गुमनाम क्रांति गाथाएं

- पूनम नेगी

महात्मा गांधी से लेकर महान क्रांतिकारी भगत सिंह की शहादत बच्चे-बच्चे की जुबान पर है। चंद्रशेखर का बलिदान आज भी राष्ट़भक्तों की आंखें नम कर देता है। सुखदेव, राजगुरु, खुदीराम बोस व रामप्रसाद बिस्मिल जैसे वीर सेनानियों की कुर्बानियां इतने वर्षों के बाद भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महान शहीद मंगल पांडेय, रानी लक्ष्मीबाई, बाजीराव पेशवा, तात्या टोपे भी श्रद्धा के पात्र हैं। इसके अलावा, ऊधम सिंह, मदनललाल धींगरा, कुंवर सिंह, भगवतीचरण वोहरा, बटुकेश्वर दत्त, बाघा जतीन, बुधु भगत सरीखे असंख्य ऐसे क्रांतिवीर भी थे जो स्वतंत्रता की बलिवेदी पर हंसते-हंसते कुर्बान हो गए। इसे विडम्बना ही कहेंगे कि उनके नाम इतिहास में उस सम्मान से दर्ज नहीं हुए, जिसके वे हकदार थे। देश के आजाद होने के बाद पंथनिरपेक्षता के नाम पर भारत के स्वर्णिम इतिहास को विकृत करने का जो सुनियोजित षड्यंत्र शुरू हुआ, उसी का दुष्परिणाम रहा कि स्वाधीनता संग्राम में अपना सर्वस्व बलिदान करने वाले हजारों क्रांतिकारियों की घोर उपेक्षा की गई। अनेक अमर शहीदों को गुमनाम बनाकर स्कूली पाठ्यक्रमों से दूर रखा गया। आजादी के महापर्व 15 अगस्त पर प्रस्तुत हैं देश के ऐसे ही गुमनाम क्रांतिवीरों की 15 कहानियां-

मदनलाल धींगरा

देश की आजादी के लिए वैसे तो अनेक रणबांकुरों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी, लेकिन मदनलाल धींगरा की बात ही जुदा है। वे महान हिंदू राष्ट्रवादी विनायक सावरकर के करीबी थे। 11 अगस्त 1908 को जब खुदीराम बोस और उसके बाद कन्हाई दत्त सहित कई क्रांतिकारियों को फांसी की सजा हुई तो इस घटना ने उन्हें उद्वेलित कर दिया। उन दिनों वे इंग्लैंड में पढ़ाई कर रहे थे। सावरकर भी तब लंदन में ही थे। धींगरा ने उनसे पूछा, ‘‘क्या अपनी मातृभूमि के लिए प्राण देने का यह सही वक्त है?’’ जवाब में सावरकर ने कहा, ‘‘अगर तुम सर्वोच्च बलिदान के लिए तैयार हो तो निश्चित रूप से अपने राष्ट्र के लिए प्राण देने का यह सही समय है।’’ सावरकर की प्रेरणा से इस प्रखर राष्ट्रभक्त ने क्रांतिवीरों की हत्या के दोषी ब्रिटिश सैनिक अधिकारी विलियम कर्जन वायली की हत्या कर दी। उन्हें फांसी की सजा सुनायी गई। फैसले के बाद उन्होंने जज को शुक्रिया कहा और बोले, ‘‘मेरा विश्वास है कि विदेशी संगीनों से पराधीन किया गया राष्ट्र सदैव युद्ध की स्थिति में ही रहता है। चूंकि नि:शस्त्र जाति द्वारा खुला युद्ध करना असंभव है, इसलिए मैंने अकस्मात हमला किया। मुझ जैसा निर्धन बेटा खून के अलावा अपनी मां को और क्या दे सकता है? इसीलिए मैंने भारतमाता की बलिवेदी पर अपना बलिदान किया है।’’ जज उनकी तेजस्वी वाणी सुनकर अवाक् रह गया। फांसी से पूर्व उन्होंने कहा, ‘‘मेरी भगवान से एक ही प्रार्थना है कि मैं फिर से उसी मां की गोद में पैदा होऊं और जब तक हमारा लक्ष्य पूरा न हो, उसी पावन लक्ष्य के लिए दोबारा मरूं।’’

ऊधम सिंह

स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में 13 अप्रैल, 1919 का दिन बहुत मार्मिक है। इस दिन अंग्रेजों ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में सभा कर रहे निहत्थे भारतीयों पर अंधाधुंध बरसा कर सैकड़ों बेगुनाह लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। उस कत्लेआम से अनाथाश्रम में पलने वाले बालक ऊधम सिंह के मन-मस्तिष्क को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने इस घटना के लिए जिम्मेदार पंजाब प्रांत के गवर्नर जनरल माइकल डायर से बदला लेने की ठान ली। उन्होंन अनाथालय छोड़ दिया और एक देश से दूसरे देश भटकते हुए लंदन जा पहुंचे। ऊधम सिंह का मकसद जलियांवाला बाग का बदला लेना ही नहीं, बल्कि अंग्रेज सरकार को एक कड़ा संदेश देकर भारत में क्रांति की आग को भड़काना था। 

13 मार्च, 1940 की शाम लंदन के कैक्सटन हॉल में जहां ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की बैठक होनी थी, उस हॉल में बैठे भारतीयों में ऊधम सिंह भी एक थे। उनके ओवरकोट में एक मोटी किताब थी और किताब के भीतर के पन्नों के को काटकर उस युवा ने उसमें एक रिवॉल्वर छिपा रखी थी। ज्यों ही बैठक खत्म हुई, तभी ऊधम सिंह ने रिवॉल्वर निकाल मंच पर मौजूद वक्ताओं में से एक माइकल डायर पर गोली चला दी। डायर की मौके पर ही मौत हो गई। हॉल में भगदड़ मच गई, लेकिन इस दुस्साहसिक वारदात को अंजाम देने के बाद भी उस निर्भीक युवा ने भागने की कोशिश नहीं की। उसे गिरफ्तार कर लिया गया। ब्रिटेन में ही उस पर मुकदमा चला और 31 जुलाई, 1940 को उसे फांसी हो गई। 

बटुकेश्वर दत्त

महान स्वतंत्रता सेनानी व क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त को आजाद भारत में वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वह अधिकारी थे। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, भगवती चरण वोहरा, राजगुरु व सुखदेव के अभिन्न साथी रहे इस महान क्रांतिकारी को आजाद भारत में अपमान, उपेक्षा, यातनाओं और संघर्षों के कड़वे दंश झेलने पड़े। मैट्रिक की परीक्षा पास करने के दौरान 16 साल की उम्र में बटुकेश्वर कानपुर में भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के संपर्क में आए और जल्द ही क्रान्तिकारी संगठन ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के सक्रिय सदस्य बन गए। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के साथ उन्होंने विभिन्न क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लिया और केंद्रीय विधानसभा में बम विस्फोट मामले में जेल भी गए। लाहौर षडयंत्र अभियोग चला जिसमें भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को तो फांसी दी गई, किन्तु बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास के लिए काला पानी भेज दिया गया। 1933 और 1937 में उन्होंने जेल में अमानवीय अत्याचारों को लेकर दो बार भूख हड़ताल भी की। काला पानी की सजा काट कर टीबी की गंभीर बीमारी लेकर लौटे। अखबारों में खबर छपी तो 1937 में उन्हें फिर कैद कर बिहार के बांकीपुर केंद्रीय कारागार में डाल दिया गया। एक साल बाद रिहा हुए तो उनके सारे साथी दुनिया से विदा हो चुके थे। पहले उन्होंने इलाज करवाया, फिर ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में हिस्सा लिया। एक बार फिर गिरफ्तार हुए और 1945 में जेल से रिहाई मिली तो आमजन के बीच विदेशी दासता से मुक्ति की अलख जगाने में जुट गए। 1947 में देश आजाद होने के बाद बटुकेश्वर दत्त ने शादी कर जीवन की नई पारी शुरू की, लेकिन आजीविका के लिए उन्हें सिगरेट बेचने से लेकर बिस्कुट-डबलरोटी की छोटी-सी बेकरी खोली। धंधे में ईमानदारी रास नहीं आई और वे घाटे में आ गए। उन्होंने टूरिस्ट एजेंट और बस कंडक्टर का काम भी किया। 

1964 में जब वे बीमार हुए तो गंभीर हालत मे उन्हें पटना के सरकारी अस्पताल में भर्ती किया गया। उनके पत्रकार मित्र चमनलाल को इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने एक लेख लिखा, ‘‘क्या दत्त जैसे क्रांतिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए! खेद की बात है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्राणों की बाजी लगा दी और जो फांसी से बाल-बाल बच गया, वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एड़ियां रगड़ रहा है।’’ इस लेख से सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच गया। बेहतर इलाज के लिए उन्हें दिल्ली लाया गया। दिल्ली पहुंचने पर दत्त ने पत्रकारों से कहा, ‘‘मुझे स्वप्न में भी ख्याल न था कि मैं उस दिल्ली में जहां मैंने बम डाला था, एक अपाहिज की तरह स्ट्रेचर पर लाया जाऊंगा।’’ पंजाब के मुख्यमंत्री रामकिशन उनसे मिलने दिल्ली पहुंचे और बोले, ‘‘आपकी जो इच्छा हो मांग लीजिए। इस पर छलछलाई आंखों से दत्त ने कहा, मेरा दाह संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के बगल में किया जाए।’’ 20 जुलाई, 1965 को बटुकेश्वर दत्त इस दुनिया से विदा हो गए। 

यतीन्द्रनाथ मुखर्जी

आजादी की लड़ाई का इतिहास लिखे जाने के वक्त नाइंसाफी का शिकार होने वाले क्रांतिकारियों में एक नाम यतीन्द्रनाथ मुखर्जी का भी है। उस दौर में जब लोग अंग्रेजों के खौफ से घरों में सिमट जाते थे, वह ऐसे व्यक्ति थे जो अंग्रेजों को देखते ही उसकी पिटाई कर देते थे। कहा जाता है कि एक बार तो एक रेलवे स्टेशन पर यतीन्द्रनाथ ने अकेले ही आठ अंग्रेजों को पीटा था। बलिष्ठ देह के स्वामी यतीन्द्रनाथ मुखर्जी ने निहत्थे ही बाघ को मारकर भगा दिया था, तभी से वे बाघा जतिन के नाम से विख्यात हो गए। कलकत्ता सेंट्रल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वे स्वामी विवेकानंद के संपर्क में आए और उनके भीतर ब्रह्मचारी रहकर देश सेवा का भाव जगा। स्वामी विवेकानंद ने उन्हें अम्बू गुहा के अखाड़े में भेजा ताकि वे कुश्ती के दांव पेच सीख सकें। 

1899 में यतीन्द्रनाथ मुजफ्फरपुर में बैरिस्टर पिंगले का सचिव बनकर पहुंचे। वहां उन्होंने महसूस किया कि भारत की अपनी ‘नेशनल आर्मी’ होनी चाहिए। यह विचार बाद में मोहन सिंह, रास बिहारी बोस व सुभाषचंद्र बोस के चलते अस्तित्व में आया। 16 वर्ष की अवस्था में ही वे असहयोग आंदोलन में कूद पड़े और क्रांतिकारी दल में शामिल हो गए। लाहौर षड्यंत्र अभियोग में वे छठी बार गिरफ्तार हुए। उन दिनों जेल में क्रांतिकारियों के साथ बहुत बुरा बर्ताव होता था। जेल अधिकारी उनके साथ प्राय: मारपीट भी किया करते थे। मगर जतिन का मनोबल बहुत ऊंचा था। उनके नेतृत्व में लाहौर जेल में क्रांतिकारियों ने 13 जुलाई 1929 से अनशन शुरू किया। उनके लिए अनशन का अर्थ था- विजय या मृत्यु। उनका अनशन तुड़वाने के लिए जेल अधिकारी स्वादिष्ट भोजन, मिष्ठान और केसरयुक्त दूध आदि उनके कमरों में रखने लगे। लेकिन क्रांतिवीर यह सामग्री फेंक देते थे। वहीं, यतीन्द्र कमरे में रखे इन खाद्य-पदार्थों को छूना तो दूर देखते तक न थे। 13 सितंबर, 1929 को अनशन के 63वें दिन जतिन ने सब मित्रों को पास बुलाया। छोटे भाई किरण ने उनका मस्तक अपनी गोद में ले लिया। विजय सिन्हा ने यतीन्द्र का प्रिय गीत ‘एकला चलो रे’ और ‘वन्दे मातरम्’ गाया और गीत पूरा होते ही चेहरे पर अलौकिक आभा लिए संकल्प के धनी जतिन परलोक सिधार गए। समूचा जेल परिसर ‘बाघा जतिन जिंदाबाद’, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारों से गूंज उठा। 

भगवतीचरण वोहरा

नई पीढ़ी को शायद ही मालूम हो कि भगवतीचरण वोहरा क्रांतिकारी आंदोलन के ऐसे अप्रतिम नक्षत्र थे, जिनके गर्वीले आत्मत्याग की आभा में शहीद-ए-आजम भगत सिंह को अपना बलिदान तुच्छ नजर आता था। वोहरा का अनूठापन इस बात में भी है कि क्रांतिकारी आंदोलन के विचारक, संगठक, सिद्धांतकार व प्रचारक होने के साथ काकोरी से लाहौर तक कई क्रांतिकारी कार्रवाईयों के अभियुक्त होने के बावजूद वे कभी भी पुलिस के हाथ नहीं आए। अपराजेय आदर्शनिष्ठा, प्रतिबद्धता, साहस व मनोयोग से आखिरी सांस तक भारतमाता की मुक्ति के लक्ष्य के प्रति समर्पित रहे। भगवतीचरण क्रांतिकारी आंदोलन की नींव की ऐसी ईंट थे, जिसने कभी शिखर पर दिखने का लोभ नहीं पाला। उन्होंने ‘नौजवान भारत सभा’ बनाई तो भगत सिंह को महासचिव बनाया और खुद प्रचार सचिव बने। वे एक सम्पन्न परिवार से थे, पर विलासिता को ठुकराकर आजादी के लिए कठिनाइयों से भरा रास्ता चुना। एक और खास बात यह कि उनका बाल विवाह हुआ था, लेकिन वैवाहिक जीवन उनकी मार्ग की बाधा नहीं, वरन लक्ष्य में सहायक रहा। 

1918 में वे 14 साल थे, जब पांचवीं तक पढ़ी इलाहाबाद की 11 वर्षीया दुर्गावती के उनका विवाह हुआ। लेकिन दुर्गावती पति के क्रांतिकर्म में कंधे से कंधा मिलाकर चलीं। वोहरा ‘बम’ बनाने में माहिर थे। कहीं बम ऐन मौके पर दगा न दे जाएं, इस संदेह के निवारण के लिए एक दिन वे रावी तट पर बम का परीक्षण कर रहे थे कि बम फट गया और भगवती अपनी जान गंवा बैठे। बम से उनके एक हाथ की अंगुलियां और हाथ कलाई से आगे पूरा उड़ गया तथा आंतें बाहर निकल आर्इं। मौत को सामने खड़ी देखकर भी वे विचलित नहीं हुए और साथियों से दो खास बातें कहीं। पहली-ये नामुराद मौत दो दिन टल जाती तो इसका क्या बिगड़ जाता? उनका मतलब था कि तब वे भगत, सुखदेव व राजगुरु को छुड़ा लेते। दूसरी-अच्छा हुआ कि जो कुछ भी हुआ, मुझे हुआ। किसी साथी को होता तो मैं भैया यानी ‘आजाद’ को क्या जवाब देता। 

वीर कुंवर सिंह

मां भारती के अमर सेनानी बाबू कुंवर सिंह बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव के जमींदार बाबू साहबजादा सिंह के पुत्र और प्राचीन भारत के महान प्रशासक राजा भोज के वंशज थे। अपनी आजादी कायम रखने और भारत माता को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए कुंवर सिंह आजीवन संघर्ष करते रहे। उस दौर में मंगल पाण्डे की बहादुरी ने समूचे देश में नए उत्साह का संचार कर दिया था। बिहार के दानापुर रेजिमेंट, बंगाल के बैरकपुर और रामगढ़ के सिपाहियों ने बगावत कर दिया था। मेरठ, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, झांसी और दिल्ली में भी आग भड़क उठी थी। ऐसे हालात में बाबू कुंवर सिंह ने भारतीय सैनिकों का नेतृत्व करते हुए 27 अप्रैल, 1857 को दानापुर के सिपाहियों और अन्य साथियों के साथ आरा पर कब्जा जमा लिया। अंग्रेजों की लाख कोशिशों के बाद भी भोजपुर लंबे समय तक स्वतंत्र रहा। अंग्रेजी फौज ने आरा पर हमला करने की कोशिश की तो बीबीगंज और बिहियां के जंगलों में घमासान लड़ाई हुई। कुंवर सिंह अंग्रेजी सेना को चकमा देकर जगदीशपुर की ओर बढ़ गए। आरा पर कब्जा करने के बाद अंग्रेजों ने जगदीशपुर पर आक्रमण कर दिया। कुंवर सिंह और अमर सिंह को जन्म भूमि छोड़नी पड़ी। अमर सिंह छापामार लड़ाई में निपुण थे। कुंवर सिंह व अमर सिंह रामगढ़ के बहादुर सिपाहियों के साथ बांदा, रीवा, आजमगढ़, बनारस, बलिया, गाजीपुर और गोरखपुर में विप्लव के नगाड़े बजाते रहे। ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने कुंवर सिंह के बारे में लिखा है, ‘‘उस बूढ़े राजपूत ने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध अद्भुत वीरता और आन-बान के साथ लड़ाई लड़ी। गनीमत था कि उस समय कुंवर सिंह करीब 80 वर्ष के थे। अगर वह जवान होते तो शायद अंग्रेजों को 1857 में ही भारत छोड़ना पड़ता।’’

वासुदेव बलवंत फडके

महाराष्ट्र के पुणे निवासी वासुदेव बलवंत फडके को स्वतंत्रता संग्राम का आदि क्रांतिकारी माना जाता है। 1857 की प्रथम संगठित महाक्रांति की विफलता के बाद उन्होंने ही आजादी के महासमर की पहली चिनगारी भड़काई थी। ब्रिटिश काल में किसानों की दयनीय दशा से विचलित होकर उन्होंने सशस्त्र क्रांति की राह चुनी और क्षेत्र की कोल, भील तथा धांगड़ जातियों को एकत्र कर क्रांतिकारी संगठन खड़ा किया। मुक्ति संग्राम हेतु धन एकत्र करने के लिए उन्होंने धनी अंग्रेज साहूकारों को लूटा। पुणे को कुछ दिन के लिए अपने नियंत्रण में लेने के बाद वे लोकप्रिय हो गए। वे लगातार देश की सेवा करते रहे और आखिरकार 1879 में बीजापुर में अंग्रेजों द्वारा पकड़ लिए गए। उन पर अभियोग चला और उन्हें काले पानी की सजा हुई। जेल में फडके को शारीरिक यातनाएं दी गई, जिससे 1883 में उनकी मृत्यु हो गई।

बाबा रामसिंह कूका

महान समाज सुधारक बाबा रामसिंह कूका भारत की आजादी में ‘कूका विद्रोह’ के प्रणेता थे। उनका जन्म 1816 में वसंत पंचमी के दिन लुधियाना के भैणी ग्राम में हुआ था। कुछ समय वे राजा रणजीत सिंह की सेना में रहे, फिर घर आकर खेती-बाड़ी में लग गए। चूंकि वे आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे, इसलिए लोग उनके पास उपदेश सुनने आते थे। धीरे-धीरे उनके शिष्यों की संख्या बढ़ती गई और उन्होंने एक अलग ‘कूका पंथ’ बन लिया। रामसिंह ने 12 अप्रैल, 1857 को श्री भैणी साहिब (लुधियाना) में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध आवाज उठाई। उन्होंने अंग्रेजी शासन का बहिष्कार किया तथा अपनी स्वतंत्र डाक और प्रशासन व्यवस्था कायम की। भैणी गांव में हर साल मकर संक्रांति पर मेला लगता था। एक बार मेला आते समय उनके एक शिष्य को कुछ मुसलमानों ने घेर लिया और गोवध कर उसके मुंह में गोमांस ठूंस दिया। यह सुनकर गुरु रामसिंह के शिष्य भड़क गए और उन्होंने मुसलमानों के गांव पर हमला बोल दिया। उसी समय अंग्रेज सेना भी वहां आ गई। अंग्रेज सेना के साथ संघर्ष में अनेक कूका वीर शहीद हो गए, जबकि 68 पकड़ लिए गए। इनमें से 50 को 17 जनवरी, 1872 को मलेरकोटला में तोप के सामने खड़ा कर उड़ा दिया गया। शेष 18 को अगले दिन फांसी दी गई। रामसिंह को पकड़कर बर्मा की मांडला जेल में भेज दिया गया। जेल में 14 साल तक कठोर अत्याचार सह कर 1885 में बाबा रामसिंह कूका ने अपना शरीर त्याग दिया।

हेमू कालाणी

23 मार्च, 1923 को सिंध के सख्खर (पाकिस्तान) में जन्मे हेमू कालाणी बाल्यकाल से ही अत्यंत साहसी थे। उनकी रगों में देशप्रेम कूट--कूट कर भरा था। हेमू जब मात्र सात वर्ष के थे, तभी तिरंगा लेकर दोस्तों के साथ भारतमाता की जय के नारे बुलंद किया करते थे। 1942 में जब उन्हें यह गुप्त जानकारी मिली कि अंग्रेजी सेना की हथियारों से भरी रेलगाड़ी रोहड़ी शहर से होकर गुजरेगी तो हेमू कालाणी ने साथियों के साथ रेल पटरी क्षतिग्रस्त करने की योजना बनाई। 

हालांकि इस काम को वे लोग बेहद गुप्त तरीके से कर रहे थे, फिर भी वहां तैनात पुलिस वालों की उन पर नजर पड़ गई और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उनके बाकी साथी फरार हो गए। किशोरवय हेमू को कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई। सिंध के गणमान्य लोगों ने एक याचिका दाखिल कर फांसी की सजा न देने की अपील की, जिसे वायसराय ने इस शर्त पर स्वीकार किया कि यदि हेमू अपने साथियों का नाम और पता बता दे तो उनकी फांसी रोक दी जाएगी। लेकिन हेमू कालाणी ने इस शर्त को ठुकरा दिया। 21 जनवरी, 1943 को फांसी से पहले जब उनसे आखिरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने दोबारा भारत में जन्म लेने की इच्छा जाहिर की। फिर इंकलाब जिंदाबाद, भारत माता की जयघोष के साथ फांसी के फंदे पर झूल गए। 

शिरीष कुमार मेहता

बात उस समय की है, जब महात्मा गांधी के ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ के आह्वान पर समूचे देश में पदयात्राएं निकाल कर जनजागरण किया जा रहा था। अंग्रेजों को भारत छोड़ने की चेतावनियां दी जा रहीं थीं। उसी दौरान गुजरात के नंदुरबार क्षेत्र में निकली पदयात्रा में आठवीं कक्षा में पढ़ने वाला 12 वर्षीय बालक भी पूरे जोश से हिस्सा ले रहा था। अपनी मातृभाषा में ‘नहीं नमशे, नहीं नमशे, निशाण भूमी भारतनु’ के नारे लगा रहा था। भारत माता का जयघोष करते हुए पदयात्रा एक गांव से दूसरे गांव की ओर जा रही थी। बीच रास्ते में ही पुलिस ने इस यात्रा को रोक दिया। उस समय शिरीष के हाथ में राष्ट्रध्वज था। पुलिस ने टोली के लोगों से यात्रा को विसर्जित करने को कहा, लेकिन उस वीर बालक ने आदेश की अनदेखी कर भारतमाता की जय, वंदे मातरम् का जयघोष जारी रखा। इससे अंग्रेज अधिकारी बिफर गया और गोलीबारी का आदेश दे दिया। पुलिस वालों ने जब टोली में मौजूद बालिकाओं की ओर बंदूक तानी तो उस तेजस्वी बालक ने ललकारते हुए कहा, ‘‘गोली मारनी ही है तो मुझे मार! बालक की ललकार से बौखलाए पुलिस अधिकारी ने दो गोलियां दाग दीं जो बालक शिरीष की छाती में लगीं और वह गिर गया। 

बाबू गेनू

1930 में महात्मा गांधी ने जब सत्याग्रह शुरू किया तो देशभर में लोगों ने इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। अनेक राष्ट्रभक्तों ने मां भारती को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी। ऐसा ही एक रणबांकुरा था पुणे जिले के महालुंगे गांव का किशोरवय बाबू गेनू। गेनू जब 10 वर्ष के भी नहीं थे, तभी उनके सिर से पिता का साया उठ गया था। चौथी कक्षा के बाद उनकी पढ़ाई छूट गई। जब गेनू 14-15 साल के हुए तो मां ने उनके ब्याह की इच्छा जताई, लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया। वह भारतमाता की सेवा करना चाहते थे। इसलिए वे बंबई (अब मुंबई) चले गए और नमक पर छापा मारने वाले स्वयंसेवकों के दल में शामिल हो गए। इसमें पकड़े जाने पर उन्हें कठोर कारावास का दंड मिला। यरवदा जेल से छूटने के बाद वे मां से मिलने गए और उनकी आज्ञा लेकर फिर मुंबई में अपने दल से जा मिले। उस समय गांधीजी के आह्वान पर देशभर में विदेशी कपड़ों की होली जलाई जा रही थी। 

12 दिसंबर, 1930 को ब्रिटिश एजेंटों ने जब विदेशी कपड़ों से भरे एक ट्रक को जबरन सड़क पर उतारा तो बाबू गेनू सड़क पर लेट गए। लेकिन अधिकारियों के इशारे पर ट्रक उन्हें रौंदता हुआ निकल गया। बाबू गेनू शहीद हो हो गए, लेकिन अन्याय के विरुद्ध घुटने नहीं टेके। कस्तूरबा गांधी इस युवा शहीद के घर गर्इं और पूरे देश की तरफ से उनकी मां को प्रणाम कर कहा कि गेनू की शहादत को यह देश कभी भूल नहीं सकेगा। 

बालमुकुंद, अमीरचंद व अवध बिहारी

भाई बालमुकुंद, मास्टर अमीरचंद और मास्टर अवध बिहारी मां भारती के ऐसे महान बलिदानी सपूत थे, जिन्हें 1912 में दिल्ली के चांदनी चौक में लार्ड हार्डिग बम कांड में 8 मई, 1915 को फांसी पर लटका दिया गया। इन सभी पर 1912 में लार्ड हार्डिग पर बम फेंकने का आरोप था। हालांकि इनके खिलाफ आरोप साबित नहीं हुआ, लेकिन अंग्रेज हुकूमत ने शक के आधार पर इन्हें फांसी की सजा सुना दी। जिस स्थान पर इन्हें फांसी दी गई, वहां अब शहीद स्मारक है। यह शहीद स्मारक दिल्ली गेट स्थित मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में स्थित है। इन अमर क्रांतिवीरों में भाई बालमुकुंद की कहानी बेहद रोमांचकारी है। वह स्वयं तो वीर थे ही, उनकी पत्नी रामरखी भी आदर्श वीरांगना थीं। पति के गिरफ्तार होने के दिन से ही रामरखी को आभास-सा हो गया था कि अब सबकुछ समाप्त होने को है। उन्हें पति से मिलने की इजाजत भी बहुत मुश्किल से मिली। 

जेल में मुलाकात के दौरान उन्होंने पति से पूछा, ‘‘खाना कैसा मिलता है?’’ इस पर भाई बालमुकुंद ने हंसकर कहा, ‘‘मिट्टी मिली रोटी।’’ इसके बाद रामरखी अपने आटे में भी मिट्टी मिलाने लगीं। दोबारा जब वे पति से मिलने पहुंचीं तो पूछा, ‘‘सोते कहां हैं?’’ बालमुकुंद बोले, ‘‘अंधेरी कोठरी में दो कंबलों पर।’’ बस, उस दिन से रामरखी गर्मी में भी कंबल पर सोने लगीं। जिस दिन पति को फांसी हुई, उस दिन रामरखी सवेरे उठकर नये वस्त्र-आभूषण पहने और एक चबूतरे पर बैठ गर्इं। उनके चेहरे पर दु:ख के भाव ही नहीं थे। लेकिन वे बैठीं तो उठी ही नहीं। पति-पत्नी की चिता एक साथ जलाई गई। 

बसंत कुमार बिस्वास

युवा क्रांतिकारी बसंत कुमार बिस्वास बंगाल के प्रमुख क्रांतिकारी संगठन ‘युगांतर’ के सक्रिय सदस्य थे। उन्होंने अपनी जान पर खेल कर वायसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेंका था। हार्डिंग की हत्या की योजना रासबिहारी बोस ने बनाई थी और बम फेंकने वालों में बसंत बिस्वास और मन्मथ बिस्वास प्रमुख थे। 23 दिसंबर, 1912 को जब देश की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली किया गया, उस समय वायसराय दिल्ली में प्रवेश कर रहा ही रहा था कि चांदनी चौक में उसके जुलूस पर बसंत बिस्वास ने बम फेंका। उस समय उन्होंने महिला का वेश धारण किया हुआ था। हालांकि वायसराय इस हमले में बच गया। बाद में वे पकड़ लिए गए और 20 वर्ष की आयु में उन्हें फांसी दे दी गई। 

अल्लूरी सीताराम राजू

विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध संघर्ष करने वाले वनवासी महानायक अल्लूरी सीताराम राजू का जन्म 1897 में विशाखापत्तनम जिले के पांड्रिक गांव में हुआ था। उनके पिता अल्लूरी वेंकट रामराजू ने बचपन से ही उन्हें क्रांतिकारी संस्कार दिए थे। राजू ने अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ वनवासी संगठन बनाया और अंग्रेजी फौज के खिलाफ जंग छेड़ दी। गोदावरी नदी के पास फैली पहाड़ियों में राजू व उसके साथी युद्ध का अभ्यास करते और आक्रमण की रणनीति बनाते थे। राजू लगाता ब्रिटिश अधिकारियों को मात देते रहे। उन्हें पकड़ने में आंध्र पुलिस के नाकाम होने के बाद केरल की मलाबार पुलिस दस्ते को इस काम पर लगाया गया। लेकिन उस दस्ते को भी सफलता नहीं मिली। 6 मई, 1924 को राजू के दल का मुकाबला असम राइफल्स से हुआ जिसमें उनके कई साथी शहीद हो गए, पर राजू बच निकले। ईस्ट कोस्ट स्पेशल पुलिस उन्हें खोजती रही। एक दिन बाद 7 मई को जब वे अकेले जंगल में भटक रहे थे तभी फौज के एक अधिकारी की नजर उन पर पड़ी। पुलिस दल ने पीछे से गोली चलाई और राजू जख्मी होकर वहीं गिर पड़े। फिर अंग्रेज सिपाहियों ने एक पेड़ से बांध कर उन्हें गोली मार दी। 

बुधू भगत

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में प्राणों की आहूति देने वाले वीर शहीदों में बुधू भगत भी थे। वे छोटानागपुर के उस जन आंदोलन के नायक थे, जिसे अंग्रेजों ने ‘कोल विद्रोह’ की संज्ञा दी थी। ठीक वैसे ही जैसे 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन को ‘सिपाही विद्रोह’ कहा। मगर हकीकत यह है कि झारखंड के छोटानागपुर इलाके में स्थानीय जनजातियों ने बुधू भगत के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन छेड़ा था। रांची के सिलंगाई गांव (चान्हो) में जन्मे बुधू भगत और इनके बेटे हलधर व गिरधर की वीरता के सामने अंग्रेजी सेना और अंग्रेजों के चाटुकार जमींदारों को अनेक बार पराजय का मुंह देखना पड़ा था। 

बुधू दैवीय शक्ति युक्त एक ऐसे महान सेनानी थे, जिनके नेतृत्व में उरांव जाति के हजारों आदिवासियों ने 1826 में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया था। यह उनकी अद्भुत संगठनात्मक क्षमता का प्रभाव था कि यह आंदोलन सोनपुर, तमाड़ एवं बंदगांव के मुंडा मानकियों का आंदोलन न होकर छोटानागपुर के समस्त भूमि पुत्रों आंदोलन हो गया था। 1832 के जनाक्रोश की ज्वाला को तेजी से फैलते देख हताश अंग्रेज अधिकारियों ने कैप्टन इम्पे को बुधू भगत को जीवित या मृत पकड़ने की जिम्मेदारी सौंपी। बंगाल हरकारा के 29 फरवरी, 1832 के अंक में इसका विस्तृत विवरण प्रकाशित है। किस तरह अंग्रेज सैनिक अपने दायरे को संकुचित करते जा रहे थे और ग्रामीण अपने नायक को घेरे में लेकर निकल भागने का प्रयास कर रहे थे। किंतु बंदूक, पिस्तौल व तलवारों के आगे तीर-कमान कब तक टिकते। 

अंग्रेज सैनिकों ने बुधू भगत व उनके भाई-भतीजों की निर्ममता से हत्या कर दी। भले ही प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से पूर्व 1832 का कोल-संथाल आंदोलन बुधू भगत के महाबलिदान के कुछ समय बाद कुचल दिया गया, किंतु उनकी यशोगाथा आज भी आदिवासी समाज में पूरी श्रद्धा से गाई जाती है।