‘...जब नेहरू ने बुजुर्ग को जड़ दिया थप्पड़’
   दिनांक 14-अगस्त-2018
बंटवारे के समय मैं छह साल का था। छोटी उम्र होने के कारण ज्यादा याद नहीं लेकिन इतना जरूर याद है कि गांव में एक अज्ञात भय व्याप्त था। ज्यादातर लोग अपने घर में बंद रहते थे। हमारे मोहल्ले के चारों तरफ मकान थे लेकिन बीच में एक बहुत बड़ा मैदान था। उसमें हमारी गायें बंधी रहती थीं। एक तरफ से प्रवेश था। घर का प्रवेश द्वार बड़ा था। शाम होते ही वह दरवाजा बंद कर दिया जाता था। मुझे याद है हमारे घर की छत पर बड़े- बड़े कड़ाहों में तेल गरम करने की व्यवस्था की गई थी, ताकि मुसलमान अगर घर पर हमला करेंगे तो दरवाजे को तोड़ने में उन्हें काफी समय लगेगा, इतने में यह तेल और तेजाब उनके ऊपर डालकर उनको भगाने का काम करेंगे। मेरी बड़े भाईसाहब संघ की शाखा में जाया करते थे। एक दिन उनके पीछे-पीछे मैं भी संघ स्थान चला गया और शाखा में पूरे समय रहा। आनंद आया तो अगले दिन से यह क्रम जारी रहा। उस समय शाखा में एक खेल खिलाया जाता था, होता यह था कि शाखा में एक खेल में हम सभी स्वयंसेवकों को लेट जाने के लिए कहा जाता था। लेटने पर जमीन में बहुत सारे छोटे कीड़े-मकोड़े होते थे, जो शरीर पर चढ़ जाया करते थे और काटने लगते थे। लेकिन ऐसी परिस्थिति में कहा जाता था कि बिल्कुल हिलना मत। हम सभी स्वयंसेवक इसका पालन करते थे। पता नहीं था कि बंटवारे के दौरान त्रासद स्थितियों में यह अनुशासन बड़ा काम आने वाला है। खैर, विभाजन के समय हालात बहुत खराब हो गए तो जैसे-तैसे हम अपने घर का कुछ सामान साथ लेकर वहां से चले। लइया से ट्रेन ली और परिवार के साथ पानीपत आ गए। यहां आने में कितना समय लगा, मुझे याद नहीं है। यहां कुछ लोग परिचित थे, जो पानीपत में व्यापार किया करते थे। उन्होंने हम सबकी बड़ी मदद की। इसके बाद हम झज्जर में रहने लगे। यहां शाखा लगती थी, सो हमने यहां भी शाखा जाना शुरू कर दिया। इस दौरान स्वयंसेवकों ने मेरे परिवार की काफी मदद की। लेकिन आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि हमारे माता-पिताजी लोगों के घरों में काम किया करते थे। इसी से हमारे परिवार का गुजारा चलता था। मैं भी मंडी से भुट्टे लाता था और सड़क किनारे बेचता था, ताकि शाम को कुछ पैसे मिल जाएं। एक घटना याद आती है जब पानीपत के राहत शिविर में जवाहर लाल नेहरू गए थे। उनके साथ इंदिरा गांधी भी थीं। वे लोगों को समझा रहे थे कि शांति बनाएं रखें, समय के साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन जो भी उनके शांति प्रवचन सुन रहा था, उसके हृदय में खून खौल उठता था। सभी का कहना था कि उन उन्मादियों ने हमारे घरों में आग लगा दी, हमारे लोगों की हत्या कर दी और ये हमें शांति का संदेश दे रहे हैं। इसका जवाब लोगों तब दिया जब नेहरू जी शिविर से लौट रहे थे। एक बुजुर्ग ने इंदिरा गांधी का हाथ पकड़कर खींच दिया तो नेहरू ने उसे थप्पड़ मार दिया। तब उसी बुजुर्ग ने कहा कि ये बेटी मेरी पोती के बराबर की है। लेकिन मेरा जरा सा हाथ लग गया तो तुम्हारा खून खौल उठा, हम लोगों ने तो अपना सब कुछ खोया है, शर्म नहीं आती हमें शांति का पाठ पढ़ाते हुए। खैर, समय बीता और मैं दिल्ली आ गया। मेरी शिक्षा जारी रही। मेरा चयन शिक्षा विभाग में हो गया। लेकिन बंटवारे की टीस आज भी मन को कचोटती है।
(अश्वनी मिश्र से बातचीत के आधार पर)