लक्ष्य की ओर बढ़ते कदम

देश में पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने किसानों के समग्र कल्याण के लिए कोई लक्ष्य देशवासियों के सामने रखा है।वह लक्ष्य है अगस्त 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करना। इसे हासिल करने के लिए एक समिति गठित की गई, जिसकी सिफारिशों के आधार पर कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ठोस कार्यनीति अपना रहा है। इसके सकारात्मक परिणाम दिखने लगे हैं

गत वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देशन में कृषि और किसानों की बेहतरी के लिए किए गए प्रयासों के उत्साहजनक और सकारात्मक परिणाम दिखने लगे हैं। मोदी सरकार किसानों के कल्याण के लिए जिस मनोयोग से काम में जुटी है, इससे उनके जीवन में गुणात्मक सुधार आ रहा है। सरकार ने देश के विकास के लिए नई कार्यविधि व पारदर्शी कार्यशैली के नए प्रतिमान रचे हैं। समयबद्ध तरीके से प्रधानमंत्री के कुशल मार्गदर्शन में किसान कल्याण की योजनाओं के पूर्ण क्रियान्वयन के लक्ष्यों को मिशन मोड में परिवर्तित किया गया है। हमारी सरकार ने सुशासन के नये आयामों, नवाचारों एवं सुधारवादी दृष्टिकोण से एक आधुनिक व भविष्योन्मुख भारत की नींव रखी है। साथ ही, वह किसानों के मन में कृषि उन्नति के लिए की गई नई पहलों के प्रति जागरूकता लाने में सफल हुई है। हमने किसानों एवं ग्रामीणों के जीवन स्तर में गुणात्मक परिवर्तन लाने का सतत एवं सशक्त प्रयास किया है। राष्ट्रीय किसान आयोग के अध्यक्ष डॉ. स्वामीनाथन ने 2006 में तत्कालीन सरकार को सौंपी रिपोर्ट में कृषि आधारित सोच के साथ-साथ किसानों के कल्याण पर उचित ध्यान देने की अनुशंसा की थी। यह किसान ही है जो आर्थिक बदलावों में किये गये प्रयासों को महत्वपूर्ण दिशा प्रदान करता है। अत: व्यवस्था में आमूल परिवर्तन हेतु कृषि में फसल उपरांत प्रसंस्करण बाजार एवं इससे संबंधित व्यवस्था पर समुचित ध्यान देना होगा। नैसर्गिक संपदाओं में लगातार क्षरण और जलवायु परिवर्तन को देखते हुए कृषि आयोग ने विज्ञान आधारित प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन, सतत उत्पादन एवं विकास की ओर भी ध्यान देने की बात कही थी। 6 अगस्त, 2018 को डॉ. स्वामीनाथन ने एक अंग्रेजी समाचारपत्र में प्रकाशित अपने लेख में कहा है, ‘‘यद्यपि राष्ट्रीय किसान आयोग की रिपोर्ट 2006 में प्रस्तुत की गई थी, परंतु जब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार नहीं बनी, तब तक इस पर बहुत काम नहीं हुआ था। सौभाग्यवश बीते 4 वर्षों के दौरान किसानों की दशा व आय में सुधार के लिए कई अहम निर्णय लिए गए हैं।’’पिछले 4 वर्षों में देश में कृषि क्षेत्र में विकास, किसानों को उपज का उचित मूल्य दिलाने तथा कृषि उत्पादन लागत में कमी लाने के ढेरों प्रयास किये गये हैं। इन प्रयासों से हमारे जीवन में महत्वपूर्ण सुखदायी परिवर्तन हो रहे हैं। देशव्यापी मृदा स्वास्थ्य परीक्षण कार्ड की शुरुआत इसी सोच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।नाइट्रोजन उपयोग क्षमता को बढ़ाने के लिए और उपयोग की मात्रा तथा इससे जुड़ी लागत को घटाने के लिए सरकार ने कृषि में केवल नीम कोटिड यूरिया के उपयोग को अनिवार्य बनाया है। चूंकि इससे उत्पादकता में सुधार हुआ है और कृषि पर लागत घटी है, जिससे इसके गलत उपयोग और गैर-कृषि क्षेत्र में इसके उपयोग को रोकने में भी मदद मिली है। सतत कृषि विकास एवं मृदा स्वास्थ्य हेतु जैविक खेती को परंपरागत विकास योजना के साथ जोड़ा गया है, जिसमें पुआल का इन-सीटू प्रबंधन भी शामिल है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना लागू होने से कृषि कार्यों में उचित जल प्रबंधन हो सकेगा, सरकार द्वारा उठाया गया यह एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है। सरकार ने पुरानी योजनाओं के विस्तृत अध्ययन के बाद उनमें सुधार किया है तथा इन्हें विश्व की सबसे बड़ी किसान अनुकूल प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना तथा मौसम आधारित फसल बीमा योजना 2016 में शुरू किया है। इसके तहत कृषि क्षेत्र के सभी जोखिमों से सुरक्षा प्रदान की गई है। राष्ट्रीय किसान आयोग ने किसानों की आय बढ़ाने हेतु कई सुधारों की संस्तुति की थी, जिसे आधार मानकर सरकार ने बहुत सारी सुधार योजनाएं लागू की हैं। उसने मॉडल कृषि भूमि पट्टा अधिनियम-2016 राज्यों को जारी किया, जो कृषि सुधारों के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है। इसमें भू-धारकों व लीज प्राप्तकर्ता, दोनों के हितों का ख्याल रखा गया है। बाजार सुधार लागू करने से बाजारों में पारदर्शिता बढ़ी है। देश की राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक ई-मार्केट स्कीम 2016 (ई-नाम) देश के कृषि बाजारों को एक साथ जोड़ती है। सरकार ने देश की 585 कृषि उत्पाद समितियों के अलावा मंडियों के बीच खुले व्यापार को देखते हुए राष्ट्रीय कृषि बाजार की स्थापना की है। 2018 के बजट में, नई बाजार संरचना के बारे में बहुत सारी बातें कही गई हैं, जिसकी बहुत दिनों से आवश्यकता भी थी। छोटे एवं सीमांत किसान छोटी उपज को नजदीकी बाजार में बेच सकें, इसके लिए भी व्यवस्था की गई है। 22,000 ग्रामीण बाजारों का देशभर में फैलाव, ग्रामीण कृषि बाजार के विकास के अंतराल को कम करता है। नया आधारभूत ढांचा, छोटे एवं सीमांत किसान, ए.पी.एम.सी. या ई-नाम से जुड़कर अपनी छोटी-छोटी उपज को भी प्रभावशाली ढंग से बेच सकेंगे। ग्रामीण कृषि बाजार स्थापित होने से किसान सीधे तौर पर उपभोक्ताओं या खुदरा व्यापारियों को अपना उत्पाद बेच सकेंगे। हम और एक मजबूत एवं सक्षम कृषि बाजार के उचित न्यायिक ढांचे का विकास कर सकें, इसके लिए मोदी सरकार ने मॉडल (कृषि उत्पाद एवं पशुधन विपणन अधिनियम 2016) बनाकर सभी प्रदेशों को दिया है तथा कृषि उत्पाद तथा पशुधन कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एवं सेवा नियमावली 2018 भी राज्यों को लागू करने हेतु दिया गया है। सरकार ने लागत से न्यूनतम 50 प्रतिशत ज्यादा समर्थन मूल्य देने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाया है जिससे किसानों के बड़े हितों की भरपाई हो सके। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य को लागू करने के लिए भी प्रतिबद्ध है। हरित क्रांति के प्रारंभ से ही सरकारी खरीद केवल धान और गेहूं तक सीमित रही है। वैसे कभी-कभी कुछ अन्य जिन्सों की खरीदारी भी की जाती रही है, किंतु मोदी सरकार के आने के बाद दलहन एवं तिलहन की खरीदारी में भारी वृद्धि हुई है। हम सभी तरह के किसानों- जिसमें दलहन, तिलहन के आलावा अन्य मोटे अनाज उपजाने वाले किसान शामिल हैं- को अपने क्रियाकलापों में शामिल कर राज्य सरकारों के माध्यम से लाभ पहुंचायेंगे। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर इन फसलों की सुनिश्चित खरीद से किसानों तथा इस क्षेत्र को जो कि अभी तक उपेक्षित थे, को दरों में महत्वपूर्ण वृद्धि मिलेगी। ये फसलें जलवायु के अनुकूल हैं व भविष्य में जलवायु परिवर्तन को सहने की क्षमता रखती हैं। प्रधानमंत्री के देश की आजादी के 75वें वर्ष यानी 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के लक्ष्य से एक बड़े उद्देश्य की प्रतिपूर्ति होगी। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के निर्धारण हेतु नई नीति बनाकर और सुनिश्चित लाभ दिलाकर विभिन्न फसलों तथा भौगौलिक परिस्थितियों के अनुसार, जिसमें समानता एवं किसान कल्याण शामिल है, सरकार एक नई दिशा प्रदान कर रही है। अपने लेख में डॉ. स्वामीनाथन ने लिखा है, ‘‘कृषि की आर्थिक व्यवहार्यता सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय किसान आयोग की सिफारिश के आधार पर लाभकारी मूल्यों की घोषणा अहम कदम है। इस बात पर बल देने के लिए सरकार ने अधिसूचना में यह सुनिश्चित किया है कि खरीफ 2018 से अधिसूचित फसलों का एमएसपी उत्पादन लागत का कम से कम 150 प्रतिशत होगा, जबकि मोटे अनाज के लिए 150-200 प्रतिशत होगा।’’ खेती के अलावा सरकार ने अपनी नीतियों व योजनाओं में पशुपालन, मछली पालन, जलजीवों के विकास को भी उचित प्राथमिकता दी है। राष्ट्रीय गोकुल मिशन देशी नस्लों के संरक्षण एवं विकास पर आधारित है, इस पर ध्यान दिया जाना समुचित कृषि विकास का अभिन्न अंग है। इससे बहुत सारे लघु एवं सीमांत किसान (इसमें भूमिहीन कृषि मजदूर शामिल हैं) और देशी नस्लें पालकों को उचित लाभ मिल रहा है। बड़े हर्ष का विषय है कि देश में 161 देशी नस्लों का पंजीकरण किया गया है, जिसके विकास के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद क्रियाशील है। इसी तरह, मछली उत्पादन विकास, जिसमें समुद्री तथा मीठे पानी की मछलियां शामिल हैं, के लिए लागू परियोजनाओं से मछुआरों के जीवन में आशातीत सुधार हो रहे हैं। मछली उत्पादन क्षेत्र ने कृषि के सभी क्षेत्रों से ज्यादा वृद्धि दर हासिल की है। ऐसे लघु किसान जिनकी आय पर्याप्त नहीं है, उनके लिए सहयोगी कृषि को बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार की कृषि आधारित सहयोगी योजनाओं जैसे-मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन, कृषि वानिकी एवं बांस उत्पादन आदि से कृषि क्षेत्र में अतिरिक्त रोजगार एवं आमदनी पैदा करने में सहायता मिलेगी। राष्ट्रीय किसान आयोग द्वारा उत्पादकता बढ़ाने व कुपोषण दूर करने संबंधी सिफारिशों के मद्देनजर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने बीते चार साल में फसलों की कुल 795 उन्नत किस्में विकसित की हैं। इनमें 495 किस्में जलवायु के विभिन्न दबावों को सहन कर सकती हैं, जिसका लाभ किसान उठा रहे हैं। भारतीय समाज में कुपोषण की समस्या लंबे समय से है। इसे दूर करने की दिशा में पहली बार सरकार द्वारा ऐतिहासिक पहल की गई जिसके अंतर्गत कुल 20 बायो-फॉर्टिफाइड किस्में विकसित कर खेती के लिए जारी की गईं। सीमांत एवं लघु किसान परिवारों की आय बढ़ाने की दिशा में पहल करते हुए कुल 45 एकीकृत कृषि प्रणाली मॉडल विकसित किए गए जिनसे मृदा स्वास्थ्य, जल उपयोग प्रभावशीलता को बढ़ाया जा रहा है। साथ ही कृषि की जैव विविधता का संरक्षण किया जा रहा है। विभिन्न राज्यों में आर्थिक दृष्टि से मूल्यांकन करने पर ये मॉडल लाभकारी पाए गए हैं। भारत सरकार द्वारा इन मॉडलों को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए प्रत्येक कृषि विज्ञान केंद्र में इन्हें स्थापित किया जा रहा है एवं इनका प्रदर्शन भी किया जा रहा है ताकि किसान प्रेरित हों और खेती से अधिक लाभ कमा सकें। सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में नीतिगत सुधारों एवं नई-नई योजनाओं को लागू करने के लिए आवश्यकतानुसार बजट की व्यवस्था की गई है। पिछले वर्षों में सरकार ने ऐसी योजनाओं के क्रियान्वयन एवं इन्हें मजबूती प्रदान करने के लिए 2,11,694 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया है। इसके अलावा, दुग्ध, को-आॅपरेटिव, मछली तथा जलजीवों के उत्पादन, पशुपालन, कृषि बाजार व सूक्ष्म सिंचाई के आधारभूत ढांचे एवं व्यवस्था में सुधार हेतु सक्षम कार्पस फंड बनाए गए हैं। इस प्रकार सरकार ने कृषि क्षेत्र एवं किसानों के कल्याण हेतु तथा उपभोक्ताओं की अभिरुचि के मद्देनजर सतत उत्पादन की ओर आय केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है। देश में पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने किसानों की समग्र भलाई और कल्याण के लिए इस तरह का कोई लक्ष्य देशवासियों के सामने रखा है।इस विजन के अनुसरण में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय अगस्त 2022 में, जब हमारा देश 75वां स्वतंत्रता दिवस समारोह मना रहा होगा, उस समय तक किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर ठोस कार्यनीति अपना रहा है। परिणामों का प्रकटीकरण भी हो रहा है। (लेखक केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री, भारत सरकार हैं) 

गत वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देशन में कृषि और किसानों की बेहतरी के लिए किए गए प्रयासों के उत्साहजनक और सकारात्मक परिणाम दिखने लगे हैं। मोदी सरकार किसानों के कल्याण के लिए जिस मनोयोग से काम में जुटी है, इससे उनके जीवन में गुणात्मक सुधार आ रहा है। सरकार ने देश के विकास के लिए नई कार्यविधि व पारदर्शी कार्यशैली के नए प्रतिमान रचे हैं। समयबद्ध तरीके से प्रधानमंत्री के कुशल मार्गदर्शन में किसान कल्याण की योजनाओं के पूर्ण क्रियान्वयन के लक्ष्यों को मिशन मोड में परिवर्तित किया गया है। हमारी सरकार ने सुशासन के नये आयामों, नवाचारों एवं सुधारवादी दृष्टिकोण से एक आधुनिक व भविष्योन्मुख भारत की नींव रखी है। साथ ही, वह किसानों के मन में कृषि उन्नति के लिए की गई नई पहलों के प्रति जागरूकता लाने में सफल हुई है। हमने किसानों एवं ग्रामीणों के जीवन स्तर में गुणात्मक परिवर्तन लाने का सतत एवं सशक्त प्रयास किया है। राष्ट्रीय किसान आयोग के अध्यक्ष डॉ. स्वामीनाथन ने 2006 में तत्कालीन सरकार को सौंपी रिपोर्ट में कृषि आधारित सोच के साथ-साथ किसानों के कल्याण पर उचित ध्यान देने की अनुशंसा की थी। यह किसान ही है जो आर्थिक बदलावों में किये गये प्रयासों को महत्वपूर्ण दिशा प्रदान करता है। अत: व्यवस्था में आमूल परिवर्तन हेतु कृषि में फसल उपरांत प्रसंस्करण बाजार एवं इससे संबंधित व्यवस्था पर समुचित ध्यान देना होगा। नैसर्गिक संपदाओं में लगातार क्षरण और जलवायु परिवर्तन को देखते हुए कृषि आयोग ने विज्ञान आधारित प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन, सतत उत्पादन एवं विकास की ओर भी ध्यान देने की बात कही थी। 6 अगस्त, 2018 को डॉ. स्वामीनाथन ने एक अंग्रेजी समाचारपत्र में प्रकाशित अपने लेख में कहा है, ‘‘यद्यपि राष्ट्रीय किसान आयोग की रिपोर्ट 2006 में प्रस्तुत की गई थी, परंतु जब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार नहीं बनी, तब तक इस पर बहुत काम नहीं हुआ था। सौभाग्यवश बीते 4 वर्षों के दौरान किसानों की दशा व आय में सुधार के लिए कई अहम निर्णय लिए गए हैं।’’

पिछले 4 वर्षों में देश में कृषि क्षेत्र में विकास, किसानों को उपज का उचित मूल्य दिलाने तथा कृषि उत्पादन लागत में कमी लाने के ढेरों प्रयास किये गये हैं। इन प्रयासों से हमारे जीवन में महत्वपूर्ण सुखदायी परिवर्तन हो रहे हैं। देशव्यापी मृदा स्वास्थ्य परीक्षण कार्ड की शुरुआत इसी सोच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

नाइट्रोजन उपयोग क्षमता को बढ़ाने के लिए और उपयोग की मात्रा तथा इससे जुड़ी लागत को घटाने के लिए सरकार ने कृषि में केवल नीम कोटिड यूरिया के उपयोग को अनिवार्य बनाया है। चूंकि इससे उत्पादकता में सुधार हुआ है और कृषि पर लागत घटी है, जिससे इसके गलत उपयोग और गैर-कृषि क्षेत्र में इसके उपयोग को रोकने में भी मदद मिली है। सतत कृषि विकास एवं मृदा स्वास्थ्य हेतु जैविक खेती को परंपरागत विकास योजना के साथ जोड़ा गया है, जिसमें पुआल का इन-सीटू प्रबंधन भी शामिल है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना लागू होने से कृषि कार्यों में उचित जल प्रबंधन हो सकेगा, सरकार द्वारा उठाया गया यह एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है। सरकार ने पुरानी योजनाओं के विस्तृत अध्ययन के बाद उनमें सुधार किया है तथा इन्हें विश्व की सबसे बड़ी किसान अनुकूल प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना तथा मौसम आधारित फसल बीमा योजना 2016 में शुरू किया है। इसके तहत कृषि क्षेत्र के सभी जोखिमों से सुरक्षा प्रदान की गई है। राष्ट्रीय किसान आयोग ने किसानों की आय बढ़ाने हेतु कई सुधारों की संस्तुति की थी, जिसे आधार मानकर सरकार ने बहुत सारी सुधार योजनाएं लागू की हैं। उसने मॉडल कृषि भूमि पट्टा अधिनियम-2016 राज्यों को जारी किया, जो कृषि सुधारों के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है। इसमें भू-धारकों व लीज प्राप्तकर्ता, दोनों के हितों का ख्याल रखा गया है। बाजार सुधार लागू करने से बाजारों में पारदर्शिता बढ़ी है। देश की राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक ई-मार्केट स्कीम 2016 (ई-नाम) देश के कृषि बाजारों को एक साथ जोड़ती है। सरकार ने देश की 585 कृषि उत्पाद समितियों के अलावा मंडियों के बीच खुले व्यापार को देखते हुए राष्ट्रीय कृषि बाजार की स्थापना की है। 2018 के बजट में, नई बाजार संरचना के बारे में बहुत सारी बातें कही गई हैं, जिसकी बहुत दिनों से आवश्यकता भी थी। छोटे एवं सीमांत किसान छोटी उपज को नजदीकी बाजार में बेच सकें, इसके लिए भी व्यवस्था की गई है। 22,000 ग्रामीण बाजारों का देशभर में फैलाव, ग्रामीण कृषि बाजार के विकास के अंतराल को कम करता है। नया आधारभूत ढांचा, छोटे एवं सीमांत किसान, ए.पी.एम.सी. या ई-नाम से जुड़कर अपनी छोटी-छोटी उपज को भी प्रभावशाली ढंग से बेच सकेंगे। ग्रामीण कृषि बाजार स्थापित होने से किसान सीधे तौर पर उपभोक्ताओं या खुदरा व्यापारियों को अपना उत्पाद बेच सकेंगे। हम और एक मजबूत एवं सक्षम कृषि बाजार के उचित न्यायिक ढांचे का विकास कर सकें, इसके लिए मोदी सरकार ने मॉडल (कृषि उत्पाद एवं पशुधन विपणन अधिनियम 2016) बनाकर सभी प्रदेशों को दिया है तथा कृषि उत्पाद तथा पशुधन कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग एवं सेवा नियमावली 2018 भी राज्यों को लागू करने हेतु दिया गया है।

 

सरकार ने लागत से न्यूनतम 50 प्रतिशत ज्यादा समर्थन मूल्य देने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाया है जिससे किसानों के बड़े हितों की भरपाई हो सके। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य को लागू करने के लिए भी प्रतिबद्ध है। हरित क्रांति के प्रारंभ से ही सरकारी खरीद केवल धान और गेहूं तक सीमित रही है। वैसे कभी-कभी कुछ अन्य जिन्सों की खरीदारी भी की जाती रही है, किंतु मोदी सरकार के आने के बाद दलहन एवं तिलहन की खरीदारी में भारी वृद्धि हुई है। हम सभी तरह के किसानों- जिसमें दलहन, तिलहन के आलावा अन्य मोटे अनाज उपजाने वाले किसान शामिल हैं- को अपने क्रियाकलापों में शामिल कर राज्य सरकारों के माध्यम से लाभ पहुंचायेंगे। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर इन फसलों की सुनिश्चित खरीद से किसानों तथा इस क्षेत्र को जो कि अभी तक उपेक्षित थे, को दरों में महत्वपूर्ण वृद्धि मिलेगी। ये फसलें जलवायु के अनुकूल हैं व भविष्य में जलवायु परिवर्तन को सहने की क्षमता रखती हैं। प्रधानमंत्री के देश की आजादी के 75वें वर्ष यानी 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने के लक्ष्य से एक बड़े उद्देश्य की प्रतिपूर्ति होगी। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के निर्धारण हेतु नई नीति बनाकर और सुनिश्चित लाभ दिलाकर विभिन्न फसलों तथा भौगौलिक परिस्थितियों के अनुसार, जिसमें समानता एवं किसान कल्याण शामिल है, सरकार एक नई दिशा प्रदान कर रही है। अपने लेख में डॉ. स्वामीनाथन ने लिखा है, ‘‘कृषि की आर्थिक व्यवहार्यता सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय किसान आयोग की सिफारिश के आधार पर लाभकारी मूल्यों की घोषणा अहम कदम है। इस बात पर बल देने के लिए सरकार ने अधिसूचना में यह सुनिश्चित किया है कि खरीफ 2018 से अधिसूचित फसलों का एमएसपी उत्पादन लागत का कम से कम 150 प्रतिशत होगा, जबकि मोटे अनाज के लिए 150-200 प्रतिशत होगा।’’

खेती के अलावा सरकार ने अपनी नीतियों व योजनाओं में पशुपालन, मछली पालन, जलजीवों के विकास को भी उचित प्राथमिकता दी है। राष्ट्रीय गोकुल मिशन देशी नस्लों के संरक्षण एवं विकास पर आधारित है, इस पर ध्यान दिया जाना समुचित कृषि विकास का अभिन्न अंग है। इससे बहुत सारे लघु एवं सीमांत किसान (इसमें भूमिहीन कृषि मजदूर शामिल हैं) और देशी नस्लें पालकों को उचित लाभ मिल रहा है। बड़े हर्ष का विषय है कि देश में 161 देशी नस्लों का पंजीकरण किया गया है, जिसके विकास के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद क्रियाशील है।

 

इसी तरह, मछली उत्पादन विकास, जिसमें समुद्री तथा मीठे पानी की मछलियां शामिल हैं, के लिए लागू परियोजनाओं से मछुआरों के जीवन में आशातीत सुधार हो रहे हैं। मछली उत्पादन क्षेत्र ने कृषि के सभी क्षेत्रों से ज्यादा वृद्धि दर हासिल की है। ऐसे लघु किसान जिनकी आय पर्याप्त नहीं है, उनके लिए सहयोगी कृषि को बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार की कृषि आधारित सहयोगी योजनाओं जैसे-मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन, कृषि वानिकी एवं बांस उत्पादन आदि से कृषि क्षेत्र में अतिरिक्त रोजगार एवं आमदनी पैदा करने में सहायता मिलेगी। राष्ट्रीय किसान आयोग द्वारा उत्पादकता बढ़ाने व कुपोषण दूर करने संबंधी सिफारिशों के मद्देनजर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने बीते चार साल में फसलों की कुल 795 उन्नत किस्में विकसित की हैं। इनमें 495 किस्में जलवायु के विभिन्न दबावों को सहन कर सकती हैं, जिसका लाभ किसान उठा रहे हैं। भारतीय समाज में कुपोषण की समस्या लंबे समय से है। इसे दूर करने की दिशा में पहली बार सरकार द्वारा ऐतिहासिक पहल की गई जिसके अंतर्गत कुल 20 बायो-फॉर्टिफाइड किस्में विकसित कर खेती के लिए जारी की गईं। सीमांत एवं लघु किसान परिवारों की आय बढ़ाने की दिशा में पहल करते हुए कुल 45 एकीकृत कृषि प्रणाली मॉडल विकसित किए गए जिनसे मृदा स्वास्थ्य, जल उपयोग प्रभावशीलता को बढ़ाया जा रहा है। साथ ही कृषि की जैव विविधता का संरक्षण किया जा रहा है। विभिन्न राज्यों में आर्थिक दृष्टि से मूल्यांकन करने पर ये मॉडल लाभकारी पाए गए हैं। भारत सरकार द्वारा इन मॉडलों को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए प्रत्येक कृषि विज्ञान केंद्र में इन्हें स्थापित किया जा रहा है एवं इनका प्रदर्शन भी किया जा रहा है ताकि किसान प्रेरित हों और खेती से अधिक लाभ कमा सकें। सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में नीतिगत सुधारों एवं नई-नई योजनाओं को लागू करने के लिए आवश्यकतानुसार बजट की व्यवस्था की गई है। पिछले वर्षों में सरकार ने ऐसी योजनाओं के क्रियान्वयन एवं इन्हें मजबूती प्रदान करने के लिए 2,11,694 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया है। इसके अलावा, दुग्ध, को-आॅपरेटिव, मछली तथा जलजीवों के उत्पादन, पशुपालन, कृषि बाजार व सूक्ष्म सिंचाई के आधारभूत ढांचे एवं व्यवस्था में सुधार हेतु सक्षम कार्पस फंड बनाए गए हैं। इस प्रकार सरकार ने कृषि क्षेत्र एवं किसानों के कल्याण हेतु तथा उपभोक्ताओं की अभिरुचि के मद्देनजर सतत उत्पादन की ओर आय केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है। देश में पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने किसानों की समग्र भलाई और कल्याण के लिए इस तरह का कोई लक्ष्य देशवासियों के सामने रखा है।

इस विजन के अनुसरण में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय अगस्त 2022 में, जब हमारा देश 75वां स्वतंत्रता दिवस समारोह मना रहा होगा, उस समय तक किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर ठोस कार्यनीति अपना रहा है। परिणामों का प्रकटीकरण भी हो रहा है।

(लेखक केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री, भारत सरकार हैं)