जर्मनी में राहुल के भीड़तंत्र के पकौड़े

 

भीड़ मार रही है, भीड़ नंगा कर घुमा रही है, भीड़ आग लगा रही है। रोज-रोज कुछ ऐसी ही खबरें आ रही हैं, सुर्खियां बन रही हैं। अभी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक वजह बताई है कि दरअसल जीएसटी और नोटबंदी के गुस्से के कारण जनता गुस्से में है और भीड़ बनकर गुस्सा निकाल रही हैं। मुझे राहुल गांधी का बयान मौके पर चौका लगाने की कोशिश ज्यादा लगता है। राहुल गांधी यहीं नहीं रूके वो इराक तक गए और बताया कि कैसे एक जाति को नौकरी न मिलने पर वो ISIS खड़ा हो गया। उनके भाषण से लगा जैसे भारत में ISIS की जमीन तैयार हो गई है। उनके अपने विचार हो सकते हैं और हम उनसे इत्तेफाक या नाइत्तेफाकी रख सकते हैं आप चाहे तो हंस भी सकते हैं या रो भी सकते हैं। लेकिन ये भी सच है भीड़ वाली घटनाएं लगातार सुर्खियां बन रही हैं।

अभी हाल ही में चर्चा में एक पुराना किस्सा याद आया। मैं छोटा सा था। घर का लेंटर डालने के लिए सरिया आया था। सरिया घर के बाहर सड़क पर पड़ा था। जिस कारीगर को काम के लिए बुलाया उसी ने मौका देखकर सरिया रिक्शे में डलवाया और चलता बनने ही वाला था कि एक पड़ोसी की नजर पड़ी। उसने शोर मचाया और देखते ही देखते हो गई मॉब लिचिंग। उस वक्त तो मेरे हिसाब से जो हुआ था वो न्याय था, भीड़ का न्याय, चोरी होती दिख रही थी, चोर रंगे हाथ पकड़ा गया था, भीड़ ने तुरंत न्याय कर दिया। आज के हिसाब से सोचते हैं तो वो कानूनन गलत था। लेकिन भीड़ को कानून से क्या मतलब?

मतलब है, भीड़ को कानून से मतलब है। मुझे लगता है कि भीड़तंत्र का मसला कानून से सीधे जुड़ा हुआ है। यहां आज भी आम जनता को कोर्ट कटहरी से डर लगता है। आजादी के इतने साल भी पुलिस इतना विश्वास नहीं जगा पाई है कि लोग सीधे मामले को थाने में रिपोर्ट करें और फिर जल्दी न्याय की उम्मीद करें। मेरे पास फोन आते हैं अधिकतर फोन इसलिए आते हैं उनका केस थाने में दर्ज ही नहीं हो रहा या उनके तरीके से नहीं हो रहा। विश्वास की ये कमी लोगों को इंस्टेंट न्याय की तरफ प्रेरित करती हैं। पुलिस की छवि ये है कि वो पैसा खाकर मामला दबा देती है। लोग अपराधी को पुलिस को देने से पहले ही न्याय कर देना चाहते हैं। भीड़ की मान्यता ये रही है कि अच्छे से कुटाई से लोग सुधर जाते हैं। लेकिन ये कुटाई कब हत्या तक पहुंच जाती है ये पता करना बेहद मुश्किल है।

पुलिस भी करे तो क्या करे? उसका काम है मामला दर्ज कर कोर्ट तक बढ़ाना और न्याय के प्रक्रिया में हिस्सेदार बनना। लेकिन कानूनी पेचिदगी इतनी हैं कि कई बार पुलिस चाह कर भी न्याय नहीं दिला पाती। 2018 जनवरी में आंकड़े आए थे कि अदालतों में 2.84 करोड़ मामले लंबित हैं। हर साल ये संख्या बढ़ रही है। मतलब हर साल इतने मामलों का निपटारा नहीं होता जितने और बढ़ जाते हैं। एक मामला अदालत गया तो हो सकता है कि उसकी अगली सुनवाई कई महीनों बाद हो।

अदालत भी क्या करें, देश में अदालतें कम हैं, अदालत हैं तो जज नहीं हैं। मामले की जांच के लिए पुलिसकर्मी कम हैं। 663 आदमियों पर हमारे देश में एक पुलिसकर्मी है। 2016 में एक डाटा आया था जिसके मुताबिक देश में 5 लाख पुलिसकर्मी कम हैं। अब सवाल ये है कि जब न्याय मिलेगा नहीं या न्याय मिलते दिखेगा नहीं तो लोग क्या करेंगे?

लोग क्या करें? अकेला शख्स भाड़ नहीं फोड़ सकता। ये हर शख्स जानता है। लेकिन जब ये शख्स भीड़ का हिस्सा बन जाता है तो वो गाड़ियां जला सकता है, लोगो को पीट सकता है, दुकान लूट सकता है, लोगों को मार सकता है। यही पूरे देश में हो रहा है। जब भीड़ किसी शख्स की सरेआम पिटाई करती है तो यही हो रहा है।

पूरे सिस्टम पर कम यकीन के अलावा एक काम और हो रहा है वो है डर। डर फैल रहा है और डर फैलाया जा रहा है। सोशल मीडिया इसका बड़ा हिस्सा बन रहा है। देश के बड़े हिस्से में बच्चा चोरी की अफवाह फैली। ऐसी फैली कि भीड़ को जिस पर भी शक था उसे पीटा गया, कई को इतना पीटा गया कि उनकी मौत हो गई। लेकिन क्या ये डर बेवजह है। केंद्रीय गृहमंत्रालय की 2017-18 की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में देश में करीब-करीब 55 हजार बच्चों की चोरी हुई। ऐसे मामलों में दोषियों को सजा मिलने की दर सोच कर हैरान रह जाएंगे ये है सिर्फ 22.7 फीसदी। ऐसे में आमजन क्या करें, क्या महसूस करें, वो क्यों ना डरें। यही डर जब भीड़ पर सवार होता है तो देश शर्मसार होता है।

सोशल मीडिया के दौर में अफवाहें तेजी से उड़ती हैं, डर तेजी से फैलता है, गुस्सा और नफरत हमेशा प्यार के मुकाबले जल्दी फैलते है। उस पर सिस्टम से न्याय की उम्मीद कम होना ऐसा माहौल तैयार करता है जिसमें भीड़तंत्र को जान मिलती है। उस पर कुछ असमाजिक तत्व मिलकर भीड़ के गुस्से को गलत दिशा में ले जाते हैं। नतीजा होता है ऐसी तस्वीरें जिसमें इंसानियत पानी-पानी हो जाती है।

इलाज क्या है? जर्मनी में जाकर जीएसटी, बेरोजगारी और नोटबंदी को कोसना या भारत में जमीन पर कुछ काम करना। कांग्रेस के पास कार्यकर्ताओं का बड़ा नेटवर्क है। राहुल गांधी को इस नेटवर्क का इस्तेमाल भारत में जागरूकता के लिए करना चाहिए। महात्मा गाँधी होते तो यही करते। गाँधी जी हर राजनैतिक आंदोलन के तुरंत बाद पैदा हुई उर्जा को सामाजिक कामों में लगाते थे, इससे वो दिशा दे पाते थे। बेरोजगारी का इलाज इस देश में आसान नहीं है। किसी भी पार्टी के लिए नहीं है। लेकिन राहुल गांधी ने राजनीति के पकौड़े तलने की जो कोशिश की है मुझे नहीं लगता कि इससे उन्हें या देश को कोई फायदा होने जा रहा है।

जब तक राजनीति या नेता भीड़तंंत्र का इलाज नहीं खोजते तब तक डरिए जनाब, क्योंकि भीड़ से डरना बहुत जरूरी है।

(मनीश शर्मा जी के फेसबुकवाल से साभार)