समाधि लगाकर बैठना उतना कठिन नहीं जितना कर्तव्य की वेदी पर बलिदान होना:मुुंशी प्रेमचंद

कल्याण, कृष्णांक अगस्त 1931 के मुंशी प्रेमचंद के लेख में संस्कृति के स्मरण बिंदु संकेतक की तरह जगह—जगह खड़े दिखते हैं। वह लिखते हैं कि जब तक कर्मयोग के तत्व को नहीं समझा जाएगा, तब तक संसार स्वार्थ के पंजे में जकड़ा रहेगा, लेकिन यदि इसके गूढ़ रहस्य को समझ लिया गया तो मोक्ष का रास्ता पा लिया

 

 

मनुष्य को आदिकाल से सुख और शांति की खोज रही है और अंत तक रहेगी। मानव सभ्यता का इतिहास इसी खोज की कथा है। जिसने इस रहस्य को जितना अधिक समझा वह उतना ही ज्ञानी समझा गया। लोग भिन्न-भिन्न मार्गों से चले। किसी ने योग का मार्ग लिया, किसी ने तप का, किसी ने भक्ति का, किसी ने ज्ञान का, किंतु त्याग सभी वादों का स्थायी लक्षण था। निवृत्ति की दुहाई सभी दे रहे हैं। सुख का मूल निवृत्ति है, सब ने इसी तत्व का प्रतिपादन किया। मोक्ष, आवागमन के बंधन से छूट जाना, सुख और शांति की चरम सीमा है। मोक्ष-प्राप्ति के भिन्न-भिन्न मार्ग हैं।

सोचिए कितना महान सत्य है! कितना मौलिक आदर्श। निवृत्ति मानव स्वभाव से मेल नहीं खाती। उसके मार्ग पर चलने वाले विशिष्ट जन ही होंगे। जन साधारण के लिए वह मार्ग नहीं है। फिर उनके लिए धर्म का क्या आदर्श रह जाता है? निवृत्ति मार्ग का पथिक कर्म के बंधन में फंसे हुए प्राणियों से अपने को यदि ऊंचा नहीं तो पृथक अवश्य समझता है। कर्म मनुष्य के लिए स्वाभाविक क्रिया है। आंखें हैं तो देखेगा, पांव है तो चलेगा, पेट है तो खायेगा। कर्म के पूर्ण विनाश की तो कल्पना भी नहीं हो सकती। समाधि भी तो कर्म है। मौन रहना भी कर्म है। सोचना भी कर्म है, नित्य कर्म हो या निमित्त कर्म, आप कर्म के फंदे से नहीं निकल सकते। फिर कर्म सदैव बंधन ही क्यों हो। उससे परमार्थ भी तो किया जा सकता है, सेवा भी तो की जा सकती है। तत्व यह निकला कि स्वार्थ भाव से कोई कर्म न किया जाय, वरन जितने कर्म हों, यज्ञार्थ भाव से, निष्काम भाव से ही किये जाएं। यहां कर्म का आनंद तो मिलता है, कर्म से उत्पन्न होने वाला दुख नहीं मिलता। न कोई भेद है न द्वेष है। कर्म में पुरुषार्थ भी तो है।लेकिन कर्मयोग के आदर्श पर जमे रहना छोटी बात नहीं है। जंगल में समाधि लगाकर बैठ जाना उतना कठिन नहीं है जितना कर्तव्य की वेदी पर अपना बलिदान करना। अपने कर्मों में लगा रहना और लाभ के प्रति उदासीन रहना वीरों का ही काम है। और ऐसे कर्मयोगी संसार में बिरले ही होते हैं। ममत्व के पंजे से निकलना सिंह के मुंह से निकलना है। समय-समय पर ज्ञानी पुरुष अवतरित होते रहते हैं और ममत्व के बंधन को, दुख के मूल को, तोड़ने का उद्योग करते हैं, पर यह बंधन झटके पाकर कुछ और दृढ़ होता जाता है। यहां तक कि आज इस संसार में ममत्व का अकंटक राज्य है। ऐसे समय में संसार के उद्धार का एक ही उपाय है और वह है कर्मयोग। इसी तत्व को सम्मुख रखकर हम ममत्व, स्वार्थ और संघर्ष के पंजे से छूट सकते हैं। स्वार्थ का विलुप्त होना ही प्रेम का प्रसार है, उसी भांति जैसे अंधकार का हटना ही प्रकाश है। हिंसा और अप्रेम से दबा हुआ संसार पंगु हो रहा है। हिंसामय जनतंत्र और हिंसामय एकतंत्र में विशेष अंतर नहीं है। अधिभौतिकवाद के धर्महीन तत्वों से संसार का उद्धार न होगा। उसमें अध्यात्मवाद की स्फूर्ति डालनी पड़ेगी। अधिभौतिकवाद यूरोप का आविष्कार नहीं। हमारे यहां चार्वाक के सिद्धांत भी उसी पक्ष का प्रतिपादन करते हैं। पर यूरोप का ईश्वरहीन सुखवाद ही आज संसार पर आधिपत्य जमाये हुए है। इसलिए कर्मयोग के जरिए ही स्वार्थ को मिटाया जा सकता है। यूरोप के दार्शनिकों ने अध्यात्मवाद के बीज बो दिये हैं। अमेरिका में वेदांत तत्वों का जिस उत्साह से स्वागत किया जा रहा है, भारत के धर्मोंपदेशकों और दार्शनिकों का वहां जो सम्मान हो रहा है, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि हवा का रुख किधर है। वही लोग जो स्वार्थ के सब से बड़े उपासक हैं, उससे अब विरक्त से होते जा रहे हैं। विचारशील समुदाय प्रत्येक राष्ट्र में बाह्य व्यवहारों से दूर होता जा रहा है। यूरोप ने अपनी परंपरागत संस्कृति के अनुसार स्वार्थ को मिटाने का प्रयत्न किया है और कर रहा है। समष्टिवाद और बोलशेविज्म उसके वह नये आविष्कार हैं जिनसे वह संसार में युगांतर कर देना चाहता है। उनके समाज का आदर्श इसके आगे और जा ही न सकता था। किंतु अध्यात्मवादी भारत इससे संतुष्ट होने वाला नहीं। वह अपने परलोक को ऐहिक स्वार्थ पर बलिदान नहीं कर सकता। वह अध्यात्मवाद से भटककर दूर जा पड़ा था, जिसके फलस्वरूप उसे एक हजार वर्ष तक गुलामी करनी पड़ी। अबकी वह चेतेगा तो संसार को भी अपने साथ जगा देगा, प्रेम का जयघेाष सुनायी देगा और भगवान कृष्ण कर्मयोग के जन्मदाता के रूप में संसार के उद्धारकर्ता होंगे।

सोचिए कितना महान सत्य है! कितना मौलिक आदर्श। निवृत्ति मानव स्वभाव से मेल नहीं खाती। उसके मार्ग पर चलने वाले विशिष्ट जन ही होंगे। जन साधारण के लिए वह मार्ग नहीं है। फिर उनके लिए धर्म का क्या आदर्श रह जाता है? निवृत्ति मार्ग का पथिक कर्म के बंधन में फंसे हुए प्राणियों से अपने को यदि ऊंचा नहीं तो पृथक अवश्य समझता है। कर्म मनुष्य के लिए स्वाभाविक क्रिया है। आंखें हैं तो देखेगा, पांव है तो चलेगा, पेट है तो खायेगा। कर्म के पूर्ण विनाश की तो कल्पना भी नहीं हो सकती। समाधि भी तो कर्म है। मौन रहना भी कर्म है। सोचना भी कर्म है, नित्य कर्म हो या निमित्त कर्म, आप कर्म के फंदे से नहीं निकल सकते। फिर कर्म सदैव बंधन ही क्यों हो। उससे परमार्थ भी तो किया जा सकता है, सेवा भी तो की जा सकती है। तत्व यह निकला कि स्वार्थ भाव से कोई कर्म न किया जाय, वरन जितने कर्म हों, यज्ञार्थ भाव से, निष्काम भाव से ही किये जाएं। यहां कर्म का आनंद तो मिलता है, कर्म से उत्पन्न होने वाला दुख नहीं मिलता। न कोई भेद है न द्वेष है। कर्म में पुरुषार्थ भी तो है।

लेकिन कर्मयोग के आदर्श पर जमे रहना छोटी बात नहीं है। जंगल में समाधि लगाकर बैठ जाना उतना कठिन नहीं है जितना कर्तव्य की वेदी पर अपना बलिदान करना। अपने कर्मों में लगा रहना और लाभ के प्रति उदासीन रहना वीरों का ही काम है। और ऐसे कर्मयोगी संसार में बिरले ही होते हैं। ममत्व के पंजे से निकलना सिंह के मुंह से निकलना है। समय-समय पर ज्ञानी पुरुष अवतरित होते रहते हैं और ममत्व के बंधन को, दुख के मूल को, तोड़ने का उद्योग करते हैं, पर यह बंधन झटके पाकर कुछ और दृढ़ होता जाता है। यहां तक कि आज इस संसार में ममत्व का अकंटक राज्य है।

ऐसे समय में संसार के उद्धार का एक ही उपाय है और वह है कर्मयोग। इसी तत्व को सम्मुख रखकर हम ममत्व, स्वार्थ और संघर्ष के पंजे से छूट सकते हैं। स्वार्थ का विलुप्त होना ही प्रेम का प्रसार है, उसी भांति जैसे अंधकार का हटना ही प्रकाश है। हिंसा और अप्रेम से दबा हुआ संसार पंगु हो रहा है। हिंसामय जनतंत्र और हिंसामय एकतंत्र में विशेष अंतर नहीं है। अधिभौतिकवाद के धर्महीन तत्वों से संसार का उद्धार न होगा। उसमें अध्यात्मवाद की स्फूर्ति डालनी पड़ेगी। अधिभौतिकवाद यूरोप का आविष्कार नहीं। हमारे यहां चार्वाक के सिद्धांत भी उसी पक्ष का प्रतिपादन करते हैं। पर यूरोप का ईश्वरहीन सुखवाद ही आज संसार पर आधिपत्य जमाये हुए है। इसलिए कर्मयोग के जरिए ही स्वार्थ को मिटाया जा सकता है। यूरोप के दार्शनिकों ने अध्यात्मवाद के बीज बो दिये हैं। अमेरिका में वेदांत तत्वों का जिस उत्साह से स्वागत किया जा रहा है, भारत के धर्मोंपदेशकों और दार्शनिकों का वहां जो सम्मान हो रहा है, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि हवा का रुख किधर है। वही लोग जो स्वार्थ के सब से बड़े उपासक हैं, उससे अब विरक्त से होते जा रहे हैं। विचारशील समुदाय प्रत्येक राष्ट्र में बाह्य व्यवहारों से दूर होता जा रहा है। यूरोप ने अपनी परंपरागत संस्कृति के अनुसार स्वार्थ को मिटाने का प्रयत्न किया है और कर रहा है। समष्टिवाद और बोलशेविज्म उसके वह नये आविष्कार हैं जिनसे वह संसार में युगांतर कर देना चाहता है। उनके समाज का आदर्श इसके आगे और जा ही न सकता था। किंतु अध्यात्मवादी भारत इससे संतुष्ट होने वाला नहीं। वह अपने परलोक को ऐहिक स्वार्थ पर बलिदान नहीं कर सकता। वह अध्यात्मवाद से भटककर दूर जा पड़ा था, जिसके फलस्वरूप उसे एक हजार वर्ष तक गुलामी करनी पड़ी। अबकी वह चेतेगा तो संसार को भी अपने साथ जगा देगा, प्रेम का जयघेाष सुनायी देगा और भगवान कृष्ण कर्मयोग के जन्मदाता के रूप में संसार के उद्धारकर्ता होंगे।