‘भूख और भय से भरे चेहरे आज तक याद हैं’

बंटवारे के दिनों को याद कर मैं आज भी विचलित हो जाता हूं। इंसानियत तो कुछ बची ही नहीं थी। उन दिनों मेरा परिवार मुगलपुरा (लाहौर) में रहता था। मुगलपुरा में ही मेरा दफ्तर था। 1947 में मैं रेलवे में लिपिक था और संघ का स्वयंसेवक भी। उन दिनों जींद के एक गुरुद्वारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रथम वर्ष का प्रशिक्षण शिविर लगा था। शिविर में भाग लेने के लिए मैं जींद गया और उधर मार-काट शुरू हो गई। मेरे मुहल्ले मुगलपुरा में भी हिंदुओं को काटा-मारा गया।

शिविर में श्रीगुरुजी भी आए हुए थे। माहौल खराब होने की खबर सुनकर उन्होंने सभी स्वयंसेवकों को कहा कि सभी अपने-अपने घर जाओ और परिवार के साथ-साथ अन्य लोगों की मदद करो। हम लोग जैसे-तैसे लाहौर पहुंचे। चारों तरफ अफरा-तफरी थी। इस कारण उस दिन घर नहीं जा पाया। डी.ए.वी. कॉलेज में शरणार्थी शिविर लगा था। रात में वहीं रहा। शिविर में सैकड़ों हिंदू थे। सभी दहशत में थे। माहौल खराब होने के कारण कहीं से खाना नहीं भी नहीं आ पाया और सभी लोग भूखे ही बैठे रहे। सुबह एक तांगे वाले ने मुझे घर छोड़ दिया। कुछ देर बाद एक सरदार जी, जो सेना में काम करते थे, आए और कहने लगे कि जल्दी करो, अमृतसर से एक ट्रक आया है उसी से हम सभी अमृतसर चले चलते हैं। मैंने अपनी पत्नी और बच्चों को उसी ट्रक से अमृतसर भेज दिया और खुद डी.ए.वी. कॉलेज चला गया। वहां से हिंदुओं को भारत भेजने का काम करने लगा। साथ में कुछ और स्वयंसेवक थे। कुछ दिन बाद मैं भी अमृतसर आ गया। वहां से बच्चों को साथ लेकर मुजफ्फरनगर अपने साले के घर आ गया। इसके बाद फिरोजपुर गया, जहां मेरे बड़े भाई रेलवे में नौकरी करते थे। उनका हालचाल लेने के बाद जम्मू गया। वहां भी परिवार के कुछ लोग आए थे। उन्हीं दिनों मेरा तबादला असम हो गया। वहां दो साल नौकरी की। फिर शकूरबस्ती, दिल्ली आ गया। 8 मई, 1937 को मैंने नौकरी शुरू की थी। 1977 में सेवानिवृत्त होने के बाद सामाजिक कार्य से जुड़ गया। अब उम्र ज्यादा होने की वजह से सामाजिक सक्रियता कम हो गई है।

मुझे आज भी उन हिंदुओं के चेहरे याद हैं, जो लाहौर के डी.ए.वी. कॉलेज के शरणार्थी शिविर में भूख और भय से भरे थे। संघ के स्वयंसेवक जान हथेली पर रखकर शरणार्थियों के लिए खाना आदि का इंतजाम कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर स्वयंसेवकों को सरकार की ओर से भी प्रताड़ित किया जा रहा था। खुद मेरे विरुद्ध वारंट जारी था। सरकार का आदेश था कि कोई भी सरकारी कर्मचारी संघ से कोई नाता नहीं रखेगा। लेकिन स्वयंसेवकों ने सरकारी आदेश को नहीं माना और वे हिंदुओं की सहायता में लगे रहे। उन दिनों हिंदुओं के साथ जिस तरह की दरिंदगी हुई उसे नई पीढ़ी को जरूर बताना चाहिए। सेकुलरवाद के नाम पर हिंदुओं की नई पीढ़ी को इतिहास से सबक नहीं लेने दिया जा रहा है, वहीं दूसरा पक्ष अपनी विचारधारा को लेकर और भी कट्टर होता जा रहा है। इस स्थिति में हमें भी अपने बच्चों को बताना चाहिए कि उनके पुरखों के साथ कैसा व्यवहार हुआ है। यदि ऐसा हम कर पाए तो दूसरे विभाजन को रोक सकते हैं, अन्यथा ...

(अरुण कुमार सिंह से बातचीत के आधार पर)