‘देवदूत थे स्वयंसेवक’
   दिनांक 14-अगस्त-2018
बंटवारे की त्रासदी सात दशक बाद भी भूले नहीं भूलती। जब हिन्दू मां-बहनों पर खुलेआम आततायी मुसलमानों द्वारा अत्याचार किया जा रहा था, घर-दुकान, व्यवसाय को तहस-नहस करके परिवार के परिवार मौत के घाट उतार दिए जा रहे थे। यहां तक कि गर्भवती महिलाओं तक को मुसलमानों ने नहीं छोड़ा। उनके गर्भ पर वार करके पेट से बच्चा निकालकर सूली पर टांग कर उसकी हत्या की गई। ऐसी निर्दयता भला जीते-जी कौन भूल सकता है!
1940 में मैं संघ का स्वयंसेवक बन गया। 1947 में पंजाब एवं पास के क्षेत्रों के स्वयंसेवकों के लिए फगवाड़ा में संघ का शिविर लगा हुआ था। मैं उस समय सकरगढ़ का मंडल प्रचारक था। बंटवारे की खबरों से माहौल बिगड़ना शुरू हो चुका था। संघ के अधिकारियों का आदेश था कि हिन्दुओं को अपने स्थान पर रोका जाए। हम चार स्वयंसेवक फगवाड़ा से अमृतसर आए। अमृतसर से जम्मू जाने वाली रेलवे लाइन के साथ-साथ पैदल चलकर हम अपने क्षेत्रों में पहुंचे। वहां की स्थिति बड़ी भयावह थी। अफरातफरी का माहौल था। हिन्दू वहां से पलायन कर रहे थे। पाकिस्तान के मुसलमान स्वयंसेवकों को लक्षित करके हमले कर रहे थे। हालात को समझकर मैंने अपने क्षेत्र के 15 सौ हिन्दुओं को साथ लेकर भारत जाने का निश्चय किया। रास्ते में भी हम पर हमले हुए। लेकिन कुछ दूरी तय करने के बाद डोगरा रेजिमेंट के कैप्टन ने हम सभी को रोककर पूछा, कहां जा रहे हैं आप सब? मैंने उन्हें हमले की पूरी घटना बयां की। क्योंकि मेरे साथ जो महिलाएं थीं उनमें दर्जनों ऐसी थीं, जिनके वस्त्र तक मुस्लिमों ने फाड़ दिए थे, जिससे वे अर्धनग्न-सी हालत में थीं। माता-बहनों की लाज ढंकने के लिए हमने अपनी पगड़ियां उतारकर उन्हें दी थीं। कैप्टन ने वायरलेस से सिख रेजिमेंट को सूचित किया और घटना स्थल पर आने को कहा। बाद में सिख सैनिकों की मदद से हम सभी अमृतसर के शिविर में गए। मुझे याद है कि इस पूरे काल खंड में संघ के स्वयंसेवक घर-घर जाकर भोजन, वस्त्र या अन्य बहुत सी जरूरी सामग्री वितरित करते थे। आगे चलकर मुझे नेशनल डिफेंस एकेडमी, पूना में नौकरी मिल गई। लेकिन बाद में दिल्ली आना हुआ। संघ कार्य करते-करते भारतीय मजदूर संघ से लेकर विवेकनंद केन्द्र की जिम्मेदारी मिली। भाजपा का सांसद भी रहा। लेकिन बंटवारे के दिनों को याद करता हूं तो पाता हूं कि संघ के स्वयंसेवक किसी देवदूत से कम नहीं थे। विभाजन के समय प्रेम जी की पत्नी कृष्णा शर्मा 10 साल की थीं। उनकी भी पीड़ा सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
(अश्वनी मिश्र से बातचीत के आधार पर)