ग्वालियर से अटूट रहा अटल जी का नाता
   दिनांक 23-अगस्त-2018
                                                                                                                                                     - श्रीधर पराड़कर 
अटल जी का ग्वालियर से बड़ा लगाव था। उनके बचपन, किशोरावस्था और युवावस्था का साक्षी रहा ग्वालियर। वहां के गली-कूचे, मुहल्ले और घर-घर से उनका परिचय था
 
अटल जी सबके अपने ही थे। जगत विख्यात थे। बलरामपुर से, लखनऊ से चुनाव लड़े। जन्म यमुना किनारे ग्राम बटेश्वर, जिला इटावा, उत्तर प्रदेश में हुआ था फिर भी ग्वालियर को अटल जी और अटल जी को ग्वालियर से जाना जाता रहा। पिताजी नौकरी के चलते ग्वालियर आ गए थे। परिणामस्वरूप अटल जी भी ग्वालियर आ गए। बचपन, कैशोर्य, तरुणाई ग्वालियर में बीती। इस कारण गली-कूचे, मुहल्ले, घर-घर से उनका परिचय रहा। उनका मकान शिन्दे की छावनी मुहल्ले में था, पर अब वह अटल जी वाले मोहल्ले के नाम से जाना जाता है। 1936 में पूजनीय डॉक्टर जी ने संघ कार्य विस्तार हेतु नारायणराव तरटे को ग्वालियर भेजा था। उनके ही हाथों ग्वालियर में संघकार्य वृक्ष का सुदृढ़ रोपण हुआ। उनके संपर्क में आकर अटलजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने। उनमें बहुमुखी प्रतिभा तो थी ही। नारायणराव जी ने पूत के पांव पालने में देख भविष्यवाणी कर दी थी कि यह एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा।
नारायण राव तो अपनी भूमिका पूर्ण कर 1944 में नागपुर लौट गए, पर उनके द्वारा दिए गए संघ संस्कार अटल जी में घर कर गए थे। नारायणराव जी से उनका संपर्क बना रहा। यहां तक कि प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अटल जी नारायणराव जी से मिलने नागपुर गए थे। 

 
अटल जी की प्रारंभिक, माध्यमिक व स्नातक तक की पढ़ाई ग्वालियर में हुई। वकालत की पढ़ाई कानपुर से की।
अटल जी के अनेक रूप ग्वालियर को ज्ञात हैं। उनकी मिष्ठान प्रियता तो सर्वज्ञात है। ग्वालियर का कोई भी निवासी जब उनसे मिलने जाता (प्रधानमंत्री बनने के बाद भी) तो अपने साथ बहादुरों के मोतीचूर के लड्डू ले जाना नहीं भूलता था। बातों में उलझकर अगर वह लड्डू देना भूल जाता तो अटल जी स्वयं पूछ लेते— ‘भाई ग्वालियर से आ रहे हो ना...डिब्बा कहां है?’
मधुमेह का रोग बढ़ जाने पर चिकित्सकों ने मिष्ठान पर रोक लगा दी थी। बाकी मिष्ठान कितना प्रतिबंधित हो सका पता नहीं, पर ग्वालियर के बहादुरा के लड्डू लोग उनके लिए ले जाते रहे और वे खाते रहे। उन्हें सरसंघचालक जी के समीप या कुर्सी पर बैठने के लिए कहा जाता, पर वे सदैव अन्य स्वयंसेवकों के साथ पंक्ति में जमीन पर ही बैठते थे।
विक्टोरिया कॉलेज से उन्होंने बी.ए. किया। भाजपा के पितृ पुरुष और राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। स्व. कुशाभाऊ ठाकरे उनके सहपाठी थे। अंग्रेज सरकार की विरोधी गतिविधियां संयुक्त रूप से करते थे। एक बार अटल जी की ग्वालियर से चुनाव लड़ने की घोषणा हो चुकी थी। अन्तिम समय में कांग्रेस से ग्वालियर राजघराने की लोकप्रियता का लाभ उठाने के निमित्त माधवराव सिंधिया को ग्वालियर से उम्मीदवार बनाया गया। इंदिरा गांधी की लहर थी। अत: दल ने अटल जी को अन्य किसी स्थान से चुनाव लड़ने के लिए कहा। पर अटल जी ने दो स्थानों से खड़े होने पर ग्वालियर छोड़ने से स्पष्ट मना कर दिया। वे ग्वालियर से ही चुनाव लड़े। जैसी संभावना थी, उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। माधवराव चुनाव जीत गए। समय बीतता गया और अटल जी राजनीति की ऊंचाइयां छूते रहे। वे संसद सदस्य रहे, केन्द्रीय मंत्री रहे, जनसंघ, भाजपा के अध्यक्ष रहे। तमाम दायित्व निभाते हुए उनके दिल के एक कोने में ग्वालियर के लिए स्पष्ट प्रेम था।
(लेखक अ.भा. साहित्य परिषद के संगठन मंत्री हैं)