पुण्यतिथि पर विशेष: स्वतन्त्रता आंदोलन में उग्रवाद के प्रणेता लोकमान्य तिलक

भारतीय स्वतन्त्रता के आन्दोलन में कांग्रेस में स्पष्टतः दो गुट बन गये थे। एक नरम तो दूसरा गरम दल कहलाता था। पहले के नेता गोपाल कृष्ण गोखले थे, तो दूसरे के लोकमान्य तिलक। इतिहास में आगे चलकर लाल-बाल-पाल नामक जो तिकड़ी प्रसिद्ध हुई, उसके बाल यही बाल गंगाधर तिलक थे, जो आगे चलकर लोकमान्य तिलक के नाम से प्रसिद्ध हुए।
महात्मा गांधी के आंदोलन को सफल बनाने में सबसे बड़ा योगदान तिलक का ही था असहयोग आंदोलन के लिए जब एक साल के भीतर एक करोड़ रुपये जमा करने का लक्षय रखा गया तो गांधी जी ने तिलक की पुण्यतिथि पर कोष को नाम दिया तिलक स्वराज फंड। देश की जनता तिलक का बहुत स्म्मान करती थी और उन्होंने जितना हो सका उतना फंड दिया। तिलक के जनता पर प्रभाव के कारण ही यह असंभव सा दिखने वाला लक्षय पूरा हो गया। "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा" उनका यही कथन लोगों के दिलों में संघर्ष जगा गया और उन्हें "लोकमान्य" के नाम से प्रसिद्ध कर गया।
लोकमान्य तिलक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को रत्नागिरी, महाराष्ट्र के एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनकी रुचि सामाजिक कार्यों में थी। वे भारत में अंग्रेजों के शासन को अभिशाप समझते थे तथा इसे उखाड़ फेंकने के लिए किसी भी मार्ग को गलत नहीं मानते थे। इन विचारों के कारण पूना में हजारों युवक उनके सम्पर्क में आये। इनमें चाफेकर बन्धु प्रमुख थे। तिलक जी की प्रेरणा से उन्होंने पुणे के कुख्यात प्लेग कमिश्नर रैण्ड का वध किया और तीनों भाई फांसी चढ़ गये।
सन 1897 में महाराष्ट्र में प्लेग, अकाल और भूकम्प का संकट एक साथ आ गया। लेकिन दुष्ट अंग्रेजों ने ऐसे में भी जबरन लगान की वसूली जारी रखी। इससे तिलक जी का मन उद्वेलित हो उठा। उन्होंने इसके विरुद्ध जनता को संगठित कर आन्दोलन छेड़ दिया। नाराज होकर ब्रिटिश शासन ने उन्हें 18 मास की सजा दी। तिलक जी ने जेल में अध्ययन का क्रम जारी रखा और बाहर आकर फिर से आन्दोलन में कूद गये।
पत्रकारिता में भी दिया बड़ा योगदान
तिलक ने मराठी में "मराठा दर्पण व केसरी" नाम से दो दैनिक समाचार पत्र शुरू किए जो जनता में काफी लोकप्रिय हुए। जिसमें तिलक ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीनभावना की बहुत आलोचना की। तिलक जी के अखबारों में प्रकाशित होने वाले विचारों से पूरे महाराष्ट्र और फिर देश भर में स्वतन्त्रता और स्वदेशी की ज्वाला भभक उठी। युवक वर्ग तो तिलक जी का दीवाना बन गया। लोगों को हर सप्ताह केसरी की प्रतीक्षा रहती थी। अंग्रेज इसके स्पष्टवादी सम्पादकीय आलखों से तिलमिला उठे। बंग-भंग के विरुद्ध हो रहे आन्दोलन के पक्ष में तिलक जी ने खूब लेख छापे। जब खुदीराम बोस को फांसी दी गयी, तो तिलक जी ने केसरी में उसे भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी।
जेल में रहकर लिख डाला ग्रंथ
अंग्रेज तो उनसे चिढ़े ही हुए थे। उन्होंने तिलक जी को कैद कर छह साल के लिए बर्मा की माण्डले जेल में भेज दिया। वहां उन्होंने ‘गीता रहस्य’ नामक ग्रन्थ लिखा, जो आज भी गीता पर एक श्रेष्ठ टीका मानी जाती है। इसके माध्यम से उन्होंने देश को कर्मयोग की प्रेरणा दी।
तिलक जी समाज सुधारक भी थे। वे बाल-विवाह के विरोधी तथा विधवा-विवाह के समर्थक थे। धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों में वे सरकारी हस्तक्षेप को पसन्द नहीं करते थे। उन्होंने जनजागृति के लिए महाराष्ट्र में गणेशोत्सव व शिवाजी उत्सव की परम्परा शुरू की, जो आज विराट रूप ले चुकी है। स्वतन्त्रता आन्दोलन में उग्रवाद के प्रणेता तिलक जी का मानना था कि स्वतन्त्रता भीख की तरह मांगने से नहीं मिलेगी। अतः उन्होंने नारा दिया - स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर ही रहेंगे।
उन्होंने ब्रिटिश सरकार को भारतीयों को तुरंत पूर्ण स्वराज देने की मांग की, जिसके फलस्वरूप और केसरी में छपने वाले उनके लेखों की वजह से उन्हें कई बार जेल भेजा गया। तिलक अपने क्रांतिकारी विचारों के लिए भी जाने जाते थे। ऐसे भारत के वीर स्वतंत्रता सेनानी का निधन 1 अगस्त 1920 को मुंबई में हुआ।