निश्चित तौर पर जांच के बाद ही किसी निष्कर्ष तक पहुंचना संभव होगा लेकिन न तो अग्निवेश पर लगाए गए आरोप नए हैं, और न ही इनके साथ हुई मारपीट की घटना ही पहली है। इससे पहले भी गुजरात के सूरत में एक संत ने माला पहनाने के बहाने सरेआम मंच पर ही स्वामी को पीट दिया था। अगर आप अग्निवेश के समूचे करियर पर नज़र डालें तो यह कह सकते हैं कि स्वामी ने काफी मेहनत से देश की नफरत कमाई है.

हर ऐसे किसी विमर्श के समय यह सवाल अनसुलझे ही रह जाते हैं कि आखिर ऐसा क्या है कि जब भी कहीं देश के खिलाफ कुछ बात होगी, जब भी धर्म और संस्कृति के खिलाफ कहीं कोई साज़िश रची जा रही हो, वहां उसके अगुआ या उसके प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोगी के तौर पर भगवा बाना पहने स्वामी अग्निवेश ही सबसे मुखर और अगली पंक्ति में दिखते हैं. भगवा वस्त्र का जिक्र ख़ास तौर पर इसलिए भी ज़रूरी है कि जिस आर्य समाज का होने का दावा वे करते हैं, खुद उस समाज ने ही उन्हें इनके ईसाई होने और आर्थिक गबन के आरोप में अपने समाज से निकाला हुआ है।

साप्ताहिक पाञ्चजन्य ने अन्ना आन्दोलन के समय ही तथ्यों के साथ अग्निवेश के ईसाई हो जाने के आरोप का खुलासा किया था, जिसका कोई खंडन आज तक अग्निवेश की तरफ से नहीं आया। उसी समय कांग्रेस सरकार के खिलाफ अन्ना हजारे के आन्दोलन का चेहरा बने अग्निवेश एक स्टिंग में कांग्रेस के लिए ही काम करते हुए, आन्दोलन को ख़त्म करने की साजिश करते हुए कैमरे पर रिकॉर्ड हो गए थे. उसी समय उन्हें आन्दोलन से निकाल दिया गया। इसके बाद से वह ओझल हो गए थे। इस घटना ने इन्हें वर्षों बाद फिर से सुर्ख़ियों में आने का अवसर दिया है। बता दें कि बस्तर में नक्सलियों की मांद में उनके साथ ‘लाल सलाम’ का नारा लगाते हुए भी अग्निवेश पकड़े गए थे। छत्तीसगढ़ के आदिवासियों ने भी उन पर हमला किया था।

एक बार कुछ प्रसिद्ध गांधीवादी नेताओं ने अग्निवेश को आदिवासियों पर होते कथित जुल्म के खिलाफ पदयात्रा करने बस्तर बुलाया था, जल्द ही उन सभी लोगों को अग्निवेश की असलियत पता चल गई सभी लोगों ने अग्निवेश पर आन्दोलन का नेतृत्व हड़पने, चुनावी एजेंट बन जाने और कांग्रेस नेता चिदंबरम का आदेश-पालन करने वाला बताते हुए खुद को सार्वजनिक पत्र द्वारा अग्निवेश के किसी भी कार्यों से खुद को अलग कर लिया था। सभी गांधीवादी नेताओं ने अग्निवेश को राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए उनका इस्तेमाल करने का आरोप भी लगाया था। हरियाणा के पूर्व मंत्री और कुछ वर्ष पहले एक नई पार्टी के गठन की असफल कोशिश करने वाले अग्निवेश अंततः अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण ही सभी का इस्तेमाल करते हैं।

ऐसे संदेहों-साक्ष्यों की असंख्य श्रृंखला है जो स्वामी जी को संदिग्ध बताती है लेकिन, हर तरह के ऐसे भंडाफोड़ के बाद कुछ समय शांत रहकर अग्निवेश फिर से लोकलाज छोड़ किसी नए मिशनरी मिशन पर लग जाते हैं, जाहिर है वह मिशन किसी न किसी तरह से देश को कमजोर करने वाला, धर्म और संस्कृति को नुकसान पहुंचाने वाला ही पाया जाता है।

छत्तीसगढ़ के जांजगीर जिले के एक दक्षिण भारतीय परिवार में पैदा हुए अग्निवेश ने अपने तेलगू भाषी होने का फायदा उठा कर आन्ध्र-बस्तर में सक्रिय नक्सली नेताओं से संपर्क बढ़ाया। लगातार वे माओवादियों के हिंसक अलगाववादी आन्दोलनों को प्रत्यक्ष/परोक्ष रूप से मज़बूत करते रहे। कभी अमरनाथ यात्रा को लेकर आन्दोलन हुआ तो वहां भी आर्यसमाजी होने की हैसियत से बयान देने पहुंच गए जिसका फिर से आर्य समाज को खंडन करना पड़ा। कभी उड़ीसा में अगर माओ-मिशनरी पर संकट आया तो वहां भी उनके पक्ष में खड़े दिखे.

जहां तक झारखंड के उनके हालिया प्रवास का सवाल है तो वहां वे एक अनाम से संगठन ‘भारतीय आदिम जनजाति विकास समिति’ के आमंत्रण पर पाकुड़ पहुंचे थे. वहां के पहाड़िया जनजाति समाज द्वारा सदी भर से मनाये जाने वाले उत्सव ‘दामिन एकोह’ में उन्हें मुख्य अतिथि के तौर पर भाग लेना था। झारखंड के जनजाति विषयों के विशेषज्ञ वरिष्ठ पत्रकार दिव्यांशु कुमार बताते हैं कि – ‘‘झारखंड के उत्तरी इलाके की पहाड़िया जनजाति, प्रदेश की अन्य जनजातियों की तरह ही प्रखर देशभक्त है। मिशनरियों की लाख कोशिशों के बावजूद भी सबसे कम मतांतरण इसी जनजाति में हुआ है। वे सनातन परंपरा के अंग रहे हैं हमेशा से. कुल 1356 वर्ग मील में फैले इस इलाके को वे सौरिया देस कहते हैं, यानी भारत का एक अनोखी एवं विशिष्ट संस्कृति वाला अंचल. आज भी पहाड़िया लोग आधुनिक बुराइयों से दूर और सीधे सरल राष्ट्रभक्त हैं.’’ इसी जनजाति के कुछ नव मतांतरित लोगों द्वारा चर्च की मदद से स्थापित संगठन के बुलावे पर अग्निवेश यहां दक्षिण झारखंड/ उत्तर छत्तीसगढ़ की तरह पत्थलगड़ी जैसे आन्दोलन को हवा देने आए थे।

स्व. बिरसा मुंडा और सिद्धो कान्हों की तरह ही पहाड़िया जनजाति में भी एक से एक राष्ट्रभक्त नायक हुए हैं। ऐसे ही एक नायक थे मदरा पहाड़िया. उनके नेतृत्व में इस समाज को यह गौरव हासिल है कि उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर अपने इलाके को अंग्रेजों से ‘मुक्त’ जैसा करा लिया था। उन्हें किसी भी तरह का टैक्स बर्तानिया हुकूमत को नहीं देना है, ऐसा समझौता करने पर अंग्रेज विवश हो गए थे। उस विजय के प्रतीक के तौर पर मनाए जाने वाले उत्सव को राष्ट्र के खिलाफ आन्दोलन के रूप में बदल देना, देशभक्त उत्सव को भारत के खिलाफ ही खड़ा करने का षड्यंत्र इस कार्यक्रम का लक्ष्य था, ऐसा नाम न छापने की शर्त पर एक स्थानीय पत्रकार बताते हैं. जब भी कभी ईसाई मिशनरियां दबाव में होंगी तो उसके तारणहार के रूप में अग्निवेश के पहुंच जाने की प्रथा नई नहीं है। झारखंड मिशनरी आॅफ चैरिटी में नवजातों को बेचे जाने का खुलासा होने के बाद मिशनरियां दबाव में हैं। एजेंसियों की पैनी नज़र सभी मिशनरियों पर बनी हुई हैं। प्रदेश की रघुवर सरकार भी लगातार इन अपराधिक कुकृत्यों के खिलाफ अभियान चलाए हुए है। इसी तरह अभी प्रदेश के खूंटी में एक स्कूल में पांच आदिवासी बालिकाओं के खिलाफ बलात्कार की घृणित घटना और उसमें चर्च के फादर की संलिप्तता के कारण भी तेज़ी से मिशनरी एक्सपोज हो रही हैं, जाहिर है ऐसे समय में स्वामी अग्निवेश का वहां सक्रिय होना महज़ संयोग तो नहीं कहा जा सकता।

अफसोस की बात है कि कांग्रेस समेत झारखण्ड के तमाम विपक्ष को जहां उन पीड़ित आदिवासी बालिकाओं के पक्ष में खड़ा होना था, वहां वे ‘फादर’ के साथ हो रहे कथित उत्पीड़न के खिलाफ ही आवाज़ उठाकर अपराधियों-आरोपियों को प्रश्रय दे रहे हैं। यहां तक की बलात्कार के खिलाफ शासन द्वारा की गई कारवाई के खिलाफ संयुक्त विपक्ष राज्यपाल को ज्ञापन देने भी पहुंचा था। और यही विपक्ष एक साथ स्वामी अग्निवेश पर हुए हमले के अगले दिन प्रेस क्लब पहुंचा। कुछ ही घंटे पहले हुए हमले के बाद पूरी तरह स्वस्थ दिख 78 वर्षीय स्वामी वहां भी खुद पर किए गए हमले से ज्यादा कथित अल्पसंख्यकों के खिलाफ तथाकथित शासकीय जुल्मों पर ही बोलते रहे, जाहिर है स्वामी जी के एजेंडे में तब भी मिशनरियों का संरक्षण ही महत्वपूर्ण रहा।

अग्निवेश पर हुए हमले के बाद युवा मोर्चा के कुल नौ कार्यकर्ताओं को अभियुक्त बनाया गया है, हालांकि ख़बरों के अनुसार हमले के वीडियो में इन कार्यकर्ताओं की तस्वीर नहीं है। इससे मंत्री श्री सीपी सिंह के बयान को भी ज़रा बल मिलता है। सचाई तो खैर जांच के बाद सामने आएगी ही. निश्चित ही दोषी बख्शे नहीं जाने चाहिए लेकिन, ज़रूरत इस बात की भी है कि देश के भीतर पल रहे राष्ट्रविरोधी, धर्म विरोधी तत्वों के खिलाफ भी गहरी पड़ताल हो और देश को कमज़ोर करने की साज़िश में लगे लोगों का घिनौना चेहरा जनता के सामने आए।

नेपोलियन कहा करते थे- ‘जिस देश का धर्म-संस्कृति-साहित्य नष्ट हो जाता है, वह राष्ट्र जल्दी ही नष्ट हो जाता है.’ आज बड़े ही संगठित तरीके से भारत की धर्म-संस्कृति को नष्ट करने की जो साजिश रची जा रही उसके खिलाफ सतत जागृति ही हमारा युगधर्म होना चाहिए. हालिया घटनाक्रमों ने राष्ट्रविरोधी हरकतों पर अनेक कोण से हमें सोचने–समझने-सावधान होने का अवसर दिया है.