'प्रेमचंद पहले साहित्यकार हैं जिन्होंने शोषित वर्ग का उत्थान किया और उन्हें लड़ने की ताकत दी'

कमल किशोर गोयनका को प्रेमचंद के व्यक्तित्व और कृतित्व का गहन अध्येता माना जाता है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। प्रेमचंद के जीवन, साहित्य, विचार तथा उनकी पांडुलिपियों के अध्ययन, अनुसंधान और आलोचना एवं उनकी सैकड़ों पृष्ठों की अज्ञात सामग्री को खोजकर उन्हें राजनीतिक वादों की जकड़बंदी से मुक्त कर उनकी राष्ट्रवादी समग्र मूर्ति के अन्वेषक के रूप में जाने जाते हैं डॉ. कमल किशोर गोयनका। उनकी प्रेमचंद पर 30 तथा अन्य हिंदी लेखकों पर 27 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। शरद चन्द्र पर श्रम और निष्ठापूर्वक कार्य करने वाले विष्णु प्रभाकर ने स्वयं कहा , 'डॉ. गोयनका ने प्रेमचंद पर जितना कार्य किया है, वैसा संभवत: किसी शोधकर्ता ने किसी लेखक पर नहीं किया होगा।' केन्द्रीय हिन्दी शिक्षण मंडल (जिसका मुख्यालय आगरा में है और यह केन्द्र सरकार के अधीन है) के उपाध्यक्ष डा. कमल किशोर गोयनका से सतीश पेडणेकर ने प्रेमचंद के साहित्य-नवनीत पर विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसी बातचीत के संपादित अंश

आप लगभग 50 साल से प्रेमचंद पर काम कर रहे हैं। आपने प्रेमचंद पर लगभग 30 किताबें लिखी हैं। प्रेमचंद में आपकी दिलचस्पी कैसे जगी?

मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से सन् 1961 में एमए किया। फिर पीएचडी के लिए विषय तय होना था। डॉ. नगेन्द्र उस जमाने में विभाग के अध्यक्ष थे। उन्होंने मुझे कहा कि तुम्हें मुंशी प्रेमचंद पर काम करना है। तब मैंने प्रेमचंद पर अपना पीएचडी का काम शुरू किया। मेरा विषय था- प्रेमचंद के उपन्यासों का शिल्पविधान। यह एक नया विषय था। उसके बाद मैंने सोचा कि क्या पीएचडी करने के बाद आगे अध्ययन समाप्त हो जाता है। मुझे लगा कि इस पर आगे और काम करना चाहिए। मैंने मुंशी प्रेमचंद विश्वकोश के नाम से एक योजना बनाई 4-5 खंडों की। उसका प्रारूप बनाया। हौज खास में प्रेमचंद के बड़े बेटे रहते थे श्रीपत राय। मैं उनसे मिला। अपना परिचय दिया। मैंने कहा, प्रेमचंद पर पीएचडी के बाद यह मैं इस पर काम करना चाहता हूं। उन्होंने रूपरेखा देखने के बाद कहा कि यह बहुत अच्छा काम है। तुम इसको करो और मैं तुम्हें अपना सहयोग देता हूं। वह मेरा शुरुआती दौर था। उनके अनुमोदन से मुझे शक्ति मिली और बाद में मैंने प्रेमचंद विश्वकोश तैयार किया। तब तक मेरी बहुत-सी रचनाएं अखबारों में छपने लगीं थीं। यह प्रचार हो चुका था कि गोयनका जो कुछ नया सामने लाने वाले हैं। कम्युनिस्टों ने उसी समय से विरोध करना शुरू कर दिया। 1979 में मलयज नामक एक बहुत बड़े मार्क्सवादी लेखक ने मेरे खिलाफ एक टिप्पणी लिखी। इसी तरह से पहले 1973-74 में 'आलोचना' पत्रिका में सुधीश पचौरी ने मेरे खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया की। वामपंथियों ने मान लिया कि गोयनका एक ऐसा तर्क ला रहे हैं जो उनके सिद्धांतों के विरुद्ध है। इस तरह प्रेमचंद पर मेरा कार्य चलता गया और आज भी मैं उससे जुड़ा हुआ हूं।

                                                                          डॉ.कमल किशोर गोयनकाकुछ लोग आप के ऊपर आरोप लगाते हैं कि आपकी पुस्तकों से प्रेमचंद की समाज सुधारक की छवि को बड़ा आघात लगा। खासकर, आपने यह भी बताने की कोशिश की कि प्रेमचंद बहुत गरीब नहीं थे। इस पर आपका क्या कहना है?

                                                                          डॉ.कमल किशोर गोयनका

जिन चीजों पर लोग आपत्ति कर रहे हैं, उसके मूल में सचाइयां हैं जो मैंने उजागर की हैं। यह ठीक है कि मैंने यह सिद्ध किया कि प्रेमचंद गरीब नहीं थे। रामविलास शर्मा ने लिखा है कि प्रेमचंद गरीबी में पैदा हुए थे। गरीबी में रहे और गरीबी में ही मर गये। यहां तक कि लोगों ने कहा, उनके पास कफन तक के पैसे नहीं थे। बात यह है कि आप प्रेमचंद को महिमामंडित क्यों करना चाहते हैं जबकि तथ्य इसके विपरीत हैं। ये सारे प्रमाण उनके पत्रों से निकलते हैं। मैंने कोई नई खोज नहीं की। जो दस्तावेज दबे हुए थे, उसको सबके सामने रखा है। प्रेमचंद समाज सुधारक थे, इसमें कोई आपत्ति है ही नहीं। लेकिन वे अपने जीवन में अपनी बेटी की शादी में दहेज देते हैं तो उनकी सामाजिक मनुष्य के रूप में यह व्यवस्था है। इससे उनका समाज सुधार वाला तथ्य कमजोर नहीं होता। उन्होंने कई बार अपने बेटे को लिखा कि जिंदगी में सभी चीजें आदर्श से नहीं चलतीं, कभी-कभी व्यक्ति को समझौते करने पड़ते हैं। यह जिंदगी का समझौता है, उससे कोई आदमी छोटा नहीं होता। उनके साहित्य से समाज पर जो प्रभाव पड़ा है, उसकी कल्पना करके देखिए। मेरी मां ने प्रेमचंद पढ़ने के बाद बहुत सारे अनुशासन छोड़ दिये। जो जीवन का सत्य है उसे क्यों छुपाया जाए। मेरा तर्क यही है।

एक वर्ग प्रेमचंद को प्रगतिशील या कम्युनिस्ट मानता रहा था या इस तबके से जुड़ा हुआ लेखक मानता था। आपने उन्हें भारतीयतावादी या हिन्दुत्ववादी लेखक के तौर पर पेश किया। इसकी क्या वजह थी?

जिन लोगों ने उन्हें मार्क्सवादी बनाने की कोशिश की, उन्होंने जो तर्क दिए उनमें कोई बल नहीं है। वे बुनियादी तौर पर उनकी तीन या चार प्रतिशत रचनाओं के आधार पर यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं। उनकी 95 प्रतिशत रचनाओं की वे उपेक्षा कर देते हैं। इनमें सबसे बड़ी गलती वामपंथियों ने की है। उनके जो तर्क हैं, उनका कोई आधार ही नहीं है। मैंने उनके तकोंर् को खंडित किया है। मेरा यह कहना है कि प्रेमचंद ने जो प्रगतिशील लेखक संघ में उद्घाटन भाषण दिया था उसमें एक भी शब्द मार्क्सवाद से जुड़ा नहीं है। कम्युनिस्टों का कहना है कि उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की थी, पर प्रेमचंद ने इसकी स्थापना भी नहीं की थी। मार्क्सवादी झूठ बोलते हैं। प्रेमचंद ने केवल अध्यक्षीय भाषण दिया था। उन्होंने इस संस्था की कोई कल्पना नहीं की थी। हां, उन लोगों ने इनसे संपर्क किया था पर ये तो अध्यक्षता करना भी नहीं चाहते थे। फिर भी उन्होंने स्वीकार किया और इसमें भाषण दिया। सारे भाषण में वे मनुष्य के संस्कार की बात करते हैं। प्रेमचंद सात-आठ जगह आध्यात्मिक आनंद की बात करते हैं। आध्यात्मिक तृप्ति की बात करते है। आध्यात्मिक संतोष की बात करते हैं। अध्यात्म तो मार्क्सवाद में कहीं भी नहीं है। इसके बाद उन्होंने 1928 में एक लेख लिखा था जो 'कल्याण' में छपा था कि- साम्यवाद पूंजीवाद से भी भयानक है। 'गोदान' में जो लिखा था, जिसको हम महाकाव्य मानते हैं उसमें एक पात्र है जो यह कहता है कि रूस में क्या हुआ है। रूस में मिल मालिकों ने ही विद्रोह किया है। रूस के अंदर भी कोई साम्यवाद नहीं है। प्रेमचंद यह बात गोदान में कहते हैं। इस प्रकार मार्क्सवाद ने जो आधार बनाया, वह झूठ है। इसका कोई आधार नहीं है। ये सब पार्टी के आधार पर हुआ। रामविलास शर्मा ने लिखा है कि मैंने पार्टी का आदेश मिलने के बाद प्रेमचंद की व्याख्या शुरू की। सबकुछ पार्टी से संचालित हो रहा है। और वह कह रहे हैं कि यही असली प्रेमचंद है। प्रेमचंद ने लिखा है कि मेरे दो उद्देश्य हैं- एक तो मैं स्वराज्य चाहता हूं और दूसरा मैं भारतीय आत्मा की रक्षा करना चाहता हूं। भारतीय आत्मा की रक्षा का जो उनका संकल्प है वह मार्क्सिज्म में कहां है। वह तो भारतीयता का अंग है। भारत की आत्मा क्या है-सत्य है, धर्म है, न्याय है। प्रेमचंद यह बार-बार कहते हैं कि साम्यवाद के आने से सत्य और न्याय नहीं हो पाया। तैयार नहीं हैं। प्रेमचंद की कहानी 'कैदी' लेनिन के कॉमरेड पर लिखी गयी। उन्होंने कहा है कि कॉमरेड एक दूसरे को धोखा देते हैं।

 

प्रेमचंद के बारे में कहा जाता है कि वे आर्य समाज से बहुत प्रभावित थे, जिसके कारण उन्होंने एक विधवा से विवाह किया। प्रगतिशील लेखक संघ का अधिवेशन हुआ तो उसके दूसरे दिन वे आर्य समाज के एक कार्यक्रम में गये थे ?

वे आर्यसमाजी तो थे ही इसमें कोई शक नहीं। आर्यसमाजी होने के अलावा वे स्वामी विवेकानंद के अनुयायी भी थे। आर्य समाज को वे लगातार चंदा भी देते थे। हिन्दू धर्म में जो सुधार की बात आई वह आर्य समाज के माध्यम से आयी। प्रेमचंद ने अंधविश्वासों और जड़ताओं का खंडन किया है। उस जमाने में विधवाओं से विवाह करना कोई आसान काम नहीं था। आप 'यही मेरी मातृभूमि है' लेख पढ़ें तो पता चलता है कि वे कितने देशप्रेमी थे। 'दुनिया का सबसे अनमोल रतन' पढि़ये। अद्भुत कहानी है। आपके खून में जोश प्रवाहित होने लगेगा। स्वत:बोध बहुत छोटी-सी कहानी है। वह घोड़े की कहानी है। एक तहसीलदार एक घोड़ा खरीदता है जब वह कार्यालय जाते थे तो घोड़े पर बैठकर जाते थे। अंत में प्रेमचंद कहते हैं, जब दुल्हा अपने स्वत्व की रक्षा कर सकता है तो हिन्दुस्थान के लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकता। उन्होंने घोड़े के माध्यम से बता दिया कि अंग्रेजों से तब जीतोगे जब अपने स्वत्व की रक्षा करोगे।

लोग कहते हैं कि बाद में उन्होंने कम्युनिज्म और मार्क्स वगैरह पर काफी लिखा, यहां तक कि उन्होंने स्टॉलिन पर लिखा है?

मेरी जानकारी में नहीं लिखा। उन्होंने यह तो उल्लेख किया है कि प्रचार के कारण वे सत्ता में आये हैं। लेकिन उसके बाद वे लिखते हैं कि रूस भी विचारों का साम्राज्य चाहता है। किसको सत्य मानेंगे? वे 'गोदान' में रूस की आलोचना करते हैं। हम स्टालिन की बात को नहीं मानेंगे। अगर आप इसे पूरे क्रम में देखेंगे तो वह मात्र उल्लेख है। उतनी व्याख्या नहीं की जितना लोग कह रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि हमारा युग समाजवाद का युग है। समाजवाद का अर्थ है सारे मुनष्य बराबर हैं। इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं है। मनुष्य में भेद नहीं होना चाहिए, न जाति का, न पंथ का और न अर्थ का। ये तो हम सभी कहते हैं। हां, व्यवस्था कैसी बनती है वह एक अलग बात है।

 

अभी आपने गांधी और आंबेडकर का उल्लेख किया। सारे दलित साहित्यकार प्रेमचंद के लगभग विरोधी हैं। इसमें क्या सचाई है?

ऐसा नहीं है। इन लोगों ने परोक्ष रूप से बहुत कुछ लिखा है। 'कफन' में लिखा है कि जो दलित मां के पेट में बच्चा है, वह किसी जमींदार का बच्चा है। वह दलित की स्थिति को बता रहे हैं। एक कहानी 'घास वाली' जो एक पिछड़े वर्ग की औरत की कहानी है। उसको एक दिन ठाकुर पकड़ लेता है खेत में। तब वह कहती है कि ठाकुर, तुमने इतनी हिम्मत कैसे की जो मेरा हाथ पकड़ लिया। अगर मेरा पति तेरी ठकुराइन का हाथ पकड़ लेगा तो तू उसका गला काट देगा न। तू क्या समझता है मेरा पति तेरा गला नहीं काटेगा। यह प्रेमचंद लिख रहे हैं। 'गोदान' की एक घटना बताता हूं। एक है सिलिया, उससे होरी का जो बेटा है ब्रह्मदीन, जो ब्राह्मण का बेटा है उससे उसका संबंध है। एक दिन ऐसा होता है कि उसके माता-पिता कुछ लोगों को इकट्ठा करके ब्राह्मण से मिलते हैं और कहते हैं कि इससे शादी कर ले। उन्होंने बोला, तू इसके साथ सोता है तो इसके साथ शादी क्यों नहीं करेगा। तब वह कहता है कि मैं तो शादी नहीं कर सकता। मैं ब्राह्मण हूं। इसके बाद वह एक हड्डी लेकर आते हैं और उसके मुंह में डाल देते हैं और कहते हैं कि अगर तू मुझे ब्राह्मण नहीं बना सकता तो आज हम तुझे 'वंचित' वर्ग का बना रहे हैं। यह बात प्रेमचंद जी ने 'गोदान' में लिखी है। और यह भी लिखा है कि असली ब्राह्मण वह है जो अपने कर्तव्य का पालन करता है। प्रेमचंद पहले साहित्यकार हैं जिन्होंने दलितों का उत्थान किया है। ताकत दी उनको लड़ने की। 'मंदिर' कहानी के अंदर एक प्रसंग है। एक दलित औरत अपने बच्चे को लेकर मंदिर आती है और मंदिर के पुजारी से कहती है कि दर्शन करवा दो जिससे हमारा बच्चा ठीक हो जाएगा। पूजारी उसे धक्के देकर निकाल देता है। जब सभी लोग रात में सो जाते हैं तब वह एक ईंट लेकर आती है और मंदिर में जो ताला लगा हुआ था उसको तोड़ देती है। प्रेमचंद ने यहां यह किया कि वे मंदिर में भगवान के बंद ताले को तुड़वा देते हैं। प्रेमचंद की कहानी में दलितों के प्रति ऐसा जोश है जिसको लोग समझने की कोशिश ही नहीं करते। वह प्रेमचंद को पूरी तरह राजनीतिक तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं।

(पूरा साक्षात्कार पढ़ने के लिए पढ़ें पाञ्चजन्य का 5 अगस्त का अंक )