संविधान के विरुद्ध शरीयत कोर्ट चाहते हैं मुसलमान

कट्टरपंथी मुसलमान देश में शरिया कोर्ट की मांग कर रहे हैं। मुस्लिम महिलाएं शरिया कोर्ट का नाम सुनते ही सिहर जाती हैं। एक तरफ जहां पूरी दुनिया शरिया कानूनों के खिलाफ आवाज उठाई जा रही है वहीं कुछ मुसलमान नेता शरिया कोर्ट की वकालत कर रहे हैं 

कट्टरपंथी मुसलमान देश में शरिया कोर्ट की मांग कर रहे हैं। मुस्लिम महिलाएं शरिया कोर्ट का नाम सुनते ही सिहर जाती हैं। एक तरफ जहां पूरी दुनिया शरिया कानूनों के खिलाफ आवाज उठाई जा रही है वहीं कुछ मुसलमान नेता शरिया कोर्ट की वकालत कर रहे हैं 

इस्लामी उन्माद की राजनीति: भारत में व्यवस्था को अपने पक्ष में करने को दबाव की राजनीति में माहिर रहे कट्टर मुस्लिम 

कथित आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के नेताओं ने देश भर में ‘शरीयत कोर्ट’ की स्थापना की घोषणा की है। यह राष्ट्रीय संविधान की भावना के विरुद्ध है। फिर भी कांग्रेस के कई नेताओं ने इसका समर्थन किया है। दूसरी ओर, कांग्रेस नेता शशि थरूर ने अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत की स्थिति में भारत के ‘हिन्दू पाकिस्तान’ बनने का भय जताया। इन बातों पर कई दृष्टि से विचार संभव है। कानूनी, राजनीतिक, नैतिक, इस्लामी, हिन्दू, आदि हरेक पहलू से इस की विस्तृत समीक्षा हो रही है। यहां हम इसे राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखने का प्रयत्न करेंगे।

 मुस्लिम महिलाएं शरिया कोर्ट का नाम सुनते ही सिहर जाती हैं।

वस्तुत: इन प्रसंगों में कुछ नया नहीं है। ये दिखाते हैं कि गत सदी से भारतीय राजनीति की मूल समस्या जस-की-तस अनसुलझी ठहरी हुई है। यह समस्या भारत पर इस्लामी आधिपत्य को पुनर्स्थापित करने और हिन्दुओं द्वारा अपनी धर्म-भूमि बचाने के संघर्ष से संबंधित है। पुराने भारतवर्ष की पहचान, आप जैसे मानें, उसके अनुसार यह संघर्ष तेरह या आठ सदियों से चल रहा है। 19वीं सदी तक राजपूतों, सिखों, जाटों और मराठों द्वारा मुगल-राज के खात्मे के साथ संघर्ष खत्म हो जाना चाहिए था। किन्तु इस्लामी मतवाद के प्रति हिन्दू शासकों के भ्रम के कारण उन्होंने इस रोग को समूल नष्ट नहीं किया।

फलत: अवसर मिलते ही, 1857 के बाद इस्लामी आक्रामकता धीरे-धीरे फिर खड़ी हो गई। इस नए दौर के अंत में हिन्दू नेता पहले के हिन्दू राजाओं की तुलना में धार्मिक, चारित्रिक रूप से दुर्बल साबित हुए। फलत: स्वामी दयानन्द, बंकिम चंद्र चटर्जी, स्वामी विवेकानन्द, श्री अरविन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, टैगोर जैसे मनीषियों की शिक्षा और चेतावनियों की उपेक्षा कर हिन्दू नेताओं ने देश का एक हिस्सा इस्लाम को सौंप देना स्वीकार कर लिया। चूंकि यह भारी भ्रम के कारण हुआ, इसीलिए शरीर का अंग काट कर दे देने के बाद भी बचे भारत रूपी शरीर में रोग बना रह गया।

नतीजा सामने है। फिर नए इस्लामी नेता कह रहे हैं कि यदि ‘शरीयत कोर्ट’ नहीं देते तो ‘हमारा अलग देश दे दो’। यानी, बार-बार काट-काटकर इस्लामी राज्य देते हुए भारत का अस्तित्व खत्म कर दिया जाए। इस प्रकार, हजार वर्ष पहले शुरू हुई प्रक्रिया का यह नवीनतम कदम है। भारत के हिन्दू चरित्र को खत्म करते हुए जब जितनी ताकत हुई, उसे टुकड़े-टुकड़े इस्लामी राज्य बनाते चलना। इतिहास की सामान्य जानकारी से भी इस प्रवृत्ति को समझना कठिन नहीं है। फिर भी, अनेक हिन्दू नेता, लेखक, समाजकर्मी आज भी उतने ही अज्ञान में हैं, जितने सदियों पहले थे। एक बार महात्मा गांधी ने कहा था कि शान्ति-प्रिय होने के कारण हिन्दू स्वभावत: भीरू होते हैं। जबकि सदियों से साम्राज्य विस्तार के लिए लड़ने के कारण मुसलमान उग्र होते हैं। पर गांधी मूल बात पर उंगली न रख सके। उन्होंने इस्लाम को एक ‘भद्र विश्वास’ (नोबल फेथ) कह कर उसकी आरती उतारी, और केवल मुसलमानों को उग्र समझ लिया, फिर उपाय करने का विफल प्रयत्न किया।

आंबेडकर ने पहचाना सच

यह सचाई डॉ. आंबेडकर ने समझी थी और हिन्दुओं को चेतावनी दी थी, ‘‘मुस्लिम राजनीति अनिवार्यत: मुल्लाओं की राजनीति है और वह मात्र एक अंतर को मान्यता देती है—हिन्दू और मुसलमानों के बीच मौजूद अंतर। जीवन के किसी पंथनिरपेक्ष तत्व का मुस्लिम राजनीति में कोई स्थान नहीं, और वे मुस्लिम राजनीतिक जमात के केवल एक ही निर्देशक सिद्धांत के सामने नतमस्तक होते हैं, जिसे मजहब कहा जाता है।’’ उन्होंने कहा कि मुस्लिम राजनीति हिन्दुओं के साथ बराबरी नहीं, बल्कि वर्चस्व के लक्ष्य से प्रेरित है। इसीलिए, डॉ. आंबेडकर के शब्दों में, मुस्लिमों की चाह हनुमानजी की पूंछ की तरह बढ़ती जाती है। उन्होंने झूठी शिकायतों को मुस्लिम राजनीति की तकनीक बताकर इसे एक नाम दिया था: ‘ग्रवेमन पोलिटिक’। यानी, झूठी शिकायतें करके सत्ता-कब्जे की ओर बढ़ना।यह सब डॉ. अांबेडकर ने 1940 में लिखा था। आज भी विभिन्न मुस्लिम नेता उसे प्रमाणित कर रहे हैं। इस में कुछ नया नहीं है। इस्लाम मुख्यत: राजनीतिक मतवाद है, इसलिए मुसलमान स्वभावत: राजनीति-कुशल होते हैं। जबकि इस्लाम के प्रति भ्रम पालने के कारण हिन्दू नेतागण नौसिखिआ साबित होते हैं।वही फिर दिख रहा है। भारत में आठ दशक पहले वाली इस्लामी अलगाववादी भाषा फिर सुनाई पड़ रही है। पर हिन्दू यह नहीं जानते कि क्या करें! वे वैसे ही असहाय लग रहे हैं जैसे 1947 में थे, जब मुट्ठीभर इस्लामी नेताओं और उनके समर्थक कम्युनिस्टों ने देश-विभाजन करा डाला था। आज हिन्दू नेताओं में यह कहने का साहस नहीं (या फिर उन्हें मालूम नहीं!) है कि मुसलमानों की सभी शिकायतों के एकमुश्त समाधान के लिए ही 1947 में देश-विभाजन हुआ था। यहां के सभी मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बना था, जिस के लिए उन्होंने अंतत: मुस्लिम लीग को वोट दिया था। विभाजन को मनवाने के लिए हिन्दू जनता को स्वयं नेहरू ने यही तर्क व ढाढस दिया था कि इस से ‘मुस्लिम समस्या’ सदा के लिए खत्म हो जाएगी। बात-बात में मुसलमानों के ‘डायरेक्ट एक्शन’ और दंगों से हिन्दुओं को मुक्ति मिलेगी।अत: पाकिस्तान बन जाने के बाद भारत में रह गए मुसलमानों के लिए शिकायत का कोई आधार नहीं बचता था। बल्कि साढ़े तीन करोड़ मुसलमानों का यहीं रह जाना ही उनके लिए अपमानजनक था। किंतु हिन्दू नेताओं की मूढ़ता के कारण यहां फिर इस्लामी राजनीति पनपने लगी। यद्यपि कुछ समय तक अनेक मुस्लिम मानते थे कि विभाजन से उन्होंने हिन्दुओं को चोट पहुंचाई, जिसके लिए उन्हें शर्मिंदा होना चाहिए।लेकिन ये सब बातें नेहरूवादी जिद ने भुला दीं। उसकी शह से कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने इतिहास को लीप-पोत डाला। इसलिए आज यहां आम हिन्दू लोग भारत पर इस्लामी आक्रमण और उसके भयावह परिणामों के संपूर्ण इतिहास से बिल्कुल अनजान हैं। इसीलिए फिर उस अलगाववादी भाषा, ‘मुसलमानों की उपेक्षा’ और ‘अपना अलग देश बनाने’ जैसे दावों को भोलेपन से देख रहे हैं।यह सब तब, जबकि स्वतंत्र भारत में कांग्रेस और दूसरी पार्टियां मुसलमानों को बढ़-चढ़कर अधिक सुविधा, अधिकार देती रहीं। संविधान को भुलाकर शिक्षा, राजनीति, कानून, आदि में इस्लामी अलगाव का सम्मान,अंतरराष्ट्रीय इस्लामी मांगों को समर्थन, इस्लामी देशों के प्रति झुकी विदेश-नीति आदि उसके बड़े उदाहरण थे।जो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पाकिस्तान आंदोलन का केंद्र था, उसे खत्म करने के बदले विशेषाधिकार प्राप्त विश्वविद्यालय बना दिया गया! फिर भी मुस्लिम शिकायतें इतनी बढ़ गर्इं कि अब फिर अलग देश की मांग है।कांग्रेस की कुटिल चालइन मुस्लिम नेताओं को फटकारने के बजाय कांग्रेसी नेता हिन्दुओं को ही बुरा-भला कह रहे हैं, जैसे गांधीजी हिन्दू महासभा या वीर सावरकर को कहते थे। क्योंकि यहां विभिन्न पार्टियों के हिन्दू नेता यह नहीं जानते कि इस्लामी राजनीतिक परंपरा क्या है। असम में मुसलमानों को खुश करने के लिए कांग्रेस ने आई.एम.डी.टी. एक्ट बनाया। फलत: पड़ोस से इस्लामी घुसपैठ बढ़ी। तब भी उसे बनाए रखा, और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भयंकर खतरा’ कहकर अवैध बताने के बावजूद कांग्रेस उसी एक्ट को फिर किसी तरह लाने के लिए सचेष्ट रही। पर मुस्लिम खुश नहीं हुए और अलग पार्टी बनाई। उन्हें और, और, और चाहिए। जब तक सब कुछ इस्लामी न हो जाए! यही वह राजनीति-कुशलता है जिसे भूलने के कारण हिन्दू नेता तमाम चढ़ावे चढ़ाकर, बार-बार विभाजन कराकर भी समस्या का समाधान नहीं कर पाएंगे।                     कट्टरवाद का पालना: अखिलेश, मुलायम, केजरीवाल और राहुलयह सार्वभौमिक तथ्य है कि किसी भू-भाग में इस्लामी आबादी के एक विशेष सीमा पार करते ही उसकी असहिष्णुता बढ़ने लगती है। वह संगठित प्रहार करके ‘सब कुछ’ लेने की मुद्रा में आने लगती है। यह कुछ कट्टरपंथियों द्वारा शुरू होता है, किंतु उदार मुसलमान वह प्रक्रिया रोक नहीं सकते, क्योंकि इस्लामी उसूलों का समर्थन उसी प्रक्रिया के पक्ष में है। कोई मुसलमान इस्लाम-विरुद्ध नहीं जा सकता, वरना उसे भी रास्ते से हटाया जाता है। यह प्रक्रिया बार-बार सब कहीं देखी गई है। सीरिया, लेबनान में यही हुआ। इंडोनेशिया, मलेशिया तथा यूरोप के इंग्लैंड, इटली, जर्मनी, बेल्जियम, हॉलैंड में वही हो रहा है। भारत में कश्मीर के बाद केरल, असम, यहां तक कि प. बंगाल, बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी जिन-जिन क्षेत्रों में मुस्लिम बाहुल्य है, वहां वही समस्या ‘क्लासिक’ रूप में सिर उठा रही है।इस बीच, तमाम सेकुलर पार्टियों के हिन्दू नेता और बुद्धिजीवी अपनी सदिच्छाओं और शब्द-जाल में उलझकर सीधी सचाई देखना नहीं चाहते! इस भगोड़ेपन का अर्थ इस्लामी नेता अधिक अच्छी तरह समझते हैं। वे अपनी ताकत और दूसरों की कमजोरी का इस्तेमाल जानते हैं। इसीलिए वे लंदन से लेकर दिल्ली तक सत्ताधारियों को झुकाने और अपनी मनमानियां स्वीकार कराने में सफल रहते हैं। ऐसी स्थिति में क्या करें?भविष्य तो अनेक बातों पर निर्भर है। किंतु मुस्लिम समस्या के समाधान के लिए कुछ निश्चित बातें याद रखना जरूरी हैं। सब से पहले तो इतिहास! हिन्दुओं की वैदिक-आध्यात्मिक एकता नष्टप्राय हो चुकी है। अब गत हजार वर्ष से इस्लामी आक्रमण के विरुद्ध संघर्ष का समान इतिहास ही उन्हें एक करने का मुख्य कारक है। इसीलिए, इस्लामवादियों और उनके नेहरूवादी, कम्युनिस्ट चाटुकारों ने इतिहास का मिथ्याकरण किया ताकि हिन्दुओं को जोड़ने का अंतिम सूत्र भी खत्म हो जाए।दुर्भाग्यवश, इस भयंकर कृत्य को गैर-कांग्रेसी लोग भी चुपचाप देखते रहे। फलस्वरूप हिन्दुओं की पिछली दो पीढ़ियों पर इसका कितना भयंकर दुष्प्रभाव पड़ा, यह शैक्षिक अकादमियों, विश्वविद्यालयों, और अंग्रेजी मीडिया की हिन्दू-विरोधी आदत में देखा जा सकता है। उन पर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे नारों से भी कोई असर नहीं पड़ता! इसका सीधा संबंध उस विषैली शिक्षा-सामग्री से है, जो इतिहास, साहित्य और समाजिक शिक्षा में गत पांच दशकों से हमारे बच्चों, युवाओं के मनो-मस्तिष्क को निरंतर खिलाई-पिलाई जा रही है। आज भी वह यथावत जारी है।अगली पीढ़ी के लिए सबकइसलिए, भारत का सच्चा इतिहास बच्चों, युवाओं को पढ़ाना अनिवार्य कर्तव्य है। वरना उनके ही हाथों से देश और हिन्दू धर्म-समाज के पूर्ण खात्मे का खतरा है! इतिहास और धर्म-रक्षा का यह अनिवार्य संबंध जिन्हें ठीक से समझना हो, वे सीताराम गोयल की संक्षिप्त पुस्तक ‘स्टोरी आॅफ इस्लामिक इंपीरियलिज्म इन इंडिया’(1982) अवश्य पढ़ें। यह पुस्तक हिन्दू बौद्धिक व राजनीतिक वर्ग की वर्तमान दशा का दर्पण है।दूसरे, इस्लाम संबंधी किसी समस्या को मात्र स्थानीय स्तर पर समझने का प्रयास व्यर्थ है। यह एक अंतरराष्ट्रीय मतवाद और समुदाय है। अत: इसे राष्ट्रवाद, स्वदेशी आदि नाम से सुलझाने की कोशिश पर्याप्त के आसपास भी है। तीसरे, विकास और उन्नति की इस्लामी धारणाएं बिल्कुल अलग हैं। इसीलिए मुस्लिम नेताओं की मुख्य चिंता मजहबी होती है। उनके द्वारा ‘भेदभाव’, ‘पिछड़ेपन’ आदि बातें हिन्दुओं के अज्ञान का लाभ उठाने के लिए कही जाती हैं।अत: कट्टर सोच के मुसलमानों को संविधान, न्याय, समानता, मानवीयता आदि के पाठ पढ़ाना निरर्थक कवायद है। जब तक उन्हें मजहबी कट्टरता से विमुख न किया जा सके, तब तक उन्हें दी जा रही सारी विशेष सुविधाएं उलटे इस्लामी अहंकार और अलगाववादी मांगें बढ़ाती हैं। यह पूरी दुनिया का अनुभव है। जहां मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, वहां वे केवल इस्लामी मांग बढ़ाने की फिराक में रहते हैं। वे देश या समाज की कोई परवाह नहीं करते, क्योंकि इस्लाम उन्हें अपने ही देश को ‘लड़ाई की जगह’ (दारुल-हरब) मानना सिखाता है, जिस पर ‘इस्लामी कब्जा होना बाकी है’। इसी उसूल को अल्लामा इकबाल ने अपनी ‘शिकवा’ और ‘जबावे-शिकवा’ (1909-10) किताब में साफगोई से समझाया था। यह किताब पाकिस्तान-आंदोलन का पहला मेनिफेस्टो कही गई थी। आज कितने बौद्धिक या नेता उसका नाम भी जानते हैं?इकबाल ने मुसलमानों को अलग से यह भी समझाया था-‘‘इन ताजा खुदाओं में सबसे बड़ा वतन है। जो पैरहन है उस का वो मजहब का कफन है।’’ यानी देश-भक्ति के फेर में पड़ना इस्लाम की मौत होगी। इसलिए देश-भक्ति घृणित है। मुस्लिम नेता अपनी बयानबाजियों में वही सब अलग-अलग तरीके से दुहराते हैं। उस की काट राष्ट्रवाद के भाषणों से नहीं होगी।राजनीतिक विचारधारा ही प्राणतत्व ध्यान दें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश के मुसलमान सैकड़ों मामलों में हिन्दुओं जैसे हैं। तब उन्हें कौन-सी चीज हिन्दुओं से अलग करती है, और इसी अलगाव पर बल देती है? इस पर ध्यान देकर ही समस्या की पहचान होगी और समाधान भी मिलेगा। वरना गांधीवाद, नेहरूवाद, सेक्युलरवाद या विकासवाद के पास इस का जबाव नहीं है, क्योंकि अधिकांश हिन्दू नेता इस्लाम पर चर्चा से बचना चाहते हैं। केवल सज्जन मुसलमानों के उदाहरण देकर सब ठीक-ठाक मानते हैं। मानो ओवैसी या जिलानी जैसे कुछ लोग गड़बड़ करते हैं। इस तरह, अपने को भुलावा देकर वे उस मतवाद को नजरअंदाज करते हैं, जो मुसलमानों को हिन्दुओं और संविधान, देश भक्ति, विवेक आदि हर चीज से भी दूर रखता है। इसीलिए, जब इस्लामी उसूल मुसलमानों पर अपना प्रभाव दिखाता है, तो पूरा हिन्दू नेतृत्व ठगा-सा खड़ा रह जाता है, क्योंकि उसने इस्लाम पर सीधा विमर्श करने और मुसलमानों को विवेकशील बनाने का काम हाथ में लिया ही नहीं!हिन्दू नेता, बुद्धिजीवी इस्लाम को एक और पंथ मानने में असल चीज नहीं देखते कि इस्लाम राजनीतिक विचारधारा भी है। बल्कि यही उसका प्राण-तत्व है। मौलाना आजाद से लेकर अयातुल्ला खुमैनी तक अनगिनत देशी-विदेशी नेता साफ कहते रहे हैं कि ‘पूरा इस्लाम राजनीति है।’ तब, एक राजनीतिक मतवाद को मजहब मानकर चुप रहना उसे ‘वॉक-ओवर’ देने के समान है! हिन्दू नेतृत्व पिछले सौ साल से यही गलती करता रहा, और इससे हिन्दुओं और मुसलमानों की भी घोर हानि होती रही है।यही बिन्दु गंभीरता से विचारणीय है। जहां मुसलमान बहुसंख्यक नहीं, वैसे देश में यदि वे राष्ट्रीय संविधान के सामने इस्लामी कानूनों की मांग छोड़ दें, तब कुरान, हदीस, शरीयत आदि के आदेशों का क्या होगा?इसलिए, ‘शरीयत कोर्ट’ को हल्के में लेना या बकवास ठहराना भूल है। जिलानी जैसे नेता जिस वैचारिक जमीन पर खड़े हैं, उसे चुनौती दिए बिना उन्हें निर्णायक रूप से हराना नामुमकिन है। इसे मुसलमान जानते हैं। अच्छा हो, हिन्दू भी जानें। वरना वे बार-बार पाकिस्तान बनवाते रहेंगे। पर, अब एक और वैसे झटके के बाद हिन्दू धर्म-समाज के रूप में भारत नहीं बचेगा। अत: देखना होगा कि ओवैसी, राशिद अल्वी, सैफुद्दीन सोज, सलमान खुर्शीद, महबूबा मुफ्ती या जफरयाब जिलानी जैसे विविध पार्टियों के मुस्लिम नेताओं की बयानबाजियों में कौन-सा सूत्र समान है? अभी तक भारत के हिन्दू नेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार इस प्रश्न को आंख मिलाकर देखना तक नहीं सीख सके हैं।                                    दुनिया के अनेक देशों में शरिया कानूनों के विरुद्ध आवाज उठाई जा रही हैशशि थरूर उसी का उदाहरण हैं। वे गांधीजी वाली गलती दुहरा रहे हैं। उनके विचारों की बुनियादी भूल यह है कि वे हिन्दू धर्म और इस्लाम को समान रूप से पंथ मानते हैं। मानो किसी देश में केवल मुसलमानों का होना जितना भयावह होता है, उतना ही भारत में केवल हिन्दुओं का होना हो जाएगा! वे यह मामूली तथ्य भुलाते हैं कि सदियों पहले, जब भारत में केवल हिन्दू थे, तभी यह देश धन-वैभव ही नहीं, ज्ञान-विज्ञान-कला-संस्कृति, हर क्षेत्र में विश्व में अग्रणी था। साथ ही, दुनिया में कहीं भी उत्पीड़ित होते लोगों के लिए उदार शरण-स्थली भी था। यहूदी, पारसी, बौद्ध आदि कितने ही उत्पीड़ित समूहों को हिन्दू भारत ने शरण दी थी। इसकी तुलना में अरब, अफ्रीका, एशिया में किस मुस्लिम देश ने अपने भी देश के ईसाइयों, यहूदियों, बौद्धों को जिन्दा तक रहने या अपने पंथ के साथ रहने दिया?यह सत्य बेहिचक कहना होगा कि भारत हिन्दू-भूमि है। यहां के मुसलमान पिछली पीढ़ियों के हिन्दू ही हैं, जिन्हें इस्लामी उत्पीड़न से कभी मुसलमान बनना पड़ा था। वे आज भी एक मानसिक कैद में हैं। इसी रूप में हमें उनसे सहानुभूति है। पर यदि भारत हिन्दू-भूमि न रहा, तो उन की स्थिति भी बदतर होगी। सारी तुलनाएं यह दिखा सकती हैं। अत: भारत की हिन्दू पहचान को बचाना, इस की रक्षा करना पहली प्रतिज्ञा होना चाहिए। अन्यथा न तो कट्टर इस्लामी राजनीति की काट होगी, न यह देश बचेगा। यह कितना भी कड़वा, कठिन लगे, किन्तु इस प्रतिज्ञा को घोषित-नीति बनाने में ही सभी समस्याओं की कुंजी है। अन्यथा सभी नेता और पार्टियां भारत को बचाने में विफल रहेंगे।(लेखक राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर और हिन्दी स्तम्भ-लेखक हैं)

यह सब डॉ. अांबेडकर ने 1940 में लिखा था। आज भी विभिन्न मुस्लिम नेता उसे प्रमाणित कर रहे हैं। इस में कुछ नया नहीं है। इस्लाम मुख्यत: राजनीतिक मतवाद है, इसलिए मुसलमान स्वभावत: राजनीति-कुशल होते हैं। जबकि इस्लाम के प्रति भ्रम पालने के कारण हिन्दू नेतागण नौसिखिआ साबित होते हैं।

वही फिर दिख रहा है। भारत में आठ दशक पहले वाली इस्लामी अलगाववादी भाषा फिर सुनाई पड़ रही है। पर हिन्दू यह नहीं जानते कि क्या करें! वे वैसे ही असहाय लग रहे हैं जैसे 1947 में थे, जब मुट्ठीभर इस्लामी नेताओं और उनके समर्थक कम्युनिस्टों ने देश-विभाजन करा डाला था। आज हिन्दू नेताओं में यह कहने का साहस नहीं (या फिर उन्हें मालूम नहीं!) है कि मुसलमानों की सभी शिकायतों के एकमुश्त समाधान के लिए ही 1947 में देश-विभाजन हुआ था। यहां के सभी मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बना था, जिस के लिए उन्होंने अंतत: मुस्लिम लीग को वोट दिया था। विभाजन को मनवाने के लिए हिन्दू जनता को स्वयं नेहरू ने यही तर्क व ढाढस दिया था कि इस से ‘मुस्लिम समस्या’ सदा के लिए खत्म हो जाएगी। बात-बात में मुसलमानों के ‘डायरेक्ट एक्शन’ और दंगों से हिन्दुओं को मुक्ति मिलेगी।

अत: पाकिस्तान बन जाने के बाद भारत में रह गए मुसलमानों के लिए शिकायत का कोई आधार नहीं बचता था। बल्कि साढ़े तीन करोड़ मुसलमानों का यहीं रह जाना ही उनके लिए अपमानजनक था। किंतु हिन्दू नेताओं की मूढ़ता के कारण यहां फिर इस्लामी राजनीति पनपने लगी। यद्यपि कुछ समय तक अनेक मुस्लिम मानते थे कि विभाजन से उन्होंने हिन्दुओं को चोट पहुंचाई, जिसके लिए उन्हें शर्मिंदा होना चाहिए।

लेकिन ये सब बातें नेहरूवादी जिद ने भुला दीं। उसकी शह से कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने इतिहास को लीप-पोत डाला। इसलिए आज यहां आम हिन्दू लोग भारत पर इस्लामी आक्रमण और उसके भयावह परिणामों के संपूर्ण इतिहास से बिल्कुल अनजान हैं। इसीलिए फिर उस अलगाववादी भाषा, ‘मुसलमानों की उपेक्षा’ और ‘अपना अलग देश बनाने’ जैसे दावों को भोलेपन से देख रहे हैं।

यह सब तब, जबकि स्वतंत्र भारत में कांग्रेस और दूसरी पार्टियां मुसलमानों को बढ़-चढ़कर अधिक सुविधा, अधिकार देती रहीं। संविधान को भुलाकर शिक्षा, राजनीति, कानून, आदि में इस्लामी अलगाव का सम्मान,अंतरराष्ट्रीय इस्लामी मांगों को समर्थन, इस्लामी देशों के प्रति झुकी विदेश-नीति आदि उसके बड़े उदाहरण थे।

जो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पाकिस्तान आंदोलन का केंद्र था, उसे खत्म करने के बदले विशेषाधिकार प्राप्त विश्वविद्यालय बना दिया गया! फिर भी मुस्लिम शिकायतें इतनी बढ़ गर्इं कि अब फिर अलग देश की मांग है।

कांग्रेस की कुटिल चाल

इन मुस्लिम नेताओं को फटकारने के बजाय कांग्रेसी नेता हिन्दुओं को ही बुरा-भला कह रहे हैं, जैसे गांधीजी हिन्दू महासभा या वीर सावरकर को कहते थे। क्योंकि यहां विभिन्न पार्टियों के हिन्दू नेता यह नहीं जानते कि इस्लामी राजनीतिक परंपरा क्या है। असम में मुसलमानों को खुश करने के लिए कांग्रेस ने आई.एम.डी.टी. एक्ट बनाया। फलत: पड़ोस से इस्लामी घुसपैठ बढ़ी। तब भी उसे बनाए रखा, और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भयंकर खतरा’ कहकर अवैध बताने के बावजूद कांग्रेस उसी एक्ट को फिर किसी तरह लाने के लिए सचेष्ट रही। पर मुस्लिम खुश नहीं हुए और अलग पार्टी बनाई। उन्हें और, और, और चाहिए। जब तक सब कुछ इस्लामी न हो जाए! यही वह राजनीति-कुशलता है जिसे भूलने के कारण हिन्दू नेता तमाम चढ़ावे चढ़ाकर, बार-बार विभाजन कराकर भी समस्या का समाधान नहीं कर पाएंगे।

                     कट्टरवाद का पालना: अखिलेश, मुलायम, केजरीवाल और राहुल

यह सार्वभौमिक तथ्य है कि किसी भू-भाग में इस्लामी आबादी के एक विशेष सीमा पार करते ही उसकी असहिष्णुता बढ़ने लगती है। वह संगठित प्रहार करके ‘सब कुछ’ लेने की मुद्रा में आने लगती है। यह कुछ कट्टरपंथियों द्वारा शुरू होता है, किंतु उदार मुसलमान वह प्रक्रिया रोक नहीं सकते, क्योंकि इस्लामी उसूलों का समर्थन उसी प्रक्रिया के पक्ष में है। कोई मुसलमान इस्लाम-विरुद्ध नहीं जा सकता, वरना उसे भी रास्ते से हटाया जाता है। यह प्रक्रिया बार-बार सब कहीं देखी गई है। सीरिया, लेबनान में यही हुआ। इंडोनेशिया, मलेशिया तथा यूरोप के इंग्लैंड, इटली, जर्मनी, बेल्जियम, हॉलैंड में वही हो रहा है। भारत में कश्मीर के बाद केरल, असम, यहां तक कि प. बंगाल, बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी जिन-जिन क्षेत्रों में मुस्लिम बाहुल्य है, वहां वही समस्या ‘क्लासिक’ रूप में सिर उठा रही है।

इस बीच, तमाम सेकुलर पार्टियों के हिन्दू नेता और बुद्धिजीवी अपनी सदिच्छाओं और शब्द-जाल में उलझकर सीधी सचाई देखना नहीं चाहते! इस भगोड़ेपन का अर्थ इस्लामी नेता अधिक अच्छी तरह समझते हैं। वे अपनी ताकत और दूसरों की कमजोरी का इस्तेमाल जानते हैं। इसीलिए वे लंदन से लेकर दिल्ली तक सत्ताधारियों को झुकाने और अपनी मनमानियां स्वीकार कराने में सफल रहते हैं। ऐसी स्थिति में क्या करें?

भविष्य तो अनेक बातों पर निर्भर है। किंतु मुस्लिम समस्या के समाधान के लिए कुछ निश्चित बातें याद रखना जरूरी हैं। सब से पहले तो इतिहास! हिन्दुओं की वैदिक-आध्यात्मिक एकता नष्टप्राय हो चुकी है। अब गत हजार वर्ष से इस्लामी आक्रमण के विरुद्ध संघर्ष का समान इतिहास ही उन्हें एक करने का मुख्य कारक है। इसीलिए, इस्लामवादियों और उनके नेहरूवादी, कम्युनिस्ट चाटुकारों ने इतिहास का मिथ्याकरण किया ताकि हिन्दुओं को जोड़ने का अंतिम सूत्र भी खत्म हो जाए।

दुर्भाग्यवश, इस भयंकर कृत्य को गैर-कांग्रेसी लोग भी चुपचाप देखते रहे। फलस्वरूप हिन्दुओं की पिछली दो पीढ़ियों पर इसका कितना भयंकर दुष्प्रभाव पड़ा, यह शैक्षिक अकादमियों, विश्वविद्यालयों, और अंग्रेजी मीडिया की हिन्दू-विरोधी आदत में देखा जा सकता है। उन पर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे नारों से भी कोई असर नहीं पड़ता! इसका सीधा संबंध उस विषैली शिक्षा-सामग्री से है, जो इतिहास, साहित्य और समाजिक शिक्षा में गत पांच दशकों से हमारे बच्चों, युवाओं के मनो-मस्तिष्क को निरंतर खिलाई-पिलाई जा रही है। आज भी वह यथावत जारी है।

अगली पीढ़ी के लिए सबक

इसलिए, भारत का सच्चा इतिहास बच्चों, युवाओं को पढ़ाना अनिवार्य कर्तव्य है। वरना उनके ही हाथों से देश और हिन्दू धर्म-समाज के पूर्ण खात्मे का खतरा है! इतिहास और धर्म-रक्षा का यह अनिवार्य संबंध जिन्हें ठीक से समझना हो, वे सीताराम गोयल की संक्षिप्त पुस्तक ‘स्टोरी आॅफ इस्लामिक इंपीरियलिज्म इन इंडिया’(1982) अवश्य पढ़ें। यह पुस्तक हिन्दू बौद्धिक व राजनीतिक वर्ग की वर्तमान दशा का दर्पण है।

दूसरे, इस्लाम संबंधी किसी समस्या को मात्र स्थानीय स्तर पर समझने का प्रयास व्यर्थ है। यह एक अंतरराष्ट्रीय मतवाद और समुदाय है। अत: इसे राष्ट्रवाद, स्वदेशी आदि नाम से सुलझाने की कोशिश पर्याप्त के आसपास भी है। तीसरे, विकास और उन्नति की इस्लामी धारणाएं बिल्कुल अलग हैं। इसीलिए मुस्लिम नेताओं की मुख्य चिंता मजहबी होती है। उनके द्वारा ‘भेदभाव’, ‘पिछड़ेपन’ आदि बातें हिन्दुओं के अज्ञान का लाभ उठाने के लिए कही जाती हैं।

अत: कट्टर सोच के मुसलमानों को संविधान, न्याय, समानता, मानवीयता आदि के पाठ पढ़ाना निरर्थक कवायद है। जब तक उन्हें मजहबी कट्टरता से विमुख न किया जा सके, तब तक उन्हें दी जा रही सारी विशेष सुविधाएं उलटे इस्लामी अहंकार और अलगाववादी मांगें बढ़ाती हैं। यह पूरी दुनिया का अनुभव है। जहां मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं, वहां वे केवल इस्लामी मांग बढ़ाने की फिराक में रहते हैं। वे देश या समाज की कोई परवाह नहीं करते, क्योंकि इस्लाम उन्हें अपने ही देश को ‘लड़ाई की जगह’ (दारुल-हरब) मानना सिखाता है, जिस पर ‘इस्लामी कब्जा होना बाकी है’। इसी उसूल को अल्लामा इकबाल ने अपनी ‘शिकवा’ और ‘जबावे-शिकवा’ (1909-10) किताब में साफगोई से समझाया था। यह किताब पाकिस्तान-आंदोलन का पहला मेनिफेस्टो कही गई थी। आज कितने बौद्धिक या नेता उसका नाम भी जानते हैं?

इकबाल ने मुसलमानों को अलग से यह भी समझाया था-‘‘इन ताजा खुदाओं में सबसे बड़ा वतन है। जो पैरहन है उस का वो मजहब का कफन है।’’ यानी देश-भक्ति के फेर में पड़ना इस्लाम की मौत होगी। इसलिए देश-भक्ति घृणित है। मुस्लिम नेता अपनी बयानबाजियों में वही सब अलग-अलग तरीके से दुहराते हैं। उस की काट राष्ट्रवाद के भाषणों से नहीं होगी।

राजनीतिक विचारधारा ही प्राणतत्व

ध्यान दें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश के मुसलमान सैकड़ों मामलों में हिन्दुओं जैसे हैं। तब उन्हें कौन-सी चीज हिन्दुओं से अलग करती है, और इसी अलगाव पर बल देती है? इस पर ध्यान देकर ही समस्या की पहचान होगी और समाधान भी मिलेगा। वरना गांधीवाद, नेहरूवाद, सेक्युलरवाद या विकासवाद के पास इस का जबाव नहीं है, क्योंकि अधिकांश हिन्दू नेता इस्लाम पर चर्चा से बचना चाहते हैं। केवल सज्जन मुसलमानों के उदाहरण देकर सब ठीक-ठाक मानते हैं। मानो ओवैसी या जिलानी जैसे कुछ लोग गड़बड़ करते हैं। इस तरह, अपने को भुलावा देकर वे उस मतवाद को नजरअंदाज करते हैं, जो मुसलमानों को हिन्दुओं और संविधान, देश भक्ति, विवेक आदि हर चीज से भी दूर रखता है। इसीलिए, जब इस्लामी उसूल मुसलमानों पर अपना प्रभाव दिखाता है, तो पूरा हिन्दू नेतृत्व ठगा-सा खड़ा रह जाता है, क्योंकि उसने इस्लाम पर सीधा विमर्श करने और मुसलमानों को विवेकशील बनाने का काम हाथ में लिया ही नहीं!

हिन्दू नेता, बुद्धिजीवी इस्लाम को एक और पंथ मानने में असल चीज नहीं देखते कि इस्लाम राजनीतिक विचारधारा भी है। बल्कि यही उसका प्राण-तत्व है। मौलाना आजाद से लेकर अयातुल्ला खुमैनी तक अनगिनत देशी-विदेशी नेता साफ कहते रहे हैं कि ‘पूरा इस्लाम राजनीति है।’ तब, एक राजनीतिक मतवाद को मजहब मानकर चुप रहना उसे ‘वॉक-ओवर’ देने के समान है! हिन्दू नेतृत्व पिछले सौ साल से यही गलती करता रहा, और इससे हिन्दुओं और मुसलमानों की भी घोर हानि होती रही है।

यही बिन्दु गंभीरता से विचारणीय है। जहां मुसलमान बहुसंख्यक नहीं, वैसे देश में यदि वे राष्ट्रीय संविधान के सामने इस्लामी कानूनों की मांग छोड़ दें, तब कुरान, हदीस, शरीयत आदि के आदेशों का क्या होगा?

इसलिए, ‘शरीयत कोर्ट’ को हल्के में लेना या बकवास ठहराना भूल है। जिलानी जैसे नेता जिस वैचारिक जमीन पर खड़े हैं, उसे चुनौती दिए बिना उन्हें निर्णायक रूप से हराना नामुमकिन है। इसे मुसलमान जानते हैं। अच्छा हो, हिन्दू भी जानें। वरना वे बार-बार पाकिस्तान बनवाते रहेंगे। पर, अब एक और वैसे झटके के बाद हिन्दू धर्म-समाज के रूप में भारत नहीं बचेगा। अत: देखना होगा कि ओवैसी, राशिद अल्वी, सैफुद्दीन सोज, सलमान खुर्शीद, महबूबा मुफ्ती या जफरयाब जिलानी जैसे विविध पार्टियों के मुस्लिम नेताओं की बयानबाजियों में कौन-सा सूत्र समान है? अभी तक भारत के हिन्दू नेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार इस प्रश्न को आंख मिलाकर देखना तक नहीं सीख सके हैं।

 

                                   दुनिया के अनेक देशों में शरिया कानूनों के विरुद्ध आवाज उठाई जा रही है

शशि थरूर उसी का उदाहरण हैं। वे गांधीजी वाली गलती दुहरा रहे हैं। उनके विचारों की बुनियादी भूल यह है कि वे हिन्दू धर्म और इस्लाम को समान रूप से पंथ मानते हैं। मानो किसी देश में केवल मुसलमानों का होना जितना भयावह होता है, उतना ही भारत में केवल हिन्दुओं का होना हो जाएगा! वे यह मामूली तथ्य भुलाते हैं कि सदियों पहले, जब भारत में केवल हिन्दू थे, तभी यह देश धन-वैभव ही नहीं, ज्ञान-विज्ञान-कला-संस्कृति, हर क्षेत्र में विश्व में अग्रणी था। साथ ही, दुनिया में कहीं भी उत्पीड़ित होते लोगों के लिए उदार शरण-स्थली भी था। यहूदी, पारसी, बौद्ध आदि कितने ही उत्पीड़ित समूहों को हिन्दू भारत ने शरण दी थी। इसकी तुलना में अरब, अफ्रीका, एशिया में किस मुस्लिम देश ने अपने भी देश के ईसाइयों, यहूदियों, बौद्धों को जिन्दा तक रहने या अपने पंथ के साथ रहने दिया?

यह सत्य बेहिचक कहना होगा कि भारत हिन्दू-भूमि है। यहां के मुसलमान पिछली पीढ़ियों के हिन्दू ही हैं, जिन्हें इस्लामी उत्पीड़न से कभी मुसलमान बनना पड़ा था। वे आज भी एक मानसिक कैद में हैं। इसी रूप में हमें उनसे सहानुभूति है। पर यदि भारत हिन्दू-भूमि न रहा, तो उन की स्थिति भी बदतर होगी। सारी तुलनाएं यह दिखा सकती हैं। अत: भारत की हिन्दू पहचान को बचाना, इस की रक्षा करना पहली प्रतिज्ञा होना चाहिए। अन्यथा न तो कट्टर इस्लामी राजनीति की काट होगी, न यह देश बचेगा। यह कितना भी कड़वा, कठिन लगे, किन्तु इस प्रतिज्ञा को घोषित-नीति बनाने में ही सभी समस्याओं की कुंजी है। अन्यथा सभी नेता और पार्टियां भारत को बचाने में विफल रहेंगे।

(लेखक राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर और हिन्दी स्तम्भ-लेखक हैं)