लोकतंत्र के साधक 'अटल'
   दिनांक 23-अगस्त-2018
                                                                                                                                                             - एन.एम. घटाटे
अटल जी का जीवन उपलब्धियों का हस्ताक्षर है जिसने भारत के समकालीन इतिहास को गहनता से प्रभावित किया
 
अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने जीवन के 60 से अधिक वर्ष देश सेवा में लगा दिए, जिसमें पांच दशक तक तो वे सांसद रहे। वे एक अद्भुत वक्ता थे, जिनके भाषण को संसद के भीतर और बाहर उनके मित्र और विरोधी ध्यान से सुनते थे। एक सांसद होने के नाते उन्होंने संसद का उपयोग शैक्षणिक मंच के साथ-साथ राजनीतिक हथियार के रूप में किया और संविधान सभा की गरिमा को बढ़ाया। आलोचना या आवश्यकता पड़ने पर चेतावनी मिलने के बावजूद उन्होंने अपने शब्दों में कटौती नहीं की। लेकिन उनकी आलोचना ने उनके विरोधियों को ठेस नहीं पहुंचाई। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने वाजपेयी का उल्लेख ‘हमारे समय के सबसे उत्कृष्ट सांसद’ के रूप में किया है। उनका चुटीला अंदाज और चातुर्य गुणों संसदीय बहस में जैसे जान फूंक देता था। वे अपने इन प्रतिभाओं का प्रयोग दमदार तरीके से करते थे।
दार्शनिक, कवि और राजनेता
वाजपेयी अक्सर पार्टी से ऊपर रहे और राजनीति से अधिक राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी। अपने लंबे संसदीय जीवन के दौरान वे कभी अपनी बात रखने के लिए संसद के ‘वेल’ में नहीं गए और विपक्ष के अच्छे दृष्टिकोण की हमेशा सराहना की। एक प्रधानमंत्री के तौर पर भी उन्होंने अपनी उत्कृष्टता साबित की। उन्होंने प्रतिबंधों की परवाह किए बिना न केवल भारत की सैन्य शक्ति को परमाणु सम्पन्न बनाया, बल्कि उसी समय अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ करीबी दोस्ताना रिश्ते कायम किए। यहां तक कि कारगिल के धोखे के बाद भी जनरल मुशर्रफ की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया और चीन तथा दूसरे पड़ोसी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण रिश्ते स्थापित किए। वे कहा करते थे, ‘‘मैं इतिहास तो बदल सकता हूं, लेकिन भूगोल नहीं बदल सकता।’’
स्वर्णिम चतुर्भुज योजना उनकी घरेलू उपलब्ध्यिों में शामिल है, जिससे गांवों को सड़कों से जोड़ने की शुरुआत की गई। इसके अलावा, चंद्रयान परियोजना, सिंचाई और बाढ़ की समस्या का समाधान निकालने के लिए नदियों को जोड़ना, सस्ती और तेज संचार प्रणाली तथा 4,000 किलोमीटर लंबी तटीय रेखा को जोड़ने के लिए सागरमाला जैसी परियोजनाएं उन्हीं की देन हैं। उन्होंने भारत को खाद्यान्न निर्यातक, बड़ा आउटसोर्सिंग देश और अरबों डॉलर से अधिक विदेशी मुद्रा भंडार देकर समृद्ध किया। हालांकि एक विधि निर्माता के तौर पर उनकी रचनात्मक भूमिका संसद के दस्तावेजों में छिपी हुई है, जिसके बारे में अधिक लोग नहीं जानते। उन्होंने अन्य संसद सदस्यों के तीन या चार विधेयक के मुकाबले 22 विधेयक पेश किए, जिनमें 20 तो विपक्ष में होते हुए पेश किए। वर्तमान और भविष्य के विधि निर्माताओं के लिए यह धु्रवतारा अनुकरणीय है।
वाजपेयी जी ने जितने विधेयक पेश किए उनमें नौ संविधान संशोधन विधेयक थे, जबकि दो भारत के विदेश मंत्री रहते हुए पेश किए। इससे पता चलता है कि देश के लोकतांत्रिक अधिष्ठान को मजबूत करने के लिए वे कितना कुछ करते थे। लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण के प्रति उनकी गहरी सहानुभूति, न्यायपालिका की स्वतंत्रता में विश्वास, चुनावों मं धन बल पर रोक और इन सबके ऊपर कमजोर और अशक्त लोगों के प्रति सद्भावना उनकी खासियत थी।
(लेखक पुस्तक ‘अटल बिहारी वाजपेयी-ए कंस्ट्रक्टिव पार्लियामेंटेरियन’ के संपादक हैं)