'रेडियो की एक घोषणा और माहौल बिल्कुल बदल गया'
   दिनांक 14-अगस्त-2018
देश विभाजन के समय मैं लगभग 10 साल का था। मेरा परिवार मुल्तान जिले की एक तहसील शूजाबाद में रहता था। मैंने कई ऐसी ह्दय-विदारक घटनाएं देखीं, जो अभी भी मुझे डरा देती हैं। शूजाबाद नगर के चारों ओर पक्की दीवारें थीं और आने-जाने के लिए चार दरवाजे। हिंदू परिवार नगर के अंदर रहते थे और मुस्लिम परिवार नगर से बाहर गांवों में। विभाजन से पूर्व बड़ों से ऐसा सुनने में आता था कि पाकिस्तान कभी नहीं बनेगा, विभाजन असंभव है तथा हम सभी यहीं रहेंगे। यानी लोगों में एक आत्मविश्वास था कि यह देश, शहर, घर आदि छोड़कर कहीं जाने वाले नहीं हैं। लेकिन 1947 प्रारंभ होते ही मार-काट और हिंसा प्रारंभ हो गई। नगर के बाहर से मारने-काटने के समाचार आने लगे। मरे हुए लोगों की लाशें घरों में आते ही कोहराम मच जाता था। किसी की गर्दन कटी होती थी, किसी के हाथ-पैर कटे हुए होते थे। उन्हीं दिनों एक ऐसी घटना घटी, जिसने हिंदुओं को झकझोर कर रख दिया।
शूजाबाद से एक बारात जलालाबाद गई थी। वहां विवाह संपन्न होने के बाद बारातियों की बस वापस शूजाबाद लौट रही थी। रास्ते में मुसलमानों ने उस बस को रोककर सभी लोगों को उतार लिया। उनमें महिलाएं भी थीं। महिलाओं को तो वे लोग अपने साथ ले गए और पुरुषों को बहुत ही बेदर्दी के साथ मार दिया। इसके बाद एक शरारती सोच के साथ चालक को खाली बस लेकर शूजाबाद भेज दिया गया। संयोग से उस बस में एक व्यक्ति छुपा रह गया। उन दोनों ने घटना की जानकारी शूजाबाद के लोगों को दी। जिसने भी सुना दंग रह गया। चारों तरफ से रोने-धोने की आवाजें आने लगीं। कोई सुनने या सहायता करने वाला नहीं था। उन्हीं दिनों रेडियो से घोषणा की गई कि भारत का विभाजन होगा। इसके बाद तो वातावरण एकदम बदल गया। मार-काट, लूट, आगजनी आदि की घटनाएं तेज हो गर्इं। अब हिंदुओं को लगने लगा कि पुरखों की भूमि छोड़नी ही पड़ेगी। लोग अपनी सुरक्षा के लिए चितिंत होने लगे। हिंदुओं ने अपने घरों की छतों पर र्इंट और पत्थर के टुकड़े रख लिए। साथ में मिर्च चूर्ण भी रखते थे। विशेष प्रकार के गंडासे, तलवारें, लाठियां आदि घरों में जमा की गर्इं। उन्हीं दिनों ऐसी बातें सुनने में आर्इं कि पंजाब से मराठा, गोरखा सैन्यकर्मी भारत वापस जा रहे हैं। मुस्लिम मिलिट्री बलोच आदि ने कमान संभाली है। इससे हिंदुओं में और डर पैदा हो गया। हिंदू अपने घर-द्वार छोड़कर पलायन करने लगे। पता लगा कि रेलगाड़ियों का प्रबंध किया जा रहा है जो विशेषकर अमृतसर तक जाएंगी। घर की माताओं और बहनों ने अपने-अपने गहनों को हथोड़ों से कूट-कूटकर अपने अन्त:वस्त्रों में भरकर सिल लिया, ताकि मुस्लिम उन्मादियों तथा पुलिस से बचा जा सके। एक तरफ दंगाइयों के आने पर लड़ने की तैयारी, तो दूसरी ओर अपना घर, शहर, देश छोड़ने की तैयारी। ऐसे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने हिंदुओं को सहारा देने का काम किया। उन्होंने मोहल्लों में खाने-पीने और रेलवे स्टेशन तक लोगों को पहुंचाने के लिए वाहन की व्यवस्था की। लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने का काम किया।
(अरुण कुमार सिंह से बातचीत के आधार पर)