सियासत के 'समुद्र' में अटल प्रकाश स्तंभ
   दिनांक 17-अगस्त-2018
 
देश के 72 वें स्वतंत्रता दिवस पर विविध आयोजनों की उत्सवी चमक को दुख में बदल देने वाली पहली खबर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से आई!
अटल जी की तबियत बिगड़ी..। शाम होते-होते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अटल जी के स्वास्थ्य का हाल लेने एम्स पहुंच गए।
देश के पूर्व प्रधानमंत्री, पाञ्चजन्य के प्रथम संपादक और सर्वप्रिय जननेता अटल बिहारी वाजपेयी 11 जून से सांस लेने में दिक्कत और गुर्दे के संक्रमण के उपचार के लिए ‘एम्स’ में थे। अगले रोज दोपहर तक आशंकाओं के बादलों ने पूरे देश और खासकर दिल्ली को ढक लिया।
भारतीय जनता पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक स्थगित कर दी गई। दिल्ली में अटलजी के घर के बाहर तैनात सुरक्षाकर्मियों की संख्या बढ़ा दी गई।
किसी औपचारिक घोषणा से पहले एक टीवी चैनल ने अटलजी के निधन की घोषणा कर दी। सोशल मीडिया पर अपुष्ट खबरों की पहले से जारी बाढ़ के बीच व्हाट्सअप पर चैनल का स्क्रीनशॉट तेजी से घूमने लगा।
एकाएक जिस तरह हड़बड़ी में खबर चली उससे दोगुनी तेजी से उसे रोका गया।
अटलजी हैं, खबरदार! कोई गैरजरूरी फुर्ती नहीं! न्यूजरूम में संपादकों की तगड़ी झाड़ उन रिपोर्टरों के लिए सबक थी जो औपचारिक घोषणा से पूर्व सीमा लांघने की हद तक चले गए थे।
इस क्षणभर की ‘ब्रेकिंग’ में करोड़ों दिलों के टूटने की तीखी समवेत गड़गड़ाहट सुनी जा सकती थी।
क्या है अटल बिहारी वाजपेयी होने का अर्थ! और उनके न होने से क्या अंतर पड़ता है! अरसे से निश्चेष्ट अटल जी कुछ भी तो नहीं कर रहे थे! फिर उन्हें लेकर ऐसी संवेदनशीलता..
पिछले लोकसभा चुनाव में मतदान कर चुकी और 2019 के आम चुनाव में मतदान के लिए कमर कसती युवा भारत की नई खेप ने शायद पहली बार यह महसूस किया।
इस संवेदनशीलता में ही किसी के ‘अटलजी’ होने का अर्थ छिपा है।
यदि क्षेत्र, भाषा, कुनबे पर पलता और सामाजिक दरारों को गहरा करने वाला राजनैतिक फलक क्रूरता, कपट और हल्केपन की ऊंची लहरों में मदमत्त होता दीखे तो अटल जी के सदन-संदर्भ दिए जाते हैं। सियासत के समुद्र में राह दिखाने वाला अविचल प्रकाश स्तंभ।

 
भारत की मिट्टी में जन्म लेने वाले सौभाग्यशाली राजनेताओं में ऐसे बिरले ही हैं जो अपनी कला, संस्कृति और साहित्य से निरंतर जुड़े रहकर अपनी राजनीति के चक्रव्यूहों के बीच भी अपनी लेखनी को विराम नहीं देते। उदारमना एवं कर्मठ राजनेता के रूप में श्री अटल बिहारी वाजपेयी की छवि एक कुशल राजनेता, दूरदृष्टा तथा कालजयी कवि की रही। उनका विराट व्यक्तित्व विश्वव्यापी एवं सर्वसमावेशक था। यदि कहें कि उनकी अद्भुत वक्तृत्व शैली की धूम पूरे देश में है तो इसमें रंच मात्र अतिश्योक्ति नहीं। साथ ही वैश्विक मुद्दों पर भारत की कूटनीतिक दृढ़ता को रेखांकित करने वाले पहले भारतीय राजनेता भी अटल जी थे, यह मानना होगा।
गंभीर से गंभीर विषय को हल्के-फुलके और विनोदी अंदाज में कहने के बावजूद उसकी मारकता और गंभीरता को साधे रखने के उनके अनोखे अंदाज का कोई सानी नहीं। स्वतंत्रता के बाद भारत के इतिहास में शायद ही कोई राजनेता होगा जो इतने लम्बे समय तक राजनीति के केन्द्र में सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ कायम है। इसे अटल जी के संवाद कौशल का कमाल ही कहेंगे कि उनका छोटे से छोटा कथन भी खबर बनता रहा। जब भी वे बोलते जनसमुदाय के दिलों को जीत लेते। उनके रचनात्मक दृष्टिकोण एवं कुशल संवादों से संसद में बहस की गरिमा बढ़ी और इसका स्तर ऊंचा हुआ। लाखों की भीड़ को संबोधित करते समय भी जनता की नब्ज पकड़कर चलना एवं उसे बांधे रखने का मानो कोई मंत्र उनके पास रहता हो।
लेखन कर्म से अपनी जीवन यात्रा शुरू करने वाले अटल जी के जीवन के हर पड़ाव पर संघर्षशीलता एवं उतार-चढ़ाव दिखता है। अटल जी को कुशल वक्ता की कला एवं काव्य कला अपने पिताजी पं. कृष्णबिहारी वाजपेयी से विरासत में मिली। उनके पिताजी तत्कालीन समय में ग्वालियर राज्य के विख्यात कवि तथा कुशल वक्ता थे। अटल जी के बाबा भी संस्कृति के मूर्धन्य विद्वान थे, परन्तु अटल जी की वाणी पर जिस प्रकार साक्षात सरस्वती विराजती रहीं वह अध्यवसाय से अर्जित उपलब्धि से इतर ईश्वरप्रदत्त कृपा अनुभव होती है।
क्या थे अटलजी? एक बार किसी पत्रकार ने कौतुकवश पूछ लिया था- अटलजी यह शब्द आपकी जिव्हा पर आते कैसे हैं? क्या कोई दिव्य प्रेरणा?
उत्तर में अटलजी किसी बच्चे की तरह शरमा गए, सकुचा गए और विषय बदलने का इंतजार करने लगे।
संवाद कौशल एवं अपनी भाषण कला के लिए अटलजी विख्यात एवं श्रोताओं में अति लोकप्रिय रहे। गूढ़ राजनय, कठिन अर्थशास्त्र और जटिल सामयिक विषयों का जैसा सरल विवेचन या प्रतिपादन अटल जी की शब्दावली में हुआ वह विषय के पंडितों के लिए भी कठिन है।

 
क्या थे अटलजी? ओर-छोर देखकर परिभाषित कर सकना कठिन है। उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड के निर्माता अटलजी। ऑपरेशन शक्ति (पोखरण -2) परमाणु परीक्षण करवा कर दुनिया में भारत को नए सिरे से प्रतिष्ठा दिलाने वाले अटलजी। चंद्रयान -1 परियोजना की मंजूरी देने वाले अटलजी। देश को जमीन पर, हवा में, तरंगों में, नदियों में, सड़कों में, जुड़ाव और एकजुटता देने वाले अटलजी। राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना शुरु करने वाले अटलजी। 'सागरमाला परियोजना' की शुरुआत करने वाले अटलजी। देश को गोल्डन चतुर्भुज देने वाले अटलजी। उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम गलियारे को साकार करने वाले अटलजी। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना वाले अटलजी। दिल्ली मेट्रो परियोजना लाने वाले अटलजी। डॉ भूपेन हजारिका सेतु निर्माण कराने वाले करने वाले अटलजी। जम्मू और बारामूला रेल लिंक और 'चेनाब ब्रिज' देने वाले अटलजी। रक्षा खुफिया इकाई, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैसी संस्थाओं का सृजन करने वाले अटलजी। सूचना प्रौद्योगिकी में भारत को उत्कर्ष पर ले जाने वाले अटलजी। सर्व शिक्षा अभियान देने वाले अटलजी। प्रवासी भारतीय सम्मान शुरु करने वाले अटलजी। कारगिल युद्ध के समय देश को विजयी नेतृत्व देने वाले अटलजी। कहां तक याद करें।
और उससे भी पहले कितनों को याद है अटलजी का विदेशमंत्रित्व काल? कार्टर की भारत यात्रा कई लोगों को याद होगी। लेकिन मोशे दायन भी तब भारत आए थे, तब शायद पहली बार इस्राइल के किसी शीर्ष नेता ने भारत की यात्रा की थी। भारत ईरान का भी मित्र था और इस्राइल का भी। चीनी हेकड़ी तब भी थी, और यह अटलजी ही थे, जो वियतनाम पर चीनी हमले के विरोध में यात्रा अधूरी छोड़ कर लौट आए थे।
अटल जी का व्यक्तित्व इतना व्यापक है कि उन पर कई पुस्तकें लिखी जा सकती हैं, लिखी भी गई हैं। परन्तु उन पर लिखे गये लेख में उनमें विद्यमान कालजयी कवि की चर्चा न करना, उनके व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। उनकी कविताओं को पढ़कर विश्वास नहीं होता कि कोई राजनेता इतना उत्कृष्ट कवि हो सकता है। उनकी कविताओं में राष्ट्रप्रेम, जीवन संघर्ष, विश्व शांति एवं राजनेता के रूप में उनके मन के अंदर की उथल-पुथल का बखूबी वर्णन है। जब उन्होंने लिखा-
‘खड़े देहली पर हो किसने पौरुष को ललकारा,
किसने पापी हाथ बढ़ाकर मां का मुकुट उतारा?’
तब वे राजनीतिक व्यक्तित्व की बजाय योद्धा की तरह राष्ट्र के दुश्मनों को चुनौती देते हुए ललकार रहे थे। एक दूसरी कविता में लम्बे संघर्ष के बाद मिली आजादी की सुरक्षा के लिए नसीहत देते हुए उन्होंने कहा था--
‘उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जायें, जो खोया उसका ध्यान करें।’
भारत के आत्मसम्मान की अक्षुण्णता के लिए उन्होंने लिखा-
‘दांव पर सब कुछ लगा है रुक नहीं सकते हैं,
टूट सकते हैं, मगर हम झुक नहीं सकते हैं।’
अटल जी की उक्त कविताओं को देखकर लगता है कि मानों वे कोई वीर रस के कवि हों। लेकिन जब हम उनकी एक अन्य कविता ‘अपने ही मन से कुछ बोलें’ पर नजर डालते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि मानो कोई दार्शनिक लिख रहा है एवं कविता के माध्यम से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का संदेश दे रहा है। यह कविता बहुत मर्मस्पर्शी है एवं मानव जीवन की यात्रा का वृतांत इसमें वर्णित है। अपनी अंतरचेतना में झांकने एवं उसका आत्मावलोकन करने का खूबसूरत संदेश भी इसमें निहित है। पूरे जीवन चक्र का निचोड़ इस कविता में किस तरह सम्मिलित है यह कविता की निम्न पंक्तियों से समझा जा सकता है:-
क्या खोया, क्या पाया जग में,
मिलते और बिछड़ते मग में,
मुझे किसी से नहीं शिकायत,
यद्यपि छला गया पग-पग में,
एक दृष्टि बीती पर डालें,
यादों की पोटली टटोलें।
पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी,
जीवन एक अनन्त कहानी,
पर तन की अपनी सीमाएं,
यद्यपि सौ शरदों की वाणी,
इतना काफी है अंतिम
दस्तक पर खुद दरवाजा खोलें।
जन्म-मरण का अविरत फेरा,
जीवन बंजारों का डेरा,
आज यहां, कल कहां कूच है,
कौन जानता, किधर सवेरा,
अंधियारा आकाश असीमित,
प्राणों के पंखों को तोलें।
अपने ही मन से कुछ बोलें।
कुल मिलाकर चाहे एक कुशल संगठक की भूमिका हो, चाहे मंजे हुए राजनेता की, सहृदय कालजयी कवि या फिर अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक की, अटल जी जैसा कोई दूसरा नहीं है। यह अटल जी की अभूतपूर्व मेधा का ही परिणाम है कि उन्हें विरोधी और दूसरी पार्टियों में वही सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त है जो अपनी पार्टी के शीर्ष नेता होने के कारण अपनी पार्टी में प्राप्त है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दूरदृष्टा, दृढ़ निश्चयी, अविचल और प्रखर प्रतिभा के धनी, अटल जी के व्यक्तित्व को हम परखते हैं तो उनका व्यक्तित्व सबसे ऊंचाई पर व्यक्तित्व की पराकाष्ठा को छूता नजर आता है। आजकल की चरित्रहनन, कीचड़ उछालने वाली राजनीति से दूर साफ-सुथरी छवि एवं व्यापक व्यक्तित्व तथा राष्ट्र के गौरव को शिखर पर पहुंचाने के लिए समर्पित रहने को हमेशा तत्पर रहने वाले बिरले राजनेताओं में उनको शीर्ष स्थान प्राप्त है। अटल जी सत्ता के लिए सिद्घान्तों से समझौता न करने एवं वैचारिक स्वतंत्रता की परम्परा के संवाहक हैं। उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने से इस विश्वास की पुष्टि होती है कि संस्कारित व्यक्ति कितने ही ऊंचे पद पर क्यों न पहुंच जाय, अपने सद्गुणों को कभी नहीं छोड़ता।
उन्होंने लिखा था- हिन्दू तन मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय।
अपने शब्दों की ही तरह अटलजी भी शाश्वत हैं, भारत माता अपने ऐसे सपूतों को हमेशा याद रखती है। अटलजी साक्षात शब्द थे। कवित्व का शब्द, हुंकार का शब्द, राष्ट्र का शब्द, आशा का शब्द, भारतीयता का शब्द, विश्वास का शब्द, प्रेम का शब्द... ।
कहते हैं शब्द ब्रम्ह है। वह शब्द ही ब्रह्मलीन हुआ है। उस महामानव की अमिट-अटल स्मृति तो यहीं, हम सबके मानस में अंकित हैं।