महापुरुष कौन ? महापुरुषों पर मौन

 

तारीख का चलताऊ अर्थ दिनांक लिया जाता है किन्तु सही शाब्दिक अर्थ पर जाएं तो तारीख यानी इतिहास। कुछ दिनांक वास्तव में ऐसे होते हैं जब इतिहास लिखा जाता है। हम देखते हैं कि महापुरुषों से जुड़े दिनांक इतिहास में दर्ज हो जाते हैं। ऐसे में कैलेंडर की तारीखों में, समय के सफर में, मील के पत्थर की तरह स्थापित हस्तियों के बारे में एक सवाल जरूरी है-आखिर महापुरुष कौन हैं? उन्हें देखने का नजरिया क्या हो सकता है? निस्संदेह महापुरुष किसी भी देश के लिए, और कई बार संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा होते हैं। इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि महापुरुष बनने की राह पर पूरा जीवन होम करना पड़ता है। यह भी सच है कि महापुरुषों की उत्पत्ति एक क्षण में या किसी एक घटना से नहीं होती। वे जीवन भर साधना, तप, त्याग और समर्पण भाव से व्यापक और समष्टि के हित में निरंतर कार्य करते हैं, तब जाकर उन्हें महापुरुष का दर्जा मिलता है। लेकिन हमारे देश में एक खास विचारधारा के लोगों द्वारा महापुरुषों को चीन्हने के तरीके में बहुत स्पष्ट-संकीर्णता दिखाई देती है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे महानता का खांचा पहले तैयार कर लिया गया हो, और व्यक्तियों को उसमें बाद में फिट किया गया हो। महापुरुषों को एक खांचे में बांधने, और एक कथानक के अनुरूप महानता का सृजन करने का एक अपराध हमारे देश में हुआ है और यह बौद्धिक जगत की तरफ से हुआ है। विशेष तौर पर जून का अंत और जुलाई का पहला सप्ताह कुछ महापुरुषों को याद करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। 4 जुलाई को आजाद हिन्द फौज की स्थापना हुई थी। मणिपुर केंद्रीय विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के प्रमुख प्रो. राजेन्द्र क्षेत्री संदर्भ देते हैं- क्लीमेंट एटली ने कहा था कि (भारत का) अगर कोई राष्ट्रपिता है, तो फिर तो सुभाषचंद्र्र बोस को इस देश का दादा होना चाहिए। जब उनसे पूछा गया था कि अहिंसा आंदोलन और बाकी सभी आंदोलनों पर आपका क्या मत है? तो उन्होंने कहा था कि आजाद हिन्द फौज के सामने सब का योगदान तुच्छ से तुच्छ है। 

ध्यान दीजिए इस देश में जहां सबसे पहले तिरंगा फहराया गया था, वह जगह है मणिपुर में मोइरांग। यहीं स्थित है आजाद हिन्द फौज (आईएनए) युद्ध संग्रहालय। नेताजी की सेना के कारतूस, फौजी हेलमेट और वर्दियां यहां बेहद बुरी स्थिति में संग्रहित हैं। भारत माता के महान सपूत नेताजी सुभाषचंद्र बोस की स्मृतियों का कोई ध्यान नहीं रखा गया, क्यों?

अब यदि 4 जुलाई को यह सवाल उठे कि क्या यह उन्हें विस्मृत करने की सुनियोजित प्रक्रिया का हिस्सा था? तो गलत-सही छोड़िये, इसमें अस्वाभाविक क्या है? यह सच है कि देश में कुछ कोटरियों द्वारा महापुरुषों को गढ़ने की प्रक्रिया के समानांतर महापुरुषों को विस्मृत करने की प्रक्रिया भी चली है। विविधता हमारी संस्कृति नहीं है, बल्कि विविधता को स्थान देना और सम्मान देना, यह हमारी संस्कृति है।

वास्तव में महापुरुषों को अपने तरीके से भुनाने वाले लोगों ने भाषा, भूगोल, क्षेत्र और कुनबे से बांधकर उन्हें बौना करने का काम किया है। एक और उदाहरण देखिए। 1 जुलाई को बिधानचंद्र्र राय का जन्मदिवस था। डॉ. बिधानचंद्र 1948 से 1962 तक बंगाल के मुख्यमंत्री रहे। लेकिन यह बात कम ही लोग जानते हैं कि लंदन के सेंट बार्थोलोम्यू मेडिकल कॉलेज से उन्होंने एमआरसीपी और एफआरसीएस की दो डिग्रियां ली थीं। दोनों डिग्रियां 2 साल और 3 महीने के भीतर लेने वाले वह अकेले व्यक्ति थे। उस समय लंदन के उस कॉलेज में एशियाई लोगों को दाखिला नहीं मिलता था। बिधानचंद्र राय ने 30 बार प्रयास किया, तब जाकर उन्हें वहां दाखिला मिला। यह 1911 की बात है। हम किताबों में गांधी जी के साथ दक्षिण अफ्रीका में घटी घटना पढ़ते हैं। जो इसके बाद की है, लेकिन बिधान चंद्र राय जी के साथ लंदन में नस्लभेद का प्रकरण कहीं पढ़ाया-बताया नहीं जाता। असहयोग और शांतिपूर्ण निवेदन के बारे में हम पढ़ते हैं, लेकिन बिधानचंद्र राय जी के शांतिपूर्ण निवेदन के बारे में कहीं जिक्र तक नहीं आता। दरअसल शांति की, अहिंसा की परंपरा बिधानचंद्र्र राय से भी शुरू नहीं हुई है। यह सिर्फ महात्मा गांधी से भी शुरू नहीं हुई है। यह तो हमारे पुरखों से है। परम्परा से है। संस्कृति से है।

 

मोइरांग संग्रहालय में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की खंडित प्रतिमा। 7 जुलाई 1993 को अज्ञात लोगों ने इसे तोड़ डाला था। 

यदि अहिंसा के बारे में सबसे पहले कोई पद्य/श्लोक रचा गया तो वह महर्षि वाल्मीकि ने क्रौंच वध पर लिखा था- मा निषाद ...। एक वन्य पक्षी के लिए भी करुणा का भाव वहीं से चला आ रहा है। भगवान महावीर ने, भगवान बुद्ध ने भी यही उपदेश दिया। यानी इस संस्कृति से हमने वे सूत्र लिए हैं, लेकिन संस्कृति को न समझने वाले और अपने संकीर्ण सोच के मुताबिक चीजों को चुनिंदा तरीके से छांटकर देखने वाले लोगों ने अपने हिसाब से महापुरुषों को परिभाषित कर लिया। ऐसा ही एक रोचक और बड़ा नाम इन दिनों चर्चा में आया—प्रशांत चंद महालनोबिस, जो एक वैज्ञानिक और सांख्यिकीविद् थे, उनकी जयंती 29 जून को थी। हमारे देश के विकास के लिए जो संकल्पना पंचवर्षीय योजनाओं में मिली, और जिसे पूरी तरह विफल होने के पहले तक बुरी तरह घसीटा जाता रहा, उसके वे बहुत बड़े कारक रहे। लेकिन जब भारत की पंचवर्षीय योजना में सार्वजनिक क्षेत्र को ‘कमांडिंग हाइट्स’ देने की बात की गई, तो यह नहीं कहा गया कि ये शब्द लेनिन के 1922 के भाषण से, सोवियत मॉडल से, सोवियत योजना से उठाए गए हैं। लेनिन के 1922 के भाषण की फोटोस्टेट कॉपी 1956 में चलाने की कोशिश होती है और बताया जाता है कि यह हमारा मॉडल है, नेहरू का मॉडल है, महालनोबिस का मॉडल है। अर्थव्यवस्था के साथ बड़े स्तर के ये प्रयोग जब विफल होने लगे, तो उसे न महालनोबिस की असफलता बताया गया, न नेहरू मॉडल की विफलता। उसे सोवियत देखादेखी मॉडल की विफलता भी नहीं बताया गया। उसे ‘हिंदू ग्रोथ रेट’ कह दिया गया। यानी यदि सफलता मिली तो मेरी, और असफलता मिली तो वह इस बिरादरी की यानी हिंदुओं की।

1991 की बात है। जब देश में उदारीकरण की बात हुई तो मनमोहन सिंह और पीवी नरसिंह राव दोनों ने प्रयोग किए। जब वह सफल रहा तो उसका सारा श्रेय मनमोहन सिंह को मिला। पर क्यों पीवी नरसिंह राव को याद करने की जरूरत तक नहीं समझी गई? यह चयन समझ से परे है। श्रेय है, तो सिर्फ एक कुनबे की तरफ जाएगा, एक दिशा में जाएगा और यदि लांछित करने का कोई मौका आएगा तो सारे हिंदुओं को लांछित किया जाएगा, पूरे देश की परंपरा और संस्कृति को लांछित कर दिया जाएगा?

हाल ही में पाञ्चजन्य ने बाबासाहेब आंबेडकर पर एक विशेषांक प्रकाशित किया था। संतोष की बात है कि इसके बाद से वामपंथी बिरादरी ने बाबासाहेब की बातों को उद्धृत करना लगभग छोड़ दिया है। अब ये लोग अपने लेखों में, अपने भाषणों में उनकी कही और लिखी गई बातों का उद्धरण तक नहीं देते। हमने पाकिस्तान के बारे में, वामपंथियों के बारे में, मुसलमानों और दलितों की एकता को लेकर बाबासाहेब आंबेडकर का क्या दृष्टिकोण था, इस बारे में विस्तृत ढंग से लिखा। पर इन बातों को वामपंथियों ने अपनी सुनाई कथा से बाहर ही रखा था। क्यों?

दरअसल वे एक एजेंडे के तहत काम करते हैं। उनका कहना है कि वे हमारे बाबासाहेब हैं। उनके नाम को भुनाकर अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को बहकाया जाएगा। बाबा का घर तो सबका होता है। लेकिन वामपंथियों ने इसका प्रयोग सिर्फ समाज को बांटने के लिए किया। ऐसा ही भगत सिंह के बारे में प्रचारित किया जाता रहा है। जैसे, कहा गया कि भगत सिंह तो नास्तिक थे। पर यह बात छिपा दी जाती है कि भगत सिंह आर्यसमाजी परिवार से थे और आर्यसमाज के लोग मूर्ति पूजा नहीं करते। ये सभी हमारे महापुरुष हैं। इनके साथ भी अन्याय हुआ है और इनके नाम पर भी अन्याय हुआ है। हमें सक्रिय ढंग से बौद्धिक बहस छेड़ कर अपने महापुरुषों के साथ हुए इस अन्याय का प्रतिकार एवं परिमार्जन करना होगा।