हर दृष्टि से संपन्न हो भारत यह था अटल जी का सपना

- हृदयनारायण दीक्षित

वरिष्ठ नेता मुलायम सिंह ने अटलजी पर टिप्पणी की। संयोग से कुछ समय बाद अटल जी लखनऊ आए। लखनऊ के कार्यकर्ताओं ने उनसे पूछा कि क्या हम लोग भी मुलायम सिंह की निन्दा करें? अटल जी ने हंसते हुए कहा कि उनकी महफिल में हमारे चर्चे हैं तो आप लोगों को ईर्ष्या क्यों हो रही है? सब लोग हंसते रहे। अटल जी किसी की भी निन्दा नहीं चाहते थे।

असंभवो का संभवन। अटल बिहारी वाजपेयी। अटल और बिहारी एक साथ। ईशावास्योपनिषद् के एक मंत्र में परमतत्व अति गतिशील और स्थिर दृढ़ बताया गया है। यहां स्थिरता और गतिशीलता एक साथ है। आगे बताते हैं कि वह बहुत दूर है,अति दूर। लेकिन हमारे भीतर भी। उपनिषद् के इसी भाव का संगमन हैं-अटल बिहारी वाजपेयी। भावप्रवण कवि, सरल-तरल-भावुक हृदय के बावजूद राजनीति के भावहीन क्षेत्र में गति। राष्ट्रभाव की गाढ़ी अनुभूति वाले साहित्यकार-पत्रकार। जैसे मधुमय शब्द प्रयोग के जादूगर वैसे ही आचार-व्यवहार में सबके प्रति आत्मीय। अकेले में भी किसी की निन्दा नहीं। एक समय वरिष्ठ नेता मुलायम सिंह ने अटलजी पर टिप्पणी की। संयोग से कुछ समय बाद अटल जी लखनऊ आए। लखनऊ के कार्यकर्ताओं ने उनसे पूछा कि क्या हम लोग भी मुलायम सिंह की निन्दा करें? अटल जी ने हंसते हुए कहा कि उनकी महफिल में हमारे चर्चे हैं तो आप लोगों को ईर्ष्या क्यों हो रही है? सब लोग हंसते रहे। अटल जी किसी की भी निन्दा नहीं चाहते थे। आपातकाल भारतीय इतिहास का काला अध्याय है। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी राष्टÑवादी कार्यकर्ताओं पर आक्रामक थीं। अटल जी ने सभी गैरकांग्रेसी दलों को एक मंच पर लाने का काम किया था। भारतीय जनसंघ ने अटल जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय दल होने के बावजूद तमाम दलों को एक ही चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया। 1977 के चुनाव में केन्द्र में सरकार बनी। अटल जी विदेश मंत्री बने। 1977 में नई दिल्ली के प्रगति मैदान में भारतीय जनसंघ का अधिवेशन हुआ। अटल जी ने जनसंघ के विसर्जन का प्रस्ताव रखा। वे दीनदयाल जी का नाम लेकर कई बार रोये। उन्होंने रोते हुए कहा, आज जनसंघ का विसर्जन प्रस्ताव रखते समय दीनदयाल जी याद आ रहे हैं। उन्होंने जनसंघ बनाया। कार्यकर्ता गढ़े, जनसंघ को खून-पसीने से सींचा। आज राष्ट्रीय आवश्यकता है इसलिए हम जनसंघ को विसर्जित करने और जनता पार्टी में विलय का प्रस्ताव रख रहे हैं। पं. दीनदयाल उपाध्याय और ऐसे तमाम नेता व संगठक जो आज नहीं हैं, हमारे लिए सदा-सर्वदा पाथेय रहेंगे। उस समय अटल जी लगातार रो रहे थे। सभी उपस्थित कार्यकर्ता भी रो रहे थे और इन पंक्तियों का लेखक भी। अटल जी जनसंघ के संस्थापक सदस्य थे। जनसंघ विसर्जित हो गया। जनता पार्टी का अंग हो गया। हम सब कार्यकर्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा के प्रति स्वाभाविक ही निष्ठावान थे। जनसंघ मूल के कार्यकर्ताओं पर दोहरी सदस्यता के आरोप लगे। अटल जी ने एक विशाल सभा में चुटकी ली, हमसे प्यार किया, सम्बंध बनाए, सम्बंधों का लाभ उठाया। अब पूछते हैं कि आपका गोत्र क्या है? कौन नहीं जानता कि हमारा गोत्र संघ है। उन्होंने जनता पार्टी से अलग होने का निर्णय लिया। उनके नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी बनी। उन्होंने घोषणा की अंधेरा छटेगा, सूर्य उगेगा, कमल खिलेगा।भारत को परमाणु शक्ति सम्पन्न बनाना अटल जी का मुख्य एजेण्डा था। तमाम विदेशी दबावों को नजरंदाज करते हुए उन्होंने परमाणु परीक्षण किया। उन्होंने संसद में देश की प्राथमिकता बताई, परमाणु परीक्षण सम्बंधी हमारे निर्णय की एकमात्र कसौटी राष्ट्रीय सुरक्षा ही है। हमने किसी अन्तरराष्ट्रीय करार का उल्लंघन नहीं किया है। परमाणु परीक्षण किसी देश के विरुद्ध भय उत्पन्न करने अथवा आक्रमण करने के लिए नहीं है। यह आत्म सुरक्षा के लिए है। इस सम्बंध में प्रख्यात नेता चन्द्रशेखर के कथन पर अटल जी की टिप्पणी ध्यान देने योग्य है। अटल जी ने कहा, मुझे खेद है कि मैं आपके विचारों से सहमत नहीं हूं। वे भारत को हरेक दृष्टि से सम्पन्न बनाना चाहते थे। ‘परमवैभवं नेतु मेतत् स्वराष्ट्रं’ उनकी प्रतिज्ञा थी। इसलिए परमाणु परीक्षण को लेकर प्रतिबंध लगाने वाली नीति के सामने भी अटल, अटल ही रहे। भारत का स्वाभिमान और सम्मान ही उनकी वरीयता थी। वे किसी भी परिस्थिति में दबाव में नहीं आए। उन्होंने कहा कि हमने दुनिया से स्वयं आगे आकर परमाणु अस्त्र का अपनी ओर से पहले प्रयोग न करने का वायदा किया है। हम यह सब किसी दबाव या प्रभाव में नहीं कर रहे हैं। हम ऐसा इसलिए कर रहे हैं कि विश्व शांति और निरस्त्रीकरण में हमारी गहरी आस्था है। सेकुलरवाद के खोल में अल्पसंख्यकवाद चलाने की राजनीति पर वे मुखर थे। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद व्याख्यान माला (1992) में उन्होंने कहा था, स्वतंत्रता के लगभग 4 दशक बाद ‘सेकुलर’ शब्द राजनैतिक वाद-विवाद का प्रमुख विषय बन गया है। सेकुलर शब्द का अर्थ है क्या? इस पर मतैक्य नहीं है। जिसे एक दल सेकुलर कहता है उसे दूसरा दल नकली सेकुलर कहता है। ऐसी नोकझोक प्राय: ही होती है। उन्होंने धर्म और रिलीजन/मजहब का अंतर बताया, रिलीजन (मजहब) कुछ निश्चित आस्थाओं से होता है। जब तक कोई व्यक्ति उनको मानता है तब तक वह रिलीजन या मजहब का सदस्य रहता है। उन आस्थाओं को छोड़ते ही वह बहिष्कृत हो जाता है। धर्म वस्तुत: जीने का तरीका है। धर्म देशकाल से नहीं बंधा है। ऐसे ही संसद में साम्प्रदायिकता के आरोप पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी, पहले साम्प्रदायिकता की परिभाषा तय होनी चाहिए। यह साम्प्रदायिकता है क्या? मा.स. गोलवलकर उपाख्य श्री गुरुजी ने राष्ट्र से भिन्न और अलग सामूहिक अस्मिता को साम्प्रदायिकता कहा था। हिन्दू स्वयं को राष्ट्र से भिन्न अस्मिता नहीं मानते। अटल जी का दर्शन भी यही था। अटल जी ने श्रीराम जन्मभूमि को राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति बताया था। हिन्दुत्व अटल जी की दृष्टि में राष्ट्रीयता का पर्याय है। उनकी कविता ‘तन मन हिन्दू मेरा परिचय’ बेहद लोकप्रिय हुई थी। वे भारत की प्रकृति, संस्कृति, रीति-नीति व दर्शन के धारक हैं। वे विश्व में हिन्दू जीवन के उदात्तभाव लेकर गए। वे भारतीयता के पर्याय, मूर्तिमान जीवंत विश्व मानव थे। अथर्ववेद में दृढ़ निश्चयी कार्यकर्ता की गति बताई गई है-वह उठा। पूर्व दिशा की ओर चला। वृहत्साम रथंतर साम-गान उसके पीछे चले। उसकी कीर्ति बढ़ी। वह दक्षिण चला। ऋद्धि-सिद्धि-समृद्धि उसके साथ चली। वह उत्तर चला। सोम-देव आदि उसके साथ चले। वह अविचल-अटल खड़ा रहा। देव शक्तियों ने उसे आसन दिया। उसने धु्रव दिशा की ओर गति की। भूमि और वनस्पतियां उसके अनुकूल हुईं। वह कालगति के अतिक्रमण में चला। काल ने उसका अनुसरण किया। वह दृढ़निश्चयी चलता रहा। इतिहास और पुराण उसके साथ हो गए-इतिहास च पुराणं च गाथाश्च अनुव्य चलन। अटल जी भी इतिहास पुरुष, पुराण पुरुष हैं। इतिहास ने उन्हें अपने हृदय में स्थान दिया। शरीर का क्या,यह क्षण भंगुर है। अटल सत्य है-जो आता है, सो जाता है। लेकिन अटल जी का जीवन सतत् प्रवाही है। राष्ट्र के लिए ही जन्म और जीवन की संपूर्ण गति असंभव है। अटल जी का जीवन असंभव का संभव है-संभवामि युगे युगे। वे प्रतिपल हमारे साथ हैं,भारत की धरती और आकाश में प्रतिपल स्पंदित हैं। भारत के अणु-परमाणु में उनका कृतित्व और विचार रच-बस गया है। वे हमारा मूल-उत्स और हमारी जीवन गंगा का गोमुख हैं। उन्हें अतीत में सोचना व्यर्थ है। वे नित्य वर्तमान हैं-अटल वर्तमान और गतिशील वर्तमान भी। हम भारत के लोगों के मध्य सतत् उपस्थित हैं। प्रतिपल। पल-पल। (लेखक उ.प्र. विधानसभा के अध्यक्ष हैं) 

असंभवो का संभवन। अटल बिहारी वाजपेयी। अटल और बिहारी एक साथ। ईशावास्योपनिषद् के एक मंत्र में परमतत्व अति गतिशील और स्थिर दृढ़ बताया गया है। यहां स्थिरता और गतिशीलता एक साथ है। आगे बताते हैं कि वह बहुत दूर है,अति दूर। लेकिन हमारे भीतर भी। उपनिषद् के इसी भाव का संगमन हैं-अटल बिहारी वाजपेयी। भावप्रवण कवि, सरल-तरल-भावुक हृदय के बावजूद राजनीति के भावहीन क्षेत्र में गति। राष्ट्रभाव की गाढ़ी अनुभूति वाले साहित्यकार-पत्रकार। जैसे मधुमय शब्द प्रयोग के जादूगर वैसे ही आचार-व्यवहार में सबके प्रति आत्मीय। अकेले में भी किसी की निन्दा नहीं। एक समय वरिष्ठ नेता मुलायम सिंह ने अटलजी पर टिप्पणी की। संयोग से कुछ समय बाद अटल जी लखनऊ आए। लखनऊ के कार्यकर्ताओं ने उनसे पूछा कि क्या हम लोग भी मुलायम सिंह की निन्दा करें? अटल जी ने हंसते हुए कहा कि उनकी महफिल में हमारे चर्चे हैं तो आप लोगों को ईर्ष्या क्यों हो रही है? सब लोग हंसते रहे। अटल जी किसी की भी निन्दा नहीं चाहते थे।

आपातकाल भारतीय इतिहास का काला अध्याय है। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी राष्टÑवादी कार्यकर्ताओं पर आक्रामक थीं। अटल जी ने सभी गैरकांग्रेसी दलों को एक मंच पर लाने का काम किया था। भारतीय जनसंघ ने अटल जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय दल होने के बावजूद तमाम दलों को एक ही चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया। 1977 के चुनाव में केन्द्र में सरकार बनी। अटल जी विदेश मंत्री बने। 1977 में नई दिल्ली के प्रगति मैदान में भारतीय जनसंघ का अधिवेशन हुआ। अटल जी ने जनसंघ के विसर्जन का प्रस्ताव रखा। वे दीनदयाल जी का नाम लेकर कई बार रोये। उन्होंने रोते हुए कहा, आज जनसंघ का विसर्जन प्रस्ताव रखते समय दीनदयाल जी याद आ रहे हैं। उन्होंने जनसंघ बनाया। कार्यकर्ता गढ़े, जनसंघ को खून-पसीने से सींचा। आज राष्ट्रीय आवश्यकता है इसलिए हम जनसंघ को विसर्जित करने और जनता पार्टी में विलय का प्रस्ताव रख रहे हैं। पं. दीनदयाल उपाध्याय और ऐसे तमाम नेता व संगठक जो आज नहीं हैं, हमारे लिए सदा-सर्वदा पाथेय रहेंगे। उस समय अटल जी लगातार रो रहे थे। सभी उपस्थित कार्यकर्ता भी रो रहे थे और इन पंक्तियों का लेखक भी। अटल जी जनसंघ के संस्थापक सदस्य थे। जनसंघ विसर्जित हो गया। जनता पार्टी का अंग हो गया। हम सब कार्यकर्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा के प्रति स्वाभाविक ही निष्ठावान थे। जनसंघ मूल के कार्यकर्ताओं पर दोहरी सदस्यता के आरोप लगे। अटल जी ने एक विशाल सभा में चुटकी ली, हमसे प्यार किया, सम्बंध बनाए, सम्बंधों का लाभ उठाया। अब पूछते हैं कि आपका गोत्र क्या है? कौन नहीं जानता कि हमारा गोत्र संघ है। उन्होंने जनता पार्टी से अलग होने का निर्णय लिया। उनके नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी बनी। उन्होंने घोषणा की अंधेरा छटेगा, सूर्य उगेगा, कमल खिलेगा।

भारत को परमाणु शक्ति सम्पन्न बनाना अटल जी का मुख्य एजेण्डा था। तमाम विदेशी दबावों को नजरंदाज करते हुए उन्होंने परमाणु परीक्षण किया। उन्होंने संसद में देश की प्राथमिकता बताई, परमाणु परीक्षण सम्बंधी हमारे निर्णय की एकमात्र कसौटी राष्ट्रीय सुरक्षा ही है। हमने किसी अन्तरराष्ट्रीय करार का उल्लंघन नहीं किया है। परमाणु परीक्षण किसी देश के विरुद्ध भय उत्पन्न करने अथवा आक्रमण करने के लिए नहीं है। यह आत्म सुरक्षा के लिए है। इस सम्बंध में प्रख्यात नेता चन्द्रशेखर के कथन पर अटल जी की टिप्पणी ध्यान देने योग्य है। अटल जी ने कहा, मुझे खेद है कि मैं आपके विचारों से सहमत नहीं हूं। वे भारत को हरेक दृष्टि से सम्पन्न बनाना चाहते थे। ‘परमवैभवं नेतु मेतत् स्वराष्ट्रं’ उनकी प्रतिज्ञा थी। इसलिए परमाणु परीक्षण को लेकर प्रतिबंध लगाने वाली नीति के सामने भी अटल, अटल ही रहे। भारत का स्वाभिमान और सम्मान ही उनकी वरीयता थी। वे किसी भी परिस्थिति में दबाव में नहीं आए। उन्होंने कहा कि हमने दुनिया से स्वयं आगे आकर परमाणु अस्त्र का अपनी ओर से पहले प्रयोग न करने का वायदा किया है। हम यह सब किसी दबाव या प्रभाव में नहीं कर रहे हैं। हम ऐसा इसलिए कर रहे हैं कि विश्व शांति और निरस्त्रीकरण में हमारी गहरी आस्था है।

 

सेकुलरवाद के खोल में अल्पसंख्यकवाद चलाने की राजनीति पर वे मुखर थे। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद व्याख्यान माला (1992) में उन्होंने कहा था, स्वतंत्रता के लगभग 4 दशक बाद ‘सेकुलर’ शब्द राजनैतिक वाद-विवाद का प्रमुख विषय बन गया है। सेकुलर शब्द का अर्थ है क्या? इस पर मतैक्य नहीं है। जिसे एक दल सेकुलर कहता है उसे दूसरा दल नकली सेकुलर कहता है। ऐसी नोकझोक प्राय: ही होती है। उन्होंने धर्म और रिलीजन/मजहब का अंतर बताया, रिलीजन (मजहब) कुछ निश्चित आस्थाओं से होता है। जब तक कोई व्यक्ति उनको मानता है तब तक वह रिलीजन या मजहब का सदस्य रहता है। उन आस्थाओं को छोड़ते ही वह बहिष्कृत हो जाता है। धर्म वस्तुत: जीने का तरीका है। धर्म देशकाल से नहीं बंधा है। ऐसे ही संसद में साम्प्रदायिकता के आरोप पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी, पहले साम्प्रदायिकता की परिभाषा तय होनी चाहिए। यह साम्प्रदायिकता है क्या? मा.स. गोलवलकर उपाख्य श्री गुरुजी ने राष्ट्र से भिन्न और अलग सामूहिक अस्मिता को साम्प्रदायिकता कहा था। हिन्दू स्वयं को राष्ट्र से भिन्न अस्मिता नहीं मानते। अटल जी का दर्शन भी यही था।

अटल जी ने श्रीराम जन्मभूमि को राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति बताया था। हिन्दुत्व अटल जी की दृष्टि में राष्ट्रीयता का पर्याय है। उनकी कविता ‘तन मन हिन्दू मेरा परिचय’ बेहद लोकप्रिय हुई थी। वे भारत की प्रकृति, संस्कृति, रीति-नीति व दर्शन के धारक हैं। वे विश्व में हिन्दू जीवन के उदात्तभाव लेकर गए। वे भारतीयता के पर्याय, मूर्तिमान जीवंत विश्व मानव थे।

अथर्ववेद में दृढ़ निश्चयी कार्यकर्ता की गति बताई गई है-वह उठा। पूर्व दिशा की ओर चला। वृहत्साम रथंतर साम-गान उसके पीछे चले। उसकी कीर्ति बढ़ी। वह दक्षिण चला। ऋद्धि-सिद्धि-समृद्धि उसके साथ चली। वह उत्तर चला। सोम-देव आदि उसके साथ चले। वह अविचल-अटल खड़ा रहा। देव शक्तियों ने उसे आसन दिया। उसने धु्रव दिशा की ओर गति की। भूमि और वनस्पतियां उसके अनुकूल हुईं। वह कालगति के अतिक्रमण में चला। काल ने उसका अनुसरण किया। वह दृढ़निश्चयी चलता रहा। इतिहास और पुराण उसके साथ हो गए-इतिहास च पुराणं च गाथाश्च अनुव्य चलन। अटल जी भी इतिहास पुरुष, पुराण पुरुष हैं। इतिहास ने उन्हें अपने हृदय में स्थान दिया। शरीर का क्या,यह क्षण भंगुर है। अटल सत्य है-जो आता है, सो जाता है। लेकिन अटल जी का जीवन सतत् प्रवाही है। राष्ट्र के लिए ही जन्म और जीवन की संपूर्ण गति असंभव है। अटल जी का जीवन असंभव का संभव है-संभवामि युगे युगे। वे प्रतिपल हमारे साथ हैं,भारत की धरती और आकाश में प्रतिपल स्पंदित हैं। भारत के अणु-परमाणु में उनका कृतित्व और विचार रच-बस गया है। वे हमारा मूल-उत्स और हमारी जीवन गंगा का गोमुख हैं। उन्हें अतीत में सोचना व्यर्थ है। वे नित्य वर्तमान हैं-अटल वर्तमान और गतिशील वर्तमान भी। हम भारत के लोगों के मध्य सतत् उपस्थित हैं। प्रतिपल। पल-पल।

(लेखक उ.प्र. विधानसभा के अध्यक्ष हैं)