महबूबा के बयान दर्शाते हैं उनकी हताशा
   दिनांक 25-जुलाई-2018
महबूबा मुफ्ती का यह कहना कि अगर ‘दिल्ली’ ने 1987 की तरह राज्य की जनता के वोट पर डाका डाला, पीडीपी में किसी किस्म की तोड़-फोड़ की कोशिश की, तो पहले एक सलाहुद्दीन, एक यासीन मलिक ही पैदा हुए, इस बार अंजाम अधिक खतरनाक होगा। इस तरह का बयान उनकी हताशा और सोच को दर्शाता है
 
 जेकेएलएफ आतंकियों के कब्जे से छूटने के बाद मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ रूबिया और महबूबा मुफ्ती (फाइल चित्र)
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने ‘दिल्ली’ को 1987 की याद दिलाई है। उनका कहना है कि अगर ‘दिल्ली’ ने 1987 की तरह राज्य की जनता के वोट पर डाका डाला, पीडीपी में किसी किस्म की तोड़-फोड़ की कोशिश की, तो पहले एक सलाहुद्दीन, एक यासीन मलिक ही पैदा हुए, इस बार अंजाम अधिक खतरनाक होगा।’’
कश्मीर में ‘दिल्ली’ शब्द का राक्षसीकरण किया गया। अपनी हर स्याह-सफेद करतूतों के लिए ‘दिल्ली’ को दोषी ठहराकर साफ बच निकलने का रिवाज घाटी में पुराना है, किंतु सूचना व सोशल मीडिया के इस युग में यह दांव अब उतना आसान नहीं है। जम्मू-कश्मीर की जनता ने एक-एक कर देश के तमाम राज्यों से खानदानी राज को जाते और विकास को राजनीति के केंद्र में आते देखा है। वहीं, अलगाववादियों के भरते खजानों व दोहरे पैमानों के खुलासे से उनके प्रति लोगों का समर्थन भी घटा है।
महबूबा मुफ्ती इस पुराने मुहावरे का उपयोग कर ‘दिल्ली’ और प्रदेश की जनता को अगर अप्रत्यक्ष रूप से हिंसा और आतंकवाद के बढ़ने की धमकी देने की कोशिश कर रही हैं तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि यह दोधारी तलवार है जो उन्हें भी नुकसान पहुंचा सकती है। उन्हें यह भी समझना चाहिए कि अगर लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार का आग्रह न हो तो केंद्र के लिए राज्यपाल शासन से सुविधाजनक कुछ भी नहीं। यह अवसर गंवाकर उनके विधायक तोड़ने की कोशिश कोई राजनीतिक दल क्यों करेगा। यह सुविधा उसे राज्य का संविधान देती है जिसे उन्होंने राज्य की जनता को ‘विशेष दर्जे’ के आवरण में लपेट कर बेचा है।
भाजपा महासचिव राम माधव द्वारा जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने की संभावनाओं से इनकार के बाद भी इस तरह के बयान तथ्यों पर आधारित न होकर अपने लड़खड़ाते साम्राज्य व पार्टी में वर्चस्व को मिल रही चुनौती से ध्यान बंटाने की कोशिश हैं। महबूबा की पार्टी के जिन विधायकों के नाम उछाले जा रहे हैं, वे आतंक या अलगाव की बात नहीं करते, बल्कि पार्टी की कार्य संस्कृति पर सवाल उठा रहे हैं। वे महबूबा पर एक गुट के इशारे पर काम करने के साथ उनके सहयोगियों पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगा रहे हैं। दरअसल महबूबा अपनी व्यक्तिगत व राजनीतिक चूक को स्वीकार करने के बजाय अपने विधायकों, विरोधियों व यहां तक कि उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने वाले मतदाताओं को भी हिंसा का भय दिखाकर अपने पक्ष में लामबंद किए रखना चाहती हैं। यह जम्मू-कश्मीर की राजनीति का कड़वा सच है कि वहां का हर दल केंद्र की सत्ता में मौजूद राजनीतिक दल के साथ गठबंधन की सरकार बनाता है और सत्ता से बाहर होने पर ‘दिल्ली’ को गाली देता है। उसका प्रतिद्वंद्वी दल उस पर ‘दिल्ली’ का एजेंट होने का आरोप लगाता है और सरकार गिरते ही परदे के पीछे उसी ‘दिल्ली’ के सहयोग से सरकार बनाने के रास्ते खोजता है।

 
दुर्भाग्य से ‘दिल्ली’ से दोस्ती-दुश्मनी का यह खेल दशकों तक चला और राज्य की जनता व लोकतांत्रिक संस्थाएं इसका शिकार होती रहीं। राज्य की राजनीति दो दलों के बीच न होकर दो परिवारों की सियासत के बीच ठहरी हुई है। भाजपा इस मैदान में पहली बार उतरी है, जबकि कांग्रेस इस खेल की माहिर खिलाड़ी है। उसने इसी की बदौलत सूबे में विरोधी वातावरण के बावजूद दोनों स्थानीय दलों (पीडीपी व नेशनल कॉन्फ्रेंस) की तुलना में अधिक समय तक शासन किया है। अवाम के वोटों पर डाका डालने का चलन तो राज्य में चुनावों की शुरुआत से ही है। 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में हुए थे। तब मुफ्ती मुहम्मद सईद की पार्टी सूबे में पहली बार स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव पीडीपी ने नेशनल कॉन्फ्रेंस व कांग्रेस गठबंधन को चुनौती देते हुए 16 सीटें हासिल की थी। इन चुनावों में करीब 44 प्रतिशत मतदान हुआ था। 2008 के चुनावों में भी माहौल बना रहा और 61 प्रतिशत मतदान के साथ पीडीपी ने 21 सीटें जीतीं, पर सरकार नेशनल कॉन्फ्रेंस (28) और कांग्रेस (17) ने मिलकर बनाई। 2014 में मतदान प्रतिशत बढ़कर 65 प्रतिशत से अधिक हो गया। इस समय भी केंद्र में भाजपा की सरकार थी। 28 सीटें जीत कर पीडीपी ने जम्मू से 25 सीटों वाली भाजपा के साथ सरकार बनाई और मुफ्ती सईद मुख्यमंत्री बने। दस महीने बाद ही उनका निधन हो गया और अप्रैल 2016 में महबूबा ने मुख्यमंत्री का पद संभाला।
मुफ्ती और महबूबा देश तथा राज्य के बदलते राजनीतिक हालातों व मतदाताओं के मनोविज्ञान को समझने में असफल रहे। इसी वजह से उन्होंने अपनी विजय के लिए देश की उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था को श्रेय देने के बजाए पाकिस्तान व कश्मीर में सक्रिय उसकी कठपुतलियों का आभार व्यक्त किया। एक ओर देश में भ्रष्टाचार और परिवारवाद के विरुद्ध बयार थी तो घाटी में हिंसा से मुक्ति पाकर विकास की मुख्य धारा में शामिल होने की छटपटाहट।
अलगाववादियों के चुनाव बहिष्कार की अपील को नजरअंदाज कर राज्य की जनता ने 65 प्रतिशत से अधिक मतदान कर जो समर्थन व्यक्त किया था, अलगाववादी दवाब से बाहर आ पाने की मुफ्ती परिवार की असमर्थता ने उसे खो दिया। इसके चलते अनंतनाग से रिकॉर्ड बहुमत से जीतने वाली महबूबा केंद्र की घोषणा के बावजूद अनिश्चितता के कारण अपने द्वारा ही खाली की गई अनंतनाग लोकसभा सीट पर चुनाव कराने का साहस नहीं दिखा सकीं।

 
सत्ता गंवाने के बाद अपनी पार्टी में मचे घमासान के चलते महबूबा के बयान को उनकी निराशा का ही प्रतीक मानना चाहिए। पर जिस तरह से उन्होंने 1987 की घटनाओं का संदर्भ से काट कर उल्लेख किया है, उसे अनदेखा करना भी ठीक नहीं होगा। महबूबा 1987 के जिस विधानसभा चुनाव का उल्लेख कर रही हैं, उसमें काफी धांधली हुई थी। इस धांधली का आरोप नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस पर है, जिन्होंने मिलकर चुनाव लड़ा था। उस समय गठबंधन ने 76 में से 66 सीटें जीती थीं। आठ पर निर्दलीय और मात्र दो सीटों पर भाजपा को जीत मिली। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। महबूबा के पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद उस समय कांग्रेस में थे। वे राजीव गांधी कैबिनेट में जम्मू-कश्मीर का प्रतिनिधित्व कर रहे थे व पर्यटन एवं नागरिक उड्डयन मंत्री थे। तब सलाहुद्दीन- क्या लोकतांत्रिक अधिकारों की तलाश में पाकिस्तान गए थे? सैयद अलीशाह गिलानी तो धांधली के बाद भी चुनाव जीते थे, जिसकी पेंशन वे आज तक ले रहे हैं।
अवाम के वोट पर डाका डालने से सलाहुद्दीन और यासीन पैदा तो हो गए, पर उन्हें तब तक कोई नहीं पूछता था जब तक महबूबा की छोटी बहन रूबिया सईद के अपहरण के बदले पांच आतंकी नहीं छोड़े गए। श्रीनगर की सड़कों पर पहली बार खुलेआम बंदूकें तभी लहराई गर्इं, जब राज्य सरकार के विरोध के बावजूद गृह मंत्रालय ने आतंकियों को उनकी शर्तों पर छोड़ा था। उस समय मुफ्ती सईद ही भारत के गृह मंत्री और वी.पी. सिंह प्रधानमंत्री थे।
यासीन व उसके साथियों को आतंकी बनाने तथा आजादी के मसीहा की तरह स्थापित करने में जिनकी भूमिका रही, 1987 को याद करते समय उन्हें भी याद किया जाएगा।  2014 में भाजपा की पीडीपी के साथ मिलकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली की पहल सात दशक की कुटिल राजनीति, बर्बर हिंसा, तुच्छ स्वार्थों व विश्वासघातों के अतीत से बाहर आकर संवाद की एक नई कोशिश थी। इस ऐतिहासिक अवसर को गंवा कर पीडीपी ने बड़ी भूल की है।