इस्लामिक पाखंड के धुर विरोधी थे सर नायपॉल
   दिनांक 14-अगस्त-2018
 -सुमन कुमार
भारतीय मूल के लेखक सर विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल नहीं रहे। उन्हें प्यार से लोग सर विद्या कहते थे। उन्होंने जो लिखा वह अद्भुत है। साहित्य के लिए उन्हें नोबेल और बुकर पुरस्कार दिए गए। अपनी लेखनी से वामपंथियों और इस्लामिक पाखंडों की कलई खोलने वाले सर विद्या की लेखनी ने जहां उनके प्रशंसकों की फौज खड़ी की तो कथित बुद्धिजीवी उनके कड़े आलोचक भी रहे। बाबरी विध्वंस में कार सेवकों की भूमिका को उन्होंंने हिंदुओं की नव जागृति करार दिया था
सर विद्या चले गए। किसी का चला जाना ही अंतिम सत्य है। मगर उनकी मौत ने भी वही काम किया जो सर विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल अपनी पूरी जिंदगी करते रहे। अपने लेखन के जरिये कुछ कटु सचाइयों को बाहर लाने का काम। पिछले 64 वर्षों से लगातार चलती उनकी लेखनी ने पूरी दुनिया में उनके करोड़ों प्रशंसक और आलोचक बनाए थे। इस लेखन यात्रा के दौरान कितने ही लोग पहले उनके दोस्त और फ‍िर कड़े आलोचक बने।
कारण सीधा सा था, उन्होंने ऐसे विषयों पर कलम चलाने की गुस्ताखी की थी जिन पर आधुनिकतावादी और कथित बुद्धिजीवी लिखने से सदैव बचते हैं। पूरी दुनिया में स्वयं के सबसे ज्यादा बुद्धिजीवी होने का दावा करने वाला तबका इस विषय पर न तो खुद लिखता है और न ही दूसरों से लिखने की उम्मीद करता है। फ‍िर भी अगर कोई ये करे तो तो उसकी आलोचना में पन्ने रंग दिए जाते हैं। यह विषय है इस्लामिक दुनिया।
नायपॉल ने उनकी इसी दुखती रग पर हाथ रखा। उन्होंने गैर अरब इस्लामिक दुनिया में इस्लाम की कारगुजारियों को सामने रखा। Among the Believers : An Islamic Journey और उसके बाद Beyond Belief: Islamic Excursions Among the Converted Peoples के जरिए वी एस नायपॉल ने इस्लामिक दुनिया का सच दुनिया के सामने रखा। दरअसल यह दोनों किताबें गैर अरब इस्लामिक दुनिया की नायपॉल की यात्रा के अनुभवों का निचोड़ है। Beyond Belief हिंदी में आस्था के पार नाम से प्रकाशित हुई। इसकी प्रस्तावना में ही जिस प्रकार नायपॉल ने एक मजहब के रूप में इस्लाम की आलोचना की उसने वाम खेमे की त्योरियां चढ़ा दीं।

 
दरअसल मजहब के बारे में आमतौर पर सामान्यत: यही मत रहा है कि मजहब व्यक्तिगत आस्था का विषय है। भारत में भी तथाकथित पंथनिरपेक्ष खेमा यही प्रचारित करता है कि मजहब और पंथ किसी भी व्यक्ति की निजी आस्था से जुड़ा विषय है और इसका राजनीति से कोई लेना देना नहीं है। दूसरी ओर नायपॉल ने Beyond Belief: Islamic Excursions Among the Converted Peoples में लिखा है, ‘इस्लाम केवल निजी आस्था नहीं है, उसकी मांगें साम्राज्यवादी अगर कोई व्यक्ति इस्लाम में कन्वर्जन करता है तो उसका अपन परिचय उसका इतिहास सब बदल जाता है। कन्वर्जन करते ही उसकी पवित्र भूमि अरब हो जाती है, पवित्र भाषा अरबी हो जाती है। उसका इतिहास अरब का इतिहास हो जाता है। वह अरब कहानी का हिस्सा बन जाता है। कन्वर्ट हो चुके व्यक्ति् को अपनी सभी चीजों से मुंह मोड़ना होता है।
इस बात को जरा भारत-पाकिस्तान या अन्य किसी भी गैर अरब इस्लामिक देश के परिप्रेक्ष्य में रखकर देखें। हिंदुस्थान हो या पाकिस्तान, यहां जो भी मुसलमान हैं वो हजारों सालों से यहीं के निवासी हैं यानी वो अरब से यहां नहीं आए हैं, मगर चाहे जिस भी परिस्थिति में उन्हें कन्वर्जन करना पड़ा हो परिवर्तित होते ही उनकी अपनी हजारों साल की अपनी पहचान और इतिहास तत्काल समाप्त हो गया। उनकी पवित्र भाषा अरबी हो गई। उनका एक मात्र तीर्थ स्थल अरब का मक्का हो गया।
वी एस नायपॉल ने इसी कड़वी सचाई को सबके सामने रखा और ऐसा करने के लिए कम से कम भारत के वामपंथी लेखकों, पत्रकारों ने उन्हें कभी माफ नहीं किया। यहां तक कि उनकी मृत्यु के बाद भी नहीं। दुनिया में भारतीय मूल के सबसे प्रसिद्ध लेखक की मौत की खबर के घंटों बाद तक मीडिया से यह खबर गायब रही। जिस लेखक को उसके लेखन की वजह से दुनिया के दो सबसे बड़े सम्मान बुकर और साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
उनके साथ ऐसा बर्ताब शायद सिर्फ हिंदुस्थान में ही हो सकता है। जहां कथित बुद्धिजीवियों की नजर में हर वह व्यक्ति उपेक्षा का पात्र है जो इस्लाम के पाखंड पर कुछ लिखता है।
कथित बुद्धिजीवी उन्हें शायद उनके द्वारा किए गए इस्लाम के विश्लेषण के लिए उन्हें नजरअंदाज कर देते लेकिन बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद उनकी इस पर की गई टिप्पणी ने तो उन्हें अछूत की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद जब उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई तो तो उन्होंंने कहा,‘दूसरों ने जितना किया यह उतना बुरा भी नहीं था। बाबर द्वारा एक देश पर कब्जा करना देश की अवमानना थी और एक ऐसी भूमि जो कि पराजित लोगों की पवित्र भूमि थी, उस पर एक मस्जिद का निर्माण करवाना यहां के लोगों का अपमान था और यह राम से जुड़ी प्राचीन सोच का भी अपमान था।’यही नहीं बाबरी विध्वंस में कार सेवकों की भूमिका को उन्होंंने हिंदुओं की नव जागृति करार दिया था।
उनकी इस टिप्पणी के बाद तो उनकी आलोचना चरम पर पहुंच गई। रफीक जकारिया जैसे लेखकों ने उन्हें हिंदुत्व का नया झंडाबरदार करार दे दिया। मगर नायपॉल नहीं झुके। इस्लाम की ओर झुकाव रखने के कारण उन्होंने वामपंथी लेखकों की जमकर खबर ली। इतिहास के तथ्यों को तोड़—मरोड़ कर प्रस्तुत करने के कारण उन्होंने रोमिला थापर जैसी वामपंथी इतिहासकार की आलोचना की।

 
वी एस नायपॉल ने 22 वर्ष की उम्र में 1954 में लिखना शुरू किया मगर उनकी पहचान बनी 1961 में छपी उनकी किताब ‘ A House for Mr Biswas ’ से। इसके पहले नायपॉल कई किताबें लिख चुके थे। उनके पूर्वज 1880 में भारत से वेस्टइंडीज के त्रिनिदाद में जाकर बसे थे। वहीं 1932 में उनका जन्म हुआ। संयोग की बात है उनके पिता भी लेखन से जुड़े थे नायपॉल को लेखन के गुण उन्हीं से विरासत में मिले। नायपॉल को महज 18 वर्ष की उम्र में इंग्लैंड में पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप मिली। वह वहीं जाकर बस गए। हालांकि वह पूरी दुनिया घूमते रहे पर उनकी स्थाई निवास लंदन में ही रहा। उन्होंने काल्पनिक और असल घटनाओं दोनों पर लिखा। दोनों तरह की रचनाओं में उन्हें खूब शोहरत मिली।
भारत के बारे में सर नायपॉल ने तीन किताबें लिखीं। सबसे पहले 1964 में An Area of Darkness, इसके बाद 1977 में इंडिया: India a wounded civilization और सबसे अंत में इंडिया: India a million mutinies now। खास बात है कि ये तीनों किताबें भारत को लेकर नायपॉल की बदलती सोच दिखाती हैं।
Wounded Civilization में उन्होंंने खुद लिखा है, जब मैं 1962 में पहली बार भारत आया तो यह मुझे विचित्र देश लगा। 100 वर्षों का समय मुझे अनेक भारतीय धार्मिक रुझानों से अलग करने के लिए पर्याप्त था और इन रुझानों को समझे बिना भारत को समझ पाना असंभव था और आज भी असंभव है।
India a wounded civilization हिंदी में भारत एक आहत सभ्यता के नाम से प्रकाशित हुई में नायपॉल ने भारत के हिंदू साम्राज्यों पर मुसलमानों के आक्रमण और उसके असर को रेखांकित किया है। वामपंथी इतिहासकर हमें सुदूर दक्षिण में विजयनगर के व‍िशाल साम्राज्य के बारे में कुछ नहीं बताते जो चौदहवीं से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक अजेय था। जहां शिक्षा, शिल्प और कारोबार की ऐसी उन्नति हुई थी कि उसके सामने मुस्लिम सल्तनतें फीकी पड़ गई थीं। मगर रोमिला थापर या अन्य् वाम इतिहासकारों के लिए भारत का इतिहास महज मुस्लिम इतिहास बनकर रह गया है। इसी प्रकार मराठा साम्राज्य के बारे में भी वाम इतिहासकारों की नजर सिर्फ पानीपत की लड़ाई जिसमें अहमदशाह अब्दाली के हाथों हुई मराठों की हार तक सीमित है। नायपॉल अपनी दूसरी किताब में इन सबकी पड़ताल करते हुए तत्कालीन भारत को एक ऐसा देश घोष‍ित करते हैं जिसकी अपनी कोई विचारधारा ही नहीं है। हालांकि तीसरी किताब तक भारत के भविष्य को लेकर उनके विचार बदलने लगते हैं। ये किताब 1990 में आई थी और ये वो दौर था जब भारतीय जनता पार्टी का उदय होना आरंभ हुआ था। जाहिर है नायपॉल ने भारत में नवजागरण के चिह्न देख लिए थे और इसलिए 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने का पक्ष लिया था। इस देश में हिंदू जागृति की बात करने वालों के साथ वाम मीडिया जो व्यवहार करता है वही नायपॉल के साथ भी किया गया।
(लेख में दिए गए विचार लेखक के अपने हैं)