विश्व पटल पर गूंज अटल
   दिनांक 16-अगस्त-2018
भारत की मिट्टी में जन्म लेने वाले सौभाग्यशाली राजनेताओं में ऐसे बिरले ही हैं जो अपनी कला, संस्कृति और साहित्य से निरंतर जुड़े रहकर अपनी राजनीति के चक्रव्यूहों के बीच भी अपनी लेखनी को विराम नहीं देते।
- पाञ्चजन्य परिवार 
उदारमना एवं कर्मठ राजनेता के रूप में श्री अटल बिहारी वाजपेयी की छवि एक कुशल राजनेता, तथा कालजयी कवि की भी थी। उनका विराट व्यक्तित्व विश्वव्यापी एवं सर्वसमावेशक है। उनकी अद्भुत वक्तत्व शैली की धूम पूरे देश और विदेश में थी। गंभीर से गंभीर विषय को हल्के-फुल्के और विनोदी अंदाज में कहने के बावजूद उसकी मारक क्षमता और गंभीरता को बरकरार रखने के उनके अनोखे अंदाज का शायद ही कोई दूसरा सानी रहा होगा। स्वतंत्रता के बाद भारत के इतिहास में शायद ही कोई राजनेता होगा जो इतने लम्बे समय तक राजनीति के केन्द्र में सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ कायम रहा। इसे अटल जी के संवाद कौशल का कमाल ही कहेंगे कि उनका छोटे से छोटा कथन भी खबर बन जाता था। जब वे बोलते थे तो जनसमुदाय के दिलों को जीत लेते थे। उनके रचनात्मक दृष्टिकोण एवं कुशल संवादों से संसद में बहस की गरिमा और उसके स्तर का व्यापक उन्नयन हुआ। लाखों के जनसमुदाय को संबोधित करते समय भी जनता की नब्ज पकड़कर चलना एवं उसे बांधे रखने का मानो कोई मंत्र उनके पास रहता था।
लेखन कर्म से अपनी जीवन यात्रा शुरू करने वाले अटल जी के जीवन के हर पड़ाव पर संघर्षशीलता एवं उतार-चढ़ाव दृष्टव्य होता है। अटल जी को कुशल वक्ता की कला एवं काव्य कला अपने पिताजी पं. कृष्णबिहारी वाजपेयी से विरासत में मिली थी। उनके पिताजी तत्कालीन समय में ग्वालियर राज्य के विख्यात कवि तथा कुशल वक्ता थे। अटल जी के बाबा भी संस्कृति के मूर्धन्य विद्वान थे, परन्तु अटल जी की वाणी पर जिस प्रकार साक्षात् सरस्वती विराजती थीं वह उनकी ईश्वर प्रदत्त और स्वयं के अध्यवसाय से अर्जित उपलब्धि है।
संवाद कौशल एवं अपनी भाषण कला के लिए अटल जी विख्यात थे एवं श्रोताओं में अति लोकप्रिय थे। विषयों का गहन विवेचन या प्रतिपादन भी जैसी सर्वजन-सुलभ सरल शब्दावली में करके अर्थशास्त्र से अनभिज्ञ श्रोताओं को भी वे सारी बात जितनी अच्छी तरह से समझा देते थे वह योग्यता अर्थशास्त्र के पंडितों के लिए भी कठिन है। भाषा, सहजता, शब्द-चुनाव एवं सांकेतिक भाषा में अपने प्रस्ताव की प्रासंगिकता एवं उसके गुण-दोष के आधार पर उसकी सापेक्षता को सिद्ध करने का उनका अनोखा ही अंदाज था।
जिस समय अंग्रेजी बोलने वाले राजनेताओं का बड़ा रुतबा हुआ करता था और उन्हें हिन्दी भाषी राजनेताओं की तुलना में ज्यादा योग्य माना जाता था उस समय अटल जी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में विदेश मंत्री के नाते हिन्दी में भाषण करते हुए विश्व मंच पर सर्वप्रथम भारत की राष्ट्रभाषा को गौरव का स्थान दिलाकर उसके नए अध्याय का सूत्रपात किया। वहां से वापसी पर भारत की राजधानी में हिन्दी प्रेमी तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री बाबू जगजीवन राम की अध्यक्षता में अटल जी का सम्मान किया गया। इस समारोह में वक्ताओं ने अटल जी की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। तब अंत में अटल जी ने कहा था कि हिंदी की बात मत करो, हिंदी में बात करो।
 
संयुक्त राष्ट्र संघ में दिए गए उनके भाषण में निहित संदेश, उसकी सम्प्रेषणीयता एवं उसके स्तर ने भी सबको प्रभावित किया। भाषण के कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं - मेरे विचार राष्ट्रों की शक्ति और महिमा के संदर्भ में नहीं हैं। मेरे लिए आम आदमी की गरिमा और मांग ज्यादा महत्वपूर्ण है। हमारी सफलताओं और असफलाओं को मापने का एक ही मापदण्ड होना चाहिए। हम हर आदमी, औरत और बच्चों, सभी लोगों के लिए सामाजिक न्याय और गरिमा के लिए काम कर रहे हैं। इसकी सफलता के लिए यह आवश्यक है कि संयुक्त राष्ट्र संघ मानवता की प्रभावी आवाज बने और राष्ट्रों के बीच अन्तर्संबंधों एवं सहयोग तथा सामूहिक कार्रवाई पर आधारित एक गतिशील मंच इसे बनाया जाए।
उनके भाषण को पढ़कर यह आभास होता है कि यह किसी राजनेता का उबाऊ या उपदेशात्मक भाषण भर नहीं वरन् परिस्थितियों को देखते हुए बहुमुखी प्रतिभावान किसी कुशल नेता द्वारा एक अंतरराष्ट्रीय मंच से दिया गया प्रभावी एवं मर्मस्पर्शी संदेश है।
अटल जी का व्यक्तित्व इतना व्यापक है कि उन पर कई पुस्तकें बन सकती हैं। परन्तु उन पर लिखे गये लेख में यदि उनके अंदर विद्यमान कालजयी कवि की चर्चा न करना, उनके व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। उनकी कविताओं को पढ़कर विश्वास नहीं होता कि कोई राजनेता इतना उत्कृष्ट कवि हो सकता है। उनकी कविताओं में राष्ट्रप्रेम, जीवन संघर्ष, विश्व शांति एवं राजनेता के रूप में उनके मन के अंदर की उथल-पुथल का बखूबी वर्णन किया गया है। जब वे लिखते थे- खड़े देहली पर हो किसने पौरुष को ललकारा, किसने पापी हाथ बढ़ाकर मां का मुकुट उतारा? तब लगता था मानो वह राष्ट्र के दुश्मनों को चुनौती देते हुए ललकार रहे हैं। एक दूसरी कविता में वे लम्बे संघर्ष के बाद मिली आजादी की सुरक्षा के लिए नसीहत देते हुए उन्होंने लिखा था- उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें। जो पाया उसमें खो न जायें, जो खोया उसका ध्यान करें। भारत के आत्मसम्मान की अक्षुण्णता के लिए अटल जी ने लिखा था- दाव पर सब कुछ लगा है रुक नहीं सकते हैं, टूट सकते हैं, मगर हम झुक नहीं सकते हैं।
अटल जी इन कविताओं को पढ़कर लगता है कि मानो वे कोई वीर रस के कोई कवि हों। लेकिन जब हम उनकी एक अन्य कविता 'अपने ही मन से कुछ बोलें' पर नजर डालते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि मानो किसी दार्शनिक ने लिखा हो और कविता के माध्यम से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का संदेश दिया गया हो। यह कविता बहुत मर्मस्पर्शी है एवं मानव जीवन की यात्रा का वृतांत इसमें वर्णित है। अपनी अंतरचेतना में झांकने एवं उसका आत्मावलोकन करने का खूबसूरत संदेश भी इसमें निहित है। पूरे जीवन चक्र का निचोड़ इस कविता में किस तरह सम्मिलित है यह कविता की निम्न पंक्तियों से समझा जा सकता है:-
क्या खोया, क्या पाया जग में,
मिलते और बिछड़ते मग में,
मुझे किसी से नहीं शिकायत,
यद्यपि छला गया पग-पग में,
एक दृष्टि बीती पर डालें,
यादों की पोटली टटोलें।

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी,
जीवन एक अनन्त कहानी,
पर तन की अपनी सीमाएं,
यद्यपि सौ शरदों की वाणी,
इतना काफी है अंतिम
दस्तक पर खुद दरवाजा खोलें।
 
जन्म-मरण का अविरत फेरा,
जीवन बंजारों का डेरा,
आज यहां, कल कहां कूच है,
कौन जानता, किधर सवेरा,
अंधियारा आकाश असीमित,
प्राणों के पंखों को तोलें।
अपने ही मन से कुछ बोलें। 
कुल मिलाकर चाहे एक कुशल संगठक की भूमिका हो, चाहे मंजे हुए राजनेता की, सहृदय कालजयी कवि या फिर अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक की, अटल जी जैसा कोई दूसरा नहीं हो सकता। यह अटल जी की अभूतपूर्व मेधा का ही परिणाम था कि उन्हें विरोधी और दूसरी पार्टियों में वही सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त हुई जो अपनी पार्टी के शीर्ष नेता होने के कारण अपनी पार्टी में प्राप्त हुई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दूरदृष्टा, दृढ़ निश्चयी, अविचल और प्रखर प्रतिभा के धनी, अटल जी के व्यक्तित्व को जब हम परखते हैं तो उनका व्यक्तित्व सबसे ऊंचाई पर व्यक्तित्व की पराकाष्ठा को छूता नजर आता है। आजकल की चरित्रहनन, कीचड़ उछालने वाली राजनीति से दूर साफ-सुथरी छवि एवं व्यापक व्यक्तित्व तथा राष्ट्र के गौरव को शिखर पर पहुंचाने के लिए समर्पित रहने को हमेशा तत्पर रहने वाले बिरले राजनेताओं में उनको शीर्ष स्थान प्राप्त है। अटल जी सत्ता के लिए सिद्धातों से समझौता न करने एवं वैचारिक स्वतंत्रता की परम्परा के संवाहक थे।