'हिंदू पाकिस्तान' की बात करने वाले समझ लें मजहबी सोच ने बांटा देश
   दिनांक 27-अगस्त-2018
वसुधैव कुटुम्बकम् और सर्वे भवंतु सुखिन: भारत की राष्ट्रीयता का आधार है। इसलिए भारत ने सदैव समूचे विश्व को एक परिवार के रूप में देखा है और सभी के सुख और निरामयता की कामना की है। लेकिन कुछ तथाकथित बौद्धिक अपनी जड़ों को भूलकर अभारतीयता का प्रदर्शन करते हैं और ऐसा करते समय वे अपने इतिहास को भूल जाते हैं
कांग्रेस पार्टी के कुछ नेता, जो चर्च द्वारा समर्थित और कम्युनिस्टों के अभारतीय विचारों से प्रभावित हैं, वे जब अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों के लिए भारत की अस्मिता पर ही आघात करने वाले वक्तव्य देते हैं, तो आश्चर्य कम, पीड़ा अधिक होती है। ये नेता उच्च शिक्षा प्राप्त हैं। ऐसे में इनकी बातों से पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन आयोग की भारतीय शिक्षा पर की गई उस टिप्पणी का स्मरण हो जाता है, जो आयोग ने 1949 में की थी। आधुनिक शिक्षा के अभारतीय चरित्र (The un-indian character of education) पर डॉ. एस. राधाकृष्णन ने लिखा है,‘‘एक शताब्दी से अधिक वर्षों से इस देश में चली शिक्षा प्रणाली की एक प्रमुख और गम्भीर शिकायत यह है कि उसने भारत के भूतकाल को दुर्लक्षित (अनदेखा) किया है और भारत के छात्रों को अपने सांस्कृतिक ज्ञान से वंचित रखा है। इस कारण कुछ लोगों में यह भावना निर्मित हुई है कि हमारी जड़ों का कोई अता-पता नहीं है और उससे भी खराब बात यह मानना है कि हमारी जड़ें हमें ऐसी दुनिया में सीमित कर देती हैं, जिसका वर्तमान से कोई संबंध नहीं है।’’
अभी हाल में कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने ऐसा ही एक वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि यदि भाजपा फिर से शासन में आती है तो भारत ‘हिन्दू पाकिस्तान’ बन जाएगा। साम्यवाद जैसे अभारतीय विचारों के कारण और उनके प्रभाव के परिणामस्वरुप यह अभारतीयकरण इतना अधिक गहरा हो चुका है कि इसने हमारी सोच ही नहीं, हमारी शब्दावली को भी प्रभावित कर दिया है। ‘हिन्दू पाकिस्तान’, ‘हिन्दू तालिबान’, ‘हिन्दू आतंकवाद’, ये सब इसी पूर्णत: अभारतीय सोच की अभिव्यक्ति हैं। वास्तव में ‘हिन्दू पाकिस्तान’ शब्द ही पूरी तरह विरोधाभासी (oxymoron) है।
इस वक्तव्य की निरर्थकता को समझने के पहले यह समझना आवश्यक है कि भारत और हिंदुत्व क्या है?
अभी हाल ही में नागपुर में भारत के बारे में बोलते हुए भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. प्रणव मुखर्जी ने कहा,‘‘पश्चिम की राज्य आधारित राष्ट्र (nation state) की अवधारणा से भारत की राष्ट्र की अवधारणा एकदम भिन्न है। पश्चिम में जो राष्ट्र विकसित हुए उनका आधार एक विशिष्ट भूमि, एक विशिष्ट भाषा, एक विशिष्ट रिलीजन और समान शत्रु रहा है। जबकि भारत की राष्ट्रीयता का आधार वसुधैव कुटुम्बकम् और ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया’ का वैश्विक चिंतन रहा है। भारत ने सदैव समूचे विश्व को एक परिवार के रूप में देखा है और भारत सभी के सुख और निरामयता की कामना करता रहा है। भारत की यह पहचान मानव समूहों के संगम, उनके सम्मिलन और सहअस्तित्व की लंबी प्रक्रिया से निकल कर बनी है। हम सहिष्णुता से शक्ति पाते हैं, बहुलता का स्वागत करते हैं और विविधता का गुणगान करते हैं। यह शताब्दियों से हमारे सामूहिक चित्त और हमारे मानस का अविभाज्य हिस्सा है। यही हमारी राष्ट्रीय पहचान बनी है।’’ भारत के इस मूलत: उदार, सर्वसमावेशी, सहिष्णु, वैश्विक चिंतन का आधार भारत की अध्यात्म आधारित एकात्म और सर्वांगीण जीवन दृष्टि है। यह बात सारी दुनिया जानती है। डॉ. राधाकृष्णन ने इसी जीवन दृष्टि को हिंदू जीवन दृष्टि (Hindu view of life) कहा है। इसकी विशेषता के बारे में वे कहते हैं—
‘‘परिष्कार (reform) की हिन्दू पद्धति की विशेषता यह है कि प्रत्येक समूह अपने पुराने संबंधों को बनाए रखता है और अपनी पहचान तथा हित संबंध का संरक्षण भी कर सकता है। जैसे छात्र अपने महाविद्यालयीन गौरव के बारे में सोचते हैं, वैसे ही ये समूह अपने देवताओं के बारे में सोचते हैं। हमें एक महाविद्यालय से दूसरे महाविद्यालय में छात्रों को नहीं ले जाना है, बल्कि प्रत्येक महाविद्यालय का स्तर ऊंचा करना है, मानकों को ऊंचा उठाना है और उनके आदर्शों पर विचार करना है, उनका अध्ययन-परिशीलन करना है, जिससे प्रत्येक महाविद्यालय द्वारा हम एक ही लक्ष्य को प्राप्त कर सकें।’’
वे आगे कहते हैं,‘‘हम देखते हैं कि हिंदू एक ही अंतिम तत्व, चैतन्य को मानता है, यद्यपि उसे विविध नाम दिए गए हैं। उसकी सामाजिक व्यवस्था में जातियां अनेक होने पर भी समाज एक है। समाज में अनेक वंश या जनजातियां होंगी, पर सभी एक समान तत्व से आपस में बंधे हुए हैं।’’
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी अपने ‘स्वदेशी समाज’ के एक लेख में यही बात कही है। वे कहते हैं,‘‘अनेकता में एकता देखना और विविधता में ऐक्य प्रस्थापित करना ही भारत का अंतर्निहित धर्म है। भारत विविधता को विरोध नहीं मानता और पराए को दुश्मन नहीं समझता। इसीलिए किसी का त्याग या विध्वंस किए बिना वह अपनी विशाल व्यवस्था में सभी का समावेश करने का मानस रखता है। इसी कारण वह सभी मार्गों एवं सभी के महत्व को स्वीकार करता है।
भारत के इस गुण के कारण ही हम किसी समाज को अपना विरोधी मानकर भयभीत नहीं होंगे। प्रत्येक मतभिन्नता (conflict) हमें अपना विस्तार करने का अवसर देगी। हिन्दू, बौद्ध, मुस्लिम और ईसाई परस्पर लड़ कर भारत में मरेंगे नहीं, यहां वे एक सामंजस्य ही प्राप्त करेंगे। यह सामंजस्य अहिन्दू नहीं होगा अपितु वह विशिष्ट भाव से हिन्दू होगा। उसके बाह्य अंश चाहे जितने विदेशी हों, पर उनकी अंतरात्मा भारत की ही होगी।’’

 
कांग्रेसी नेता भूल यह जाते हैं कि भारत की इस उदार, सर्वसमावेशी, एकात्म और सर्वांगीण आध्यात्मिक परम्परा को नकार कर ही पाकिस्तान का निर्माण हुआ है। यह शिक्षा द्वारा हो रहे अभारतीयकरण का और साम्यवाद जैसे अभारतीय विचारों से प्रभावित होने का ही परिणाम है। भारत हिन्दू रहेगा लेकिन पाकिस्तान कतई नहीं होगा। क्योंकि हिन्दू को नकारने से ही तो पाकिस्तान का जन्म हुआ है। भारत का अस्तित्व भारत की एकता में, स्वाधीनता में, सर्वभौमिकता और अखंडता में है और हिंदुत्व के नाम से जानी जाने वाली, भारत की अध्यात्म आधारित सांस्कृतिक और वैचारिक विरासत में है। यही भारत की अस्मिता है। आधुनिक और उच्च शिक्षित होने के बावजूद कांग्रेस के ये नेता अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के लिए अपने भारत की अस्मिता को ही नकार रहे हैं। यह घोर आश्चर्य की बात है। क्या वे यह नहीं जानते कि अस्मिता को नकारने के परिणामस्वरूप भारत का अस्तित्व संकट में आ सकता है? भारत का विभाजन इस अस्मिता को नकारने के कारण ही हुआ था।
वास्तव में जिस उदार, सहिष्णु, वैविध्य का गुणगान करने वाली 5000 वर्ष से भी अधिक पुरानी संस्कृति की बात प्रणबदा ने की और जिस विरासत को डॉ. राधाकृष्णन और रवींद्रनाथ ठाकुर ने हिन्दू जीवन दृष्टि कहा, उस विरासत का वारिस तो पाकिस्तान भी है। उस विरासत से अपना नाता काट कर ही वह पाकिस्तान बना है। वह उस विरासत से यदि अपने आपको जोड़ देता है तो अपनी मुस्लिम उपासना पद्धति को बिना छोड़े वह हिन्दू बन सकता है।
श्री एम. सी. छागला, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और पाकिस्तान में जन्मे कनाडा निवासी श्री तारेक फतेह जैसे अनेक लोग मुस्लिम होते हुए भी खुद को इस विरासत से जोड़ते हैं। इस तरह मुसलमान रहते हुए भी यदि पाकिस्तान इस उदार और सहिष्णु विरासत को स्वीकारता है तो वह ‘हिन्दू पाकिस्तान’ बनेगा अर्थात् ‘भारत’ ही बनेगा। अपना राजकीय अस्तित्व अलग बनाए रखकर भी वह यह काम कर सकता है। यह भारतीय सोच है। नेपाल अलग राज्य होने के बाद भी भारत की इस सांस्कृतिक विरासत से खुद को जोड़ता है। इसलिए भारत का पड़ोसी होने के बावजूद भारत के साथ उसे कोई समस्या नहीं आती। इन जड़ों से जुड़े रहना माने अपनी अस्मिता से जुड़े रहना अपने अस्तित्व के लिए आवश्यक है। इस अस्मिता को डॉ. राधाकृष्णन और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने हिन्दू अस्मिता या ‘जीवनदृष्टि’ कहा है। किसी को हिन्दू शब्द पर आपत्ति है तो वे इसे भारतीय या इंडिक भी कह सकते है। परंतु उसकी विषयवस्तु (content) यही है जो हजारों वर्षों की हमारी विरासत रही है। वैसे भी हिन्दू चिंतन ही यह मानता है कि ‘सत्य’ एक होने पर भी उसे विभिन्न नामों से जाना जा सकता है।
इसका प्रतिलोम देखिए। भारतीय सांस्कृतिक विचार परम्परा से गहराई तक जुड़े रहें, तो हमारी सोचने की पद्धति कैसी होती है, इसका एक अच्छा उदाहरण आचार्य महाप्रज्ञ जी के कथन में आता है। तेरापंथ श्वेतांबरों में एक आध्यात्मिक परम्परा है, जिसके प्रमुख आचार्य महाप्रज्ञ थे। राष्ट्रीय विचारों के संत के नाते उनकी सभी ओर मान्यता एवं प्रतिष्ठा थी। वे कहते थे— ‘‘मैं तेरापंथी हूं, इसका कारण यह है कि मैं स्थानकवासी जैन हूं। मैं स्थानकवासी हूं, इसका कारण यह है कि मैं श्वेतांबर जैन हूं। मैं श्वेतांबर हूं, इसका कारण यह है कि मैं जैन हूं और मैं जैन हूं, इसका कारण यह है कि मैं हिन्दू हूं। यह भारतीय पद्धति की बहुत सुंदर सोच है। मैं एक साथ तेरापंथी, स्थानकवासी, श्वेतांबर जैन और हिन्दू भी हो सकता हूं।’’ कारण यह कि भारतीय चिंतन इस सारी विविधता में कोई विरोधाभास (Contradiction) नहीं देखता। यह भारत की परम्परा रही है। लेकिन इन गहरी जड़ों से जुड़ाव कमजोर होने लगता है, तो यह व्याख्या बदलने लगती है। फिर यह कथन (Narrative) शुरू होता है कि मैं हिन्दू हूं, लेकिन मैं जैन हूं। मैं जैन हूं, लेकिन मैं श्वेतांबर हूं। मैं श्वेतांबर हूं, लेकिन मैं स्थानकवासी जैन हूं और मैं श्वेतांबर जैन हूं पर मैं तो तेरापंथी हूं।
जड़ों के साथ के जुड़ाव का क्षरण होते होते यह स्थिति बन जाती है कि मैं जैन, श्वेतांबर, स्थानकवासी और तेरापंथी जो भी हूं, पर मैं हिन्दू नहीं हूं। और फिर इस पर राजनीति शुरू हो जाती है। और जड़ों से जुड़ाव का और अधिक क्षरण होने से हिंदू पाकिस्तान, हिन्दू तालिबान, हिन्दू आतंकवाद जैसे विचार सूझने लगते हैं। और यह क्षरण पूर्ण होते ही अभारतीयकरण की प्रक्रिया पूर्ण हो कर - ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’, ‘भारत की बर्बादी तक जंग चलेगी’, जैसी बातें शुरू हो जाती हैं। वह भी अनपढ़, पिछड़े और गरीब लोगों के द्वारा नहीं, सबसे प्रगतिशील माने जाने वाले शैक्षिक संस्थान की भारतीय प्रज्ञा के आधुनिकतम युवा प्रतिनिधियों की ओर से। और तो और, इन्हें समर्थन भी इसी भारत के धन पर पढ़े और बढ़े प्रज्ञावान प्राध्यापकों की ओर से मिलता है। अभारतीयकरण का इससे स्पष्ट उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं है।
प्रणब दा ने इसीलिए 5000 वर्ष से बनी भारत की पहचान की बात की जो बहुत महत्वपूर्ण है। हम गहराई तक अपनी जड़ों से जुड़ेंगे तो ही दुनिया में अपनी पहचान बनाकर टिक सकेंगे। सुप्रसिद्ध कवि श्री प्रसून जोशी ने एक कविता में कहा है—
उखड़े-उखड़े क्यों हो वृक्ष,
सूख जाओगे।
जितनी गहरीं जड़ें तुम्हारी,
उतने ही तुम हरियाओगे।
(लेखक रा.स्व.संघ के सहसरकार्यवाह हैं)