झारखंड में जनजातीय समाज के बीच मुसलमानों की गहरी साजिश

भारत विरोधी गतिविधियों के कारण झारखंड पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला राज्य है। 21 फरवरी 2018 से झारखंड सरकार ने राज्य में पीएफआई पर प्रतिबंध लगा दिया हैहाल ही में झारखंड में एक खुफिया रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि झारखंड में प्रतिबंधित संगठन पीएफआई ( पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया ) के मुसलमान युवक जनजातीय समाज की भोलीभाली लड़कियों को अपने चंगुल में फंसाकर उनसे शादियां कर जमीन कब्जा रहे हैं। स्थानीय स्पेशल सेल ने इस संबंध में पुलिस मुख्यालय को अपनी रिपोर्ट भेजी है। रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि पीएफआई राजमहल, उधवा, तालझारी और बरहेट प्रखंड के अयोध्या, जोगोटोला, वृंदावन, करमटोला, महाराजपुर, बालूग्राम, गंगटिया, जोंका, तीन पहाड़ बाजार और पाकुड़ के चंद्रापाड़ा, राशिपुर, जोगाडीह व पादरकोला गांवों में जमीन खरीद रहा है। इसके अलावा कई गांवों में पीएफआई ने जमीनों पर कब्जा भी किया है। अब झारखंड सरकार इन सभी कब्जों की जांच कराने जा रही है। वहां के एक अधिकारी ने बताया कि मामला उनके संज्ञान में आया है। जिन लोगों ने इस तरह से जमीने कब्जाईं हैं जांच के बाद उनकी रजिस्ट्री निरस्त की जाएगी।सिमी का दूसरा रूप है पीएफआईपीएफआई ऐसा क्यों कर रहा है ? इसके पीछे पीएफआई की मंशा क्या है इसके लिए यह जानना जरूरी है कि पीएफआई आखिर है क्या ? दरअसल पीएफआई प्रतिबंधित संगठन सिमी (इस्लामिक स्टूडेंट मूवमेंट ऑफ इंडिया) का ही दूसरा रूप है। भारत सरकार द्वारा की गई कार्रवाई से सिमी के पैर उखड़ने के बाद पाकिस्तान के इशारे पर भारत को अस्थिर करने के लिए पाकिस्तान ने जिस संगठन का इस्तेमाल किया वह कामयाब नहीं हुआ तो फिर पाकिस्तान ने अपनी रणनीति में परिवर्तन किया और पीएफआई को मैदान में उतारा। पीएफआई की शुरुआत केरल में नेशनल डमोक्रेटिक फ्रंट (एडीएफ) के उत्तराधिकारी के रूप में हुई। बाद में कनार्टक के फोरम फॉर डिग्निटी और तमिलनाडू में मनिथा नीति पासाराई (एमएनपी) के साथ इसका विलय हो गया। अन्य राज्यों में भी, जैसे-गोवा के सिटिजन फोरम, राजस्थान की कम्युनिटी सोशल एंड एजुकेशनल सोसायटी, पश्चिम बंगाल नागरिक अधिकार सुरक्षा समिति, मणिपुर के लिलोंग सोशल फोरम और आंध्र प्रदेश की एसोसिएशन ऑफ सोशल जस्टिस के साथ पीएफआई का विलय कर दिया गया। इसके अनुषांगिक संगठनों में रिहैब इंडिया फाउंडेशन, इंडियन फ्रैटरनिटी फोरम, कॉन्फेडरेशन ऑफ मुस्लिम रिलीफ नेटवर्क और सत्य सारिणी जैसे संगठन शामिल हैं। आतंकी संगठनों के साथ हैं पीएफआई के संबंध2010 में पीएफआई पर आरोप लगा कि प्रतिबंधित इस्लामिक आतंकवादी संगठन सिमी के साथ उसके संबंध हैं। पीएफआई का राष्ट्रीय अध्यक्ष अब्दुल रहमान पहले सिमी का राष्ट्रीय सचिव था। इसका राज्य सचिव अब्दुल हमीद मास्टर सिमी में भी राज्य सचिव रह चुका था। सिमी के ज्यादातर पूर्व नेता या तो पीएफआई के साथ जुड़े हुए हैं या वे संगठन में अलग-अलग पदों पर बैठे हैं। केरल और कनार्टक में पीएफआई की गतिविधियों के बारे में प्रमाणित हो चुका है, लेकिन अन्य राज्यों में भी पीएफआई का नेटवर्क फैला हुआ है। अब झारखंड को पीएफआई ने अपना नया ठिकाना बनाया है जहां वह जनजातीय समाज की लड़कियों से शादी कर जमीन कब्जा रहा है।पीएफआई एनडीएफ का उत्तराधिकारी है। एनडीएफ के काडर ने मई 2003 में केरल के माराड समुद्र तट पर नरसंहार किया था। इसके लोगों ने पीने के पानी को लेकर हुए विवाद में आठ हिंदू मछुआरों की हत्या कर दी थी। बाद में यह घटना सांप्रदायिक संघर्ष में बदल गई। 2009 में विशेष अदालत ने इसके लिए एनडीएफ के 65 कार्यकर्ताओं को सजा सुनाई थी। आठ जून 2011 में सुधींद्र और विग्नेश नाम के दो लड़कों का मैसूर के महाजन कॉलेज परिसर से अपहरण कर लिया गया। उनके परिजनों से पांच करोड़ की फिरौती मांगी गई। बाद में कनार्टक फोरम फॉर डिग्निटी केएफडी के सदस्यों ने इनकी हत्या कर दी। 2006 में केएफडी का पीएफआई में विलय हो गया। गिरफ्तार किए गए केएफडी सदस्यों में आदिल उर्फ आदिल पाशा, अलाउल्ला खान, अमीन उर्फ सैयद अमीन, रहमान उर्फ शब्बीर रहमान, कौसर उर्फ मोहम्मद कौसर और सफीर अहमद उर्फ सफीर शामिल हैं। इस अपराध में केएफडी सदस्यों की गिरफतारी के बाद कर्नाटक की राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से कनार्टक फोरम फॉर डिग्निटी पर प्रतिबंध लगाने का अनुरोध किया था। पीएफआई में विलय होने वाली एमएनपी पर नवंबर 1993 में चेन्नै में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय पर हमला करने का आरोप लगा था। इस घटना में 11 संघ कार्यकर्ता मारे गए थे।अलकायदा और तलिबानी मानसिकता है पीएफआई कीपीएफआई का मानना है कि हमास, तालिबान और अलकायदा के सदस्य स्वतंत्रता सेनानी हैं। आतंकवाद पर इसके विचार मानवाधिकार संगठनों जैसे नहीं हैं। अपने एक प्रकाशन में वह कहता है: हम फिलिस्तीन, अफगानिस्तान और इराक में स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति एकजुटता की घोषणा करते हैं। पीएफआई भारत देश को दुश्मन देश के रूप में भी देखता है।पीएफआई के साहित्य में बाबरी, मस्जिद विध्वंस उसके बाद दंगों और गुजरात नरसंहार को इस तरह इस क्रमबद्ध बताया जाता है जिससे ऐसा आभास हो कि भारत सरकार मुसलमानों के उत्थान को दबाती है। अब झारखंड की बात करें तो यहां पीएफआई लगातार अपना विस्तार कर रहा है। इसके लिए उसने पाकुड़ को अपना राज्य मुख्यालय बनाया है। पीएफआई के लिए झारखंड बड़ी संभावनाओं वाले राज्यों में एक है, क्योंकि यहां अतीत में कई ऐसे संगठन सक्रिय रहे हैं जो कन्वर्जन, नक्सलवाद और जातिवाद के एजेंड पर काम करते रहे या ऐसे सभी समूहों की सहायता करते रहे हैं, जो देश विरोधी गतिविधियों में शामिल है। भारत विरोधी गतिविधियों के कारण झारखंड पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला राज्य है। 21 फरवरी 2018 से झारखंड सरकार ने राज्य में पीएफआई पर प्रतिबंध लगा दिया है।बता दें कि पांच जुलाई 2017 को पाकुड़ में पीएफआई संगठन के राज्य उपाध्यक्ष हंजाला शेख, राज्य सचिव अब्दुल हन्नान, और पूर्व राज्य सचिव हबीबुर रहमान द्वारा एक सशस्त्र रैली का आयोजन किया गया। जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई तो पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा और पीएफआर्इ् नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करनी पड़ी। इसके 43 सदस्यों को पुलिस के साथ संघर्ष करने और उनके हथियार छीनने के आरोप में पकड़ा गया। वर्ष 2015 में हंजला शेख का नाम देशविरोधी कई प्रदर्शनों में प्रमुखता से सामने आया था। साहेबगंज में पीएफआई समर्थकों ने शेख के नेतृत्व में देश विरोधी एक प्रदर्शन में पाकिस्तानी झंडा लहराया था। अन्य भी ढेरों घटनाएं हैं जो पीएफआई के सदस्यों द्वारा अंजाम दी गईं। पीएफआई ने अब जनजातीय लड़कियों के साथ शादी कर जमीन कब्जाने की योजना बनाई है। पीएफआई के सदस्य जनजातीय समाज की लड़कियों से शादी कर उनके नाम से जमीन खरीद रहे हैं। ऐसा करके वह नेशनल रजिस्टर फॉर सिटीजंस (एनआरसी) से बचने के लिए के लिए करते हैं। दूसरी गौर करने वाली बात है कि म्यांमार, बंगलादेश और असम से बंगाली भाषी मुसलमान धीरे—धीरे झारखंड में और विशेष रूप से पाकुड़ और झारखंड के अन्य मुस्लिम आबादी वाले इलाकों के पास बढ़ रहे हैं।जनजातीय समाज की महिलाएं दस्तावेजों में पति का नाम न दिखाकर पिता का नाम दर्ज कराती हैं। इससे उसकी जमीन का मालिक उसका गैर जनजातीय व्यक्ति जो महिला का पति होता है वह बन जाता है। इस साजिश का खुलासा होने के बाद अब राज्य सरकार ने फैसला लिया है कि जनजातीय महिलाओं को जमीन रजिस्ट्री में पति का नाम दिखाना अनिवार्य होगा। ओडिशा में पहले से ही ऐसा कानून है। इसी तर्ज पर अभी झारखंड में भी इसी तरह का कानून बनाया जाएगा।

भारत विरोधी गतिविधियों के कारण झारखंड पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला राज्य है। 21 फरवरी 2018 से झारखंड सरकार ने राज्य में पीएफआई पर प्रतिबंध लगा दिया हैहाल ही में झारखंड में एक खुफिया रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि झारखंड में प्रतिबंधित संगठन पीएफआई ( पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया ) के मुसलमान युवक जनजातीय समाज की भोलीभाली लड़कियों को अपने चंगुल में फंसाकर उनसे शादियां कर जमीन कब्जा रहे हैं। स्थानीय स्पेशल सेल ने इस संबंध में पुलिस मुख्यालय को अपनी रिपोर्ट भेजी है। रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि पीएफआई राजमहल, उधवा, तालझारी और बरहेट प्रखंड के अयोध्या, जोगोटोला, वृंदावन, करमटोला, महाराजपुर, बालूग्राम, गंगटिया, जोंका, तीन पहाड़ बाजार और पाकुड़ के चंद्रापाड़ा, राशिपुर, जोगाडीह व पादरकोला गांवों में जमीन खरीद रहा है। इसके अलावा कई गांवों में पीएफआई ने जमीनों पर कब्जा भी किया है। अब झारखंड सरकार इन सभी कब्जों की जांच कराने जा रही है। वहां के एक अधिकारी ने बताया कि मामला उनके संज्ञान में आया है। जिन लोगों ने इस तरह से जमीने कब्जाईं हैं जांच के बाद उनकी रजिस्ट्री निरस्त की जाएगी।सिमी का दूसरा रूप है पीएफआईपीएफआई ऐसा क्यों कर रहा है ? इसके पीछे पीएफआई की मंशा क्या है इसके लिए यह जानना जरूरी है कि पीएफआई आखिर है क्या ? दरअसल पीएफआई प्रतिबंधित संगठन सिमी (इस्लामिक स्टूडेंट मूवमेंट ऑफ इंडिया) का ही दूसरा रूप है। भारत सरकार द्वारा की गई कार्रवाई से सिमी के पैर उखड़ने के बाद पाकिस्तान के इशारे पर भारत को अस्थिर करने के लिए पाकिस्तान ने जिस संगठन का इस्तेमाल किया वह कामयाब नहीं हुआ तो फिर पाकिस्तान ने अपनी रणनीति में परिवर्तन किया और पीएफआई को मैदान में उतारा। पीएफआई की शुरुआत केरल में नेशनल डमोक्रेटिक फ्रंट (एडीएफ) के उत्तराधिकारी के रूप में हुई। बाद में कनार्टक के फोरम फॉर डिग्निटी और तमिलनाडू में मनिथा नीति पासाराई (एमएनपी) के साथ इसका विलय हो गया। अन्य राज्यों में भी, जैसे-गोवा के सिटिजन फोरम, राजस्थान की कम्युनिटी सोशल एंड एजुकेशनल सोसायटी, पश्चिम बंगाल नागरिक अधिकार सुरक्षा समिति, मणिपुर के लिलोंग सोशल फोरम और आंध्र प्रदेश की एसोसिएशन ऑफ सोशल जस्टिस के साथ पीएफआई का विलय कर दिया गया। इसके अनुषांगिक संगठनों में रिहैब इंडिया फाउंडेशन, इंडियन फ्रैटरनिटी फोरम, कॉन्फेडरेशन ऑफ मुस्लिम रिलीफ नेटवर्क और सत्य सारिणी जैसे संगठन शामिल हैं। आतंकी संगठनों के साथ हैं पीएफआई के संबंध2010 में पीएफआई पर आरोप लगा कि प्रतिबंधित इस्लामिक आतंकवादी संगठन सिमी के साथ उसके संबंध हैं। पीएफआई का राष्ट्रीय अध्यक्ष अब्दुल रहमान पहले सिमी का राष्ट्रीय सचिव था। इसका राज्य सचिव अब्दुल हमीद मास्टर सिमी में भी राज्य सचिव रह चुका था। सिमी के ज्यादातर पूर्व नेता या तो पीएफआई के साथ जुड़े हुए हैं या वे संगठन में अलग-अलग पदों पर बैठे हैं। केरल और कनार्टक में पीएफआई की गतिविधियों के बारे में प्रमाणित हो चुका है, लेकिन अन्य राज्यों में भी पीएफआई का नेटवर्क फैला हुआ है। अब झारखंड को पीएफआई ने अपना नया ठिकाना बनाया है जहां वह जनजातीय समाज की लड़कियों से शादी कर जमीन कब्जा रहा है।पीएफआई एनडीएफ का उत्तराधिकारी है। एनडीएफ के काडर ने मई 2003 में केरल के माराड समुद्र तट पर नरसंहार किया था। इसके लोगों ने पीने के पानी को लेकर हुए विवाद में आठ हिंदू मछुआरों की हत्या कर दी थी। बाद में यह घटना सांप्रदायिक संघर्ष में बदल गई। 2009 में विशेष अदालत ने इसके लिए एनडीएफ के 65 कार्यकर्ताओं को सजा सुनाई थी। आठ जून 2011 में सुधींद्र और विग्नेश नाम के दो लड़कों का मैसूर के महाजन कॉलेज परिसर से अपहरण कर लिया गया। उनके परिजनों से पांच करोड़ की फिरौती मांगी गई। बाद में कनार्टक फोरम फॉर डिग्निटी केएफडी के सदस्यों ने इनकी हत्या कर दी। 2006 में केएफडी का पीएफआई में विलय हो गया। गिरफ्तार किए गए केएफडी सदस्यों में आदिल उर्फ आदिल पाशा, अलाउल्ला खान, अमीन उर्फ सैयद अमीन, रहमान उर्फ शब्बीर रहमान, कौसर उर्फ मोहम्मद कौसर और सफीर अहमद उर्फ सफीर शामिल हैं। इस अपराध में केएफडी सदस्यों की गिरफतारी के बाद कर्नाटक की राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से कनार्टक फोरम फॉर डिग्निटी पर प्रतिबंध लगाने का अनुरोध किया था। पीएफआई में विलय होने वाली एमएनपी पर नवंबर 1993 में चेन्नै में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय पर हमला करने का आरोप लगा था। इस घटना में 11 संघ कार्यकर्ता मारे गए थे।अलकायदा और तलिबानी मानसिकता है पीएफआई कीपीएफआई का मानना है कि हमास, तालिबान और अलकायदा के सदस्य स्वतंत्रता सेनानी हैं। आतंकवाद पर इसके विचार मानवाधिकार संगठनों जैसे नहीं हैं। अपने एक प्रकाशन में वह कहता है: हम फिलिस्तीन, अफगानिस्तान और इराक में स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति एकजुटता की घोषणा करते हैं। पीएफआई भारत देश को दुश्मन देश के रूप में भी देखता है।पीएफआई के साहित्य में बाबरी, मस्जिद विध्वंस उसके बाद दंगों और गुजरात नरसंहार को इस तरह इस क्रमबद्ध बताया जाता है जिससे ऐसा आभास हो कि भारत सरकार मुसलमानों के उत्थान को दबाती है। अब झारखंड की बात करें तो यहां पीएफआई लगातार अपना विस्तार कर रहा है। इसके लिए उसने पाकुड़ को अपना राज्य मुख्यालय बनाया है। पीएफआई के लिए झारखंड बड़ी संभावनाओं वाले राज्यों में एक है, क्योंकि यहां अतीत में कई ऐसे संगठन सक्रिय रहे हैं जो कन्वर्जन, नक्सलवाद और जातिवाद के एजेंड पर काम करते रहे या ऐसे सभी समूहों की सहायता करते रहे हैं, जो देश विरोधी गतिविधियों में शामिल है। भारत विरोधी गतिविधियों के कारण झारखंड पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला राज्य है। 21 फरवरी 2018 से झारखंड सरकार ने राज्य में पीएफआई पर प्रतिबंध लगा दिया है।बता दें कि पांच जुलाई 2017 को पाकुड़ में पीएफआई संगठन के राज्य उपाध्यक्ष हंजाला शेख, राज्य सचिव अब्दुल हन्नान, और पूर्व राज्य सचिव हबीबुर रहमान द्वारा एक सशस्त्र रैली का आयोजन किया गया। जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई तो पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा और पीएफआर्इ् नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करनी पड़ी। इसके 43 सदस्यों को पुलिस के साथ संघर्ष करने और उनके हथियार छीनने के आरोप में पकड़ा गया। वर्ष 2015 में हंजला शेख का नाम देशविरोधी कई प्रदर्शनों में प्रमुखता से सामने आया था। साहेबगंज में पीएफआई समर्थकों ने शेख के नेतृत्व में देश विरोधी एक प्रदर्शन में पाकिस्तानी झंडा लहराया था। अन्य भी ढेरों घटनाएं हैं जो पीएफआई के सदस्यों द्वारा अंजाम दी गईं। पीएफआई ने अब जनजातीय लड़कियों के साथ शादी कर जमीन कब्जाने की योजना बनाई है। पीएफआई के सदस्य जनजातीय समाज की लड़कियों से शादी कर उनके नाम से जमीन खरीद रहे हैं। ऐसा करके वह नेशनल रजिस्टर फॉर सिटीजंस (एनआरसी) से बचने के लिए के लिए करते हैं। दूसरी गौर करने वाली बात है कि म्यांमार, बंगलादेश और असम से बंगाली भाषी मुसलमान धीरे—धीरे झारखंड में और विशेष रूप से पाकुड़ और झारखंड के अन्य मुस्लिम आबादी वाले इलाकों के पास बढ़ रहे हैं।जनजातीय समाज की महिलाएं दस्तावेजों में पति का नाम न दिखाकर पिता का नाम दर्ज कराती हैं। इससे उसकी जमीन का मालिक उसका गैर जनजातीय व्यक्ति जो महिला का पति होता है वह बन जाता है। इस साजिश का खुलासा होने के बाद अब राज्य सरकार ने फैसला लिया है कि जनजातीय महिलाओं को जमीन रजिस्ट्री में पति का नाम दिखाना अनिवार्य होगा। ओडिशा में पहले से ही ऐसा कानून है। इसी तर्ज पर अभी झारखंड में भी इसी तरह का कानून बनाया जाएगा।

भारत विरोधी गतिविधियों के कारण झारखंड पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला राज्य है। 21 फरवरी 2018 से झारखंड सरकार ने राज्य में पीएफआई पर प्रतिबंध लगा दिया है

हाल ही में झारखंड में एक खुफिया रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि झारखंड में प्रतिबंधित संगठन पीएफआई ( पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया ) के मुसलमान युवक जनजातीय समाज की भोलीभाली लड़कियों को अपने चंगुल में फंसाकर उनसे शादियां कर जमीन कब्जा रहे हैं। स्थानीय स्पेशल सेल ने इस संबंध में पुलिस मुख्यालय को अपनी रिपोर्ट भेजी है। रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि पीएफआई राजमहल, उधवा, तालझारी और बरहेट प्रखंड के अयोध्या, जोगोटोला, वृंदावन, करमटोला, महाराजपुर, बालूग्राम, गंगटिया, जोंका, तीन पहाड़ बाजार और पाकुड़ के चंद्रापाड़ा, राशिपुर, जोगाडीह व पादरकोला गांवों में जमीन खरीद रहा है। इसके अलावा कई गांवों में पीएफआई ने जमीनों पर कब्जा भी किया है। अब झारखंड सरकार इन सभी कब्जों की जांच कराने जा रही है। वहां के एक अधिकारी ने बताया कि मामला उनके संज्ञान में आया है। जिन लोगों ने इस तरह से जमीने कब्जाईं हैं जांच के बाद उनकी रजिस्ट्री निरस्त की जाएगी।

सिमी का दूसरा रूप है पीएफआई

पीएफआई ऐसा क्यों कर रहा है ? इसके पीछे पीएफआई की मंशा क्या है इसके लिए यह जानना जरूरी है कि पीएफआई आखिर है क्या ? दरअसल पीएफआई प्रतिबंधित संगठन सिमी (इस्लामिक स्टूडेंट मूवमेंट ऑफ इंडिया) का ही दूसरा रूप है। भारत सरकार द्वारा की गई कार्रवाई से सिमी के पैर उखड़ने के बाद पाकिस्तान के इशारे पर भारत को अस्थिर करने के लिए पाकिस्तान ने जिस संगठन का इस्तेमाल किया वह कामयाब नहीं हुआ तो फिर पाकिस्तान ने अपनी रणनीति में परिवर्तन किया और पीएफआई को मैदान में उतारा। पीएफआई की शुरुआत केरल में नेशनल डमोक्रेटिक फ्रंट (एडीएफ) के उत्तराधिकारी के रूप में हुई। बाद में कनार्टक के फोरम फॉर डिग्निटी और तमिलनाडू में मनिथा नीति पासाराई (एमएनपी) के साथ इसका विलय हो गया। अन्य राज्यों में भी, जैसे-गोवा के सिटिजन फोरम, राजस्थान की कम्युनिटी सोशल एंड एजुकेशनल सोसायटी, पश्चिम बंगाल नागरिक अधिकार सुरक्षा समिति, मणिपुर के लिलोंग सोशल फोरम और आंध्र प्रदेश की एसोसिएशन ऑफ सोशल जस्टिस के साथ पीएफआई का विलय कर दिया गया। इसके अनुषांगिक संगठनों में रिहैब इंडिया फाउंडेशन, इंडियन फ्रैटरनिटी फोरम, कॉन्फेडरेशन ऑफ मुस्लिम रिलीफ नेटवर्क और सत्य सारिणी जैसे संगठन शामिल हैं।

आतंकी संगठनों के साथ हैं पीएफआई के संबंध

2010 में पीएफआई पर आरोप लगा कि प्रतिबंधित इस्लामिक आतंकवादी संगठन सिमी के साथ उसके संबंध हैं। पीएफआई का राष्ट्रीय अध्यक्ष अब्दुल रहमान पहले सिमी का राष्ट्रीय सचिव था। इसका राज्य सचिव अब्दुल हमीद मास्टर सिमी में भी राज्य सचिव रह चुका था। सिमी के ज्यादातर पूर्व नेता या तो पीएफआई के साथ जुड़े हुए हैं या वे संगठन में अलग-अलग पदों पर बैठे हैं।

केरल और कनार्टक में पीएफआई की गतिविधियों के बारे में प्रमाणित हो चुका है, लेकिन अन्य राज्यों में भी पीएफआई का नेटवर्क फैला हुआ है। अब झारखंड को पीएफआई ने अपना नया ठिकाना बनाया है जहां वह जनजातीय समाज की लड़कियों से शादी कर जमीन कब्जा रहा है।

पीएफआई एनडीएफ का उत्तराधिकारी है। एनडीएफ के काडर ने मई 2003 में केरल के माराड समुद्र तट पर नरसंहार किया था। इसके लोगों ने पीने के पानी को लेकर हुए विवाद में आठ हिंदू मछुआरों की हत्या कर दी थी। बाद में यह घटना सांप्रदायिक संघर्ष में बदल गई। 2009 में विशेष अदालत ने इसके लिए एनडीएफ के 65 कार्यकर्ताओं को सजा सुनाई थी।

आठ जून 2011 में सुधींद्र और विग्नेश नाम के दो लड़कों का मैसूर के महाजन कॉलेज परिसर से अपहरण कर लिया गया। उनके परिजनों से पांच करोड़ की फिरौती मांगी गई। बाद में कनार्टक फोरम फॉर डिग्निटी केएफडी के सदस्यों ने इनकी हत्या कर दी। 2006 में केएफडी का पीएफआई में विलय हो गया। गिरफ्तार किए गए केएफडी सदस्यों में आदिल उर्फ आदिल पाशा, अलाउल्ला खान, अमीन उर्फ सैयद अमीन, रहमान उर्फ शब्बीर रहमान, कौसर उर्फ मोहम्मद कौसर और सफीर अहमद उर्फ सफीर शामिल हैं। इस अपराध में केएफडी सदस्यों की गिरफतारी के बाद कर्नाटक की राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से कनार्टक फोरम फॉर डिग्निटी पर प्रतिबंध लगाने का अनुरोध किया था। पीएफआई में विलय होने वाली एमएनपी पर नवंबर 1993 में चेन्नै में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय पर हमला करने का आरोप लगा था। इस घटना में 11 संघ कार्यकर्ता मारे गए थे।

अलकायदा और तलिबानी मानसिकता है पीएफआई की

पीएफआई का मानना है कि हमास, तालिबान और अलकायदा के सदस्य स्वतंत्रता सेनानी हैं। आतंकवाद पर इसके विचार मानवाधिकार संगठनों जैसे नहीं हैं। अपने एक प्रकाशन में वह कहता है: हम फिलिस्तीन, अफगानिस्तान और इराक में स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति एकजुटता की घोषणा करते हैं। पीएफआई भारत देश को दुश्मन देश के रूप में भी देखता है।

पीएफआई के साहित्य में बाबरी, मस्जिद विध्वंस उसके बाद दंगों और गुजरात नरसंहार को इस तरह इस क्रमबद्ध बताया जाता है जिससे ऐसा आभास हो कि भारत सरकार मुसलमानों के उत्थान को दबाती है।

अब झारखंड की बात करें तो यहां पीएफआई लगातार अपना विस्तार कर रहा है। इसके लिए उसने पाकुड़ को अपना राज्य मुख्यालय बनाया है। पीएफआई के लिए झारखंड बड़ी संभावनाओं वाले राज्यों में एक है, क्योंकि यहां अतीत में कई ऐसे संगठन सक्रिय रहे हैं जो कन्वर्जन, नक्सलवाद और जातिवाद के एजेंड पर काम करते रहे या ऐसे सभी समूहों की सहायता करते रहे हैं, जो देश विरोधी गतिविधियों में शामिल है।

भारत विरोधी गतिविधियों के कारण झारखंड पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला राज्य है। 21 फरवरी 2018 से झारखंड सरकार ने राज्य में पीएफआई पर प्रतिबंध लगा दिया है।

बता दें कि पांच जुलाई 2017 को पाकुड़ में पीएफआई संगठन के राज्य उपाध्यक्ष हंजाला शेख, राज्य सचिव अब्दुल हन्नान, और पूर्व राज्य सचिव हबीबुर रहमान द्वारा एक सशस्त्र रैली का आयोजन किया गया। जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई तो पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा और पीएफआर्इ् नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करनी पड़ी। इसके 43 सदस्यों को पुलिस के साथ संघर्ष करने और उनके हथियार छीनने के आरोप में पकड़ा गया। वर्ष 2015 में हंजला शेख का नाम देशविरोधी कई प्रदर्शनों में प्रमुखता से सामने आया था। साहेबगंज में पीएफआई समर्थकों ने शेख के नेतृत्व में देश विरोधी एक प्रदर्शन में पाकिस्तानी झंडा लहराया था। अन्य भी ढेरों घटनाएं हैं जो पीएफआई के सदस्यों द्वारा अंजाम दी गईं। पीएफआई ने अब जनजातीय लड़कियों के साथ शादी कर जमीन कब्जाने की योजना बनाई है। पीएफआई के सदस्य जनजातीय समाज की लड़कियों से शादी कर उनके नाम से जमीन खरीद रहे हैं। ऐसा करके वह नेशनल रजिस्टर फॉर सिटीजंस (एनआरसी) से बचने के लिए के लिए करते हैं। दूसरी गौर करने वाली बात है कि म्यांमार, बंगलादेश और असम से बंगाली भाषी मुसलमान धीरे—धीरे झारखंड में और विशेष रूप से पाकुड़ और झारखंड के अन्य मुस्लिम आबादी वाले इलाकों के पास बढ़ रहे हैं।

जनजातीय समाज की महिलाएं दस्तावेजों में पति का नाम न दिखाकर पिता का नाम दर्ज कराती हैं। इससे उसकी जमीन का मालिक उसका गैर जनजातीय व्यक्ति जो महिला का पति होता है वह बन जाता है। इस साजिश का खुलासा होने के बाद अब राज्य सरकार ने फैसला लिया है कि जनजातीय महिलाओं को जमीन रजिस्ट्री में पति का नाम दिखाना अनिवार्य होगा। ओडिशा में पहले से ही ऐसा कानून है। इसी तर्ज पर अभी झारखंड में भी इसी तरह का कानून बनाया जाएगा।