भारत की अखंडता के ध्वजवाहक रहे महर्षि अरविन्द के जन्मदिवस पर विशेष

 

                                                                                                                                                               - गोविंद मिश्र

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में श्री अरविन्द का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उनका बचपन घोर विदेशी और विधर्मी वातावरण में बीता। पर पूर्वजन्म के संस्कारों के बल पर वे महान आध्यात्मिक पुरुष बने ओर महर्षि कहलाए

 

 उनका जन्म 15 अगस्त, 1872 को डॉ. कृष्णधन घोष के घर में हुआ था। उन दिनों बंगाल का बुद्धिजीवी और सम्पन्न वर्ग ईसाइयत से बहुत प्रभावित था। वे मानते थे कि हिन्दू धर्म पिछड़ेपन का प्रतीक है। भारतीय परम्पराएं अन्धविश्वासी और कूपमण्डूक बनाती हैं। जबकि ईसाई धर्म विज्ञान पर आधारित है। अंग्रेजी भाषा और राज्य को ऐसे लोग वरदान मानते थे। इसके लिए उनके पिता ने उन्हें मात्र सात वर्ष की अवस्था में इंग्लैंड भेज दिया। अरविन्द असाधारण प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने अपने अध्ययन काल में अंग्रेजों के मस्तिष्क का भी आन्तरिक अध्ययन किया। अंग्रेजों के मन में भारतीयों के प्रति भरी द्वेष देखकर उनके मन में अंग्रेजों के प्रति घृणा उत्पन्न हो गयी। उन्होंने तब संकल्प लिया कि मैं अपना जीवन अंग्रेजों के चंगुल से भारत को मुक्त करने में लगाऊंगा। भारत की अखंडता के ध्वजवाहक रहे महर्षि अरविन्द ने भारत भूमि को साक्षात् दुर्गा का चैत्य बताया था। अखंड भारत के पैरोकार महर्षि अरविन्द ने भारत के विभाजन को कभी भी स्वीकारने की बात नहीं की। बंग भंग आन्दोलन के दौरान कांग्रेस के गरमपंथी धड़े के साथ खड़े महर्षि अरविन्द ने 1910 में में व्यक्तिगत साधना के लिए पुडुचेरी का रुख किया। फ़्रांसिसी अधिपत्य वाले पुडुचेरी में प्रवास के दौरान भी महर्षि अरविन्द भारत की राजनीति में होने वाले परिवर्तन पर हमेशा नजर बनाये रखते थे। 1942 के ब्रिटिश सरकार के द्वारा भेजे गए क्रिप्स मिशन के आगमन के बाद उन्होंने अपना सन्देश कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल को भेजा जिसमें उन्होंने क्रिप्स मिशन के तत्कालीन प्रस्ताव को मंजूर करने की बात दोहराई थी जिससे भारत की अखंडता को सुरक्षित रखा जा सके। कांग्रेस प्रतिनिधि मंडल के द्वारा इस प्रस्ताव को नामंजुर करने के बाद महर्षि अरविन्द ने इसे निष्काम भाव से निकले शब्द बताया था। यदि प्रस्ताव को स्वीकारा जाता तो भारत की अखंडता भी सुरक्षित रहती और लाखों निर्दोष लोगों को बचाया जा सकता था।15 अगस्त से एक दिन पूर्व 14 अगस्त 1947 को महर्षि अरविन्द ने रेडियो तिरुचापल्ली को राष्ट्र के नाम दिए सन्देश में कहा था यह स्वतंत्रता तब तक अधूरी मानी जायेगी जब तक भारत भूमि की अखंडता को पूर्ण नहीं बनाया जाएगा। उन्होंने कहा था की यह राष्ट्र अविभाजित है और इसे कभी भी खंडित नहीं किया जा सकता है। हर राष्ट्र की एक आध्यात्मिक नियति है और भारत की नियति सदैव अखंड होने की है। अपने विचारों को लोेगों तक पहुंचाने के लिए श्री अरविंद निरंतर पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखते थे। वन्दे मातरम्, युगान्तर, इन्दु प्रकाश आदि पत्रों में प्रकाशित उनके लेखों में मातृभूमि के लिए सर्वस्व समर्पण की बात कही जाती थी। उनके क्रान्तिकारी विचारों से डर कर अंग्रेजों ने उन्हें अलीपुर बम काण्ड में फंसाकर एक वर्ष का सश्रम कारावास भी दिया था। कारावास में उन्हें स्वामी विवेकानन्द की वाणी सुनाई दी और भगवान् श्रीकृष्ण से साक्षात्कार हुआ। अब उन्होंने अपने कार्य की दिशा बदल ली और 4 अप्रैल, 1910 को पुडुचेरी आ गए। यहां वे योग साधना, अध्यात्म चिन्तन और लेखन में डूब गए। 1924 में उनकी आध्यात्मिक उत्तराधिकारी श्री मां का वहां आगमन हुआ। 24 नवम्बर, 1926 को उन्हें विशेष सिद्धि की प्राप्ति हुई। इससे उनके शरीर का रंग सुनहरा हो गया। श्री अरविन्द ने अनेक ग्रन्थों की रचना की। अध्यात्म साधना में डूबे रहते हुए ही 5 दिसम्बर, 1950 को वे अनन्त प्रकाश में लीन हो गए।

 

उनका जन्म 15 अगस्त, 1872 को डॉ. कृष्णधन घोष के घर में हुआ था। उन दिनों बंगाल का बुद्धिजीवी और सम्पन्न वर्ग ईसाइयत से बहुत प्रभावित था। वे मानते थे कि हिन्दू धर्म पिछड़ेपन का प्रतीक है। भारतीय परम्पराएं अन्धविश्वासी और कूपमण्डूक बनाती हैं। जबकि ईसाई धर्म विज्ञान पर आधारित है। अंग्रेजी भाषा और राज्य को ऐसे लोग वरदान मानते थे। इसके लिए उनके पिता ने उन्हें मात्र सात वर्ष की अवस्था में इंग्लैंड भेज दिया। अरविन्द असाधारण प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने अपने अध्ययन काल में अंग्रेजों के मस्तिष्क का भी आन्तरिक अध्ययन किया। अंग्रेजों के मन में भारतीयों के प्रति भरी द्वेष देखकर उनके मन में अंग्रेजों के प्रति घृणा उत्पन्न हो गयी। उन्होंने तब संकल्प लिया कि मैं अपना जीवन अंग्रेजों के चंगुल से भारत को मुक्त करने में लगाऊंगा। भारत की अखंडता के ध्वजवाहक रहे महर्षि अरविन्द ने भारत भूमि को साक्षात् दुर्गा का चैत्य बताया था। अखंड भारत के पैरोकार महर्षि अरविन्द ने भारत के विभाजन को कभी भी स्वीकारने की बात नहीं की। बंग भंग आन्दोलन के दौरान कांग्रेस के गरमपंथी धड़े के साथ खड़े महर्षि अरविन्द ने 1910 में में व्यक्तिगत साधना के लिए पुडुचेरी का रुख किया। फ़्रांसिसी अधिपत्य वाले पुडुचेरी में प्रवास के दौरान भी महर्षि अरविन्द भारत की राजनीति में होने वाले परिवर्तन पर हमेशा नजर बनाये रखते थे। 1942 के ब्रिटिश सरकार के द्वारा भेजे गए क्रिप्स मिशन के आगमन के बाद उन्होंने अपना सन्देश कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल को भेजा जिसमें उन्होंने क्रिप्स मिशन के तत्कालीन प्रस्ताव को मंजूर करने की बात दोहराई थी जिससे भारत की अखंडता को सुरक्षित रखा जा सके। कांग्रेस प्रतिनिधि मंडल के द्वारा इस प्रस्ताव को नामंजुर करने के बाद महर्षि अरविन्द ने इसे निष्काम भाव से निकले शब्द बताया था। यदि प्रस्ताव को स्वीकारा जाता तो भारत की अखंडता भी सुरक्षित रहती और लाखों निर्दोष लोगों को बचाया जा सकता था।

15 अगस्त से एक दिन पूर्व 14 अगस्त 1947 को महर्षि अरविन्द ने रेडियो तिरुचापल्ली को राष्ट्र के नाम दिए सन्देश में कहा था यह स्वतंत्रता तब तक अधूरी मानी जायेगी जब तक भारत भूमि की अखंडता को पूर्ण नहीं बनाया जाएगा। उन्होंने कहा था की यह राष्ट्र अविभाजित है और इसे कभी भी खंडित नहीं किया जा सकता है। हर राष्ट्र की एक आध्यात्मिक नियति है और भारत की नियति सदैव अखंड होने की है।

अपने विचारों को लोेगों तक पहुंचाने के लिए श्री अरविंद निरंतर पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखते थे। वन्दे मातरम्, युगान्तर, इन्दु प्रकाश आदि पत्रों में प्रकाशित उनके लेखों में मातृभूमि के लिए सर्वस्व समर्पण की बात कही जाती थी।

उनके क्रान्तिकारी विचारों से डर कर अंग्रेजों ने उन्हें अलीपुर बम काण्ड में फंसाकर एक वर्ष का सश्रम कारावास भी दिया था। कारावास में उन्हें स्वामी विवेकानन्द की वाणी सुनाई दी और भगवान् श्रीकृष्ण से साक्षात्कार हुआ। अब उन्होंने अपने कार्य की दिशा बदल ली और 4 अप्रैल, 1910 को पुडुचेरी आ गए। यहां वे योग साधना, अध्यात्म चिन्तन और लेखन में डूब गए। 1924 में उनकी आध्यात्मिक उत्तराधिकारी श्री मां का वहां आगमन हुआ। 24 नवम्बर, 1926 को उन्हें विशेष सिद्धि की प्राप्ति हुई। इससे उनके शरीर का रंग सुनहरा हो गया। श्री अरविन्द ने अनेक ग्रन्थों की रचना की। अध्यात्म साधना में डूबे रहते हुए ही 5 दिसम्बर, 1950 को वे अनन्त प्रकाश में लीन हो गए।