कारगिल विजय दिवस पर विशेष: भारत के शूरवीरों ने चटाई थी पाकिस्तान को धूल

1999 में 60 दिनों तक चले कारगिल युद्ध में हमारे 527 से अधिक वीर योद्धा बलिदान हुए थे। भारत माता के इन सपूतों ने अपने प्राण देकर भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह कर पाकिस्तानी सेना को धूल चटाई थी और भारत का 'आॅपरेशन विजय' सफल हुआ था

 1965 और 1971 में भारत के हाथों मिली कड़ी पराजय की टीस पाकिस्तानी सेना के मन में हमेशा से रही है। पूरी दुनिया यह बात जानती है कि वहां लोकतंत्र सिर्फ नाम का ही है, आज तक पाकिस्तान का कोई प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। सेना का जब मन चाहा तब तख्ता पलट दिया। 1971 में जब पाकिस्तान भारत से युद्ध हार गया तो लंबे समय तक शांति रही। इस बीच भारत और पाकिस्तान दोनों की सेनाएं आमने सामने नहीं आईं। हालांकि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज कभी नहीं आया बीच—बीच में वह भारतीय सीमा में घुसपैठ करने की कोशिश करता रहा। 1984 में ‘ऑपरेशन अबाबील’ भी पाकिस्तान ने शुरू किया था लेकिन वह सफल नहीं हो पाया था। इसके तहत पाकिस्तान की सियाचिन में घुसपैठ करने की कोशिश नाकाम कर दी गई दी और भारतीय सेना ने वहां कब्जा ले लिया। इस आॅपरेशन के असफल होने की टीस सेना प्रमुख बनने के बाद भी मुशर्रफ के मन में रही, जो 1999 के कारगिल युद्ध के रूप में बाहर आई। मुशर्रफ ने अपनी किताब ‘इन द लाइन आॅफ फायर’ में इस बात का उल्लेख भी किया है।1990 में कश्मीर में पाक समर्थित आतंकवाद की शुरुआत हुई थी जो आज तक जारी है। 1998 में भारत द्वारा परमाणु परीक्षण किए जाने के बाद पाकिस्तान ने भी परमाणु परीक्षण किए। इस समय परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान की सेना के प्रमुख थे। परमाणु परीक्षण के बाद पैदा हुई तनाव की स्थिति पर बातचीत करने के लिए दोनों देशों ने फरवरी 1999 में लाहौर डिक्लेरेशन पर हस्ताक्षर किए जिसके अनुसार कश्मीर मुद्दे पर शांतिपूर्वक हल के लिए प्रयास करने को राजी हुए। हालांकि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। सर्दियों के दिनों में पाकिस्तान की तरफ से कुछ घुसपैठिए लाइन आॅफ कंट्रोल की और पाए गए। उनसे पूछताछ के बाद पता चला कि उनके आॅपरेशन का नाम 'आॅपरेशन बद्र' है जिसका उद्देश्य था कश्मीर और लद्दाख के बीच के लिंक को तोड़ना ताकि भारतीय सेना सियाचिन ग्लेशियर से पीछे हट जाए और पाकिस्तान भारत पर कश्मीर मुद्दे पर अपनी बात मनवाने का दबाव बना सके। पाकिस्तान की यह मंशा भी थी कि यदि इस मामले पर कोई तनाव उत्पन्न होगा तो यह अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन जाएगा। शुरुआत में भारतीय सेना को लगा कि भारतीय सीमा में घुसपैठ करने वाले जिहादी हैं और सेना इन्हें कुछ ही दिनों में बाहर निकाल देगी लेकिन बाद में स्पष्ट हो गया कि ऐसा नहीं है दुश्मन की योजना छोटी—मोटी मुठभेड़ की नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर युद्ध लड़ने की है। इसके बाद भारत ने आॅपरेशन विजय की शुरूआत की जिसमें दो लाख सैनिकों ने भाग लिया। यह 60 दिनों तक चला। इस युद्ध में हमारे हमारे 527 से अधिक वीर योद्धा बलिदान और 1300 से ज्यादा घायल हुए थे। इनमें से अधिकांश अपने जीवन के 30 वसंत भी नही देख पाए थे। भारत माता के इन सपूतों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है। कुछ ऐसा रहा था घटनाक्रम 3 मई को पाकिस्तान की सेना की तरफ से कारगिल में घुसपैठ की जानकारी स्थानीय चारवाहों से भारतीय सेना को मिली। 5 मई को भारतीय सेना के गश्ती दल को धोखे से बंधक बना लिया गया। उन्हें यातनाएं देकर मारा गया। 9 मई को पाकिस्तानी सेना की तरफ से भंयकर गोलाबारी की गई। 10 मई को द्रास, काक्सर और मुश्कोह क्षेत्र में घुसपैठ होने का पता चला। इस पर सेना ने कुछ और सैन्य दलों को कारगिल की तरफ भेजा। इसके बाद लगातार युद्ध चला और धीरे—धीरे भारत ने अपनी सभी चोटियों पर कब्जा ले लिया। 14 जुलाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने आॅपरेशन विजय को सफल घोषित किया। 26 जुलाई को औपचारिक रूप से सेना से कारगिल युद्ध समाप्त होने की घोषणा की और आॅपरेशन विजय पूरा हुआ। हिमालय से भी ऊंचा था उनका साहस 1999 के शुरुआती महीनों में जब ठंड बहुत ज्यादा थी तो पाकिस्तानी सेना की नॉदर्न लाइट इंफ्रेंटी की कई बटालियन ने अफगानी लड़कों के साथ कारगिल और द्रास में भारतीय सेना द्वारा छोड़ी गई चोटियों पर कब्जा कर लिया। पाकिस्तान की अनियमित सेनाओं को आगे रखा गया ताकि यह भ्रम फैलाया जा सके कि पाकिस्तानी सेनाओं का इसमें कोई हाथ नहीं है। भारतीय सेना के वापस आने से पहले ही पाकिस्तानी सेना नेशनल हाइवे 1डी के साथ लगी 150 वर्ग किलोमीटर में फैली चौकियों पर कब्जा करके बैठ गई। पाकिस्तान ने यह धोखा उस समय दिया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से भारत शाांति वार्ता का सिलसिला जारी रखे हुए थे। उस समय शायद किसी ने यह नहीं सोचा था कि पाकिस्तान की सेना भारतीय सीमा में घुसपैठ करेगी। कारगिल संघर्ष की शुरुआत 1999 में मई के महीने में कश्मीर के कारगिल जिले से शुरू हुई थी। बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों व पाक समर्थित आतंकवादियों ने लाइन ऑफ कंट्रोल यानी भारत-पाकिस्तान की वास्तविक नियंत्रण रेखा के भीतर प्रवेश कर कई महत्वपूर्ण पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लेह-लद्दाख को भारत से जोड़ने वाली सड़क का नियंत्रण हासिल कर सियाचिन-ग्लेशियर पर भारत की स्थिति को कमजोर कर हमारी राष्ट्रीय अस्मिता के लिए खतरा पैदा कर दिया था। दो महीने से ज्यादा चले इस युद्ध में भारतीय सेना ने लाइन ऑफ कंट्रोल पार न करने के आदेश के बावजूद अपनी मातृभूमि में घुसे आक्रमणकारियों को मार भगाया था। भारत के रणबांकुरों ने अपना जीवन बलिदान कर मातृभूमि की रक्षा की थी। मातृभूमि के लिए बलिदान होने वाले रणबांकुरों ने अपने परिजनों से वापस लौटकर आने का वादा किया था। उन्होंने वादा निभाया लेकिन वे लौटे तो जरूर मगर लकड़ी के ताबूत में और उसी तिरंगे मे लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की सौगन्ध उन्होंने उठाई थी। जिस राष्ट्रध्वज के आगे कभी उनका माथा सम्मान से झुका होता था, वही तिरंगा मातृभूमि के इन बलिदानी जांबाजों से लिपटकर उनकी गौरव गाथा का बखान कर रहा था।  

 

1965 और 1971 में भारत के हाथों मिली कड़ी पराजय की टीस पाकिस्तानी सेना के मन में हमेशा से रही है। पूरी दुनिया यह बात जानती है कि वहां लोकतंत्र सिर्फ नाम का ही है, आज तक पाकिस्तान का कोई प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। सेना का जब मन चाहा तब तख्ता पलट दिया। 1971 में जब पाकिस्तान भारत से युद्ध हार गया तो लंबे समय तक शांति रही। इस बीच भारत और पाकिस्तान दोनों की सेनाएं आमने सामने नहीं आईं। हालांकि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज कभी नहीं आया बीच—बीच में वह भारतीय सीमा में घुसपैठ करने की कोशिश करता रहा। 1984 में ‘ऑपरेशन अबाबील’ भी पाकिस्तान ने शुरू किया था लेकिन वह सफल नहीं हो पाया था। इसके तहत पाकिस्तान की सियाचिन में घुसपैठ करने की कोशिश नाकाम कर दी गई दी और भारतीय सेना ने वहां कब्जा ले लिया। इस आॅपरेशन के असफल होने की टीस सेना प्रमुख बनने के बाद भी मुशर्रफ के मन में रही, जो 1999 के कारगिल युद्ध के रूप में बाहर आई। मुशर्रफ ने अपनी किताब ‘इन द लाइन आॅफ फायर’ में इस बात का उल्लेख भी किया है।

1990 में कश्मीर में पाक समर्थित आतंकवाद की शुरुआत हुई थी जो आज तक जारी है। 1998 में भारत द्वारा परमाणु परीक्षण किए जाने के बाद पाकिस्तान ने भी परमाणु परीक्षण किए। इस समय परवेज मुशर्रफ पाकिस्तान की सेना के प्रमुख थे। परमाणु परीक्षण के बाद पैदा हुई तनाव की स्थिति पर बातचीत करने के लिए दोनों देशों ने फरवरी 1999 में लाहौर डिक्लेरेशन पर हस्ताक्षर किए जिसके अनुसार कश्मीर मुद्दे पर शांतिपूर्वक हल के लिए प्रयास करने को राजी हुए। हालांकि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। सर्दियों के दिनों में पाकिस्तान की तरफ से कुछ घुसपैठिए लाइन आॅफ कंट्रोल की और पाए गए। उनसे पूछताछ के बाद पता चला कि उनके आॅपरेशन का नाम 'आॅपरेशन बद्र' है जिसका उद्देश्य था कश्मीर और लद्दाख के बीच के लिंक को तोड़ना ताकि भारतीय सेना सियाचिन ग्लेशियर से पीछे हट जाए और पाकिस्तान भारत पर कश्मीर मुद्दे पर अपनी बात मनवाने का दबाव बना सके। पाकिस्तान की यह मंशा भी थी कि यदि इस मामले पर कोई तनाव उत्पन्न होगा तो यह अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन जाएगा। शुरुआत में भारतीय सेना को लगा कि भारतीय सीमा में घुसपैठ करने वाले जिहादी हैं और सेना इन्हें कुछ ही दिनों में बाहर निकाल देगी लेकिन बाद में स्पष्ट हो गया कि ऐसा नहीं है दुश्मन की योजना छोटी—मोटी मुठभेड़ की नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर युद्ध लड़ने की है। इसके बाद भारत ने आॅपरेशन विजय की शुरूआत की जिसमें दो लाख सैनिकों ने भाग लिया। यह 60 दिनों तक चला। इस युद्ध में हमारे हमारे 527 से अधिक वीर योद्धा बलिदान और 1300 से ज्यादा घायल हुए थे। इनमें से अधिकांश अपने जीवन के 30 वसंत भी नही देख पाए थे। भारत माता के इन सपूतों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है।

कुछ ऐसा रहा था घटनाक्रम

3 मई को पाकिस्तान की सेना की तरफ से कारगिल में घुसपैठ की जानकारी स्थानीय चारवाहों से भारतीय सेना को मिली। 5 मई को भारतीय सेना के गश्ती दल को धोखे से बंधक बना लिया गया। उन्हें यातनाएं देकर मारा गया। 9 मई को पाकिस्तानी सेना की तरफ से भंयकर गोलाबारी की गई। 10 मई को द्रास, काक्सर और मुश्कोह क्षेत्र में घुसपैठ होने का पता चला। इस पर सेना ने कुछ और सैन्य दलों को कारगिल की तरफ भेजा। इसके बाद लगातार युद्ध चला और धीरे—धीरे भारत ने अपनी सभी चोटियों पर कब्जा ले लिया। 14 जुलाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने आॅपरेशन विजय को सफल घोषित किया। 26 जुलाई को औपचारिक रूप से सेना से कारगिल युद्ध समाप्त होने की घोषणा की और आॅपरेशन विजय पूरा हुआ।

हिमालय से भी ऊंचा था उनका साहस

1999 के शुरुआती महीनों में जब ठंड बहुत ज्यादा थी तो पाकिस्तानी सेना की नॉदर्न लाइट इंफ्रेंटी की कई बटालियन ने अफगानी लड़कों के साथ कारगिल और द्रास में भारतीय सेना द्वारा छोड़ी गई चोटियों पर कब्जा कर लिया। पाकिस्तान की अनियमित सेनाओं को आगे रखा गया ताकि यह भ्रम फैलाया जा सके कि पाकिस्तानी सेनाओं का इसमें कोई हाथ नहीं है। भारतीय सेना के वापस आने से पहले ही पाकिस्तानी सेना नेशनल हाइवे 1डी के साथ लगी 150 वर्ग किलोमीटर में फैली चौकियों पर कब्जा करके बैठ गई। पाकिस्तान ने यह धोखा उस समय दिया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से भारत शाांति वार्ता का सिलसिला जारी रखे हुए थे। उस समय शायद किसी ने यह नहीं सोचा था कि पाकिस्तान की सेना भारतीय सीमा में घुसपैठ करेगी।

 

कारगिल संघर्ष की शुरुआत 1999 में मई के महीने में कश्मीर के कारगिल जिले से शुरू हुई थी। बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिकों व पाक समर्थित आतंकवादियों ने लाइन ऑफ कंट्रोल यानी भारत-पाकिस्तान की वास्तविक नियंत्रण रेखा के भीतर प्रवेश कर कई महत्वपूर्ण पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लेह-लद्दाख को भारत से जोड़ने वाली सड़क का नियंत्रण हासिल कर सियाचिन-ग्लेशियर पर भारत की स्थिति को कमजोर कर हमारी राष्ट्रीय अस्मिता के लिए खतरा पैदा कर दिया था।

दो महीने से ज्यादा चले इस युद्ध में भारतीय सेना ने लाइन ऑफ कंट्रोल पार न करने के आदेश के बावजूद अपनी मातृभूमि में घुसे आक्रमणकारियों को मार भगाया था। भारत के रणबांकुरों ने अपना जीवन बलिदान कर मातृभूमि की रक्षा की थी।

मातृभूमि के लिए बलिदान होने वाले रणबांकुरों ने अपने परिजनों से वापस लौटकर आने का वादा किया था। उन्होंने वादा निभाया लेकिन वे लौटे तो जरूर मगर लकड़ी के ताबूत में और उसी तिरंगे मे लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की सौगन्ध उन्होंने उठाई थी। जिस राष्ट्रध्वज के आगे कभी उनका माथा सम्मान से झुका होता था, वही तिरंगा मातृभूमि के इन बलिदानी जांबाजों से लिपटकर उनकी गौरव गाथा का बखान कर रहा था।