Panchjanya - स्वामी विवेकानंद से प्रभावित मुंशी प्रेमचंद स्वामी विवेकानंद से प्रभावित मुंशी प्रेमचंद
स्वामी विवेकानंद से प्रभावित मुंशी प्रेमचंद
   दिनांक 31-जुलाई-2018
मुंशी प्रेमचंद स्वामी विवेकानंद से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने उर्दू में स्वामी विवेकानंद जी के बारे में 'स्वामी विवेकानंद: एक जीवन झांकी' नाम से लेख लिखा था, जो 'जमाना' मासिक के मई, 1908 के अंक में प्रकाशित हुआ था। बाद में उन्होंने स्वयं इसका हिन्दी अनुवाद किया
मुंशी प्रेमचंद
 
स्वामी विवेकानन्द का जीवन-वृत्तान्त बहुत संक्षिप्त है। दु:ख है कि भरी जवानी में ही गोलोकवासी हो गए और आपके महान व्यक्तित्व से देश और जाति को जितना लाभ पहुंच सकता था, न पहुंच सका। 1863 में स्वामी जी एक प्रतिष्ठित कायस्थ कुल में उत्पन्न हुए। बचपन से ही होनहार दिखाई देते थे। अंग्रेजी स्कूलों में शिक्षा पायी और 1884 में स्नातक की डिग्री हासिल की। उस समय उनका नाम नरेन्द्रनाथ था। कुछ दिनों तक ब्रह्म-समाज के अनुयायी रहे। नित्य प्रार्थना में सम्मिलित होते और चूंकि गला बहुत ही अच्छा पाया था, इसलिए कीर्तन-समाज में भी सम्मिलित हुआ करते थे। पर ब्रह्म-समाज के सिद्धान्त उनकी प्यास न बुझा सके। फिर वह कुछ दिनों तक सत्य की खोज में इधर-उधर भटकते रहे।
उन दिनों स्वामी रामकृष्ण परमहंस के प्रति लोगों की श्रद्धा थी। नवयुवक नरेन्द्रनाथ ने भी उनके सत्संग से लाभ उठाना आरम्भ किया और धीरे-धीरे उनके उपदेशों से इतने प्रभावित हुए कि उनकी भक्त्तमण्डली में सम्मिलित हो गए और उन सच्चे गुरु से अध्यात्म तत्व और वेदान्त-रहस्य स्वीकार कर अपनी जिज्ञासा तृप्त की। परमहंस के देहत्याग के बाद नरेन्द्रनाथ ने कोट-पतलून उतार फेंका और संन्यास ले लिया। उस समय से विवेकानन्द नाम से प्रसिद्ध हुए। उनकी गुरुभक्ति गुरुपूजा की सीमा तक पहुंच गयी थी। जब कभी आप उनकी चर्चा करते हैं, तो एक-एक शब्द से श्रद्धा और सम्मान टपकता है। 'मेरे गुरुदेव' के नाम से उन्होंने न्यूयार्क में एक विद्वत्तापूर्ण भाषण दिया, जिसमें परमहंस जी के गुणों का गान बड़ी श्रद्धा और उत्साह के स्वर में किया गया है। स्वामी विवेकानन्द ने गुरुदेव के प्रथम दर्शन का वर्णन इस प्रकार किया है कि देखने में वे बिल्कुल साधारण आदमी मालूम होते थे। उनके रूप में कोई विशेषता न थी। बोली बहुत सरल और सीधी थी। मैंने मन में सोचा कि क्या यह सम्भव है कि ये सिद्धपुरुष हैं? मैं धीरे-धीरे उनके पास पहुंच गया और उनसे वे प्रश्न पूछे, जो अक्सर औरों से पूछा करता था, 'महाराज, क्या आप ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हैं?' उन्होंने जवाब दिया, 'हां।' मैंने फिर पूछा, 'क्या आप उसका अस्तिव सिद्ध भी कर सकते हैं?' जवाब मिला, 'हां।' परमहंस जी की वाणी में कोई वैद्युतिक शक्ति थी, जो संशयात्मा को तत्क्षण ठीक रास्ते पर लगा देती थी और यही प्रभाव स्वामी विवेकानन्द की वाणी और दृष्टि में भी था। यह हम कह चुके हैं कि परमहंस के परमधाम सिधारने के बाद स्वामी विवेकानन्द ने संन्यास ले लिया। उनकी माता उच्चाकांक्षिणी स्त्री थीं। उनकी इच्छा थी कि मेरा लड़का वकील हो, अच्छे घर में उसका ब्याह हो और वह दुनिया के सुख भोगे। उनके संन्यास-धारण के निश्चय का समाचार पाया, तो परमहंस जी की सेवा में उपस्थित हुईं और अनुनय-विनय की कि मेरे बेटे को जोग न दीजिए, पर जिस हृदय ने शाश्वत प्रेम और आत्मानुभूति के आनन्द का स्वाद पा लिया हो, उसे लौकिक सुख-भोग कब तक अपनी ओर खींच सकते हैं। परमहंस जी कहा करते थे कि जो आदमी दूसरों को आध्यात्मिक उपदेश देने की आकांक्षा करे, उसे पहले स्वयं उस रंग में डूब जाना चाहिए। इस उपदेश के अनुसार स्वामी जी हिमालय पर चले गए और पूरे नौ साल तक तपस्या और चित्त-शुद्धि में लगे रहे। बिना खाये, बिना सोये, एकदम नग्न और एकदम अकेले सिद्ध-महात्माओं की खोज में घूमते और उनके सत्संग से लाभ उठाते रहते थे। स्वामी जी चेन्नै में थे, तो अमेरिका में सर्वधर्म-सम्मेलन के आयोजन की खबर मिली। वे तुरन्त उसमें सम्मिलित होने को तैयार हो गए और उनसे बड़ा ज्ञानी तथा वक्ता और था ही कौन? भक्त-मण्डली की सहायता से आप इस पवित्र यात्रा पर चल पड़े। आपकी यात्रा अमेरिका के इतिहास की अमर घटना है। यह पहला मौका था कि कोई पश्चिमी जाति दूसरी जातियों के मत-विश्वासों की समीक्षा और स्वागत के लिए तैयार हुई हो।
अमेरिका पहुंचकर उन्हें मालूम हुआ कि अभी सम्मेलन होने में देर है। ये दिन उनके बड़े कष्ट में बीते। अकिंचनता की यह दशा थी कि पास में ओढ़ने-बिछाने तक को काफी न था। पर उनकी सन्तोष-वृत्ति इन सब कठिनाइयों पर विजयी हुई। अन्त में बड़ी प्रतीक्षा के बाद नियत तिथि आ पहुंची। दुनिया के विभिन्न मत-पंथों ने अपने-अपने प्रतिनिधि भेजे थे और यूरोप के बड़े-बड़े पादरी और धर्मशास्त्र के आचार्य हजारों की संख्या में उपस्थित थे। ऐसे महासम्मेलन में एक अकिंचन असहाय युवक का कौन पुछैया था, जिसकी देह पर साबुत कपड़े भी न थे? पहले तो किसी ने उनकी ओर ध्यान आने ही न दिया, पर सभापति ने बड़ी उदारता के साथ उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली, और वह समय आ गया कि स्वामी जी श्रीमुख से कुछ कहें। उस समय तक उन्होंने किसी सार्वजनिक सभा में भाषण न किया था। एकबारगी 8-10 हजार विद्वानों और समीक्षकों के सामने खड़े होकर भाषण करना कोई हंसी-खेल न था। मानव-स्वभाववश क्षण-भर स्वामी जी को भी घबराहट रही, पर केवल एक बार तबियत पर जोर डालने की जरूरत थी। स्वामी जी ने ऐसा पाण्डित्यपूर्ण, ओजस्वी और धाराप्रवाह बोलना शुरू किया कि श्रोतामण्डली मंत्रमुग्ध-सी हो गयी। यह असभ्य हिन्दू, और ऐसा विद्वत्तापूर्ण भाषण! किसी को विश्वास न होता था। उनका भाषण क्या है, भगवद्गीता और उपनिषदों के ज्ञान का निचोड़ है। पश्चिम वालों को आपने पहली बार सुझाया कि धर्म के विषय में निष्पक्ष उदार भाव रखना किसको कहते हैं। अन्य मतावलंबियों के विपरीत आपने किसी मत-पंथ की निन्दा न की और पश्चिम-वालों को जिन्हें बहुत दिनों से यह धारणा हो रही थी कि हिन्दू तो बस ऐसे ही हैं, वह एकदम दूर हो गयी। वह भाषण ऐसा ज्ञानमय और अर्थ-भरा है कि उसका खुलासा करना असम्भव है, पर उसका निचोड़ यह है हिन्दू धर्म का आधार किसी विशेष सिद्धान्त को मानना या कुछ विशेष विधि-विद्वानों का पालन करना नहीं है। हिन्दू का हृदय शब्दों और सिद्धान्तों से तृप्ति-लाभ नहीं कर सकता। अगर कोई ऐसा लोक है, जो हमारी स्थूल दृष्टि से अगोचर है, तो हिन्दू उस दुनिया की सैर करना चाहता है, अगर कोई ऐसी सत्ता है, जो भौतिक नहीं है। कोई ऐसी सत्ता है, जो न्याय-रूप, दया-रूप और सर्वशक्तिमान है, तो हिन्दू उसे अपनी अन्तदृर्ष्टि से देखना चाहता है। आपने पाश्चात्यों को पहली बार सुनाया कि विज्ञान के वे सिद्धान्त, जिनका उनको गर्व है और जिनका धर्म से संबंध नहीं, हिन्दुओं को अति प्राचीन काल से विदित थे और हिन्दू धर्म की नींव उन्हीं पर खड़ी है और जहां अन्य मत-पंथों का आधार कोई विशेष व्यक्ति या उसके उपदेश हैं, हिन्दू धर्म का आधार शाश्वत सनातन सिद्धान्त है और यह इस बात का प्रमाण है कि वह कभी न कभी विश्वधर्म बनेगा। कर्म को केवल कर्तव्य समझकर करना, उसमें फल या सुख-दु:ख की भावना न रखना ऐसी बात थी, जिससे पश्चिम वाले अब तक सर्वथा अपरिचित थे। स्वामी जी के ओजस्वी भाषणों और सचाई भरे उपदेशों से लोग इतने प्रभावित हुए कि अमेरिका के अखबार बड़ी श्रद्धा और सम्मान के शब्दों में स्वामी जी की बड़ाई छापने लगे। उनकी वाणी में यह दिव्य प्रभाव था कि सुनने वाले आत्मविस्मृत हो जाते।
स्वामी जी अमेरिका में करीब तीन साल रहे और इस बीच श्रम और शरीर-कष्ट की तनिक भी परवाह न कर अपने गुरुदेव के आदेश के अनुसार वेदान्त का प्रचार करते रहे। इसके बाद इंग्लैंड की यात्रा की। आपकी ख्याति वहां पहले ही पहुंच चुकी थी। अंग्रेजों को, जो नास्तिकता और जड़पूजा में दुनिया में सबसे आगे थे, को आकृष्ट करने में आपको बहुत परिश्रम करना पड़ा। पर आपकी अद्भुत संकल्प शक्ति ने इन सब बाधाओं पर विजय प्राप्त की और आपका जादू अंग्रेजों पर भी चल गया। ऐसे-ऐसे वैज्ञानिक, जिन्हें खाने के लिए भी प्रयोगशाला के बाहर निकलना कठिन था, आपका भाषण सुनने के लिए घण्टों पहले सभा में पहुंच जाते और प्रतीक्षा में बैठे रहते। आपने वहां तीन बड़े मारके के भाषण किए और आपकी वाग्मिता तथा विद्वता का सिक्का सबके दिलों पर बैठ गया। सब पर प्रकट हो गया कि जड़वाद में यूरोप चाहे भारत से कितना ही आगे क्यों न हो, पर अध्यात्म और ब्रह्मज्ञान का मैदान हिन्दुस्तानियों का ही है! आप करीब एक साल तक वहां रहे और अनेकानेक सभा-समितियों, विद्यालयों और क्लब घरों से आपके पास निमंत्रण आते थे। वेदान्त के प्रचार का कोई भी अवसर आप हाथ से न जाने देते। आपकी ओजमयी वाणी का यह प्रभाव हुआ कि बिशपों और पादरियों ने चर्च में वेदान्त पर आपके भाषण कराए।
एक दिन लंदन में एक संभ्रान्त महिला के मकान पर आपकी सभा होने वाली थी। श्रीमती जी शिक्षा विषय पर बड़ा अधिकार रखती थीं। उनका भाषण सुनने तथा उस पर बहस की इच्छा से विद्वान् एकत्र हुए थे। संयोगवश श्रीमती जी की तबीयत कुछ खराब हो गयी। स्वामी जी वहां विद्यमान थे। लोगों ने प्रार्थना की आप ही कुछ फरमाएं। स्वामी जी उठ खड़े हुए और भारत की शिक्षा-प्रणाली पर पण्डित्यपूर्ण भाषण किया। उन शिक्षा-व्यवसासियों को कितना आश्चर्य हुआ, जब स्वामी जी के श्रीमुख से सुना कि भारत में विद्यादान सब दानों से श्रेष्ठ माना गया है और भारतीय गुरु अपने विद्यार्थियों से कुछ लेता नहीं, बल्कि उन्हें अपने घर पर रखता है और उनको विद्यादान के साथ-साथ भोजन-वस्त्र भी देता है।
धीरे-धीरे यहां भी स्वामी जी की भक्त-मण्डली काफी बड़ी हो गयी। बहुत से लोग, जो अपनी रुचि का आध्यात्मिक भोजन न पाकर धर्म से विरक्त हो रहे थे, वेदान्त पर लट्टू हो गए और स्वामी जी में इनकी इतनी श्रद्धा हो गयी कि यहां से जब वे चले, तो उनके साथ कई अंग्रेज शिष्य थे, जिनमें कुमारी नोबल भी थीं, जो बाद को भगिनी निवेदिता के नाम से प्रसिद्ध हुईं। स्वामी जी ने अंग्रेजों के रहन-सहन और चरित्र-स्वभाव को बड़ी सूक्ष्म दृष्टि से देखा-समझा। इस अनुभव की चर्चा करते हुए भाषण में आपने कहा कि यह क्षत्रियों और वीर पुरुषों की जाति है।
16 सितम्बर, 1896 को स्वामी जी कई अंग्रेज चेलों के साथ प्रिय स्वदेश को रवाना हुए। भारत के छोटे-बड़े सब लोग आपकी उज्ज्वल विरुदावली को सुन-सुनकर आपके दर्शन के लिए उत्कण्ठित हो रहे थे। आपके स्वागत और अभ्यर्थना के लिए नगर-नगर में कमेटियां बनने लगीं। स्वामी जी जब जहाज से कोलम्बो में उतरे, तो जनसाधारण ने जिस उत्साह और उल्लास से आपका स्वागत किया, वह एक दर्शनीय दृश्य था। कोलम्बो से अल्मोड़ा तक जिस-जिस नगर में आप पधारे,वहां अमीर-गरीब, छोटे-बड़े सबके हृदय में आपके लिए एक-सा आदर-सम्मान था। यूरोप में बड़े विजेताओं को जो अभ्यर्थना हो सकती है, उसमें कई गुना अधिक भारत में स्वामी जी की हुई। आपके दर्शन के लिए लाखों की भीड़ जमा हो जाती थी और लोग आपको एक नजर देखने के लिए मंजिलें तय करके आते थे।
हर शहर में जनसाधारण की ओर से आपके कार्यों की बड़ाई और कृतज्ञता-प्रकाश करने वाले मानपत्र दिए गए। कुछ बड़े शहरों में तो पन्द्रह-पन्द्रह, बीस-बीस मानपत्र दिए गए और आपने उनके उत्तर में देशवासियों को देशभक्ति के उत्साह और अध्यात्म से भरी हुई वाणी सुनायी। चेन्नै में आपके स्वागत के लिए 17 आलीशान फाटक बनाए गए। महाराज (खेतड़ी) जिनकी सहायता से स्वामी जी अमेरिका गए थे, ने इस समय बड़े उत्साह और उदारता के साथ आपके स्वागत का आयोजन किया। चेन्नै के विभिन्न स्थानों में घूमते और अपने अमृत उपदेशों से लोगों को तृप्त करते हुए 28 फरवरी को स्वामी जी कलकत्ता पधारे। यहां आपके स्वागत-अभिनन्दन के लिए लोग उपस्थित थे। राजा विनयकृष्ण बहादुर ने स्वयं मानपत्र दिया। उत्तर में स्वामी जी ने एक अति पाण्डित्यपूर्ण भाषण किया।
अध्यापन और उपदेश में अत्यधिक श्रम करने के कारण आपका स्वास्थ्य बिगड़ गया और जलवायु-परिवर्तन के लिए आपको दार्जिंलिंग जाना पड़ा। वहां से अल्मोड़ा गए। पर स्वामी जी ने तो वेदान्त के प्रचार का व्रत ले रखा था, उनको बेकारी में कब चैन आ सकता था? ज्योंही तबियत जरा संभली, स्यालकोट पधारे और वहां से लाहौर वालों की भक्ति ने अपनी ओर खींच बुलाया। इन दोनों स्थानों में आपका बड़े उत्साह से स्वागत-सत्कार हुआ और आपने अपनी अमृतवाणी से श्रोताओं के अन्त:करण में ज्ञान की ज्योति जगा दी। लाहौर से आप कश्मीर गए और वहां से राजपूताने का भ्रमण करते हुए कलकत्ता लौट आए। इस बीच आपने दो मठ स्थापित कर दिए थे। इसके कुछ दिन बाद रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य लोकसेवा है और जिसकी शाखाएं भारत के हर भाग में विद्यमान हैं जो जनता का उपकार कर रही हैं। 1897 का साल सारे हिन्दुस्तान के लिए बड़ा मनहूस था। कितने ही स्थानों में प्लेग का प्रकोप था और अकाल भी पड़ रहा था। लोग भूख और रोग से काल का ग्रास बनने लगे। देशवासियों को इस विपत्ति में देखकर स्वामी जी कैसे चुप बैठ सकते थे। आपने लाहौर वाले भाषण में कहा था 'साधारण मनुष्य का धर्म यही है कि साधु-संन्यासियों और दीन-दुखियों को भरपेट भोजन कराए। मनुष्य का हृदय ईश्वर का सबसे बड़ा मन्दिर है और इसी मन्दिर में उसकी आराधना करनी होगी।' फलत: आपने बड़ी सरगर्मी से खैरातखाने खोलना आरंभ किया। उन्होंने देश-सेवाव्रती संन्यासियों की एक छोटी-सी मण्डली बना दी। ये सब स्वामी जी के निरीक्षण में तन-मन से दीन-दुखियों की सेवा में लग गए। लेकिन इसी बीच उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ रहा था, फिर भी वे स्वयं घर-घर घूमते और पीडि़तों को आश्वासन तथा आवश्यक सहायता देते-दिलाते। प्लेग-पीडि़तों की सहायता करना, जिनसे डाक्टर लोग भी भागते थे, कुछ इन्हीं देशभक्तों का काम था।
स्वामी जी का स्वास्थ्य जब बहुत बिगड़ गया, तो आपने लाचार हो इंग्लैंड की दूसरी यात्रा की और वहां कुछ दिन ठहरकर अमेरिका चले गए। वहां आपका बड़े उत्साह से स्वागत हुआ। दो बरस पहले जिन लोगों ने आपके श्रीमुख से वेदान्त-दर्शन पर जोरदार बातें सुनी थीं, वे अब पक्के वेदान्ती हो गए थे। स्वामी जी के दर्शन से उनके हर्ष की सीमा न रही। वहां की जलवायु स्वामी जी को लाभजनक सिद्ध हुई और कठिन श्रम करने पर भी कुछ दिन में आप फिर स्वस्थ हो गए।
धीरे-धीरे हिन्दू-दर्शन के प्रेमियों की संख्या इतनी बढ़ी कि स्वामी जी दिन-रात श्रम करके भी उनकी पिपासा तृप्त न कर सकते थे। अमेरिका जैसे व्यापारी देश में एक हिन्दू संन्यासी का भाषण सुनने के लिए दो-दो हजार आदमियों का जमा हो जाना कोई साधारण बात नहीं है। अकेले सैनफ्रांसिस्को नगर में आपने हिन्दू-दर्शन पर पूरे 50 व्याख्यान दिए। श्रोताओं की सहायता से सैनफ्रांसिस्को में 'वेदान्त सोसाइटी' और 'शान्ति आश्रम' बनाया और दोनों पौधे आज तक हरे-भरे हैं। 'शान्ति-आश्रम' नगर के कोलाहल से दूर एक परम रमणीय स्थान पर स्थित है और उसका घेरा लगभग 200 एकड़ है। यह आश्रम एक उदार धर्मानुरागिनी महिला की वेदान्यता का स्मारक है। स्वामी जी न्यूयार्क में थे कि पेरिस में विभिन्न मत-पंथों का सम्मेलन करने की आयोजना हुई और आपको भी निमंत्रण मिला। उस समय तक आपने फ्रांसीसी भाषा में कभी भाषण न किया था। यह निमंत्रण पाते ही उसके अभ्यास में जुट गए और आत्मबल से दो महीने में ही उस पर इतना अधिकार पा लिया कि देखने वाले दंग हो जाते। पेरिस में आपने हिन्दू-दर्शन पर दो व्याख्यान दिए।
अन्त में अत्यधिक श्रम के कारण स्वामी जी का शरीर बिल्कुल गिर गया। पेरिस-सम्मेलन की तैयारी ने और भी कमजोर बना दिया। अमेरिका, इंग्लैंड और फ्रांस की यात्रा करते हुए जब आप स्वदेश लौटे, तो देह में हड्डियां भर रह गयी थीं और इतनी शक्ति न थी कि सार्वजनिक सभाओं में भाषण कर सकें। डाक्टरों की कड़ी ताकीद थी कि आप कम-से-कम दो साल तक पूर्ण विश्राम करें। पर जो हृदय अपने देशवासियों के दु:ख देखकर गला जाता हो और जिसमें भलाई की धुन समायी हो, जिसमें यह लालसा हो कि आज की धन और बल से हीन हिन्दू जाति फिर पूर्वकाल की सबल-समृद्ध और आत्मशालिनी आर्य जाति बने, उससे यह कब हो सकता था कि एक क्षण के लिए भी आराम कर सके। कलकत्ता पहुंचते ही, कुछ ही दिनों बाद आप असम की ओर रवाना हुए और अनेक सभाओं में वेदान्त का प्रचार किया। कुछ तो स्वास्थ्य पहले से ही बिगड़ा हुआ था, कुछ उधर का जलवायु भी प्रतिकूल सिद्ध हुई। आप फिर कलकत्ता लौटे। दो महीने तक हालत बहुत नाजुक रही। फिर बिल्कुल तन्दुरुस्त हो गए।
आप केवल महर्षि ही न थे, ऐसे देशभक्त भी थे, जिसने देश पर अपने आपको मिटा दिया हो। एक भाषण में फरमाते हैं, ''मेरे नौजवान दोस्तो! बलवान बनो। तुम्हारे लिए मेरी यही सलाह है। तुम भगवद्गीता के स्वाध्याय की अपेक्षा फुटबाल खेलकर कहीं अधिक सुगमता से मुक्ति प्राप्त कर सकते हो। कृष्ण भगवान के उपदेश और अलौकिक शक्ति को तुम तभी समझ सकोगे, जब तुम्हारी रगों में खून कुछ और तेजी से दौड़ेगा।'' दूसरे व्याख्यान में उपदेश देते हुए कहते हैं कि यह समय आनन्द में भी आंसू बहाने का नहीं। हम रो तो बहुत चुके। अब हमारे लिए नरक बनाने की आवश्यकता नहीं। इस कोमलता ने हमें इस हद तक पहुंचा दिया है कि हम रुई का गोला बन गए हैं। अब हमारे देश और जाति को जिन चीजों की जरूरत है, वह है लोहे के हाथ-पैर और फौलाद जैसे पुट्ठे।
सामाजिक सुधार के समस्त प्रचलित प्रश्नों में से स्वामी जी केवल एक के विषय में सुधारकों से सहमत थे। बाल-विवाह और जनसाधारण की गृहस्थ-जीवन की अत्याधिक प्रवृत्ति को वे घृणा की दृष्टि से देखते थे, अत: रामकृष्ण मिशन की ओर से जो विद्यालय स्थापित किए गए, उनमें और भारतवर्ष की वर्तमान भीरुता और पतन को ब्रह्मचर्यनाश का ही परिणाम समझते थे। आजकल के हिन्दुओं के बारे में अक्सर वे तिरस्कार के स्वर में कहा करते थे कि यहां भिखमंगा भी यह आकांक्षा रखता है कि ब्याह कर लूं और देश में दस-बारह गुलाम और पैदा कर दूं।
वर्तमान शिक्षा-प्रणाली के आप कट्टर विरोधी थे। आपका मत था कि शिक्षा जानकारी का नाम नहीं है, जो हमारे दिमाग में ठूंस दी जाती है। शिक्षा का प्रधान उद्देश्य मनुष्य के चरित्र का उत्कर्ष, आचरण का सुधार और पुरुषार्थ तथा मनोबल का विकास है।
(मुंशी जी द्वारा लिखे गए लेख का संक्षिप्त अंश, पूरा पढ़ने के लिए देखें पाञ्चजन्य का 5 अगस्त का अंक)