पूर्वोत्तर में चर्च की दखल पहले ज्यादा थी, अब कम हुई है
   दिनांक 09-जुलाई-2018

 
पूर्वोत्तर यानी विविधता से भरा क्षेत्र। संस्कृति, परंपरा एवं रीति-रिवाजों से भरा-पूरा क्षेत्र। लेकिन दूसरी ओर इसका एक स्याह पहलू है- विकास का अभाव। पहले की राज्य और केन्द्र सरकारों ने सदैव इस क्षेत्र की उपेक्षा की, जिसका परिणाम यह हुआ कि दिन-प्रतिदिन ईसाई मिशनरियों ने ‘सेवा के बाने’ में अपनी जड़ें मजबूत कीं और पूर्वोत्तर चर्च के चंगुल में फंसता चला गया। लेकिन मणिपुर विधानसभा के अध्यक्ष वाई.खेमचंद मानते हैं कि मोदी सरकार आने के बाद पूर्वोत्तर की शक्लो-सूरत बदल रही है और जो अराष्ट्रीय गतिविधियां हो रही थीं, वे भी कम हुई हैं। पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने राज्य के मौजूदा परिदृश्य और बदलते हालात पर उनसे विस्तृत बात की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:-

भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार राज्य में पहली बार आई है। महीन गठबंधन और चुनौतीपूर्ण सदन संचालन...ऐसे में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?
देखिए, कोई भी जिम्मेदारी कठिन होती है, यह सच है। मैं चुनाव जीतकर आया और अध्यक्ष नियुक्त किया गया। सदन में अध्यक्ष की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण मानी जाती है। सबको साथ लेकर चलना, यह अध्यक्ष का दायित्व होता है और इसे बखूबी निभाना होता है। मेरी कोशिश रहती है कि जो जिम्मेदारी मुझे दी गई है, उसे अच्छे से निभाऊं। रही चुनौतियों की बात तो मौजूदा हालात में विधानसभा में कांग्रेस को छोड़कर सभी सहयोग दे रहे हैंं। ऐसी चुनौतियों के बावजूद सरकार अच्छी चल रही है।

राजनेता से विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका में आने पर क्या सक्रिय राजनीति की कमी महसूस होती है?
हां। कभी-कभी यह महसूस करता हूं। जैसे जब मैं स्वयं का ही उदाहरण लेता हूं तो पाता हूं कि मैं भाजपा में आया और जीवन में पहली बार चुनाव जीता। मेरी संगठन के लिए काम करने की इच्छा थी लेकिन पार्टी ने मुझे अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी। अब पार्टी ने जो जिम्मेदारी दी है, उसे तो निभाना ही पड़ेगा। लेकिन इन सबके बीच जो खलता है वह यह कि जब आप संगठन के लिए काम करते हैं तब आप हर समय अपने लोगों से जुड़े रहते है, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष के पद पर बैठने के बाद इसमें दूरियों के साथ ही औपचारिकताएं जुड़ जाती हैं।

पूर्वोत्तर के राज्यों में मणिपुर छोटे राज्यों में गिना जाता है। देश की अन्य विधानसभाओं की तुलना में यहां की विधानसभा में किस प्रकार का सुधार करना चाहेंगे?
देखिए, सदन में अच्छे लोग आएंगे तो चीजें बेहतर होंगी और राज्य के लिए सुखद होगा। इसलिए गुणवत्ता में सुधार हमारी प्रमुख प्राथमिकता है। पूर्वोत्तर के तीन क्षेत्र-अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मणिपुर में जब चुनाव होता है तो बहुत ही खराब वातावरण होता है। मैं इस व्यवस्था को सुधारना चाहता हूं। इसके लिए चुनाव व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों के साथ चर्चा चल रही है।

विकास के मुद्दे कम और राजनीतिक हो-हल्ला ज्यादा, इस चुनौती का सामना आप कैसे करते हैं?

यह बात सच है कि पिछले 50 साल से लेकर अभी तक विकास की नीति पर ध्यान नहीं दिया गया, लेकिन राजनीतिक हो-हल्ले में कसर नहीं रही। तथ्य यह है कि पिछली सरकारों को जहां पैसा देना चाहिए, जिसका विकास करना चाहिए, वह नहीं किया। पर मौजूदा सरकार की नीति में परिवर्तन है। मैं इतना ही कहूंगा कि यह परिवर्तन तब ही जमीन पर सार्थक होगा, जब दलों के बीच समन्वय होगा और सभी विकास के लिए काम करेंगे।

मणिपुर में एनजीओ एक बड़ा ‘सेक्टर’ है। आप इनसे कैसा संवाद करना चाहेंगे?
बिल्कुल सही बात है कि राज्य में एनजीओ एक ‘सेक्टर’ रूप में है और इनका बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है राज्य की व्यवस्था में। लेकिन मैं इतना जरूर कहना चाहूंगा कि राज्य में यदि बदलाव लाना है तो इसमें सबकी जिम्मेदारी बनती है, जिसमें एनजीओ की बड़ी भूमिका है। राज्य में विकास हो, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत जरूरतें आमजन को सुलभ हों, इसके लिए सभी को साथ मिलकर सिर्फ और सिर्फ जनसामान्य के विकास के लिए काम करना होगा।

पिछले दिनों नागालैंड में चुनाव के समय चर्च ने घोषणा करके राजनीति में दखल दी। एक तरफ चुनाव सुधार हैं तो दूसरी तरफ चर्च की घोषणाएं। कैसे देखते हैं आप इन्हें?
मैं स्पष्ट तौर पर कहना चाहता हूं कि मत-पंथ से जुड़े विषयों को राजनीति में दखल नहीं देना चाहिए। अभी हाल ही में आर्चबिशप ने खुले तौर पर कहा कि कांग्रेस को वोट देना है। मैं इसे सही नहीं मानता। इस तरह का वातावरण न उत्पन्न हो, इसके लिए मैं राज्य के लोगों से मिलना चाहूंगा।

...लेकिन चर्च और एनजीओ का सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था में दखल काफी गहराई तक है। ऐसे में विधानसभा अध्यक्ष के नाते इन दोनों से संवाद करना क्या आपके लिए सरल होगा?
आपकी बात सही है। उनकी अपनी भूमिका है और हमारी अपनी भूमिका है। लेकिन जब आप किसी से संवाद करने निकलते हैं तो सामने वाला कब तक आपसे भागेगा। हां, उसका इरादा नेक होना चाहिए। जैसे एक उदाहरण याद आता है। कुछ समय पहले इंफाल में मुझे दो ऐसे व्यक्ति मिले थे जो चर्च भी जाते थे और संघ के कार्यक्रम में शामिल होते थे। चर्च के लोगों को जब इसकी सूचना मिली तो उन्होंने उन्हें बुलाया और कहा कि यह तो हिन्दुओं का कार्यक्रम है। आप वहां क्यों जाते हो? तो उन्होंने जवाब दिया, मेरे घर के पड़ोस में सात मणिपुरी हिन्दू परिवार रहते थे और साथ ही काम करते थे। वह भी रविवार को हमारे साथ चर्च जाते थे, लेकिन कभी भी किसी हिन्दू ने ऐसा सवाल नहीं किया कि वे चर्च क्यों जाते हैं? तो आप क्यों ऐसा सवाल उठा रहे हैं? यह सुनकर चर्च के लोग चुप हो गए। फिर उन्होंने एक सांस्कृतिक कार्यक्रम किया और चर्च को भी इसमें बुलाया तो चर्च ने उनके प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। अब इस तरह से कोई काम करेगा तो ठीक नहीं है।

पूर्वोत्तर, संस्कृति और विविधता से समृद्ध है। लेकिन समय-समय पर स्थानीय चर्च लोगों से अपील करता दिखाई देता है कि पुरखों का उत्सव नहीं मनाना, देवी-देवता की पूजा नहीं करना। क्या आपको लगता है कि ईसाई मिशनरियों ने पूर्वोत्तर को काफी हद तक प्रभावित किया है?
इसे मैं दूसरी तरह से बताना चाहूंगा कि पहले चर्च का दखल ज्यादा था जो अब कम हुआ है। कुछ समय पहले मेरे गांव में कुछ लोग चर्च बनाने आए थे। एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए मुझे भी बुलाया। तब उस गांव के वनवासी समुदाय के लोग मेरे पास आए और कहा कि हमारा चर्च ठीक से नहीं बन पा रहा है, इसलिए आप इसमें आर्थिक मदद करिए। मैंने उनसे बड़े प्रेम से कहा कि आप दूर-दराज इलाके से मेरे पास आए हैं तो मेरी सभ्यता-संस्कृति है कि घर आए किसी व्यक्ति को खाली हाथ नहीं भेजा जाता। लेकिन मैंने उनसे कहा कि जो विदेश के चर्च और ईसाई हैं, वे अपने देश की परंपरा और संस्कृति को नहीं भूलते। मणिपुर का थांग्खुल समुदाय जो अपनी संस्कृति और परंपरा को वर्षों से मनाता चला आ रहा है, ईसाई बनने के बाद क्यों अपनी परंपरा को भूल जाता है? क्यों चर्च आपको अपने रीति-रिवाज से दूर करता है? उसके बाद उनके जवाब का जो भाव था वह यह था कि वनवासी समुदाय, गलत और सही को पहचानने लगा है।

...चर्च की ओर से कैसी प्रतिक्रिया हुई?

देखिए, चर्च का सब काम पैसे से चलता है। पैसा आएगा तो काम चलता रहेगा और पैसा खत्म, काम खत्म। बस समझने के लिए इतना ही काफी है।

गठबंधन सरकार में पक्ष-विपक्ष की ओर से भाव, सम्मान और गर्मजोशी कैसी है?
वैसे दिल की बात दिल में ही रहनी चाहिए। लेकिन मेरा मानना है कि सदन में एक मजबूत विपक्ष होना चाहिए, क्योंकि यह जितना आक्रामक होगा, उतना ही सत्ता पक्ष को लाभ मिलेगा और लोकतंत्र मजबूत होगा। दूसरा, सम्मान की बात है, तो मैं अधिकतम समय विपक्ष को देता हूं। कभी-कभी सत्तापक्ष के लोग नाराज भी होते हैं कि आप इतना समय उन्हें दे रहे हैं। लेकिन कुल मिलाकर सब ठीक ही चल रहा है। ‘हिल’ यानी पहाड़ी क्षेत्रों और ‘वैली’ यानी घाटी और मैदानी क्षेत्रों का जो झगड़ा है, वह भी कम होता जा रहा है और भावानात्मक रूप से आपसी रिश्तों में मजबूती आ रही है।

दिल्ली में पेट्रोल के दाम 70 से 80 रु. के बीच होने पर हंगामा शुरू हो गया। लेकिन मणिपुर में जब पेट्रोल के दाम 200 रु. तक पहुंच गए तो दिल्ली को बेचैनी नहीं हुई थी। इस पर आप क्या कहेंगे?
शायद यही कि मणिपुर के लोगों को परेशानी सहने की आदत हो गई है इसलिए मजबूरी में खरीदना पड़ा। मैं इसी से जुड़ती एक बात कहना चाहूंगा कि राष्ट्रीय मीडिया यहां बहुत कम ध्यान देता है। जो प्रमुख विषय होते हैं, उन्हें तरजीह नहीं मिलती। इसलिए आमजन की समस्याएं सामने नहीं आ पातीं।

दिल्ली में महात्मा गांधी सहित राष्ट्रीय नेताओं के अच्छे स्मारक बने हैं। लेकिन मोइरांग जैसी गौरवशाली भूमि में आजाद हिंद फौज का जो स्मारक है, वह ठीक स्थिति में नहीं है। संग्रहालय में समुचित साहित्य का अभाव है। मणिपुर की इस राष्ट्रीय धरोहर को संरक्षित करने के लिए आप क्या प्रयास करेंगे?
आपने सही कहा कि मणिपुर के पास नेताजी से जुड़ी राष्ट्रीय धरोहर है। लेकिन यह धरोहर अकेले हमारी नहीं है, पूरे देश की है। इसलिए पूरे देश की जिम्मेदारी बनती है इसे संरक्षित करने की। फिर भी स्वयं की जिम्मेदारी समझकर मैं राज्य की आर्थिक स्थिति को देखते हुए इसको सहेजने का पूरा प्रयास करूंगा। दूसरी बात राज्य में सिर्फ संग्रहालय ही नहीं, बहुत-सी ऐसी चीजें हैं जो विकास और संरक्षण के अभाव में खत्म होती जा रही हैं। यहां सरकारी स्कूलों के भवनों की स्थिति ठीक नहीं है। विद्यार्थियों के बैठने तक की समुचित व्यवस्था नहीं है। पिछले 15-20 साल से सरकारी भवनों का विकास नहीं हो रहा है। हालात यह है कि राज्य में बच्चों को ठीक ढंग से बैठाकर पढ़ाने वाले विद्यालय गिनती के हैं। इसके अलावा बहुत सारे क्षेत्र अविकसित हैं। तो कुल मिलाकर हमारा इन सभी बिन्दुओं पर ध्यान हैं और हम इन्हें सुलझाने में लगे हुए हैं।

मणिपुर में विभिन्न कार्य क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी अच्छी है, मगर सरकार में उनकी भागीदारी न के बराबर है। इस पर आप क्या कहेंगे?
यह सच है कि सदन में महिलाओं की स्थिति न के बराबर है। इसके पीछे की वजह है आर्थिक कारण। खराब आर्थिक हालात के कारण महिलाएं सदन में भागीदारी में पीछे रह जाती हैं। इस स्थिति को सुधारने के लिए हम लोगों ने विचार-विमर्श भी चुनाव आयुक्त एवं अन्य अधिकारियों से किया था। आने वाले दिनों में इसमें सुधार होगा और आप सदन में ज्यादा संख्या में महिलाआें को देख पाएंगे।

देश के बहुत से लोग नहीं जानते कि राज्य का विधानसभा अध्यक्ष एक राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी है। खेलों के प्रति आपका क्या रुझान है?
मैं ताइक्वांडो का खिलाड़ी था। लेकिन राजनीति का खिलाड़ी अभी तक नहीं हो पाया हूं। पर खिलाड़ी और कोच होने के नाते मैं जो चीजें यहां सीख रहा हूं वे हैं कि जैसे खेल में लक्ष्य, भावना और किसी भी परिस्थिति में जीतने का जज्बा बरकरार रहता है, ठीक वही बात मैं राजनीति में भी लागू करता हूं।

वर्तमान समय में केन्द्र सरकार द्वारा पूर्वोत्तर के क्षेत्र में किए जा रहे विकास कार्य को आप कैसे देखते हैं?
केन्द्र सरकार के प्रयासों से पूर्वोत्तर तेजी के साथ बदला है। राज्य को 500 करोड़ की लागत से खेल विवि. का ऐलान हुआ। विकास की न केवल नई-नई योजनाएं चल रही हैं बल्कि जमीन पर उसका असर स्पष्ट तौर पर देखने को मिलता है। बड़ी तेज गति से कम समय में राजमार्ग का निर्माण हो रहा है, जिसका लगभग 80 प्रतिशत काम पूरा होने वाला है। एक तरीके से यह राजमार्ग मणिपुर के लिए वरदान साबित होगा। मुझे यह कहने में बिल्कुल भी संकोच नहीं कि जो काम पिछले 50 साल से नहीं हो पाया था, उसको केन्द्र सरकार ने 3-4 साल में करके दिखाया है।