अफगानिस्तान में खतरे में हिंदू-सिख समुदाय
   दिनांक 09-जुलाई-2018
 
 
गत 1 जुलाई 2018 को अफगानिस्तान के जलालाबाद में एक आत्मघाती हमले में सिख और हिन्दू समुदाय के लोगों मौत के घाट उतार दिया गया। हालांकि अफगानिस्तान में हुए इस आतंकी हमले की जिम्मेदारी आईएसआईएस ने ली है, किन्तु सूत्रों का दावा है कि इस घटना को पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आईएसआई ने काबुल में भारत के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अंजाम दिया है। प्राप्त सूचनाओं के अनुसार एक आत्मघाती हमलावर ने राष्ट्रपति अशरफ गनी से मिलने जा रहे सिखों और हिंदुओं के काफिले को जलालाबाद में निशाना बनाया, जिसमें कुल 19 लोगों की मौत हो गई। मारे गए लोगों में 10 सिख और 7 हिंदू थे।
 
 
जलालाबाद: आतंकी हमले में मारे गए अपने परिजन की अंतिम यात्रा में शामिल सिख युवा 
अफगानिस्तान में सिख-हिन्दू समुदाय अब करीब 300 परिवारों तक सीमित हो गया है। वहां दो गुरुद्वारे हैं, एक जलालाबाद में और दूसरा राजधानी काबुल में, कुछ मंदिर भी हैं पर कोई सुरक्षा नहीं है। एक दशक पहले अमेरिकी विदेश विभाग की एक रिपोर्ट के हिसाब से अफगानिस्तान में करीब 3,000 सिख-हिंदू रहते थे।
हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब वहां अल्पसंख्यकों पर आतंकी हमला किया गया हो। हमले के पीड़ितों में अफगानिस्तान के संसदीय चुनाव में एकमात्र सिख उम्मीदवार अवतार सिंह खालसा और समुदाय के जाने-माने कार्यकर्ता रावल सिंह भी शामिल हैं। अफगानिस्तान में संसद की एक सीट हिंदू-सिखों के लिए आरक्षित है।
अफगानिस्तान में साम्यवादी नजीबुल्लाह की सरकार के पतन के बाद से हिन्दू-सिख समुदाय के लिए बुरे दिनों की शुरुआत हो गई थी। 1992 में नजीबुल्लाह को काबुल में सरेआम फांसी पर लटका दिया गया था। समझा जाता है कि उसी दिन से वहां पर सदियों से बसे हिन्दू-सिख समुदाय के लिए संकट का दौर आ गया था। तालिबानियों ने काबुल की सत्ता हथियाते ही हिंदुओं और सिखों को सार्वजनिक स्थलों पर अपनी पहचान प्रकट करने के लिए पीली रंग की पट्टी पहनने को मजबूर कर दिया। दोनों ही अल्पसंख्यक समुदायों की भूमि तथा अन्य सम्पत्तियों पर तालिबानियों तथा उसके बाद काबुल पर काबिज हुए कबीलाई सरदारों ने बलात् कब्जा जारी रखा।
1970 के दशक में अफगानिस्तान में इन दोनों ही समुदायों की कुल आबादी लगभग नौ लाख थी। व्यापार के क्षेत्र में दोनों ही समुदायों का वर्चस्व था।  तालिबानी कब्जे के बाद अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों की संपत्ति पर नजर रखने के चलते हिंदुओं और सिखों को भारी क्षति उठानी पड़ी है। लगभग यही स्थिति अफगानिस्तान की सीमा से लगे पाकिस्तान के पश्चिमी क्षेत्रों में भी है। पेशावर में मानवाधिकारकर्मी और पाकिस्तान में सिख समुदाय के प्रभावशाली नेता चरणजीत सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पाकिस्तान में सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने और हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने वाले चरणजीत खुद ही आतंकियों की गोली का शिकार हो गए। हमलावरों ने चरणजीत सिंह की गोली मारकर हत्या की और मौके से फरार हो गए। हालांकि, हत्या की वजह का पता फिलहाल चल नहीं पाया है। वहां के समुदाय और स्थानीय नेताओं को शक है कि इस हत्या के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ है।
25 जुलाई को पाकिस्तान में आम चुनाव होने हैं। चुनावों की घोषणा के बाद से वहां मजहबी हिंसा में अचानक तेजी आई है। पाकिस्तान की सेना और आईएसआई अपने देश में कट्टरवाद की खुलेआम मदद कर रही है। हाल ही में कई पांथिक नेताओं ने पाकिस्तान सरकार पर आरोप लगाया है कि देश में अल्पसंख्यकों से भेदभाव और अत्याचार के खिलाफ सरकार आंखें मूंदे बैठी है। पाकिस्तान मे अल्पसंख्यक मंत्रालय होने के बावजूद उनके दुख-दर्द को सुनने वाला वहां कोई नहीं है। पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वा में लगभग 60,000 सिख-हिन्दू रहते हैं, जिसमें पेशावर में ही इनकी संख्या 25,000 से अधिक है। अफगानिस्तान में हिन्दू-सिख समुदाय के लोगों की हत्या और उनकी संपत्ति हथियाए जाने के विरोध में अब समुदाय के कुछ लोग देश छोड़ने पर विचार कर रहे हैं। एक सिख व्यापारी तेजवीर सिंह ने कहा, ‘मैंने तय कर लिया है कि अब हम यहां ज्यादा समय तक नहीं रह सकते हैं।’ हमले में तेजवीर के चाचा की भी मौत हो गई थी। हिंदुओं और सिखों के राष्टÑीय मंच के सचिव तेजवीर ने कहा, ‘इस्लामी आतंकी हमारी पांथिक प्रथाओं को बर्दाश्त नहीं करेंगे। हम अफगानी हैं। सरकार हमें मान्यता देती है लेकिन आतंकवादी हम पर हमले करते हैं क्योंकि हम मुस्लिम नहीं हैं।’
उनके अनुसार अफगानिस्तान में सिख-हिन्दू समुदाय अब करीब 300 परिवारों तक सीमित हो गया है। वहां दो गुरुद्वारे हैं, एक जलालाबाद में और दूसरा राजधानी काबुल में, कुछ मंदिर भी हैं पर कोई सुरक्षा नहीं है। एक दशक पहले अमेरिकी विदेश विभाग ने एक रिपोर्ट में बताया था कि अफगानिस्तान में करीब 3,000 सिख-हिंदू रहते हैं। राजनीतिक प्रतिनिधित्व और पूजा-पाठ की स्वतंत्रता के बावजूद आतंकी हमलों और उत्पीड़न से तंग आकर हजारों लोग भारत चले आए हैं।
 
 अफगानिस्तान में सिख-हिन्दू समुदाय
अब जलालाबाद हमले के बाद कुछ सिखों ने शहर स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास से शरण मांगी है। जलालाबाद में इन समुदायों के व्यापारी समवेत् स्वर में कह रहे हैं कि हमारे पास केवल दो विकल्प बचे हैं-या तो हम भारत चले जाएं या फिर इस्लाम कबूल कर लें।
भारत सरकार ने मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए अफगानिस्तान के सिख और हिंदू समुदायों के लोगों को लंबी अवधि का वीजा जारी किया है। अफगानिस्तान में भारत के राजदूत विनय कुमार ने कहा कि सिखों-हिन्दुओं की पूरी मदद की जाएगी। हालांकि कुछ सिख ऐसे भी हैं जो कह रहे हैं कि वे अफगानिस्तान से कहीं नहीं जाएंगे।
विश्व सिख संगठन, कनाडा के कानूनी सलाहकार बलप्रीत सिंह ने ‘अफगानिस्तान में सिख एवं हिन्दू समुदाय की दुर्दशा’ पर एक रिपोर्ट में इन दोनों समुदायों की मार्मिक स्थिति का विवरण प्रस्तुत किया है। रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों को समान अधिकार होने के बावजूद इन दोनों समुदायों को स्कूलों में प्रवेश नहीं दिया जाता। दोनों ही समुदायों के लोगों को सार्वजनिक रूप से काफिर कहा जाना, उन पर थूका जाना, और उनकी शव-यात्राओं पर पत्थर फेंके जाना आम बात है। इन दोनों समुदायों की महिलाओं को बाहर निकलने के लिए बुर्के का इस्तेमाल करना पड़ता है। दुकानदारों को स्थानीय एजेंसियों को व्यापार करने की एवज में ‘जजिया’ चुकाना पड़ता है। सरकारी नौकरियों में इन्हें कोई जगह नहीं दी जाती है। निश्चित रूप से इन सब खामियों के मद्देनजर, अफगानिस्तान में भारत के भारी निवेश के चलते भारत सरकार को अफगानिस्तान में बचे हिन्दू-सिख समुदाय की सुरक्षा के लिए कोई कारगर नीति अपनानी ही पड़ेगी। सामरिक रूप से भी महत्वपूर्ण इस बिन्दु पर विचार करना होगा कि किस प्रकार अफगानिस्तान में बसे हिंदुओं और सिखों को पूरी हिफाजत दी जाए। 
 
(लेखक वरिष्ठ राजनैतिक विश्लेषक हैं)