बंटवारे का दर्द और संघ-समर्पण
   दिनांक 14-अगस्त-2018
 
1947 में पाकिस्तान से बड़ी मुश्किल से जान बचाकर हिंदुस्थान पहुंचे थे हिंदू  
15 अगस्त को दो तरह से देखा जा सकता है, एक- जिस दिन भारत को ब्रिटिश राज से मुक्ति मिली। दूसरा- वह दिन जब इस महान राष्ट्र को अलग-अलग हिस्सों में काट-बांट दिया गया।
जाहिर है, तब यह उत्सव आंसुओं में डूबा था। आंसू.. जिनकी आज कोई बात नहीं करता। आंसू, जिनका दर्द अचकन में गुलाब लगाए, सिंहासन की ओर तेजी से कदम बढ़ाती राजनीति ने कभी नहीं जाना।
यह उल्लेख अनपेक्षित या जरा भी अतिरंजित नहीं है। सचाई यह है कि देश की स्वतंत्रता की लड़ाई कांग्रेस की स्थापना से भी पहले से चल रही थी और पूरा देश, किसी न किसी मंच या आंदोलन के अंतर्गत या इनके बिना भी स्वतंत्रता की अलख जगाने में शामिल था।
जिन्हें इस बात पर आपत्ति हो उन्हें एक प्रश्न स्वयं से पूछना चाहिए- यदि आजादी 1947 में नेहरू कांग्रेस ने दिलाई तो इससे 90 वर्ष पहले झांसी की रानी क्या हवा से लड़ रही थीं? कौन था मंगल पांडे और कौन थे उनके दुश्मन? राष्ट्रवादी नेताओं के कांग्रेस से जुड़ाव और स्वतंत्रता संग्राम में निस्वार्थ अवदान पर भी प्रश्न नहीं, किन्तु कांग्रेसी जन्मकुंडली का यह तथ्य ही इसके गले का सबसे बड़ा कांटा है कि इस पार्टी को जन्म देने का नुस्खा (1857 के भीषण स्वतंत्रता संग्राम का ब्रिटिशों द्वारा विश्लेषण किये जाने के बाद और भविष्य में इस तरह की किसी घटना को टालने की गरज से) अंग्रेजों ने ही निकाला था। इसके चलते ब्रिटिश हितों की पूर्ति, भारतीय आक्रोश को आहिस्ता से निकाल देने वाले राजनैतिक औजार के रूप में एक अंग्रेज ए.ओ. ह्यूम ने 1885 में कांग्रेस की नींव रखी और अध्यक्ष बना। कुछ कुनबापरस्त लोगों और कथित
इतिहासकारों को विकीपीडिया में दर्ज इस पंक्ति कि- ...भारत का बंटवारा जिन्ना और नेहरू के राजनीतिक लालच की वजह से हुआ-और इस तथ्य कि पार्टी के प्रारंभिक अधिवेशनों में ब्रिटिश राज की जय-जयकार और महारानी की लंबी उम्र की कामना के नारे लगाए जाते थे, से खासी तकलीफ हो सकती है। किंतु, यह तकलीफ उन लाखों लोगों के कष्ट का अंश मात्र भी नहीं है जो कांग्रेस की अगुआई में लिए गए भारत विभाजन के निर्णय के कारण असह्य पीड़ा से गुजरे और जिन्हें अपने परिवार, समृद्धि और सम्मान को रौंदे जाने के बाद भारत आना पड़ा ।

 
विभाजन के दौरान मजहबी उन्मादियों द्वारा हिंदुओं को निशाना बनाए जाने के ऐसे दृश्य आम थे 
विभाजन देश को दिया गया कांग्रेस का सबसे बड़ा धोखा
भारत विभाजन कांग्रेस का देश को दिया गया सबसे बड़ा धोखा था, यह बात आज कोई क्यों नहीं करता, जबकि यह अकाट्य बात है? इस संदर्भ में स्वतंत्रता से केवल एक वर्ष पूर्व, 1946 के विधानसभा चुनाव और इनके परिणाम गौर करने लायक हैं। इस चुनाव में कांग्रेस अखंड भारत का नारा लेकर मैदान में उतरी थी। यानी विभाजन के नितांत विरोध में। दूसरे पाले में थी मुस्लिम लीग जिसने पाकिस्तान बनाने का सपना मुसलमानों को दिखाया था। जब नतीजे आए तो यह देखा गया कि हिंदू बहुल क्षेत्र में तो कांग्रेस को बहुमत मिला ही लेकिन इसके साथ ही 95 प्रतिशत तक मुस्लिम जनसंख्या वाले उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांतों में भी लोगों ने कांग्रेस को चुना। यानी अखंड भारत के कांग्रेसी वादे पर पूरे देश ने भरोसा किया। पूरे पंजाब में मुस्लिम लीग को सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं मिला। सिंध में भी मुस्लिम लीग बड़ी पार्टी तो बनी किंतु सरकार बनाने लायक बहुमत उसे नहीं मिला। यह ऐसी स्थिति थी जब देश में किसी ने नहीं सोचा था कि अखंड भारत का दम भरने वाली और लोगों को इस मुद्दे पर अपने साथ लेने वाली पार्टी बंटवारे को स्वीकार करेगी। किन्तु हुआ क्या? जीती कांग्रेस और सपना पूरा किया गया मुस्लिम लीग का!
संघ स्वयंसेवकों ने जी जान से बंटवारे के दौरान की थी मदद
यह बंटवारा लाखों-करोड़ों भारतीयों के दिलों पर छुरा चलने जैसी बात थी। यह बात इतिहास का जिक्र करते हुए दबा दी जाती है कि विभाजन के समय संघ स्वयंसेवकों की क्या भूमिका थी। (उस पूरे घटनाक्रम को विस्तार से जानने के लिए आप दो पुस्तकें,- ज्योति जला निज प्राण की तथा ‘ना फूल चढ़े ना दीप जले’-पढ़ सकते हैं।) विभाजन की बात करें तो हमें पंजाब रिलीफ कमेटी की बात करनी ही होगी जिस समय पंजाब से लाशों से अटी रेलगाड़ियां और लुटे-पिटे परिवारों के जत्थे आने लगे तब प्रारंभ में संघ के स्वयंसेवक और कांग्रेस के कार्यकर्ता मिलकर काम करने आए थे। किंतु शरणार्थियों के लिए आई राहत सामग्री और वाहनों का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते और केवल बयानबाजी में जुटे रहने वाले कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के साथ स्वयंसेवकों की नहीं बनी और स्वयंसेवकों ने पंजाब रिलीफ कमेटी का अलग से गठन किया । स्वयंसेवकों के अलग होते ही कांग्रेसियों की सहायता समिति की मानो जान चली गई। कार्यकर्ता तो उनके पास थे ही बहुत थोड़े। जो हल्ला और हवाबाजी थी, वह भी थम गई।
आंसुओं और खून से लिथड़े उस दौर में खतरनाक क्षेत्रों से हिंदू महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों को निकालना, सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना, दंगे से जलते मोहल्लों में फंसे हिंदुओं को सुरक्षा कवच देना, हमलावरों को उनकी करनी का सबक सिखाना, घायलों को अस्पताल ले जाकर उनके उपचार की व्यवस्था करना, मृतकों के शवों का अंतिम संस्कार तक, सब काम तब स्वयंसेवकों ने किए।
पाञ्चजन्य में पढ़िए बंटवारे की 15 अनकहीं कहानियां
सारांशत: यह कहना होगा कि 15 अगस्त केवल छुट्टी, खुशी और मौज-मस्ती का दिन नहीं है, यह उन क्षणों को याद करने का मौका है जिनमें राजनीतिक विश्वासघात इस देश के लाखों परिवारों को मिले जख्म, अथाह दर्द और स्वयंसेवकों के लोक सेवा कार्यों की अनकही कहानियां आपस में गुंथी हुई हैं। स्वतंत्रता दिवस पर इस विशेषांक में पाञ्चजन्य अपने पाठकों के लिए विभाजन की त्रासदी अपनी आंखों से देखने, इसका संताप भुगतने वालों की 15 अनकही कहानियां लेकर आया है। ऐसी कहानिया हजारों हैं, लेकिन विभाजन के समय संघ स्वयंसेवकों के स्नेह, सहयोग और सुरक्षा प्रदान करने के ब्यौरों को भुक्तभोगियों के शब्दों में सामने रखता यह वह इतिहास है जिसे दबाने-बिसराने की भरसक कोशिशें दरबारी इतिहासकार करते रहे, जिन्हें न औपचारिक इतिहास लेखन में दर्ज किया गया और न ही पाठ्यपुस्तकों में जगह दी गई। विभाजन की फांस और क्षुद्र राजनीति को बेपर्दा करती ऐसी कोई कहानी आपके पास-पड़ोस में भी हो सकती है। उसे हमसे साझा करें, हम चुनिंदा कथा-किरदारों को वेब पर स्थान देंगे।
अपने पाठकों तक सही, सच्ची, तथ्यात्मक जानकारी पहुंचाना पाञ्चजन्य का संकल्प है। वैसे भी झूठी,अधूरी जानकारी और कुनबा राजनीति के पांव तले रौंदे गए इतिहास के बूते स्वतंत्रता दिवस सरीखे उत्सव की आत्मा तक पहुंचना संभव नहीं है। आइए, स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मनाएं... मगर पूरी जानकारी के साथ। जानकारी हमें मजबूत बनाती है और मजबूत लोग मजबूत देश बनाते हैं।