लोकमंगल के गायक तुलसी दास के जन्मदिन दिवस पर विशेष
   दिनांक 17-अगस्त-2018
राम अनादि हैं, राम अनंत हैं, लोक के भी हैं वे और सृष्टि के...भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में राम सर्वत्र व्याप्त हैं। किसी से कुशलक्षेम जानना हो तो राम-राम, अगर किसी से कोई अनर्थ हुआ तो राम-राम, अफसोस हुआ तो हे राम, हैरत हुई तो हाय राम, दुर्गंध हुई तो व्यंजना में राम-राम और अंत हुआ तो राम-नाम सत्य...ऐसे में अगर हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक रामचंद्र शुक्ल राम के अनहद भक्त और गायक तुलसीदास की प्रतिष्ठा करते हैं तो क्या वे कोई नया कदम उठाते हैं?
अपने निबंध संग्रह त्रिवेणी में जब तुलसीदास की प्रतिष्ठा करने की कोशिश रामचंद्र शुक्ल करते हैं तो दरअसल वे भारतीय संस्कृति में सहज रूप से सर्वव्यापी राम का गुणगान नहीं करते, बल्कि राम की व्यापकता को भक्तिरस की धारा में डूबाकर देश में नवचेतना का नवसंस्कार भरने वाले तुलसीदास की महिमा को स्थापित कर रहे होते हैं। तुलसी दास लोकमंगल के कवि हैं। भारतीय धारा भी सर्वे भवंतु सुखिन:,सर्वे संतु निरामया: की अवधारणा में विश्वास करने वाली रही है। मुगलकाल के दौरान इस्लामिक अत्याचार से अधिसंख्य प्रजा हिंदू समाज पर बेटी, रोटी और चोटी तीनों पर खतरा बढ़ गया था। मुगलिया हरम में शामिल करने के लिए भारती सुंदरता प्राथमिक शर्त थी। ऐसे में अधिसंख्य हिंदू समाज की कुलशीलाएं सुरक्षित नहीं थीं।
मुगल काल को कुछ इतिहासकार भले ही भारतीय गुलामी काल का स्वर्ण युग बताते रहे हों, लेकिन यह भी हकीकत है कि उस दौर में हिंदू प्रजा पर कभी जजिया तो कभी ऐसे ही दूसरे कर लगाकर उनके रोजगार और कमाई को या तो सीमित किया जा रहा था या फिर उन पर भारी कर का बोझ लगाकर सल्तनत का खजाना भरा जा रहा था। धर्म पर जो संकट था, उसके प्रत्यक्ष प्रमाण आज भी अयोध्या, मथुरा और काशी जैसे हिंदुओं के प्रमुख तीर्थ स्थल और वहां के प्रमुख मंदिरों की प्राचीरें दे ही रही हैं।
ऐसे माहौल में राम को सहारा बनाकर तुलसीदास मैदान में उतरते हैं और राम के जरिए भारतीय चेतना को पुष्ट ही नहीं करते, बल्कि वे भारतीयता की धारा को पुनर्जीवित भी करते हैं। उस धारा को जहां मर्यादा पर जोर रहा है, जिसमें पति, पुत्र, पिता, राजा, सामान्य नागरिक से लेकर स्त्री, रानी, पत्नी, पुत्री आदि सभी रिश्तों की अपनी मर्यादित भूमिकाएं रही हैं। तुलसी प्रत्यक्ष रूप से भले ही इसकी घोषणा न करते, लेकिन अपनी काव्यधारा से वे यह स्थापित करने की कोशिश जरूर करते हैं कि इसी मर्यादित धारा के ही जरिए पहले समाज, फिर राज्य और फिर समूची मानवता का भला हो सकता है। रामचंद्र शुक्ल का तुलसी का यह रूप सबसे ज्यादा आकर्षित करता है और फिर उनकी प्रतिष्ठा करते हुए उन्हें लोकमंगल का गायक घोषित करते हैं।
 
तुलसीदास की व्याप्ति और प्रतिष्ठा की बात करना अब बेमानी है। उनकी काव्यचेतना और काव्य सौष्ठव की प्रतिष्ठा का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा, कि रामचरित मानस किसी धीरोदात्त नायक की जीवनी मात्र नहीं है, बल्कि वह करोड़ों लोगों का प्रेरणा स्रोत है, दुख-दलिद्दर दूर कराने का दैवीय मंत्र है। सनातन व्यवस्था में धार्मिक कर्मकांड, पूजा-पाठ, दैवीय आवाहन का माध्यम संस्कृत भाषा है। लेकिन उस परंपरा में ठेठ अवधी के ग्रंथ रामचरित मानस का पैठ बनाना, और घर-घर में पूजनीय बनना बड़ी उपलब्धि है। छायावाद के महत्वपूर्ण कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जीवन कबीर के सहज फक्कड़पना से प्रभावित है। लेकिन उनकी चेतना तुलसी से जबरदस्त प्रभावित है। निराला ने तुलसीदास पर पूरे 100 पदों की कविता ही लिखी है, तुलसीदास। तुलसी की रचनाधर्मिता में वे लोक और देश चेतना किस तरह देखते हैं, इसे समझने के लिए यह उदाहरण काफी है-
जागो, जागो आया प्रभात,
बीती वह, बीती अन्ध रात,
झरता भर ज्योतिर्मय प्रपात पूर्वाचल
बाँधो, बाँधो किरणें चेतन,
तेजस्वी, है तमजिज्जीवन,
आती भारत की ज्योर्धन महिमाबल।
वे समाज का आवाहन करते हैं, तुलसी दास की रचनाधर्मिता जाग उठी है। आप भी जागो, अब सुबह होने वाली है, अंधेरी रात बीत गई है। तुलसी की रचनाधर्मिता का सोता फूट पड़ा है। अब उसे थामने का वक्त है, उस प्रतिभा से प्रस्फुटित ज्योति को थामने है, जो बहुत ही तेजस्वी है, जो भारत के मौजूदा अंधकार को खत्म करेगी..भारतीय महिमा को स्थापित करेगी।
यह कम बड़ी हैरत की बात नहीं है कि रामचंद्र शुक्ल ने चूंकि छायावाद को खारिज कर दिया था, इसलिए निराला से उनकी नहीं पटती थी। शुक्ल के खिलाफ उन्होंने मजाक उड़ाते हुए कविता ही लिख डाली थी, बचुआ एफए फेल है। लेकिन क्या सहज संयोग है कि तुलसी को लेकर दोनों के विचार एक हैं।
तुलसी के रामचरित मानस की एक-एक पंक्ति अगर आज सूक्त वाक्य, प्रेरक पंक्तियों के तौर पर उद्धृत की जाती है तो इसकी बड़ी वजह यह है कि उन्हें रचते समय तुलसी ने अपनी श्रद्धा और भक्ति के साथ ही जीवन संघर्ष से उपजे अनुभवों को निचोड़ कर समाहित कर दिया है। कैसे यह संभव हो पाया, इसे वे खुद जाहिर करते हैं,
सिया राम मय सब जग जानी। करहुं परनाम जोरि जुग पानी।
यानी तुलसी के लिए समूची मानवता एक हो उठती है। तभी वे सबके हित की बात करते हैं और उसका जरिए राम को बनाते हैं।
हिंदी के वयोवृद्ध आलोचक नामवर सिंह आलोचक प्रवर रामचंद्र शुक्ल का सम्मान तो करते हैं, लेकिन वे भक्तिकाल को आम जन की बजाय साहित्यिक पाठकों, आलोचकों का विचार मानते हैं। अपने एक निबंध में उन्होंने लिखा है, सामान्य जनता कबीर, सूर और तुलसी को जानती है, किसी भक्तिकाल को नहीं।
नामवर का यह कथन एक हद तक ठीक ही है। जनमानस के बीच हिंदी की मध्यकालीन काव्य परंपरा को लेकर कहावत ही रही है,
सूर, सूर, तुलसी-ससि, उड्गन केशवदास
अब के कवि खद्योत सम,
जहं-तहं करत परकास..
यानी हिंदी काव्य आकाश में सूरदास सूर्य हैं तो तुलसी चंद्रमा और केशवदास तारे हैं। बाकी आज के कवि जुगनूं जैसे हैं, जो भक् से कहीं-कहीं हल्का-सा प्रकाश करते हैं। हालांकि इस स्थापना पर भी हिंदी समाज में व्यापक बहस हुई है कि सूरदास और तुलसी दास में श्रेष्ठ कौन है। उपमान, रचनाधर्मिता, लोकचेतना और वैचारिक प्रकीर्णता की प्रखरता में देखें तो तुलसी, सूरदास की तुलना में आगे ही दिखते हैं। बहरहाल इन पंक्तियों के लेखक का मानना है कि दोनों महाकवियों में इस की तुलना होनी ही नहीं चाहिए।
भारतीयता का मूल मंत्र लोकमंगल का गायन ही रहा है। अगर अपनी सभ्यता को हम पांच हजार साल पुराना ही मान लें तो आप देखेंगे कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह चेतना हमारे जीन में चली रही है। तात्कालिक कारणों से संघर्ष भी हुआ तो उसका भी व्यापक आधार लोकमंगल ही रहा। तुलसी इसी लोकमंगल के गायक हैं, राम इस प्रक्रिया में उनके सहयोगी हैं, कभी आराध्य के रूप में तो कभी विचारक के रूप में तो कभी शासक के रूप में..इसीलिए तुलसी के राम घर-घर में लोकप्रिय हैं।
राजा के कर्तव्य को लेकर तुलसी से पहले चाणक्य भी बहुत कुछ कह गए हैं, शुक्रनीति तो राजधर्म का ग्रंथ हैं। हजारों साल तक भारतीय मनीषा ने राजधर्म पर बहुत कुछ विचारा है, उसे लिखा है। लेकिन जब भी राजधर्म की चर्चा होती है, तुलसी की यह पंक्ति ही उद्धृत की जाती है,
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी।।
तुलसी का रामराज आज तो दुनिया के देशों के लिए आदर्श राज्य के रूप में स्वीकार किया जाने लगा है। पश्चिम के विचारक प्लेटो ने भी आदर्श राज्य की कल्पना की है। लेकिन वह तुलसी के रामराज के सामने फीका है। गांधी भी तुलसी के ही रामराज को आजाद भारत की शासन व्यवस्था का आधार बनाना चाहते थे,
दैहिक, दैविक,भौतिक तापा। रामराज काहुहि नहीं व्यापा।।
तुलसी की महत्ता को तो रामचंद्र शुक्ल स्वीकार कर ही चुके हैं। उन्हें मिर्जापुर के अपने गांव में वह जीवन सुख और आनंद नहीं मिला, जो उन्हें बाहर नौकरियां करते हुए मिला। मानसिक तौर पर प्रिय संयोग उन्हें इतना प्रीतिकर लगा कि इसका आधार उन्होंने तुलसी के राम में ही ढूंढ़ लिया। वनवास के दौरान राम को वन की प्रकृतिलीला किस तरह प्यारी लगती है, उसे तुलसी ने ऐसे अभिव्यक्ति दी है,
अवध सहस सम वन प्रिय लागा।
यह तब का वर्णन है, जब पंचवटी में राम कुटी बनाकर सिया और लक्ष्मण संग रह रहे हैं। उस वक्त प्रकृति प्रेम और सिय साहचर्य में वे इतना डूब गए हैं कि वे कह पड़ते हैं कि हजारों अयोध्या जैसा मुझे यह वन प्रिय लग रहा है। तुलसी की जिंदगी भी तो उबड़-खाबड़ ही रही। तुलसी जब राम के मुख से ऐसा कहलाते हैं तो दरअसल वे अपना संन्यासधर्म और उससे उपजे निर्वासन के सुख को अभिव्यक्ति देते हैं।
लेकिन आधुनिक रचनाकारों ने भी तुलसी के बहाने खुद को खूब अभिव्यक्त किया है। आम जनजीवन तो खैर ऐसा करता ही है। तुलसी की भावुकता  शीर्षक निबंध में अवध सहस सम वन प्रिय लागा की व्याख्या करते हुए आचार्य शुक्ल लिखते हैं, सीता जब राम के साथ वन गईं, तब उन्हें प्रिय के साथ सहयोग से अधिक अवसर मिले। अपनी पुस्तक आचार्य रामचंद्र शुक्ल: आलोचना के नए मानदंड में आलोचक भवदेव पांडेय लिखते हैं, पंडित रामचंद्र शुक्ल को जिस प्रकार अपने रमई पट्टी वाले घर की अपेक्षा अधिक सुख प्रकृति-पर्यटन करते हुए कल्पित प्रेयसी के साहचर्य से मिलता था, लगभग वैसा ही सुख वन में राम और सीता को मिलता था।
हिंदी के दूसरे बड़े आलोचक हजारी प्रसाद द्विवेदी वैसे तो प्रभावित कबीर से थे। उन्होंने हिंदी साहित्य का जो इतिहास लिखा, उसका आधार उन्होंने कबीर की रचनाधर्मिता को बनाया, लेकिन जब वाराणसी के प्रबुद्ध समाज ने उन्हें प्रताड़ित किया तो अपनी दर्द की अभिव्यक्ति का जरिया तुलसी को ही बनाया। अपने एक निबंध में वे लिखते हैं, तुलसी गुसाईं भयो, मोंडे के दिन भूलि गयो । हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रखर शिष्य नामवर सिंह 1961 में प्रकाशित अपने एक निबंध में इस तथ्य को रेखांकित करने से नहीं भूलते।
अव्वल तो होना चाहिए था कि लोकव्याप्ति के गायक तुलसी का प्रगतिशील धारा उचित मूल्यांकन करती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनकी कुछ पंक्तियां, मसलन, ढोल, गंवार, शूद्र, पसु, नारी। सकल ताड़न के अधिकारी  को लेकर आलोचना के घेरे में रखा गया। उन्हें खारिज करने की कोशिश हुई। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अध्यक्ष और हिंदी के सर्वाधिक प्रगतिशील कथाकार प्रेमचंद तुलसी की महत्ता को वर्णनातीत मानते थे। अपनी पत्रिका हंस के जुलाई 1933 के अंक में प्रेमचंद ने लिखा,
तुलसीदास ने हिंदू जाति और हिंदू धर्म का जो उपकार किया है, उसका वर्णन करने को बहुत स्थान चाहिए। उन्होंने हिंदू सभ्यता और हिंदू संस्कृति की बड़ी रक्षा की है। हिंदू समाज और हिंदू साहित्य उनके उपकार से कभी मुक्त नहीं हो सकता है।
आज का हंस, प्रेमचंद के हंस से ही अपनी नाभिनाल को जुड़ा मानता है। लेकिन वह प्रेमचंद के इस वक्तव्य से शायद ही इत्तेफाक रखता होगा।
भारत की सुप्त चेतना को जगाने वाले तुलसीदास राजधर्म,राष्ट्रधर्म, प्रजाधर्म और इन सबसे बढ़कर मानवधर्म की बात करने वाले संभवत: पहले और आखिरी कवि हैं। आलोचनाएं होती रहेंगी, अपने-अपने नजरिए से उनकी रचनाधर्मिता का मूल्यांकन होता रहेगा। लेकिन एक तथ्य अक्षुण्ण रहेगा..मानवता का यह अहर्निश गायक और पहले की तुलना में और मजबूती से हमारे हृदयों में स्थान बनाता रहेगा।