क्या पक्षपात सेकुलर मीडिया का एजेंडा है!

 

घटनाओं एवं खबरों को मनचाहा मोड़ दे मीडिया अपना ही नुक्सान कर रहा है। अभी हाल में राहुल गांधी ने चोरी-छिपे कुछ मुस्लिम नेताओं से मुलाकात की।

 

उन्होंने गुजरात चुनाव के दौरान मंदिर जाने पर अपनी गलती मानी और भरोसा दिलाया कि कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है और आगे भी रहेगी। लोकसभा चुनाव से पहले हुई इस मुलाकात और बात के बहुत सारे मतलब निकाले जा सकते हैं। लेकिन मीडिया के एक जाने-पहचाने तबके को इसमें राहुल गांधी की ‘सूझबूझ’ दिखाई दी। शशि थरूर ने भाजपा के जीतने पर ‘हिन्दू पाकिस्तान’ बनने का डर दिखाया तो भी वह वर्ग उनकी तरफ से सफाई दे रहा था कि उनके कहने का मतलब कुछ और है। ऐसे तमाम उदाहरण हैं जो बताते हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले मीडिया का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस के लिए ‘डैमेज कंट्रोल’ की जिम्मेदारी निभा रहा है।

उधर अग्निवेश से झारखंड में हुई मारपीट को दिल्ली के कुछ चैनलों ने तूल देने की कोशिश की। स्थानीय पुलिस ने दोषियों पर तेजी से कार्रवाई की, लेकिन मीडिया की दिलचस्पी इस बहाने अपना एजेंडा चलाने में थी। एनडीटीवी की अगुआई में कुछ चैनलों ने इस पर खूब मातम मनाया। करीब-करीब यही रवैया तब भी देखने को मिला जब बरेली की निदा खान को इस्लाम से खारिज करने का फतवा सुनाया गया। इन दोनों घटनाओं में मुख्यधारा मीडिया यह रट लगाता रहा कि 'यह इस्लाम नहीं है', जबकि अग्निवेश पर हमले के लिए सीधे तौर पर ‘हिंदुत्व’ को दोषी बताया गया। मीडिया का यही वर्ग टेरेसा की संस्था में बच्चे बेचने को ‘मामूली’ घटना साबित करने में जुटा है।

कई मीडिया समूहों की नीति हमेशा से हिंदू संस्थाओं के खिलाफ दुष्प्रचार और कट्टरपंथी ईसाई और मुस्लिम संगठनों को बढ़ावा देने की रही है। इसी कड़ी में टाइम्स आॅफ इंडिया रंगे हाथ पकड़ा गया। अखबार ने चेन्नई के एक मदरसे में तस्करी कर लाए गए 11 साल के लड़के की खबर छापी। लेकिन शीर्षक में बड़ी सफाई से ‘वेद पाठशाला’ शब्द डाल दिया। इससे यह भाव पैदा हो रहा था मानो वेद पाठशालाओं में बच्चे तस्करी करके लाए जाते हैं। जबकि खबर एक मदरसे के बारे में थी। पाठकों ने जब इस रवैये पर आपत्ति दर्ज कराई तो वेबसाइट पर शीर्षक बदल दिया गया।

भाजपा से जुड़े मुस्लिम नेता भी हमेशा मुख्यधारा मीडिया के निशाने पर रहते हैं। ताजा मिसाल मध्य प्रदेश में देखने को मिली, जहां प्रवक्ता डॉ. गुलरेज शेख के खिलाफ दैनिक भास्कर ने महिला मरीजों से बदसलूकी की फर्जी खबर छापी। पता चला कि डॉ. शेख बीते कई साल से डाक्टरी नहीं कर रहे और जो घटना बताई गई थी, उससे उनका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। गनीमत बस यह हुई कि अखबार ने अगले दिन डॉक्टर शेख का पक्ष भी छाप दिया।

पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में प्रधानमंत्री की रैली के दिन चैनलों का रवैया हतप्रभ करने वाला था। बड़े पैमाने पर ऐसी रिपोर्ट आर्इं कि लोगों को रैली स्थल तक जाने से रोका गया। लेकिन एकाध को छोड़ किसी चैनल को इसमें ‘लोकतंत्र को खतरा’ नहीं दिखाई दिया। एक जगह रैली में जा रहे स्थानीय लोगों और पुलिस के बीच झड़प हो गई तो एबीपी न्यूज ने सारा ध्यान उसी पर केंद्रित कर दिया। इस रैली में भगदड़ मचाने की जिस तरह से कोशिश की गई थी उस पर मीडिया ने बड़ी सफाई से आंखें मूंद ली।

उधर तमाम बड़े अखबारों और चैनलों ने एक झूठ फैलाने की कोशिश की कि 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीतने वाली हिमा दास की जाति जानने के लिए लोग इंटरनेट पर खोजबीन कर रहे हैं। जब जानकारों ने इस खबर की जांच की तो पता चला कि ऐसी कोई बात नहीं है। यह मनगढ़ंत खबर हिंदू धर्म को नीचा दिखाने के उद्देश्य से फैलाई गई। इसके पीछे भी कांग्रेस से जुड़े कुछ व्यक्तियों का हाथ था। सवाल यह है कि इस अफवाह को बिना जांच के प्रतिष्ठित अखबारों और चैनलों ने जगह कैसे दे दी।