हंगामा हुआ पर कामयाब रहा मानसून सत्र
   दिनांक 13-अगस्त-2018
हंगामे भी कम नहीं हुए, सरकार के खिलाफ असफल अविश्वास प्रस्ताव तक आया...इसके बावजूद अगर संसद का मानसून सत्र पिछले 18 सालों के बाद सबसे बेहतर रहा तो हैरत होगी ही। भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया में एक तथ्य स्वीकार कर लिया गया है कि संसद का सत्र चलाना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी है, विपक्ष चाहे जितने भी अड़ंगे डाले। उसकी जिम्मेदारी संसद का सत्र चलाना नहीं है। हालांकि प्रत्यक्ष तौर पर यह स्वीकार नहीं किया जाता कि संसद को बाधित करना विपक्ष की जिम्मेदारी है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ऐसा हुआ है। इसलिए संसद के बारे में यह मान लिया गया है कि यहां काम कम हंगामे, ज्यादा होंगे। ऐसे माहौल में अगर संसद का यह सत्र 18 साल में सबसे ज्यादा सार्थक रहा तो इसकी प्रशंसा की ही जानी चाहिए।
संसद सचिवालय के मुताबिक 18 जुलाई से लेकर 10 अगस्त तक 24 दिन के इस सत्र में साल 2000 के बाद लोकसभा में सबसे ज्यादा काम हुआ। इस दौरान संसद में कुल 21 बिल पेश किए गए, जिनमें से 12 को दोनों सदनों ने मंजूरी दे दी। हालांकि सरकार के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बना मुस्लिम महिलाओं के शोषण का प्रतीक बना तीन तलाक के खिलाफ बिल राज्यसभा में पेश ही नहीं हो पाया। संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिन सरकार इसे राज्यसभा में रखने वाली थी, लेकिन हंगामे के चलते इसे पेश नहीं किया जा सका। हालांकि इसी सत्र में संविधान का 123वां संशोधन विधेयक पास हुआ, जिसके तहत राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया जाना है। इसके साथ ही विपक्षी दलों और दलित संगठनों की मांग पर अनुसूचित जातियां एवं अनुसूचित जनजातियां (अत्याचार निवारण) संशोधन विधेयक-2018 को भी संसद की मंजूरी मिली। यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर लाया गया। सरकार इसे बड़ी उपलब्धि बता सकती है। लेकिन यह भी सच है कि इस विधेयक के पारित होने से जहां अनुसूचित वर्ग की राजनीति करने वाले उत्साह में हैं, वहीं सवर्णों के एक हिस्से में इसे लेकर क्षोभ भी है।
 
मानसून सत्र में लोकसभा की प्रोडक्टिविटी जहां 110 प्रतिशत रही, वहीं राज्यसभा की 66 प्रतिशत। संसद सचिवालय से आए आंकड़ों के मुताबिक लोकसभा की बैठकों का 50 और राज्यसभा का 48 प्रतिशत वक्त विधायी कामकाज में खर्च हुआ। शायद यही वजह है कि अनिश्चितकाल के लिए लोकसभा का सत्रावसान करते हुए निचले सदन की अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कहा कि यह सत्र बजट सत्र 2017के दूसरे हिस्से और 2017 के मानसून सत्र की तुलना में कहीं ज्यादा सार्थक रहा।
सुमित्रा महाजन के ऐसा कहने की वजह है, इस सत्र में हुआ काम काज। संसद सचिवालय के ही मुताबिक इस बार सिर्फ 26 प्रतिशत बिल ही संसदीय कमेटियों के पास भेजे गए, जबकि 15वीं लोकसभा में 71 और 14वीं लोकसभा में 60 फीसद बिल कमेटियों को भेजे गए थे।
संसद के सत्रों को बाधित करने के लिए मीडिया के मौजूदा रिपोर्टिंग माहौल को भी जिम्मेदार माना जाता है। कम से कम राजनीतिक हलके में तो ऐसा ही माना जाता है। कहा जाता है कि मीडिया चूंकि नकारात्मक खबरों को ही ज्यादा तवज्जो देता है, इसलिए भी सांसद संसद में हंगामा करते हैं। इसलिए मीडिया को भी अब किसी सत्र से उम्मीद नहीं रहती कि उसमें काम होगा। चूंकि इस बार बरसों बाद काम हुआ है, इसलिए वेंकैया नायडू चुटकी लेने से खुद को नहीं रोक सके। राज्यसभा का सत्रावसान करते हुए उनका यह कहना तो यही जाहिर करता है। उन्होंने कहा कि, ‘‘पिछले दो सत्रों में गतिरोध को देखते हुये मीडिया में मानसून सत्र की कार्यवाही भी बाधित रहने की आशंका जतायी थी लेकिन मुझे खुशी है कि मीडिया गलत साबित हुआ।’’ संसद की ताकत और सर्वोच्चता का प्रतीक होता है प्रश्न काल। अक्सर हंगामे की भेंट प्रश्नकाल चढ़ता रहा है। लेकिन अरसे बाद इस मानसून सत्र में मंत्रियों ने लोकसभा में मौखिक रूप से 75 और राज्यसभा में 90 सवालों के जवाब दिए।

 
लेकिन यह सत्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव और राज्यसभा में बहुमत ना होते हुए भी सदन के उपसभापति के चुनाव में सरकार के प्रतिनिधि के चुने जाने के लिए भी याद रहेगा। संसद में तेलुगू देशम पार्टी के सांसद श्रीनिवास के ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था, जिस पर 20 जुलाई को 11 घंटे 46 मिनट तक चर्चा चली। इस प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं ने राफेल विमान सौदा, बेरोजगारी और कृषि आदि तमाम मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश की तो चर्चा के जवाब में प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सरकार का जोरदार बचाव किया। यह सत्र राहुल गांधी द्वारा संसद के प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए प्रधानमंत्री को जबर्दस्ती गले लगाने के लिए भी याद किया जाएगा। हालांकि अविश्वास प्रस्ताव 146 के मुकाबले 325 मतों से गिर गया। इसी तरह राज्यसभा उपसभापति चुनाव में सरकार के उम्मीदवार पत्रकार हरिवंश 125 वोटों के साथ जीत गए, जबकि विपक्षी उम्मीदवार बीके हरिप्रसाद को सिर्फ 105 वोट मिले। अविश्वास प्रस्ताव पर तकरीबन समूचा विपक्ष सरकार के खिलाफ गोलबंद रहा, वहीं राज्यसभा उपचुनाव में विपक्ष में बिखराव हो गया। आम आदमी पार्टी और वाईएसआर कांग्रेस ने तो मतदान का बहिष्कार तक किया। इस सत्र ने आने वाले आम चुनावों में विपक्ष की स्थिति का भी संकेत दिया है। संकेत यह कि मोदी विरोधी गोलबंदी में वह मजबूती से शायद ही एक हो सके और उन्हें चुनौती दे सके।