विराट व्यक्तित्व के 'अटल' खलती रहेगी कमी

महाराज जनक को विदेह क्यों कहा जाता था? वे विदेह इसलिए थे कि सांसारिक माया में जुड़े रहने के बावजूद कहीं न कहीं वीतरागी भी थे..अटल बिहारी वाजपेयी भी कुछ ऐसे ही थे..वीतरागी, विदेह..

साल 1996, मई महीने की एक तारीख...लोकसभा में अपनी सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर हुई चर्चा का प्रधानमंत्री जवाब दे रहे थे...अपनी परिचित भाव -भंगिमा में ओजस्वी भाषण जारी था.. इसी बीच अपने परिचित विराम के बाद उन्होंने एक बात कह डाली..‘ पूरा सदन कहता है कि अटल जी अच्छे हैं..उन्होंने विराम लिया..और पूरे सदन का समवेत स्वर गूंज उठा... ‘हां-हां’समवेत स्वर थमने के बाद प्रधानमंत्री का अगला वाक्य था,‘ सदन कहता है गलत पार्टी में अच्छा आदमी’सदन में फिर समवेत गूंज उठी, ‘हां-हां’सदन की आवाज थमी नहीं कि प्रधानमंत्री ने सदन के सामने यक्ष प्रश्न उछाल दिया, ‘तो यह सदन बताए कि वह अच्छे अटल के लिए क्या करने जा रहा है?’और में समवेत गान करने वाले सदन में इस सवाल के जवाब में सन्नाटा छा गया..1996 में 162 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बनने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी अछूत बनी रही..उसे सिर्फ शिवसेना का ही साथ मिला और मजबूरन विपक्ष की नज़र में गलत पार्टी का अच्छा आदमी चुनावी राजनीति की भेंट चढ़ गया। सिर्फ तेरह दिन की ही सरकार चल पाई।वाजपेयी विश्वासमत भले नहीं जीत पाए, लेकिन उन्होंने देश का दिल जीत लिया था। दो दिन तक चली संसद की बहस को देख देश ने मान लिया कि अजातशत्रु राजनेता को जबरदस्ती सत्ता से दूर रखा गया। इसके बाद इतिहास बदलना ही था और इतिहास बदलने में सिर्फ दो साल का ही वक्त लगा..1996 में जिस भारतीय जनता पार्टी के साथ आने से लोग हिचकते रहे, 1998 में उसका साथ देने वालों की कतार लग गई।लोकतंत्र के सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बाद एक झटके में ही उससे बाहर कर दिया जाना, अच्छे-अच्छों को हिला सकता है। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी अलग ही मिट्टी के बने थे। निस्पृह और बीत रागी भाव से उन्होंने इस घटना को लिया। हालांकि उन्होंने संघर्ष और कर्तव्य का दामन नहीं छोड़ा।महाराज जनक को विदेह क्यों कहा जाता था? वे विदेह इसलिए थे कि सांसारिक माया में जुड़े रहने के बावजूद कहीं न कहीं वीतरागी भी थे..अटल बिहारी वाजपेयी भी कुछ ऐसे ही थे..वीतरागी, विदेह...विदेह और वीतरागी की दुनिया क्योंकर दुश्मन होने लगी..राजनीति की दुनिया में वे अजातशत्रु ही थे..उनके विपक्षी थे, विरोधी भी थे, लेकिन शत्रु कोई नहीं था..वे मतभेद की बात तो करते थे..मतभेद लोकतांत्रिक राजनीति का आभूषण होता है..लेकिन वाजपेयी मनभेद को स्वीकार नहीं करते थे..इसीलिए लाख हंगामों के बीच जब भी वे सदन में बोलने के लिए खड़े होते, पूरा सदन शांत होकर उन्हें सुनता था..लोकतांत्रिक राजनीति में राजनेता की कामयाबी का एक पैमाना उसके प्रति लोकमान्यता भी होती है। लोक उससे कितना स्नेह करता है, यह भी उसकी सफलता के सोपानों को मापने का मानदंड होता है। अटल संभवत: भारतीय राजनीति के आखिरी नेता रहे, जिन्हें व्यापक लोक मान्यता हासिल रही..लोक के स्नेहभाजक तो वे ताजिंदगी रहे।आखिर यह लोक स्नेह की योग्यता आती कहां से है?1996 की ही घटना याद कीजिए। तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने संयुक्त मोर्चा गठबंधन के नेता हरदनहल्ली डोड्डेगौड़ा देवेगौड़ा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना उचित नहीं समझा था..उन्होंने संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए सबसे बड़ी पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने के लिए बुलाया था..इससे संयुक्त मोर्चा में शामिल दल बहुत नाराज थे...दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में जहां आज स्पीकर और डिप्टी स्पीकर हॉल की एनेक्सी बनी है, वहां तब मैदान हुआ करता था..वाजपेयी को राष्ट्रपति के बुलावे के ठीक बाद मई की उस झुलसती सांझ को उस मैदान में संयुक्त मोर्चा के नेताओं का जमघट लगा था..तमिल मनिला कांग्रेस के नेता जीके मूपनार और पी चिदंबरम, जनता दल के नेता लालू यादव, शरद यादव, जयपाल रेड्डी, इंद्रकुमार गुजराल, देवेगौड़ा और रामबिलास पासवान और मुलायम सिंह यादव मंच पर अपनी भावी सरकार से दूर किए जाने की खीझ निकाल रहे थे..उनकी अगुआई कर रहे थे तत्कालीन राजनीति के चाणक्य मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता हरकिशन सिंह सुरजीत और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एबी वर्धन।इस मंच से रामबिलास पासवान ने तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा की जमकर लानत-मलामत की...वाजपेयी के बारे में भी अशोभन बातें की गईं।आज के दौर में ऐसी आलोचनाएं बड़े से बड़े राजनेता भी झेल नहीं पाते..लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी अलग ही मिट्टी के बने थे। उनकी सरकार गिरने के बाद देवेगौड़ा की अगुआई में सरकार बनी और रामबिलास पासवान ने उसमें मंत्री पद की शपथ ली..शपथ समारोह में शामिल होने के बाद वाजपेयी ने रामबिलास से जिस तरह की ठिठोली की, वह जाहिर करने के लिए काफी था कि उन्होंने रामबिलास की बातों को संकीर्ण सोच वाले राजनेता की तरह नहीं, बल्कि एक विपक्षी की भड़ास के रूप में लिया था..भारतीय राजनीति में गठबंधन तो पहले भी बने, लेकिन किसी ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया। ऐसे माहौल में वाजपेयी ने अपने उदार और विराट व्यक्तित्व के सहारे ना सिर्फ गठबंधन चलाया, बल्कि उसे सफल भी बनाया। जयललिता के 1999 में उठाए कदम को छोड़ दें तो वाजपेयी के सहयोगी उनकी अगुआई में काम करने में गर्व का ही अनुभव करते रहे।भारतीय राजनीति में माना जाता है कि संयुक्त मोर्चा 1996 में ही बना और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन भी। लेकिन यह अर्धसत्य है। 1984 में भी ये दोनों गठबंधन बने थे। कांग्रेस के खिलाफ गठित तब के संयुक्त मोर्चा गठबंधन में चंद्रजीत यादव की जनवादी पार्टी, देवराज अर्स की कांग्रेस अर्स, हेमवंतीनंदन बहुगुणा की लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी और चंद्रशेखर की जनता पार्टी शामिल थी। वहीं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में चौधरी चरण सिंह की अगुआई वाली दलित मजदूर किसान पार्टी और भारतीय जनता पार्टी शामिल थे। ये दोनों गठबंधन आपसी बातचीत कर ही रहे थे कि इंदिरा गांधी की दुखद हत्या हो गई और वाजपेयी के प्रखर नेतृत्व को देखने से देश वंचित रह गया।वाजपेयी ने देश में स्वीकार्यता की राजनीति को भी बढ़ावा दिया। वे कितने स्वीकार्य थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्रसंघ में कश्मीर का मामला उछाला और उस पर भारत के घिरने की नौबत आई तो तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने उन्हें ही भारतीय प्रतिनिधिमंडल का अगुआ बनाकर भेजा। तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री सलमान खुर्शीद नेता प्रतिपक्ष वाजपेयी के अधीन उस दल में कार्यरत थे। आमतौर पर ऐसे प्रतिनिधिमंडलों की अगुआई मंत्री ही करते हैं। वाजपेयी देश और प्रधानमंत्री की अपेक्षाओं पर खरे उतरे और उऩ्होंने पाकिस्तान को जोरदार पटखनी दी। इसके बाद जब वाजपेयी देश लौटे तो सारे प्रोटोकॉल को दरकिनार करके प्रधानमंत्री नरसिंह राव उनका स्वागत करने हवाई अड्डे पहुंच गए थे।समन्वय की राजनीति जितनी वाजपेयी ने की है, बहुत कम ही राजनेताओं ने की है। अगर कहें कि भारतीय समन्वय की राजनीति के वाजपेयी शिखर पुरूष थे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।दलगत राजनीति और दलीय पक्षपात से उपर वाजपेयी की राजनीति ही थी कि उन्हें सर्वमान्य बनाती थी। इसीलिए उनका व्यक्तित्व विराट था। बेशक शारीरिक रूप से पिछले कुछ वर्षों से वे अक्षम थे, लेकिन लगातार संकीर्ण होती राजनीतिक मान्यताओं के बीच वे समन्वय की राजनीति के प्रेरणा पुरूष थे। उनकी कमी इस मोर्चे पर देश को लगातार खलती रहेगी। 

साल 1996, मई महीने की एक तारीख...लोकसभा में अपनी सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर हुई चर्चा का प्रधानमंत्री जवाब दे रहे थे...अपनी परिचित भाव -भंगिमा में ओजस्वी भाषण जारी था.. इसी बीच अपने परिचित विराम के बाद उन्होंने एक बात कह डाली..‘ पूरा सदन कहता है कि अटल जी अच्छे हैं..

उन्होंने विराम लिया..और पूरे सदन का समवेत स्वर गूंज उठा... ‘हां-हां’

समवेत स्वर थमने के बाद प्रधानमंत्री का अगला वाक्य था,

‘ सदन कहता है गलत पार्टी में अच्छा आदमी’

सदन में फिर समवेत गूंज उठी, ‘हां-हां’

सदन की आवाज थमी नहीं कि प्रधानमंत्री ने सदन के सामने यक्ष प्रश्न उछाल दिया, ‘तो यह सदन बताए कि वह अच्छे अटल के लिए क्या करने जा रहा है?’

और में समवेत गान करने वाले सदन में इस सवाल के जवाब में सन्नाटा छा गया..

1996 में 162 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बनने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी अछूत बनी रही..उसे सिर्फ शिवसेना का ही साथ मिला और मजबूरन विपक्ष की नज़र में गलत पार्टी का अच्छा आदमी चुनावी राजनीति की भेंट चढ़ गया। सिर्फ तेरह दिन की ही सरकार चल पाई।

वाजपेयी विश्वासमत भले नहीं जीत पाए, लेकिन उन्होंने देश का दिल जीत लिया था। दो दिन तक चली संसद की बहस को देख देश ने मान लिया कि अजातशत्रु राजनेता को जबरदस्ती सत्ता से दूर रखा गया। इसके बाद इतिहास बदलना ही था और इतिहास बदलने में सिर्फ दो साल का ही वक्त लगा..1996 में जिस भारतीय जनता पार्टी के साथ आने से लोग हिचकते रहे, 1998 में उसका साथ देने वालों की कतार लग गई।

लोकतंत्र के सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बाद एक झटके में ही उससे बाहर कर दिया जाना, अच्छे-अच्छों को हिला सकता है। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी अलग ही मिट्टी के बने थे। निस्पृह और बीत रागी भाव से उन्होंने इस घटना को लिया। हालांकि उन्होंने संघर्ष और कर्तव्य का दामन नहीं छोड़ा।

महाराज जनक को विदेह क्यों कहा जाता था? वे विदेह इसलिए थे कि सांसारिक माया में जुड़े रहने के बावजूद कहीं न कहीं वीतरागी भी थे..अटल बिहारी वाजपेयी भी कुछ ऐसे ही थे..वीतरागी, विदेह...

विदेह और वीतरागी की दुनिया क्योंकर दुश्मन होने लगी..राजनीति की दुनिया में वे अजातशत्रु ही थे..उनके विपक्षी थे, विरोधी भी थे, लेकिन शत्रु कोई नहीं था..वे मतभेद की बात तो करते थे..मतभेद लोकतांत्रिक राजनीति का आभूषण होता है..लेकिन वाजपेयी मनभेद को स्वीकार नहीं करते थे..इसीलिए लाख हंगामों के बीच जब भी वे सदन में बोलने के लिए खड़े होते, पूरा सदन शांत होकर उन्हें सुनता था..

लोकतांत्रिक राजनीति में राजनेता की कामयाबी का एक पैमाना उसके प्रति लोकमान्यता भी होती है। लोक उससे कितना स्नेह करता है, यह भी उसकी सफलता के सोपानों को मापने का मानदंड होता है। अटल संभवत: भारतीय राजनीति के आखिरी नेता रहे, जिन्हें व्यापक लोक मान्यता हासिल रही..लोक के स्नेहभाजक तो वे ताजिंदगी रहे।

आखिर यह लोक स्नेह की योग्यता आती कहां से है?1996 की ही घटना याद कीजिए। तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने संयुक्त मोर्चा गठबंधन के नेता हरदनहल्ली डोड्डेगौड़ा देवेगौड़ा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना उचित नहीं समझा था..उन्होंने संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए सबसे बड़ी पार्टी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने के लिए बुलाया था..

इससे संयुक्त मोर्चा में शामिल दल बहुत नाराज थे...

दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में जहां आज स्पीकर और डिप्टी स्पीकर हॉल की एनेक्सी बनी है, वहां तब मैदान हुआ करता था..वाजपेयी को राष्ट्रपति के बुलावे के ठीक बाद मई की उस झुलसती सांझ को उस मैदान में संयुक्त मोर्चा के नेताओं का जमघट लगा था..

तमिल मनिला कांग्रेस के नेता जीके मूपनार और पी चिदंबरम, जनता दल के नेता लालू यादव, शरद यादव, जयपाल रेड्डी, इंद्रकुमार गुजराल, देवेगौड़ा और रामबिलास पासवान और मुलायम सिंह यादव मंच पर अपनी भावी सरकार से दूर किए जाने की खीझ निकाल रहे थे..उनकी अगुआई कर रहे थे तत्कालीन राजनीति के चाणक्य मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता हरकिशन सिंह सुरजीत और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एबी वर्धन।

इस मंच से रामबिलास पासवान ने तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा की जमकर लानत-मलामत की...वाजपेयी के बारे में भी अशोभन बातें की गईं।

आज के दौर में ऐसी आलोचनाएं बड़े से बड़े राजनेता भी झेल नहीं पाते..लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी अलग ही मिट्टी के बने थे। उनकी सरकार गिरने के बाद देवेगौड़ा की अगुआई में सरकार बनी और रामबिलास पासवान ने उसमें मंत्री पद की शपथ ली..शपथ समारोह में शामिल होने के बाद वाजपेयी ने रामबिलास से जिस तरह की ठिठोली की, वह जाहिर करने के लिए काफी था कि उन्होंने रामबिलास की बातों को संकीर्ण सोच वाले राजनेता की तरह नहीं, बल्कि एक विपक्षी की भड़ास के रूप में लिया था..

भारतीय राजनीति में गठबंधन तो पहले भी बने, लेकिन किसी ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया। ऐसे माहौल में वाजपेयी ने अपने उदार और विराट व्यक्तित्व के सहारे ना सिर्फ गठबंधन चलाया, बल्कि उसे सफल भी बनाया। जयललिता के 1999 में उठाए कदम को छोड़ दें तो वाजपेयी के सहयोगी उनकी अगुआई में काम करने में गर्व का ही अनुभव करते रहे।

भारतीय राजनीति में माना जाता है कि संयुक्त मोर्चा 1996 में ही बना और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन भी। लेकिन यह अर्धसत्य है। 1984 में भी ये दोनों गठबंधन बने थे। कांग्रेस के खिलाफ गठित तब के संयुक्त मोर्चा गठबंधन में चंद्रजीत यादव की जनवादी पार्टी, देवराज अर्स की कांग्रेस अर्स, हेमवंतीनंदन बहुगुणा की लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी और चंद्रशेखर की जनता पार्टी शामिल थी। वहीं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में चौधरी चरण सिंह की अगुआई वाली दलित मजदूर किसान पार्टी और भारतीय जनता पार्टी शामिल थे। ये दोनों गठबंधन आपसी बातचीत कर ही रहे थे कि इंदिरा गांधी की दुखद हत्या हो गई और वाजपेयी के प्रखर नेतृत्व को देखने से देश वंचित रह गया।

वाजपेयी ने देश में स्वीकार्यता की राजनीति को भी बढ़ावा दिया। वे कितने स्वीकार्य थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्रसंघ में कश्मीर का मामला उछाला और उस पर भारत के घिरने की नौबत आई तो तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने उन्हें ही भारतीय प्रतिनिधिमंडल का अगुआ बनाकर भेजा। तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री सलमान खुर्शीद नेता प्रतिपक्ष वाजपेयी के अधीन उस दल में कार्यरत थे। आमतौर पर ऐसे प्रतिनिधिमंडलों की अगुआई मंत्री ही करते हैं। वाजपेयी देश और प्रधानमंत्री की अपेक्षाओं पर खरे उतरे और उऩ्होंने पाकिस्तान को जोरदार पटखनी दी। इसके बाद जब वाजपेयी देश लौटे तो सारे प्रोटोकॉल को दरकिनार करके प्रधानमंत्री नरसिंह राव उनका स्वागत करने हवाई अड्डे पहुंच गए थे।

समन्वय की राजनीति जितनी वाजपेयी ने की है, बहुत कम ही राजनेताओं ने की है। अगर कहें कि भारतीय समन्वय की राजनीति के वाजपेयी शिखर पुरूष थे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

दलगत राजनीति और दलीय पक्षपात से उपर वाजपेयी की राजनीति ही थी कि उन्हें सर्वमान्य बनाती थी। इसीलिए उनका व्यक्तित्व विराट था। बेशक शारीरिक रूप से पिछले कुछ वर्षों से वे अक्षम थे, लेकिन लगातार संकीर्ण होती राजनीतिक मान्यताओं के बीच वे समन्वय की राजनीति के प्रेरणा पुरूष थे। उनकी कमी इस मोर्चे पर देश को लगातार खलती रहेगी।