निरोगी काया जीवन का सबसे पहला सुख
   दिनांक 23-जुलाई-2018
आयुर्वेद और योग के मार्ग पर चलने से व्यक्ति कभी भी बीमार नहीं हो सकता है। हमारे ऋषि-मुनि यही करते थे और बरसों जीते थे। आज के माहौल में इस साधना की आवश्यकता और अधिक है
 
पहला सुख निरोगी काया। यदि आपका शरीर स्वस्थ नहीं है तो जीवन में आने वाला बड़े से बड़ा सुख आपको हल्का लगेगा और उस सुख का आपके जीवन में होना या न होना कुछ भी महत्व नहीं रखेगा। और दूसरी तरफ यदि आप निरोगी हैं तो जीवन में आने वाला बड़े से बड़ा दुख आपको हल्का लगेगा और आप उस दुख को धैर्यपूर्वक झेल जाएंगे। आज विश्व में लगभग 100 प्रकार की चिकित्सा पद्धतियां उपलब्ध हैं। जैसे एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, हाईड्रोथेरेपी, एक्यूप्रेशर, एक्यूपंचर इत्यादि, लेकिन आयुर्वेद और योग को छोड़कर सभी चिकित्सा पद्धतियों की जरूरत बीमार होने के बाद पड़ती है। यदि आप बीमार होंगे तभी आपको डॉक्टर गोली या इंजेक्शन देगा, अन्यथा नहीं। और यदि आप बीमार ही नहीं पड़ते हैं तो इन चिकित्सा पद्धतियों की कोई उपयोगिता ही नहीं है। लेकिन आयुर्वेद और योग ऐसी चिकित्सा है जिनके सिद्धांत और नियम अपनाने से आप सदैव निरोग बने रह सकते हैं और यदि रोगी हैं तो इस रोग का निवारण कर सकते हैं। आयुर्वेद और योग अपने आप में सरलता से भरपूर है। थोड़ा-सा ध्यान देने पर आप अपनी चिकित्सा स्वयं कर सकते हैं और अपने आसपास के लोगों को भी इसका लाभ पहुंचा कर उनको निरोगी बना सकते हैं। आयुर्वेद का लगभग 80 प्रतिशत भाग हमारी दिनचर्या का हिस्सा हो सकता है और 20 प्रतिशत ही है जब हमें रसायन या चिकित्सक की जरूरत हो। योग तो इतना सरल है कि थोड़ा ध्यान देकर सीखने पर 100 प्रतिशत अपने आप किया जा सकता है।
यहां एक प्रसंग की चर्चा जरूरी है। राजा हर्षवर्धन, जो बहुत बड़े वैज्ञानिक थे, ने गर्म समतल भूभाग पर बर्फ बनाने की विधि का आविष्कार किया था। एक बार उन्होंने भारत के सभी बड़े-बड़े चिकित्सकों की सभा का आयोजन किया और सभी के समक्ष एक प्रश्न रखा कि- ऐसी वह कौन-सी औषधि है, जो न जमीन पर पैदा होती है, न पानी के अंदर और न ही आकाश में, पर सभी बीमारियों में अत्यंत लाभकारी होती है। इसके सेवन से सभी रोगों को अपने से दूर रखा जा सकता है। प्रश्न अपने आपमें बड़ा रहस्यमय वाला था। किसी को कोई उत्तर नहीं मिला। तभी एक युवा चिकित्सक खड़ा हुआ और बोला, ‘राजन! मैं जानता हूं ऐसी औषधि का नाम। उसका नाम है प्रात: भ्रमणं, प्रात: भ्रमणं, प्रात: भ्रमणं।’ यदि सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर अधिक से अधिक प्राण वायु का उपयोग किया जाए तो शरीर के समस्त रोगों से बचा जा सकता है। समस्त मानव समाज सुखी रहे, निरोगी रहे, हमारी चिकत्सा पद्धति में इस प्रकार की प्रार्थना एवं भावना को अधिक महत्व इसलिए दिया गया कि हम सभी मनुष्य उस एक परमपिता परमात्मा की संतान हैं। हम सभी का कल्याण एक साथ हो। कहा भी गया है-
सर्वे भवंतु सुखिन:, सर्वे संतु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु, मा कश्चित दुख भाग्भवेत।।
हमारा शरीर त्रिदोषात्मक है वात, पित एवं कफ। जब वात, पित कफ तीनों समावस्था में हों तब शरीर निरोग है और यदि एक भी दोष असंतुलित हो जाए तो रोग उत्पन्न होने लगते हैं। यदि शरीर में वात असंतुलित हो जाए तो लगभग 80 रोग शरीर के अंदर आ सकते हैं। अगर पित असंतुलित हो जाए तो लगभग 50 रोग तथा कफ बिगड़ जाए तो 28 रोग शरीर को दबोच सकते हैं। यदि तीनों दोष असंतुलित हो जाए तब 148 रोग इस शरीर को अपना घर बना सकते हैं। छोटे से छोटा रोग जैसे सर्दी, खांसी, जुकाम से लेकर बड़े से बड़ा रोग जैसे कैंसर सभी वात, पित्त, कफ के बिगड़ने से ही होते हैं। आयुर्वेद के दो महान ग्रंथों (अष्टांगसंग्रह और अष्टांगहृदयसंहिता) के रचयिता ऋषि वाग्भट ने त्रिदोष को संतुलित करने का अत्यंत सरल चार नियम दिए हैं, जो कि पानी पर आधारित हैं। पहला नियम है भोजन के बाद एक घंटे तक पानी नहीं पीना। दूसरा नियम है हमेशा घूंट-घूंट कर पानी पीना है। तीसरा नियम है अत्यंत ठंडा पानी नहीं पीना है। और चौथा है सुबह उठकर भर पेट पानी पीना।
इन चार नियमों को अपनाने से आप अपने शरीर में त्रिदोषों को समावस्था में बनाए रख सकते हैं। हमारा स्वास्थ्य हमारे भोजन, पानी और हवा पर निर्भर करता है और आज की इस भागमभाग दुनिया में भोजन, पानी और हवा तीनों ही दूषित हो चुका है। भोजन कीटनाशक जैसे अनेक प्रकार के जहर से युक्त हो चुका है। शुद्ध पानी रहा नहीं और हवा भयंकर प्रदूषण से युक्त है। बड़ा ही कठिन लगता है कि किस प्रकार से अपने को निरोगी बनाकर रखा जाए। लेकिन फिर भी जितना प्रयास हम कर सकते हैं करना चाहिए। गीता में भोजन को सात्विक, राजसी एवं तामसिक श्रेणी में रखा गया है। जो व्यक्ति चिकनाईयुक्त, पौष्टिक एवं रसभरा भोजन लेता है वह सात्विक श्रेणी में आता है। कड़वा, खट्टा, नमकीन, अत्यंत गर्म एवं जलन पैदा करने वाला आहार राजसी श्रेणी में और सड़ा हुआ, आधा पका एवं आधा कच्चा, सुखा, बासी भोजन तामसी श्रेणी में आता है।
 
शरीर को निरोग रखने के लिए केवल सात्विक भोजन ही करें। आयुर्वेद में बड़े ही सरल तरीके से बताया गया है कि भोजन कैसा हो। ऋषि चरक ने भोजन के तीन सिद्धांत बता कर मनुष्य पर बड़ा उपकार किया है- ऋत भुक्, हित भुक् और मित भुक्। ऋत भुक् का मतलब है जो फल, सब्जी, भोजन जिस ऋतु में पैदा होता है उसे उसी ऋतु में खाना चाहिए, लेकिन आज इस आधुनिक युग में सभी सब्जियां एवं फल पूरे साल उपलब्ध रहते हैं। फ्रीजर के जरिए उन्हें बचाया जाता है और बाजार तक पहुंचाया जाता है। लोग बड़े चाव से खरीदते भी हैं। ऐसे लोगों को यह नहीं पता कि ऐसी चीजें रोग का कारण हैं। हित भुक् का अर्थ है हितकारी भोजन। प्रत्येक व्यक्ति को अपने शरीर की स्थिति का ज्ञान होता है। वह यह जानता है कि कौन-सा भोज्य पदार्थ उसके लिए हितकर है और कौन-सा अहितकर। बहुत लोगों को रात में दही, तो बहुतों को दूध या फिर खट्टा इत्यादि पचते नहीं हैं। इस प्रकार के अहितकारी भोज्य पदार्थों से बचना चाहिए। मित भुक् का अर्थ है जितनी भूख हो उससे कम खाएं। जब आप भोजन समाप्त कर के उठें तो आपको लगे कि थोड़ा और खाया जा सकता था। हमारा भोजन, व्यायाम, रहन-सहन, आचरण एवं जीवनशैली सरल और प्रकृति के अनुकूल होनी चाहिए। पंचतत्वों से बना शरीर जितना प्रकृति के निकट रहेगा उतना ही स्वस्थ रहेगा।
आयुर्वेद के सिद्धांतों के साथ जीवन में योग के नियमों का भी उतना ही महत्व है। योगासन, प्राणायाम, मंत्रों का उच्चारण, त्राटक और ध्यान ऐसी क्रियाएं हैं जो व्यक्ति को 100 प्रतिशत निरोगी बना सकते हैं। योग अपने आपमें पूर्णता लिए हुए है। हमारे शरीर में 11 तंत्र हैं। सभी को योग के माध्यम से निरोगी रखा जाना सरल मार्ग है। योग आसन द्वारा शरीर ह्ष्टपुष्ट तथा लचीला बनता है। प्रतिदिन सुबह शौच के पश्चात् एक घंटा योगासन करने से समस्त रोगों से बचकर सुखी और स्वस्थ जीवन जिया जा सकता है। आज समूचे विश्व ने योग को अपनाकर भारतीय दर्शन में विश्वास दिखाया है। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में योग ही एक ऐसी विद्या है जो शरीर, प्राण और मन को स्वस्थ रख सकता है। अनेक रोगों के उपचार में लाभकारी योगासन और प्राणायाम अत्यंत सरल है। शरीर को शक्तिशाली और लचीला बनाने के लिए हठयोग के आसन प्रतिदिन किए जाएं तो मधुमेह, रक्तचाप, हृदय रोग, कमजोर पाचन आदि अनेक बीमारियों को जड़ से समाप्त किया जा सकता है। शरीर जितना लचीला होगा उतना ही तंत्रिका तंत्र स्वस्थ होगा। पाचन तंत्र सभी तंत्रों के मूल में माना जा सकता है। जो भी भोजन हम करते हैं वह पाचनतंत्र में जाकर उसका रस बनता है। इसके बाद रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और अंतिम धातु शुक्र (वीर्य) बनता है। जो भोजन आपने खाया, यदि वह अच्छी प्रकार पच जाता है तो ये सभी धातु पुष्ट होती हैं और पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने के लिए योगासन से श्रेष्ठ कुछ और नहीं हो सकता। हठ योग का एक अंग सूर्य नमस्कार है, जिसमें 12 आसन एक तारतम्यता के साथ किए जाते हैं और विशेष रूप से सांस को सूर्यनमस्कार में जोड़कर किया जाए तो बहुत ही लाभकारी रहता है। योगासन का लाभ यह है कि इसे कोई भी कर सकता है। उम्र और लिंग का कोई भेद नहीं। शरीर में प्राण से संबंधित रोगों को दूर करने के लिए प्राणायाम करना लाभकारी है। आज के जीवन में तनाव ने बहुत बड़ा स्थान ले लिया है। छोटे-छोटे बच्चे तनाव से ग्रस्त दिखाई देते हैं। यदि परीक्षा में बच्चों के अंक कम आ जाएं तो वे आत्महत्या तक कर लेते हैं। शरीर, प्राण और मन के साथ-साथ हम लोगों का आत्मविश्वास भी बीमार हो गया है। हिंसा, क्रोध, लालच, असत्य, चोरी, भ्रष्टाचार, असंतोषी और ईश्वर में अंध आस्था या कम आस्था होना मानसिक रोगों का मूल कारण है। 
मन को रोक पाना असंभव है, लेकिन प्राणायाम के माध्यम से मन को नियंत्रित किया जा सकता है। कुंभक प्राणायाम मन को स्थिर करने में रामबाण है और जो व्यक्ति अपने मन को नियंत्रित कर सकता है वह अपनी इंद्रियों पर विजय पाकर अपने जीवन को सुखी, स्वस्थ एवं मंगलकारी बना सकता है।
मनुष्य निरोग रहे, इसके लिए आवश्यक है उसकी जीवनशैली सरल और संतुलित हो। वह सात्विक भोजन, योगासन, प्राणायाम एवं व्यायाम करे। यही नहीं, उसे संतोषी स्वभाव का होना चाहिए और ईश्वरभक्ति का भाव अपने मन में सदैव रखे। ऐसा कर सके तो विश्वास मानिए आपको कभी किसी चिकित्सक के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
(लेखक भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की शासकीय परिषद के सदस्य हैं)