कांग्रेस का 'मजहब' संकट

कांग्रेस गंभीर 'मजहब संकट' में है। 'मजहब संकट' यह कि अब वह इसके आगे कहां जाए, कैसे बढ़े? कांग्रेस के सामने एक ही रास्ता है, लेकिन वही ज्यादा ही परेशानी भरा नजर आ रहा है। 

कांग्रेस गंभीर 'मजहब संकट' में है। 'मजहब संकट' यह कि अब वह इसके आगे कहां जाए, कैसे बढ़े? कांग्रेस के सामने एक ही रास्ता है, लेकिन वही ज्यादा ही परेशानी भरा नजर आ रहा है। 

कांग्रेस गंभीर 'मजहब संकट' में है। 'मजहब संकट' यह कि अब वह इसके आगे कहां जाए, कैसे बढ़े? कांग्रेस के सामने एक ही रास्ता है, लेकिन वही ज्यादा ही परेशानी भरा नजर आ रहा है। मोदी सरकार को कांग्रेस की राह आसान करने के लिए कुछ करना चाहिए ना? सरकार कुछ करती ही नहीं है। लिहाजा अभी अपनी ठिठकी हुई स्थिति में कांग्रेस इस बात से इनकार करने के अंदाज में आ गई है कि-हमने तो ऐसा नहीं कहा था (कि कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है)। इसका अहसास भी उन्हें तीन-चार दिन बाद तब हुआ, जब लगा कि यह मुद्दा तो नुकसान करा सकता है। हालांकि तब भी यह नहीं कहा कि नहीं ऐसा नहीं है। अंत में खुद की हरकत का ठीकरा भाजपा पर डाल दिया। अरे भई, जब आपने कहा कि कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है, तो इस पर प्रधानमंत्री ने यही तो कहा कि कांग्रेस मुसलमान मर्दों की पार्टी है (माने मुस्लिम महिलाओं की नहीं है)। अगर ऐसा नहीं है, तो आप साबित करो कि आप मुस्लिम महिलाओं की भी उतनी ही चिंता करते हैं, जितनी मुस्लिम पुरुषों की। इस सीधे-सपाट सवाल पर कांग्रेस कैसे-कैसे अपने ही बयानों के साथ, अपने ही कहे के साथ तरह-तरह से हील-हलाला करवा रही है, यह देखने के लिए आपको शशि थरूर को देखना होगा, दिग्विजय सिंह से काम नहीं चलेगा।

हो सकता है कि कांग्रेस (अध्यक्ष) ने जब कांग्रेस को मुसलमानों की पार्टी बनाने का फैसला किया हो, तब उन्हें किसी ने यह ध्यान न दिलाया हो कि मुसलमानों में महिलाएं भी होती हैं (पुन: सरकार कुछ करती ही नहीं है)। लेकिन इस भ्रम का कांग्रेस के मजहब संकट से कोई लेना-देना नहीं है। कांग्रेस का मजहब संकट यह है कि वह स्वयं को मुसलमानों की पार्टी घोषित करने के बाद आगे क्या करे?

इसे गौर से समझिए। बात तुष्टीकरण की नहीं है। हो सकता है कि इसकी शुरुआत तुष्टीकरण से हुई हो। मुस्लिम तुष्टीकरण कांग्रेस ने कब से शुरू किया, यह इतिहास खोद निकालना कठिन नहीं है। लेकिन 1918 के बाद से अभी तक, माने कांग्रेस को मुसलमानों की पार्टी घोषित करने के राहुल गांधी के बहुत ही क्रांतिकारी निर्णय के पहले तक, कांग्रेस यह काम सिर्फ चार तरीकों से कर पाती थी।

तरीका नंबर एक-कांग्रेस मुसलमानों का एक समुदाय के तौर पर तुष्टीकरण करती रहे। शुरुआत में यह तरीका बहुत निरापद था, लेकिन बाद में इसे हिन्दू विरोध की ज्यादा से ज्यादा धार दी गई। जैसे गोमांस को प्रोत्साहित करना-पिछले वर्ष तक तक तो बीफ पार्टियां भी आयोजित की गईं। जैसे, हिन्दू कोड बिल लाना और समान नागरिक संहिता से साफ इनकार कर देना। लेकिन जब दूसरे सेक्युलर दल और ज्यादा सेक्युलर नजर आने की कोशिश करने लगे तो, कांग्रेस दूसरे गियर में आ गई।

दूसरा गियर-अपराधियों को और दंगाइयों को संरक्षण दिया जाए, बशर्ते वे मुसलमान हों। यह कारनामा कांग्रेस मोतीलाल नेहरू के समय से करती आ रही है। चाट-चाट कर लिखे गए और चीन्ह-चीन्ह कर मिटाए गए इतिहास में से भी, कांग्रेस के, खासतौर पर मोतीलाल नेहरू के कई कारनामे आज भी इतिहास में पढ़ने को मिल जाते हैं। गूगल करें कि इलाहाबाद में 1920 के दशक में रामलीला की शोभायात्रा पर प्रतिबंध लगवाने में मोतीलाल नेहरू ने किस स्तर तक कितनी सक्रियता दिखाई थी। खोजें कि 1920 के दशक की शुरुआत में उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में हुए दंगों पर गांधी की प्रतिक्रिया से नाराज होकर कांग्रेस के किन-किन पितामहों ने कांग्रेस छोड़ दी थी। यह बहुत रोचक, लेकिन बेहद साम्प्रदायिक इतिहास है, जिसमें बहुत सारी लाग-लपेट भी निहित है। संप्रग सरकार जो साम्प्रदायिक हिंसा पर विधेयक लाने जा रही थी, उसके बारे में पढ़ें और कांग्रेस के पितामहों का इतिहास पढ़ें। आपको लगेगा कि इस विधेयक की पटकथा तो 1920 के दशक से ही लिखी जा चुकी थी।

केरल के ऐतिहासिक मोपला दंगों पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया क्या थी-इसे गूगल करके देखें या किसी जानकार से पूछें। केरल, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश-वास्तव में देश में ऐसे गिनती के ही राज्य होंगे, जहां साम्प्रदायिक हिंसा के जरिए तुष्टीकरण करने की कोशिश न की गई हो। साम्प्रदायिक हिंसा के लिए किसी भी हालत में सिर्फ बहुसंख्यक ही जिम्मेदार होंगे, चाहे वे इससे पीडि़त ही क्यों न हों-यह सेकंड गियर की या सेकंड डिग्री का सेकुलरवाद है।

लेकिन इस दूसरे गियर ने कांग्रेस के साथ नए 'मजहब संकट' की स्थिति पैदा कर दी। वास्तव 'समर्थन गीदड़ देंगे' वाले दौर के भी काफी पहले से कांग्रेस तमाम कम्युनिस्टों को, केरल में मुस्लिम लीग को उनके धुर हिन्दू विरोधी होने के गुण के बूते समर्थन देती आ रही है। तमाम कम्युनिस्टों की हिन्दू विरोधी प्रतिभा के बूते उन्हें सरकार में, खासतौर पर अफसरशाही में और राज्य व्यवस्था की एक 'अवमानना सक्षम' सत्ता में, जो अब प्रेस कांफ्रेंस पालिका, धमकी पालिका, सुविधा पालिका, राहत पालिका, तारीख पालिका आदि के तौर पर जानी जाती है, जमकर प्रसाद आदि दिया गया। इसे पंथनिरपेक्षता आदि कहा गया। लेकिन समस्या तब होने लगी, जब यह तत्व सत्तापेक्षी होने के बजाए, स्वयं सत्ता बनने की कोशिश करने लगे। दंगाइयों की मदद से राजनीति का काम जब कम्युनिस्ट पार्टियां और कथित समाजवादी पार्टियां स्वयं ही करने लगीं, तो कांग्रेस तीसरा गियर डालने के लिए बाध्य हुई।

यह तीसरा गियर था, मुसलमानों को छोड़ो, सीधे इस्लाम का तुष्टीकरण करो। 'माइंड कंट्रोल'। शरिया अदालतों पर कांग्रेस के हाल के मत में कुछ भी नया नहीं है। तीन तलाक पर रोक लगाने के लिए लाए गए विधेयक के खिलाफ कांग्रेस ने, गुलाम नबी आजाद ने जितने मासूमियत भरे तर्क दिए थे, उनमें नया रत्ती भर नहीं था। आजाद ने कहा था कि अगर तीन तलाक पर किसी (मर्द को) सजा हो जाती है, तो उसके बीवी-बच्चे कौन पालेगा? माने कांग्रेस इस सजा की कोई 'डिटरेंस वैल्यू' तो मानती ही नहीं है कि कोई व्यक्ति सजा के भय से, कानून के भय से तीन तलाक नहीं देगा। बल्कि उसका मानना है कि मुसलमान मर्द तो तीन तलाक देगा ही देगा, लिहाजा कानून को ही उससे डर कर रहना चाहिए। माना कि तलाक बहुत सारे नहीं होते हैं, लेकिन मुद्दा यह है कि भारत राज्य बड़ा है या चंद मौलवी बड़े हैं? मुद्दा यह है कि क्या 125 करोड़ के इस देश में भारत की मुस्लिम महिलाओं का बचाव करने वाला कोई नहीं होना चाहिए?

इस्लाम का तुष्टीकरण करने के लिए कांग्रेस इसी तरह शाहबानो मामले पर सर्वोच्च न्यायालय के खिलाफ न केवल संसद में आई थी, बल्कि सड़कों पर और टीवी पर भी आई थी। क्या बात है? अब गुलाम नबी की चिंता यह है कि तलाक दी जा चुकी मुस्लिम महिला के मामले में बीवी-बच्चे कौन पालेगा। तब यह थी कि देखते हैं किसकी हिम्मत है, जो बीवी-बच्चे पालकर दिखाए। इसमें भी कुछ नया नहीं था। कांग्रेस ही वह पार्टी थी, जिसने खिलाफत आंदोलन को न केवल खुला समर्थन दिया था, बल्कि आंदोलन में शामिल हुई थी। नतीजा क्या है? आज उम्माह और खलीफत जैसी अवधारणाएं सिर्फ (पाकिस्तान सहित) भारत के मुसलमानों के दिमाग में बची हुई हैं। पूरे 56 इस्लामी देशों में से एक भी देश इसका खुला समर्थन नहीं करता है, मुर्गों की तरह लड़ात् ाा जरूर है। लेकिन अफगानिस्तान से लेकर सीरिया तक में जो केरल के युवा आइएसआइएस का साथ देते हुए मारे गए होते हैं, वे 'दाइश' और 'उम्माह' और 'खलीफत' कायम करने वहां पहुंचे होते हैं। यह थर्ड डिग्री का कांग्रेसी सेकुलरवाद है।

शायद यह भी काफी नहीं था। लिहाजा कांग्रेस चौथा गियर लगाती है। आतंकवाद का तुष्टीकरण। 'ओसामा जी' और 'श्री लादेन' से कहानी शुरू की जाती है, और 'भटके हुए युवाओं', 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' तक पहुंचती है। मीसा का आविष्कार करने वाली कांग्रेस 'टाडा' खत्म करने के नाम पर चुनाव लड़ लेती है। बटला हाउस में दो आतंकवादियों के मारे जाने पर कोई व्यक्ति रात भर रो लेता है। आतंकवाद के तुष्टीकरण का दूसरा चरण शुरू होता है उसके चारों तरफ संरक्षण की एक दीवार खड़ी करने की कोशिशों से। 'हिन्दू आतंकवाद' शब्द का आविष्कार किया जाता है। सेना आतंकवादियों को मार गिराने लगे, तो सेना के विरोध की मुहिम चला दी जाती है। सेना अध्यक्ष को 'गली का गुंडा' करार दिया जाता है। 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' का नारा लगाने वालों के साथ बैठकर यकजेहनियत का इजलास किया जाता है।

वापस कांग्रेस के 'मजहब संकट' पर, कांग्रेस की अटकी हुई गाड़ी पर लौटें। दिक्कत यह है कि कांग्रेस की इस गाड़ी में सिर्फ चार ही गियर थे। खुद को मुसलमानों की पार्टी घोषित कर देना वास्तव में एक 'रिवर्स गियर' था, जिसे नए ड्राइवर ने पांचवां गियर समझकर लगा दिया। इसे प्रयोग में लाने के बाद गाड़ी जब आगे नहीं बढ़ पाई, तो उसे रोक कर खड़ा कर दिया गया। अब क्या करें? गाड़ी का आगे बढ़ाया जाना बहुत ही जरूरी है। महागठबंधन होना है, उसके अलावा कोई गुजारा नहीं है। महागठबंधन घूम-फिरकर सेकुलरवाद के नाम पर ही होगा। और महागठबंधन की धुरी वही पार्टी या वही नेता बन सकेगा, जो पांचवीं डिग्री का सेकुलर होगा। अब यह पांचवा गियर कहां से लाएं?

सोचो, सोचो, कुछ तो सोचो। सरकार तो कुछ करती ही नहीं है हमारे लिए। कुछ विद्वानों ने पांचवें गियर की तलाश 'मॉब लिंचिंग' में की है। 'मॉब लिंचिंग'- जैसा कि जाहिर है- अंग्रेजी शब्द है, और बकौल गूगल, अभी तीन साल पहले ही इसका आविष्कार किया था। इसका हिन्दी में या संस्कृत में कोई प्रतिशब्द नहीं है। अरबी में जरूर इसे 'तहारुश गमीई' कहा जाता है, हालांकि उसमें भीड़ द्वारा हत्या के अलावा भीड़ द्वारा बलात्कार भी शामिल होता है। इसका हिन्दी में या संस्कृत में कोई प्रतिशब्द क्यों नहीं है? जाहिर है कि यह भारतीय संस्कृति का हिस्सा कभी नहीं रहा। अब क्यों इसकी खबरें आने लगी हैं? कोई तो बात होगी। क्या बात है? छोडि़ए। यह भी छोड़ दीजिए कि इस तहारुश गमीई उर्फ मॉब लिंचिंग के पीछे बहुत बार सिर्फ फर्जी और जानबूझकर पैदा की गई अफवाह पाई गई है। छोडि़ए इन बातों को। यह बताइए कि गायों की तस्करी की, तस्करों द्वारा रास्ते में आने वाले लोगों, पुलिस वालों-किसी की भी निर्मम हत्याएं किए जाने की खबरों की कभी किसी ने निंदा भी की थी?

उसे भी छोडि़ए। यह बताइए कि क्या संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में साफ-साफ, और अंग्रेजी में, अनुच्छेद 48 में यह नहीं लिखा हुआ है कि भारत राज्य गोवध पर प्रतिबंध लगाएगा? इसे भी छोडि़ए। यह बताइए कि क्या मार्क्सशुदा और मैकालेशुदा इतिहास में भी यह नहीं कहा गया है कि 1857 का संग्राम, उर्फ गदर, कारतूसों में गाय (और सूअर) की चर्बी लगाने के कारण भड़का था? माने फिर तो वह भी मॉब लिंचिंग ही रहा होगा? वैसे भी तब तक तो भारत का वह आविष्कार भी नहीं हुआ था, जो नेहरू ने 1947 में किया था। प्रगतिशील- सेकुलर ब्रिगेड की ताजा कसौटी के हिसाब से तो इस मसले पर मॉब लिंचिग करने वाले पहले व्यक्ति मंगल पांडे थे,और इस प्रकार यह भी सिद्ध होता है कि-1857 में जो भी कुछ हुआ था, वह सरासर मॉब लिंचिग थी। अगर तमाम रोमिला थापरों और इरफान हबीबों से इसका अविष्कार नहीं हो सका, तो यह नेहरू तंत्र से लेकर सोवियत संघ और कार्ल मार्क्स तक की विफलता, खेद की गंभीर बात और शायद ऐतिहासिक भूल मानी जानी चाहिए।

 एक पुलिसकर्मी को बेरहमी से छड़ों से पीटते कश्मीर के 'भटके हुए युवक'

 

इसे भी छोडि़ए। यह बताइए कि क्या तहारुश गमीई उर्फ मॉब लिंचिंग तभी होती है, जब वह गोहत्या के खिलाफ हो? जब कश्मीर 'भटके हुए नन्हे-मुन्ने' सेना के जवानों को पत्थरों से निशाना बनाते हैं, जिसके खिलाफ पैलेट गन चलाने से भी सेना को रोक दिया जाता है, तो क्या होता है? जब श्रीनगर में भीड़ एक कश्मीरी मुस्लिम डीएसपी को पीट-पीटकर मार देती है, तो उस पर संसद में सवाल उठाने की, उसकी निंदा करने की जरूरत भी क्यों नहीं महसूस होती?

प्रिय कांग्रेस, पांचवा गियर मॉब लिचिंग का जाप करने से नहीं लग पाएगा। महागठबंधन की फिल्म में फिर भी तुम्हें 'एकस्ट्रा' का ही रोल मिल सकेगा। विश्वास न हो, तो कैम्ब्रिज एनालिटिका से पूछ कर देख लो। वैसे तुम्हें धक्का देते-देते उसकी भी गाड़ी बंद हो गई है। और सरकार तुम्हारे लिए वास्तव में कुछ नहीं करेगी।