हलाला जैसी कुप्रथा के खिलाफ जंग को तैयार मुस्लिम महिलाएं
   दिनांक 23-जुलाई-2018
अब जब मुस्लिम महिलाओं ने इस्लाम की कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाना शुरू किया है तो मुल्ला-मौलवियों ने इसे कुंद करने के लिए शरई अदालत खोलने की चाल चली है। कहा यह जा रहा है कि इन अदालतों में न केवल पारिवारिक मसले निपटाए जाएंगे बल्कि महिलाओं के हक-हुकूक की बात सुनी जाएगी, पर मुस्लिम महिलाओं को मौलवियों की अदालत पर रत्ती भर विश्वास नहीं
 
तीन तलाक और हलाला जैसी कुरीतियों के खिलाफ मुस्लिम महिलाओं ने आवाज उठाना शुरू कर दिया है
 
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम महिलाओं ने अब हलाला के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दिया है। इस्लाम के अनुसार तलाक मिलने के बाद महिला को अगर उसी आदमी से दोबारा शादीकरनी हो तो उसे किसी गैर मर्द से निकाह कर शारीरिक संबंध बनाने पड़ते हैं। इसे हलाला कहा जाता है। एक झटके में तीन बार तलाक कहने के बाद कई बार ऐसा हुआ कि जब दोनों पक्षों में समझौता हो गया और यह तय हुआ कि पति-पत्नी फिर से साथ रहेंगे। तब आड़े आ गई इस्लाम की जंजीर कि उस महिला को किसी गैर मर्द के साथ हलाला करना ही पड़ेगा। हालात तब और ज्यादा खराब हो गए जब एक बार तलाक मिलने के बाद महिला ने हलाला किया, मगर उसके पति ने उसे फिर तलाक दे दिया और जब दोबारा समझौता हुआ तो फिर हलाला की शर्त रखी गई। ऐसी ही एक पीड़ित महिला का सब्र तब जवाब दे गया जब पहली बार उसे अपके ससुर से हलाला करना पड़ा। दोबारा उसे देवर के साथ हलाला करने की शर्त रखी गयी। लेकिन पीड़ित महिला ने इस बार इनकार कर दिया और पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी। पीड़िता अब एक सामाजिकसंस्था के साथ न्याय के लिए संघर्ष कर रही है। बरेली में कुछ महिलाएं सामाजिक संस्था के माध्यम से बाकायदा इन इस्लामिक नियमों का विरोध कर रही हंै। दरअसल इस तरह के कई मामले उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में सामने आये हैं, जहां मुस्लिम महिलाओं का उत्पीड़न किया जा रहा है। जाहिर है एक जिले से यह घटनाएं सामने आई हैं तो पूरे देश में महिलाओं को शर्मिंदगी और अत्याचार में धकेलनी वाली कितनी कहानियां दबी होगी।
जब भड़की शबीना खान

 
बरेली की रजिया ने मीडिया के सामने आकर अपनी पीड़ा साझा की, उसने बताया हलाला के नाम पर कैसे उसका यौन उत्पीड़न किया गया
बरेली की शबीना खान का निकाह 2009 में मुरावपुरा के वसीम नामक युवक से हुआ था। निकाह के बाद जब शबीना ससुराल आई तो वसीम किसी ना किसी बात को लेकर मारपीट करने लगा। हद तो तब हो गई जब 2011 में वसीम ने तीन बार तलाक कह कर उसे तलाक दे दिया।
तलाक दिए जाने के बाद उसके पास कोई सहारा नहीं था। शबीना के मायके वालों की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। ऐसे में शबीना ने वसीम से कई बार मिन्नतें कीं। इसे देखकर वसीम दोबारा निकाह के लिए तैयार तो हो गया लेकिन इस्लाम के अनुसार उसने यह शर्त रखी कि शबीना को हलाला करना होगा। यह सुनकर वह चौंक गयी। शबीना के पास और कोई चारा नहीं था। जीवन-यापन के लिए वह अपने शौहर वसीम पर ही आश्रित थी। जिहाजा दिल पर पत्थर रखकर उसके यह शर्त स्वीकार कर ली। वसीम ने अपने अब्बा के साथ उसे हलाला के लिए भेज दिया। शबीना अपने ससुर से हलाला करने के बाद अपने ससुराल में रहने लगी। शबीना का आरोप है कि दोबारा जब निकाह हुआ तो वसीम फिर से अपनी पुराने ढर्रे पर आ गया और आये दिन मारपीट करने लगा। वह घर के खर्च के लिए पैसे मांगने पर भी मारपीट करता था। धीरे-धीरे परिस्थितियां और ज्यादा खराब हो गर्इं और एक दिन फिर से वसीम ने उसे तलाक दे दिया। पहले से खराब स्थिति और उस पर भी फिर से तलाक। इससे शबीना पूरी तरह से टूट गई। थक हारकर शबीना फिर से वसीम को मनाने में जुट गई। खैर, वह दोबारा निकाह के लिए तैयार तो हुआ लेकिन शर्त वही थी कि हलाला कराना होगा। और यह हलाला कोई और नहीं, वसीम का भाई करेगा। शबीना देवर से हलाला के लिए तैयार नहीं हुई। आर्थिक स्थिति ठीक ना होने के बावजूद उसने देवर के साथ हलाला के लिए मना कर दिया और अपने अधिकार के लिए लड़ने का फैसला किया। इसके बाद वह अपनी बहन के घर रहने चली गई और अपने शौहर के खिलाफ मारपीट करने और घर से निकालने की प्राथमिकी दर्ज कराई। इस पूरे मामले पर शबीना कहती हैं,‘‘पहली बार तलाक होने के बाद वसीम के अब्बा से हलाला करा लिया था क्योंकि तब मेरे पास कोई रास्ता नहीं था। लेकिन दोबारा से देवर के साथ हलाला की शर्त से मैं बहुत ज्यादा शर्मिन्दा महसूस कर रही हूं। मैं किसी भी कीमत पर देवर के साथ हलाला नहीं करूंगी। मेरी इच्छा है कि वसीम को उसके किए की सजा मिले।’’
जब कराया दोस्त से हलाला
बरेली की निशा खान के साथ भी इसी तरह की घटना घट चुकी है। पहले तलाक हुआ, फिर किसी तरह से समझौता हुआ। समझौते में हलाला की शर्त रखी गई। हलाला की शर्त मान लेने के बाद दोबारा निकाह हुआ मगर पति ने कुछ दिन बाद फिर से तलाक दे दिया। गौरतलब है कि निशा का विवाह बरेली के रहने वाले अकबर के साथ वर्ष 1999 में हुआ था। शादी के बाद पारिवारिक जीवन में काफी कलह रहने लगा।
अकबर हर दिन शराब पीकर घर आता था और झगड़ा करने के बाद बीवी को मारता-पीटता। काफी ज्यादा तनाव बढ़ जाने पर अकबर ने निशा खान को एक दिन तीन बार तलाक कहकर, तलाक दे दिया। साल 2010 में तलाक हो जाने के बाद निशा खान के साथ विवशता थी कि पति के घर के अलावा उसके पास कोई ठिकाना नहीं था। मायके वाले ऐसी स्थिति में नहीं थे कि निशा का आगे का खर्च उठा पाते। पांच वर्ष बाद किसी तरह से समझौता हुआ। अकबर ने हलाला की शर्त रखी। निशा को पहले तो अटपटा लगा लेकिन भविष्य को देखते हुए उसने हामी भर दी। अकबर ने अपने दोस्त अफरोज से उसका हलाला कराया। 2017 में एक दिन अकबर ने दोबारा तलाक देकर निशा को मार-पीटकर घर से बाहर निकाल दिया। इस दौरान निशा के चार बच्चे हुए। वह चारों बच्चों के साथ इंसाफ के लिए अब थाना-कचहरी के चक्कर लगा रही है।
दुकान मालिक से कराया जब हलाला
मीना की शादी बरेली के अहमद अली तालाब इलाके के निवासी मुन्ना से 2010 में हुई थी। मीना के दो बच्चे भी हुए। करीब तीन साल बाद दोनों बच्चों की परवाह ना करते हुए मुन्ना ने मीना को तलाक दे दिया। वह दो साल तक तलाकशुदा जिन्दगी गुजारने के बाद फिर से अपने शौहर मुन्ना के यहां पहुंची तो उसे भी हलाला की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। मुन्ना जिस दुकान में नौकरी करता था, उसने उस दुकान मालिक से मीना का हलाला कराया। फिर से निकाह हो गया मगर यह निकाह कुछ समय ही चल पाया और 2016 में मुन्ना ने फिर से मीना को तलाक दे दिया।
देवर से कराया हलाला और दिया तलाक
नजमा की आपबीती भी कुछ इसी तरह की है। उसका विवाह बरेली के हसीब से हुआ था। नजमा का आरोप है कि घर के खर्च के पैसे मांगने पर हसीब मारपीट करता था। इस बीच हसीब, नजमा और दो बच्चों को छोड़कर जयपुर नौकरी करने चला गया। घर चलाने के लिए नजमा एक फैक्ट्री में नौकरी करने लगी। 2015 में हसीब ने नजमा को तलाक दे दिया। उसके बाद किसी तरह समझौता हुआ तो उसने अपने भाई से हलाला कराया। नजमा देवर से हलाला के बाद फिर से ससुराल में आई मगर, 2016 में फिर से हसीब ने उसे तलाक दे दिया।
दर्ज हो बलात्कार का मुकदमा
बरेली की सामाजिक कार्यकर्ता निदा खान हलाला पीड़ित महिलाओं के मामले की लड़ाई लड़ रही है। वे इस पूरे मामले पर कहती हैं, ‘‘तलाक देने के बाद मजहब की आड़ लेकर हलाला की प्रक्रिया की गई, जो गलत है और अपराध की श्रेणी में आती है। मैं तो कहती हूं कि जिन लोगों ने हलाला किया है, उनके खिलाफ बलात्कार का मुकदमा दर्ज कर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। तभी इन हलाला पीड़ित महिलाओं को न्याय
मिल पाएगा।’’
प्रताड़ना से गई रजिया की जान

 
                     बरेली की रजिया ने मीडिया के सामने आकर अपनी पीड़ा को सबके सामने साझा किया था
बरेली की तलाक पीड़िता रजिया को इस कदर प्रताड़ित किया गया कि उसने अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। लेकिल रजिया की मौत के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया है। सामाजिक संस्थाएं भी उसे न्याय दिलाने के लिए आगे आई हैं। रजिया की शादी 2005 में नईम से हुई थी। 2012 में रजिया के एक बेटा भी हुआ। रजिया की बहन सारा का आरोप है कि नईम ने तीन बार तलाक कहकर, तलाक दे दिया। तलाक देने के बाद नईम ने रजिया को एक घर में कैद कर रखा था और उस दौरान उसे भूखा रखा गया और खूब पिटाई की गई। एक महीने के बाद जब रजिया की हालत ज्यादा बिगड़ने लगी तो नईम ने उसे घर से निकाल दिया। रजिया की बहन सारा और सामाजिक संस्था ‘मेरा हक’ की संचालिका फरहत नकवी की मदद से रजिया को अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल में उसका एक महीने तक इलाज चला मगर उसे बचाया नहीं जा सका। फरहत नकवी इस पूरे मामले पर कहती हैं,‘‘नईम ने रजिया के ऊपर बहुत जुल्म किए थे और वे दहेज की मांग करते थे। यह मांग पूरी न कर पाने में रजिया के घर वाले सक्षम नहीं थे। इसकी वजह से नईम और उसके घरवालों ने उसे मारा- पीटा, जिसकी वजह से उसे गंभीर चोट लगी।’’ फरहत बताती हैं कि रजिया ने आखिरी समय में हाथ जोड़ मुझसे कहा था कि मेरे बच्चे को वापस बुला लीजिएगा और मेरे पति को सजा जरूर मिलनी चाहिए।
शरई अदालत पर सियासी घमासान
शरई अदालतें बननी चाहिए या नहीं बननी चाहिए, अभी इस विषय पर बहस छिड़ी ही है कि इस बीच आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने फैसला कर लिया कि शरई अदालतें बनाई जाएंगी। इन अदालतों को बनाने के पीछे यह तर्क दिया गया हैं कि पारिवारिक न्यायालयों में मुकदमों की संख्या काफी ज्यादा हो गई है। इसके चलते समय से न्याय नहीं मिल पा रहा है। काफी समय केवल तारीखों में ही बीता जा रहा है। इसलिए मुसलमान महिलाओं के पारिवारिक विवाद को हल करने के लिए बोर्ड ने शरई अदालत बनाने की घोषणा कर दी। बोर्ड ने शरई अदालतों के साथ ही हलाला प्रथा का भी समर्थन करने का फैसला किया है।
मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सचिव जफरयाब जिलानी का कहना है,‘‘आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड शरई अदालतें खोलने की तैयारी में काफी पहले से है। तलाक और पारिवारिक मामलों के विवाद दिन-प्रति दिन बढ़ते ही जा रहे हैं। इसलिए बोर्ड की यह मंशा है कि निकाह और तलाक जैसे मामले शरई अदालतों में निपटाए जाएं।’’उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग शरई अदालत के फैसले से सहमत न हों,वे न्यायालय जा सकते हैं। शरई अदालत बनाने के बोर्ड के फैसले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार के अल्पसंख्यक मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी ने इसका विरोध किया है। उन्होंने कहा,‘‘ एक देश में दो अदालतें नहीं चल सकतीं। यह किसी भी प्रकार से संभव नहीं है कि इस्लाम मानने वाले लोग अपने पारिवारिक मामलों के विवाद को हल करने के लिए शरई अदालतें बनाएं। यहां पर एक संविधान और कानून है। इसलिए मजहब की आड़ लेकर कोई अलग से अपनी अदालत नहीं चला सकता। कुछ कठमुल्ले हैं, जो इस तरह की अदालत बनाना चाहते हैं। ऐसी सभी अदालतें राष्टÑ विरोधी हैं। महिला विरोधी हैं। इन अदालतों में महिलाओं का अपमान किया जाता है। इस प्रकार की किसी भी शरई अदालत का हमारी सरकार विरोध करती है। तो दूसरी ओर शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी ने भी इन मसले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा,‘‘शरई अदालतें सिर्फ इस्लामिक देशों में चलती हैं। हिंदुस्थान में इस प्रकार की अदालत किसी भी कीमत पर संभव नहीं है। आॅल इंडिया महिला मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर का कहना है कि शरीयत के अनुसार जो भी फैसले किए गए, वे सब एक पक्षीय थे। महिलाओं को उसमें न्याय नहीं मिल पाया। यही वजह है कि मुस्लिम महिलाओं को आखिर में न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।