ममता के साथ मिलकर देश को धोखा दे रही कांग्रेस

 

भूटान और बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे असम में पिछली सदी के अस्सी के दशक जैसे आंदोलनकारी हालात तो नहीं हैं, अलबत्ता उसी दौर के एक मुद्दे ने राज्य ही नहीं, पड़ोसी पश्चिम बंगाल तक को मौका दे दिया है। राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में शामिल होने से रह गए 40 लाख लोगों को लेकर ममता बनर्जी इतनी आहत हैं कि उन्हें इससे देश में गृहयुद्ध की आशंका तक दिखने लगी है।

राजनीतिक स्वार्थ के चलते अपनी जिम्मेदारियां भूलीं ममता

भारतीय संविधान के प्रति शपथ ले चुकी ममता बनर्जी अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए अपना दायित्व भूल गईं हैं। देश में गृहयुद्ध की स्थिति होने जैसा बयान देना उस जिम्मेदारी का अपमान है, जो वे संवैधानिक शपथ के बाद निभा रही हैं।

कांग्रेस की ओछी राजनीति

एनआरसी मुदृदे पर कांग्रेस भी ओछी राजनीति कर रही है। राजीव गांधी ने इस रजिस्टर को अपडेट करने और 24 मार्च 1971 की आधी रात के बाद आए लोगों को चिन्हित करके देश से बाहर निकालने का समझौता किया था। कांग्रेस का शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता होगा, जिस दिन वह अपने नेता की शहादत और राष्ट्र सेवा की दुहाई नहीं देती होगी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में अपडेट हो रहे राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर पर सबसे ज्यादा सवाल वही उठा रही है। इस वजह से संसद के दोनों सदनों में सामान्य कामकाज तक नहीं हो पा रहा है।

बाहरी बिगाड़ रहे असम का जनसांख्यिकी संतुलन

असम की बराक घाटी के जिलों की जनसांख्यिकी में हाल के वर्षों में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है। 2001 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक धुबरी जिले में 79.67, बारपेटा में 70.74, दारंग में 64.34, हैलाकंडी में 60.31, करीमगंज में 56.36, नगांव में 55.36, मोरीगांव में 52.56, बोंगईगांव में 50.22 और गोलपाडा में 57.52 फीसद मुस्लिम हैं। सबसे चौंकाने वाली बढ़ोतरी तो 1991 से 2001 के बीच हुई। इस दौरान हिंदुओं की आबादी में जहां 10.9 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी हुई, वहीं मुस्लिम आबादी में 29.59 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। जनसांख्यिकी में इसी विस्तार से उपजा डर ही था कि असम में पहले छिटपुट और बाद में संगठित विरोध बढ़ा। असमिया और गैर असमिया को लेकर राज्य में विरोध तो आजादी के तुरंत बाद 50 के दशक में ही शुरू हो गया था। इसकी वजह बना था देश विभाजन के बाद बांग्लादेश जा चुके लोगों का फिर से वापस आना। यह आना-जाना इतना बढ़ा कि इस पर विवाद हुआ, फिर असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर बनाया गया। इसी दौरान घर-घर जाकर एक-एक व्यक्ति से जुड़ी बुनियादी जानकारी जुटाई गई और उसे उन व्यक्तियों की नागरिकता के दस्तावेज के लिए इस्तेमाल किया। इसके बाद यह दस्तावेज संबंधित जिला अधिकारियों और उप जिलाधिकारियों के दफ्तरों में रखवा दिया गया। बाद में इसे केंद्रीय गृहमंत्रालय को सौंप दिया गया।

देश के विभाजन से पहले ही हो रही असम में घुसपैठ

असम में सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ आज से नहीं हो रही है। 1931 में तत्कालीन जनगणना अधीक्षक सीएस मुल्लन ने लिखा था कि पिछले 25 वर्षों से पूर्वी बंगाल से मुसलमान जमीन के लालच में जिस तरह असम में चले आ रहे हैं उससे प्रदेश की संस्कृति एवं समाज का तानाबाना ध्वस्त हो जाएगा। 1947 के बाद बड़ी संख्या में पूर्वी पाकिस्तान से हिंदुओं का पलायन हुआ। बंगलादेश इंस्टीटयूट आॅफ डेवेलपमेंट स्टडीज ढाका के अनुसार 1951 से 1961 के बीच करीब 35 लाख लोग पूर्वी पाकिस्तान से गायब हो गए। इस संस्था के अनुसार 1961 से 1974 के बीच भी करीब 15 लाख लोग भारत में आकर बसे। बंगलादेश चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में भी कुछ दिलचस्प तथ्य हैं 1991 में वहां 6 करोड़ 21 लाख 81 हजार 745 मतदाता थे लेकिन जब 1995 में सत्यापन किया गया तो 61 लाख 65 हजार 567 नाम मतदाता सूची से काटने पड़े, क्योंकि उनके बारे में आयोग को कुछ पता नहीं लगा। 1996 में आयोग को दोबारा 1 लाख 20 हजार लोगों के नाम मतदाता सूची से काटने पड़े। सबसे ज्यादा बंगलादेशी असम और पश्चिम बंगाल आए। इसके अलावा वे बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, मुंबई और राजस्थान आदि राज्यों में भी बड़ी संख्या में फैल गए। बंगलादेशियों की घुसपैठ को लेकर सीमा प्रबंधन पर गठित टास्क फोर्स प्रमुख रहे माधव गोडबोले ने में अधिकारिक आंकड़े पेश किए थे, केंद्र सरकार को अगस्त 2000 में दी गई रिपोर्ट में उन्होंने बताया था कि 1.5 करोड़ बंगलादेशी भारत में अवैध रूप से घुस चुके हैं।

1971 के युद्ध के बाद स्थितियां और बिगड़ी

असमिया और गैर असमिया को लेकर विभेद 1971 के युद्ध के बाद ज्यादा बढ़ा। भारत से हार के बाद पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए और दुनिया के नक्शे पर बंगलादेश का उदय हुआ। एक अनुमान के मुताबिक युद्ध के दौरान करीब दस लाख बांग्लादेशी असम आए और युद्ध खत्म होने के बाद करीब नौ लाख लौट गए। लेकिन एक लाख पीछे रह गए। इसके बाद उन्हें भी वापस लौटाने की मांग बढ़ी। इस मांग को लेकर आंदोलन पिछली सदी के अस्सी के दशक में इसलिए तेज हुआ, क्योंकि बराक घाटी के सभी नौ जिलों में मुस्लिम जनसंख्या में तेज बढ़ोतरी शुरू हुई। इसके बाद ही बांग्लाभाषियों के विरोध में आवाजें उठने लगीं। ये आवाजें बाद में संगठित होती गई और देखते ही देखते छात्र आंदोलन का हिस्सा बन गई। ऑल असम छात्र यूनियन के बैनर तले यह आंदोलन देखते ही देखते हिंसक हो गया। यह इतना हिंसक बना कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए संसदीय चुनावों में राज्य की सभी 14 सीटों पर चुनाव कराने की हिम्मत चुनाव आयोग नहीं जुटा पाया। आजाद भारत का यह पहला मौका था, जब असम और पंजाब में चुनाव नहीं हुए।

 

आज कांग्रेस को इस बात से आपत्ति हो रही है कि राज्य के 40 लाख लोग नागरिकता रजिस्टर में शामिल होने से रह गए हैं। हो सकता है इसमें कुछ खामियां हो लेकिन दिलचस्प है कि यह मांग कांग्रेस के ही नेता राजीव गांधी ने ही स्वीकार की थी। 14 अगस्त 1985 को उन्होंने असम के छात्र नेताओं से जो समझौता किया था, उसमें 24 मार्च 1971 की आधी रात के बाद भारत आए घुसपैठियों को बाहर निकालना था। इस समझौते की घोषणा उन्होंने अगले दिन लाल किले की प्राचीर से दिए अपने पहले भाषण में की थी। कांग्रेस के लोगों को वह भाषण एक बार फिर पढ़ लेना चाहिए।

दुखद है कि कायदे से उन्हीं दिनों इस पर काम शुरू हो जाना चाहिए था। लेकिन कांग्रेस को इसमें दिलचस्पी नहीं थी, क्योंकि उसके वोट बैंक पर खतरा बढ़ सकता था। लेकिन समझौते के बाद छात्रावास से सीधे सत्ता में पहुंचे छात्र नेताओं प्रफुल्ल कुमार महंत और भृगु फूकन तक ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई। दिलचस्पी बाद की सरकारों और केंद्र सरकार ने भी नहीं दिखाई। दिलचस्प यह है कि 2005 में सत्ता में आई कांग्रेस ने भी इस कार्य को करने के लिए असम से वादा किया था। लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही तरूण गोगोई ने इस मामले को टालना शुरू कर दिया लेकिन जब लगा कि इसे लेकर असम एक बार फिर आतंकवाद की ओर बढ़ सकता है तो 2005 में इस पर काम शुरू हुआ, लेकिन फिर विवाद शुरू हो गया। तब यह मामला 2013 में सुप्रीम कोर्ट में गया और उसके आदेश पर ही राष्ट्रीय नागरिकता प्राधिकरण ने इस पर काम शुरू किया। जिसके लिए केंद्र सरकार ने 1220 करोड़ रूपए दिए हैं।

सवाल यह है कि जब यह पूरी कार्यवाही सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही है, जिस पर कोर्ट अब तक करीब 40 सुनवाई कर चुका है, तब कांग्रेस और ममता बनर्जी संसद को क्यों ठप कर रही हैं? अगर उन्हें कोई एतराज है तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट में जाना चाहिए था।

चुनाव शास्त्र के मुताबिक अल्पसंख्यक मतदाता एकजुट होते हैं और थोक वोट बैंक की तरह होते हैं। ममता बनर्जी और कांग्रेस को लगता है कि राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर से बाहर रह गए करीब 40 लाख मतदाताओं में से ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के हैं। दोनों को लगता है कि उनकी बात करना एक साथ इतने बड़े थोक वोट बैंक के समर्थन की गारंटी हो सकता है। लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि अब बहुसंख्यक समुदाय उनकी इस चाल को समझने लगा है। जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ सकता है।