‘संघ न होता तो नहीं बचते हिन्दू’
   दिनांक 14-अगस्त-2018
मुझे वह दिन भुलाए नहीं भूलता जब स्थानीय मुस्लिम समुदाय भीड़ रूप में आकर हिन्दुओं के घरों पर टूट पड़ रहे थे, आग लगा रहे थे, उन्हें लूट रहे थे, बहन-बेटियों की इज्जत को तार-तार कर रहे थे इसे देखकर स्थानीय हिन्दू सहमा, अपने घरों में दुबका हुआ था। दूर-दूर तक कोई मदद को नहीं आ रहा था।
चूंकि मेरा पूरा परिवार संघमय था इसलिए मैं भी बचपन से स्वयंसेवक बन गया था। हिन्दुत्व से रचा-बसा परिवार होने के कारण मेरे परिवार से जुड़े लोग आस-पास के हिन्दुओं की हरसंभव मदद कर रहे थे। खतरा इतना अधिक था कि आस-पास के सभी हिन्दू लगभग एक ही मोहल्ले में आकर रहने लगे। रात को सभी पहरा देते थे और कोई हमला करे तो उसका प्रतिकार कैसे करना है, इसकी रणनीति भी बनाते थे। हम पांच भाई और एक बहन थे। बंटवारे के समय मेरी उम्र 16 वर्ष की थी। मेरे पिताजी की एक छोटी सी दुकान थी, जिससे घर का खर्चा चलता था। लेकिन हालात खराब होने के कारण सब बिखरता जा रहा था। यही हाल सभी हिन्दू परिवारों के साथ हो रहा था। संयोग से एक दिन पास के बाजार में भारत की ओर से एक ट्रक आया, जिसके चालक से मेरे पिता जी ने बात की। वह कुछ लोगों को ले जाने को राजी हो गया। मैं अपने भाई के साथ लाहौर होते हुए सुरक्षित अमृतसर आ गया। लेकिन मेरे पिता जी और परिवार के अन्य सदस्य अभी वहीं फंसे हुए थे। अमृतसर के पास मेरे चचेरे भाई नौकरी करते थे। हम उनके घर रुके। उन्होंने मेरा ख्याल रखा। तीन महीने बाद पूरा परिवार यहीं आ गया।
कुछ समय बीता तो परिवार लुधियाना आ गया, जहां राहत शिविर में दो साल रहना हुआ। इस दौरान अनेक कष्ट सहे। इस दौरान संघ के स्वयंसेवकों ने भोजन से लेकर वस्त्र आदि तक की मदद की। कुछ दिन बाद सरकार की ओर से एक छोटा सा मकान मिल गया। जहां मैं परिवार के साथ रहने लगा। यहां रहकर मैंने धीरे-धीरे अपनी परास्नातक तक की शिक्षा पूरी की। इसी बीच मुझे चंडीगढ़ में शिक्षा विभाग में नौकरी मिल गई। लगभग 10 महीने बाद ही मुझे दिल्ली में दूसरी नौकरी मिल गई, जिसके कारण लुधियाना छोड़कर मैं दिल्ली आ गया। लेकिन इस कालखंड में जो देखा और अनुभव किया, वह यह था कि यदि संघ की स्थापना 1925 की बजाय 1915 में हुई होती तो बंटवारे के समय स्थिति बिल्कुल भिन्न होती। संघ के स्वयंसेवक एक भी हिन्दू को खरोंच तक नहीं आने देते। लेकिन यदि वहीं संघ की स्थापना 1935 में हुई होती तो पाकिस्तान से आने वाला एक भी हिन्दू सुरक्षित नहीं बचता। मुझे तो यही लगता है कि संघ के कारण ही हम आज तक जीवित हैं। इसलिए मुझे स्वयंसेवक होने पर गर्व है, क्योंकि उस समय हम उम्र में छोटे थे और समस्याएं बड़ी थीं लेकिन संघ ने हमारे अंदर ऐसा दमखम भर दिया, जिसके कारण हम हर कठिन समस्या को सुलझाते चले गए। लेकिन एक टीस अभी भी मन के अंदर है कि हमारा जो हिस्सा कट गया, उसे आने वाली पीढ़ियों को याद दिलाते रहना है और मौका मिलने पर उसे भारत का अंग बनाना है।
(अश्वनी मिश्र से बातचीत के आधार पर)