Panchjanya - कालजयी सोच वाले महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद कालजयी सोच वाले महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद
कालजयी सोच वाले महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद
   दिनांक 30-जुलाई-2018
कालजयी सोच वाले महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद 
31 जुलाई प्रेमचंद जयंती  
पाञ्चजन्य का यह अंक मुंशी प्रेमचंद को समर्पित है। प्रेमचंद यानी भारतीय समाज का ऐसा आईना जिसमें आप किसी भी कालखंड को देख लो। वही प्रेमचंद जिनकी रचनाएं वामपंथियों को बाएं झुकी दिखती हैं और वे उन्हें अपनी जमात का बताते नहीं थकते। लेकिन क्या यह संभव है कि जिस व्यक्ति की रचनाएं कालजयी हैं, उसकी सोच कालजयी न हो ? नहीं न! तो फिर मुंशी जी को अपनी कोटरी की तंग-बंद गलियों में सीमित करने वाले लोग इस ओर से मुंह क्यों फेर लेते हैं कि राष्ट्र और राष्ट्रवाद को लेकर प्रेमचंद क्या सोचते थे। प्रेमचंद का स्पष्ट मानना था कि राष्ट्र को सम्प्रदाय से ऊपर रखना एक पवित्र कार्य है क्योंकि इसी से देश-समाज की बुनियाद मजबूत होती है। सवाल है—मुंशी जी को अपने कुनबे का बताने वाले लोग आखिर उनके राष्ट्रवाद से मुंह क्यों फेर लेते हैं?
प्रेमचंद को उनकी जयंती (31 जुलाई) के अलावा भी बार-बार याद किया जाना जरूरी है क्योंकि वह उस लोक, उस तंत्र, उस सुराज तथा उस भारतीयता के पहरेदार व प्रखर प्रवक्ता हैं जिससे आज की सेकुलर-प्रगतिशील ब्रिगेड कन्नी काटती है। उदाहरण के लिए कांग्रेस को ही लीजिये। कभी आम जन के सरोकार और आकांक्षाओं का मंच रही पार्टी आज कुनबे और नकारात्मकता का पर्याय होकर रह गई है।
हाल में कांग्रेस पार्टी अपनी कार्यसमिति बैठक में जिन बातों को उकेरती-खंगालती नजर आई, उससे साफ हो गया कि वह गहरी हताशा और नकारात्मकता के भंवर में है। यहां कांग्रेस ने भाजपा की पहचान  'मोदी पार्टी' के तौर पर की। यानी कांग्रेस पर परिवारवाद के ठप्पे की झुंझलाहट उस दल पर निकली जिसमें कुछ पाने का आधार परिवार कभी नहीं रहा। यह बौखलाहट उस व्यक्ति के नाम पर निकली जो आज भारत का सबसे मुखर, प्रभावी और जनप्रिय नेता है। दरअसल, भाजपा पर सवाल उठाने के क्रम में भी कांग्रेस खुद पर लगे आरोपों का ही जवाब दे रही थी। लेकिन उसकी छटपटाहट की एक बड़ी वजह है। कांग्रेस को मानना पड़ रहा है कि जिस चेहरे पर वह भविष्य का दांव खेल रही थी, वह राजनैतिक समझ की कसौटी पर खारिज हो चुका है।
भाजपा को चुनौती देने के लिए बुजुर्ग पार्टी गठबंधन का सपना बुन रही थी। खामी यह रही कि दशकों कुनबे का बंधक रहा दल माने बैठा था कि गठबंधन की कमान उसके 'युवराज' के ही हाथ में रहेगी। लेकिन यह जिक्र छिड़ते ही कांग्रेस के दूतों को अन्य दलों ने झिड़क दिया। पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा के अतिरिक्त किसी ने इस बात को जरा भी भाव नहीं दिया। ठीक भी है! कर्नाटक में कांग्रेस संग गठबंधन में खून के आंसू रोते देवगौड़ा की बेशक मजबूरी हो, बाकी दलों की क्या मजबूरी? इससे यह साफ हुआ कि लोकसभा चुनाव के लिए किसी गठबंधन का खाका बनता है तो कांग्रेस अग्रणी भूमिका में नहीं रहेगी। सो, खूंटा कमजोर होने के चलते भानुमती के इस कुनबे की एकजुटता बड़ा सवाल होगी। जाहिर है, स्वार्थभरी एकता सरल नहीं होगी। इसके बड़े स्पष्ट से कारण हैं। पहला, यह गठबंधन तमाम व्यक्ति-केंद्रित दलों का जमावड़ा है, जिसमें सबके अपने हित हैं। दूसरा, इसके सभी क्षत्रप खुद तरह-तरह के दागों का दंश झेल रहे हैं और उनके पास उपलब्धियों के नाम पर बड़ा सा शून्य ही है। तीसरा, इस जमघट का हर घटक सामाजिक आधार खिसकने पर अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। ऐसे गठबंधन को कदम बढ़ाने के लिए काफी ताकत और साथ रहने के लिए खास 'गोंद' की दरकार होगी। वह गोंद जहरीले मुद्दों को हवा देकर और झूठ फैलाकर हासिल किया जाएगा। निश्चित ही जातीय विद्वेष फैलाते हुए, सांप्रदायिकता की आग लगाते हुए और देश को नीचा दिखाने वाले मुद्दों पर ढोल पीटते हुए आगे बढ़ना इस प्रगतिशील-सेकुलर ब्रिगेड को सहज रास आएगा। इस बिरादरी के नफरती टोटके और परस्पर तालमेल देखनेे लायक हैं। उदाहरण के लिए-विभिन्न आपराधिक मामलों को आपस में जोड़ने के लिए 'मॉब लिंचिंग' जैसा शब्द उछालना हो तो सब साथ आते हैं। इस शब्द के खांचे में घटनाओं को चुनकर फिट करना, फिर मीडिया द्वारा इसे हवा देना, इस साझी रणनीति पर काम होता है। वोटों के गणित के साथ बंधी संवेदनशीलता का 'मॉब लिंचिंग' के मुद्दे पर ही तालमेल देखिए—अलवर के अकबर का जिक्र पूरे हल्ले के साथ होता है (उसकी आपराधिक पृष्ठभूमि का जरा भी उल्लेख किए बिना) किन्तु बाड़मेर के 'दलित' खेतराम भील की हत्या करने वाली मुस्लिम भीड़ और उसके नेता अकबर खान के बारे में होंठ सिल लिए जाते हैं। आज समाज को झूठे प्रगतिशीलों की बजाय सच्चे प्रेमचंद की ज्यादा जरूरत है जो विघटनकारी लक्षणों पर अपने-अपने स्वार्थ की रोटी सेंकने वालों को लताड़ते हैं और जिनके लिए देशप्रेम की बात करना कट्टरता का प्रतीक नहीं है। आइए, मुंशी जी की कलम को उन्मादी मंसूबेबंदी के खिलाफ मशाल की तरह रोशन करें। क्योंकि आज जरूरत इसी की है।