कांग्रेस की दोहरी चाल तीन तलाक पर चुप्पी

 - सतीश पेडणेकर

मुस्लिमों के नाम पर कांग्रेस केवल तुष्टीकरण की राजनीति करती आई है। इसीलिए तीन तलाक पर संसद में अपनी स्थिति को लेकर वह पसोपेश में है। वह मध्य मार्ग अपनाने की कोशिश कर रही है। मुस्लिम वोटबैंक फिर से हासिल करने के लिए वह कभी खुद को मुसलमानों की पार्टी कहती है तो कभी ‘नरम हिंदुत्व’ की ओर कदम बढ़ाती है |

मुस्लिम महिलाएं अपने समुदाय में प्रचलित तीन तलाक की कुरीति से छुटकारा चाहती हैं, लेकिन कांग्रेस की दोहरी चाल के कारण विधेयक पारित नहीं हो पा रहा हैअपने तीखे और चुटीले हास्य-व्यंग्य और बेलाग शायरी के लिए लोकप्रिय अकबर इलाहाबादी का मुस्लिम पुरुषों की तंग नजर पर तंज करता एक शेर है—बे-पर्दा नजर आर्इं जो कल चंद बीवियां‘अकबर’ जमीं में गैरत-ए-कौमी से गड़ गया पूछा जो मैंने आपका पर्दा वो क्या हुआ कहने लगीं कि अक्ल पे मर्दों के पड़ गयामुस्लिम औरतों को मुस्लिम पुरुषों के बारे में यही लगता है कि उनकी अक्ल पर पर्दा पड़ा हुआ है, तभी वे कई शादियां, तीन तलाक और हलाला जैसे नारी विरोधी रवायतों पर बहुत जोर देते हैं। मुस्लिम महिलाओं को कांग्रेस नेतृत्व के बारे में भी यही लगता होगा कि उसकी अक्ल पर भी पर्दा पड़ा होगा, तभी तो वह तीन तलाक विधेयक को संसद में पारित नहीं होने दे रही। कांग्रेस इस संवेदनशील मुद्दे पर दोहरा खेल खेल रही है। भले ही वोट की राजनीति का ख्याल रखते हुए वह फूंक-फूंक कर कदम उठा रही है, पर सच यह है कि राहुल गांधी शाहबानो मामले में अपने पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा की गई ऐतिहासिक गलती को भूलकर अब सायरा बानो के मामले में भी वही गलती दोहराने जा रहे हैं, जिसके लिए इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।मुस्लिम सुधार के मामले में कांग्रेस हमेशा ही तुष्टीकरण का रवैया अपनाती है। इस बार भी उसके रुख ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि लोकसभा में विधेयक के पक्ष में खड़ी रहने वाली कांग्रेस ने राज्यसभा में विधेयक का विरोध क्यों किया? एक तरफ उसके बड़बोले नेता दिग्विजय सिंह कहते हैं कि पार्टी तीन तलाक के पक्ष में न थी और न है। अपने ट्वीट में उन्होंने तीन तलाक विधेयक के संसद के शीतकालीन सत्र तक टलने का ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ते हुए कहा कि इस मुद्दे पर भाजपा झूठ बोल रही है। भाजपा ने एक दिन पहले मंत्रिमंडल में फैसला लिया और आखिरी दिन राज्यसभा में विधेयक ले आई जो अशासकीय सदस्यों के लिए आरक्षित था। इस विधेयक को सत्र की शुरुआत में क्यों नहीं लाया गया? जब यह इतना ही जरूरी था तो इस पर चर्चा के लिए सत्र को एक दिन और बढ़ाया जा सकता था। जबकि सच्चाई यह है कि कांग्रेस यही कोशिश करती रही कि अव्वल तो विधेयक पारित ही न और अगर इसके अलावा कोई विकल्प न हो तो उसे मौजूदा स्वरूप में पारित ही नहीं होने दिया जाए। इसीलिए कांग्रेस की तरफ से विधेयक के मौजूदा स्वरूप में संशोधन को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश हो रही थी। लेकिन जब विधेयक सदन में पेश हुआ तो कांग्रेस ने उसे सीधे चयन समिति को भेजने की मांग कर दी, जिससे इसके मानसून सत्र में पारित होने को लेकर संशय उत्पन्न हो गया। विधेयक पेश होते ही हंगामाकानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जब राज्यसभा में विधेयक पेश किया तो हंगामा शुरू हो गया। कांग्रेस की तरफ से नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद से लेकर आनंद शर्मा तक सरकार पर हमलावर हो गए। शर्मा का कहना था कि तीन तलाक विधेयक को चयन समिति के पास भेजा जाए। साथ ही, उन्होंने इसे समिति के पास भेजने के लिए उच्च सदन में एक प्रस्ताव भी रखा। दरअसल, शर्मा ने चयन समिति के जिन सदस्यों के नाम गिनाए, उनमें सत्तापक्ष का एक भी सदस्य नहीं था, सभी विपक्षी दलों के राज्यसभा सांसद ही थे। शर्मा को जवाब देने के लिए सरकार की ओर से सदन के नेता अरुण जेटली ने मोर्चा संभाला। उन्होंने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि 1954 से लेकर अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि इस अंदाज में बिना सहमति और सरकार से बिना चर्चा किए चयन समिति के सदस्यों के नाम तय कर दिए गए उन्हें सदन में बताया भी गया। जेटली का कहना था कि नियम के मुताबिक विधेयक को चयन समिति के पास भेजने के लिए 24 घंटे पहले नोटिस दिया जाना चाहिए। अचानक इस तरह नोटिस देना सही नहीं है। वित्त मंत्री ने कहा कि विपक्ष ने पहले से तय कर रखा है कि विधेयक को चयन समिति के पास भेजकर लटकाना है। इसीलिए सरकार इसे समिति के समक्ष भेजने को तैयार नहीं है।राहुल गांधी ने हिंदुओं को धोखा देने के लिए कई मंदिरों के चक्कर लगाए हैं  कांग्रेस की नीयत पर सवालकांग्रेस की नीयत पर सवाल इसलिए भी है, क्योंकि उसने लोकसभा में तीन तलाक विधेयक में संशोधन के समय साथ नहीं दिया था। हकीकत यह है कि लोकसभा में कांग्रेस कमजोर है, जबकि राज्यसभा के गणित ने उसे ऐसी ताकत दे दी है जिससे उसका रुख बदल गया। उसकी रणनीति यही है कि इस विधेयक में सख्त सजा के प्रावधान में संशोधन किया जाए। उसे लगता है कि ऐसा करने से उसे मुस्लिम तबके की नाराजगी का सामना नहीं करना पड़ेगा। कांग्रेस इस मुद्दे पर खुलकर इसलिए भी विरोध नहीं कर रही क्योंकि उसे मालूम है कि उसकी एक गलती राहुल गांधी के ‘नरम हिंदुत्व’ की हवा निकाल देगी। यही सब सोचकर कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि तीन तलाक विधेयक पारित कराने को लेकर भाजपा सरकार की नीयत साफ नहीं है और वह इस पर केवल राजनीति करना चाहती है। वे कहते हैं, ‘‘राज्यसभा में गुलाम नबी आजाद ने पार्टी का रुख स्पष्ट कर दिया था। हम चाहते हैं कि तीन तलाक के खिलाफ कानून बने। हमने तो आपराधिक जवाबदेही वाले पहलू का विरोध किया था। सरकार की नीयत मुस्लिम महिलाओं की रक्षा नहीं है। उनका मकसद कांग्रेस और दूसरे दलों पर निशाना साधना है।’’ यहां बता दें कि मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद तीन तलाक विधेयक को तीन संशोधनों के साथ राज्यसभा में पेश किया गया था, लेकिन मानसून सत्र के समाप्त होने के कारण यह शीतकालीन सत्र तक टल गया है। दरअसल, मोदी मंत्रिमंडल ने जिस संशोधन विधेयक को मंजूरी दी है, उसमें आरोपी को जमानत देने का अधिकार मजिस्ट्रेट के पास होगा और अदालत की इजाजत से समझौते का प्रावधान भी होगा। विपक्ष की नित नई शर्तहालांकि कांग्रेस इस विधेयक का प्रत्यक्ष विरोध नहीं कर रही, लेकिन लगातार नई-नई शर्तें थोपती जा रही है। पहले उसने मुआवजे की शर्त रखी ताकि वह वापस मुस्लिम वोट बैंक के करीब आ सके। अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव का कहना है कि अगर सरकार तीन तलाक विरोधी विधेयक में महिलाओं के लिए गुजारा भत्ता का प्रावधान करती है तो कांग्रेस इस विधेयक का समर्थन जरूर करेगी। साथ ही वह यह आरोप भी लगाती हैं कि सरकार महिला आरक्षण विधेयक के लिए तीन तलाक विधेयक की शर्त रख कर ‘सौदेबाजी’ कर रही है।इसी तरह, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा। इसमें उन्होंने एक नई शर्त रख दी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने संसद के मानसून सत्र में महिला आरक्षण विधेयक लाने पर अपना समर्थन दिया था, साथ ही इस विधेयक को पारित करने की बात भी कही थी। इस पर पलटवार करते हुए केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि उन्हें पत्र लिखकर निकाह, हलाला और तीन तलाक विधेयक पर समर्थन की मांग की गई थी, लेकिन कांग्रेस महिला आरक्षण पर जोर दे रही थी। एक तरफ वह महिला आरक्षण की वकालत कर रही है, उसे पारित कराने की बात कहती है, दूसरी ओर उन्हीं दलों के साथ गठबंधन भी कर रही है, जिन्होंने महिला आरक्षण विधेयक कभी पारित नहीं होने दिया। दरअसल कांग्रेस को इस बात का डर था कि अगर तीन तलाक संशोधन विधेयक मानसून सत्र में पारित हो जाता तो इसका श्रेय भाजपा ले जाती। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को लग रहा है कि विधेयक को चयन समिति के पास भेजने के बाद अगर इसमें संशोधन हो जाए तो इसे बजट सत्र में पारित कराकर इसका श्रेय ले सकेगी। इसी कारण उसने अपनी रणनीति बदल दी। इतिहास गवाह है कि जब भी मुस्लिम कानूनों में सुधार की बात आती है, कांग्रेस या तो रूढ़िवादी मुल्लाओं के साथ खड़ी नजर आती है या बगलें झांकने लगती है। उसका सेकुलरिज्म सिर के बल खड़ा रहता है। आजाद भारत के बाद से उसका यही रवैया चला आ रहा है। इसलिए समान नागरिक संहिता कानून को उसने ठंडे बस्ते में डाले रखा। सुधार के नाम पर हिन्दुओं के लिए हिन्दू कोड बिल तो बना दिया, पर मुस्लिम कानून शरीयत के मुताबिक ही चलता रहा। मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम मामले की जितनी अहमियत स्वतंत्र भारत के न्यायिक इतिहास में है, उतनी ही राजनीतिक इतिहास में भी है। इसे सांप्रदायिक तुष्टीकरण की कांग्रेसी राजनीति की मिसाल के तौर पर पेश किया जाता है। शाहबानो के पक्ष में जब सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया तो उसका भारी विरोध हुआ। आखिरकार राजीव गांधी सरकार ने कठमुल्लाओं के दबाव में आकर मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 पारित कर अदालत के फैसले को ही पलट दिया। शाहबानो की तरह ही सायरा बानो भी एक तलाकशुदा महिला हैं जो अपने अधिकारों के लिए न्यायालय पहुंचीं। इस मामले के भी न्यायिक व राजनीतिक पहलू हैं। सायराबानो का कहना है कि अन्य समुदायों में प्रचलित बहुविवाह प्रथा को समाप्त कर इसे दंडनीय बनाया गया, जबकि मुस्लिम समुदाय में यह कुरीति आज भी उसी तरह चलन में है। उनका कहना है कि ऐसी कुरीतियों के लिए प्रगतिशील समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए, जिनमें महिलाओं को केवल निजी जायदाद समझा जाता है। ऐसी कुरीतियों का समर्थन और इनका प्रचार केवल वे इमाम और मौलवी ही करते हैं, जो अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं।दोराहे पर पार्टीकुल मिलाकर राहुल गांधी के सामने तीन तलाक वैसी ही चुनौती है, जैसी शाहबानो मामले में राजीव गांधी के सामने थी। कांग्रेस की मुश्किल यह है कि वह इस मसले पर भाजपा को श्रेय लेने से रोके तो कैसे? राहुल गांधी की अगुआई में कांग्रेस अब मुस्लिम तुष्टीकरण से ‘नरम हिंदुत्व’ की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही है। दरअसल, हिंदुत्व को लेकर भाजपा ने कांग्रेस को ऐसी शह दी है कि उसके लिए किसी भी रास्ते पर आगे बढ़ना मुश्किल हो रहा है। मजबूरी में उसे मध्य मार्ग चुनना पड़ रहा है। अपने ढुलमुल रवैये के कारण कांग्रेस अपने मुस्लिम वोटबैंक को तो गवां ही चुकी है, अब हिन्दू वोट हासिल करने के लिए भी उसे हर कदम पर जूझना पड़ रहा है। यही वजह है कि तीन तलाक के मसले पर विरोध के नाम पर भी वह महज रस्मअदायगी कर रही है। अभी हाल ही में राहुल गांधी ने कहा था कि कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है। तब नरेंद्र मोदी ने चुटकी लेते हुए पूछा था कि कांग्रेस केवल मुस्लिमों की पार्टी है या मुस्लिम महिलाओं की भी पार्टी है। तीन तलाक मामले में कांग्रेस के रवैये को देखकर लगता है कि उसे केवल मुस्लिम पुरुषों की चिंता है। शाहबानो से लेकर सायरा बानो तक का इतिहास यही बताता है कि वह मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और सम्मान को लेकर जरा भी चिंतित नहीं है। उसे लगता है कि मुस्लिम महिलाएं वहीं वोट देंगी, जहां घर के पुरुष देने के लिए कहेंगे इसलिए उनके लिए कुछ करने की क्या जरूरत है।

मुस्लिम महिलाएं अपने समुदाय में प्रचलित तीन तलाक की कुरीति से छुटकारा चाहती हैं, लेकिन कांग्रेस की दोहरी चाल के कारण विधेयक पारित नहीं हो पा रहा है

अपने तीखे और चुटीले हास्य-व्यंग्य और बेलाग शायरी के लिए लोकप्रिय अकबर इलाहाबादी का मुस्लिम पुरुषों की तंग नजर पर तंज करता एक शेर है—

बे-पर्दा नजर आर्इं जो कल चंद बीवियां

‘अकबर’ जमीं में गैरत-ए-कौमी से गड़ गया

पूछा जो मैंने आपका पर्दा वो क्या हुआ

कहने लगीं कि अक्ल पे

मर्दों के पड़ गया

मुस्लिम औरतों को मुस्लिम पुरुषों के बारे में यही लगता है कि उनकी अक्ल पर पर्दा पड़ा हुआ है, तभी वे कई शादियां, तीन तलाक और हलाला जैसे नारी विरोधी रवायतों पर बहुत जोर देते हैं। मुस्लिम महिलाओं को कांग्रेस नेतृत्व के बारे में भी यही लगता होगा कि उसकी अक्ल पर भी पर्दा पड़ा होगा, तभी तो वह तीन तलाक विधेयक को संसद में पारित नहीं होने दे रही। कांग्रेस इस संवेदनशील मुद्दे पर दोहरा खेल खेल रही है। भले ही वोट की राजनीति का ख्याल रखते हुए वह फूंक-फूंक कर कदम उठा रही है, पर सच यह है कि राहुल गांधी शाहबानो मामले में अपने पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा की गई ऐतिहासिक गलती को भूलकर अब सायरा बानो के मामले में भी वही गलती दोहराने जा रहे हैं, जिसके लिए इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।

मुस्लिम सुधार के मामले में कांग्रेस हमेशा ही तुष्टीकरण का रवैया अपनाती है। इस बार भी उसके रुख ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि लोकसभा में विधेयक के पक्ष में खड़ी रहने वाली कांग्रेस ने राज्यसभा में विधेयक का विरोध क्यों किया? एक तरफ उसके बड़बोले नेता दिग्विजय सिंह कहते हैं कि पार्टी तीन तलाक के पक्ष में न थी और न है। अपने ट्वीट में उन्होंने तीन तलाक विधेयक के संसद के शीतकालीन सत्र तक टलने का ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ते हुए कहा कि इस मुद्दे पर भाजपा झूठ बोल रही है।

भाजपा ने एक दिन पहले मंत्रिमंडल में फैसला लिया और आखिरी दिन राज्यसभा में विधेयक ले आई जो अशासकीय सदस्यों के लिए आरक्षित था। इस विधेयक को सत्र की शुरुआत में क्यों नहीं लाया गया? जब यह इतना ही जरूरी था तो इस पर चर्चा के लिए सत्र को एक दिन और बढ़ाया जा सकता था। जबकि सच्चाई यह है कि कांग्रेस यही कोशिश करती रही कि अव्वल तो विधेयक पारित ही न और अगर इसके अलावा कोई विकल्प न हो तो उसे मौजूदा स्वरूप में पारित ही नहीं होने दिया जाए। इसीलिए कांग्रेस की तरफ से विधेयक के मौजूदा स्वरूप में संशोधन को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश हो रही थी। लेकिन जब विधेयक सदन में पेश हुआ तो कांग्रेस ने उसे सीधे चयन समिति को भेजने की मांग कर दी, जिससे इसके मानसून सत्र में पारित होने को लेकर संशय उत्पन्न हो गया।

विधेयक पेश होते ही हंगामा

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जब राज्यसभा में विधेयक पेश किया तो हंगामा शुरू हो गया। कांग्रेस की तरफ से नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आजाद से लेकर आनंद शर्मा तक सरकार पर हमलावर हो गए। शर्मा का कहना था कि तीन तलाक विधेयक को चयन समिति के पास भेजा जाए। साथ ही, उन्होंने इसे समिति के पास भेजने के लिए उच्च सदन में एक प्रस्ताव भी रखा। दरअसल, शर्मा ने चयन समिति के जिन सदस्यों के नाम गिनाए, उनमें सत्तापक्ष का एक भी सदस्य नहीं था, सभी विपक्षी दलों के राज्यसभा सांसद ही थे। शर्मा को जवाब देने के लिए सरकार की ओर से सदन के नेता अरुण जेटली ने मोर्चा संभाला। उन्होंने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि 1954 से लेकर अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि इस अंदाज में बिना सहमति और सरकार से बिना चर्चा किए चयन समिति के सदस्यों के नाम तय कर दिए गए उन्हें सदन में बताया भी गया।

जेटली का कहना था कि नियम के मुताबिक विधेयक को चयन समिति के पास भेजने के लिए 24 घंटे पहले नोटिस दिया जाना चाहिए। अचानक इस तरह नोटिस देना सही नहीं है। वित्त मंत्री ने कहा कि विपक्ष ने पहले से तय कर रखा है कि विधेयक को चयन समिति के पास भेजकर लटकाना है। इसीलिए सरकार इसे समिति के समक्ष भेजने को तैयार नहीं है।

राहुल गांधी ने हिंदुओं को धोखा देने के लिए कई मंदिरों के चक्कर लगाए हैं  

कांग्रेस की नीयत पर सवाल

कांग्रेस की नीयत पर सवाल इसलिए भी है, क्योंकि उसने लोकसभा में तीन तलाक विधेयक में संशोधन के समय साथ नहीं दिया था। हकीकत यह है कि लोकसभा में कांग्रेस कमजोर है, जबकि राज्यसभा के गणित ने उसे ऐसी ताकत दे दी है जिससे उसका रुख बदल गया। उसकी रणनीति यही है कि इस विधेयक में सख्त सजा के प्रावधान में संशोधन किया जाए। उसे लगता है कि ऐसा करने से उसे मुस्लिम तबके की नाराजगी का सामना नहीं करना पड़ेगा। कांग्रेस इस मुद्दे पर खुलकर इसलिए भी विरोध नहीं कर रही क्योंकि उसे मालूम है कि उसकी एक गलती राहुल गांधी के ‘नरम हिंदुत्व’ की हवा निकाल देगी। यही सब सोचकर कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि तीन तलाक विधेयक पारित कराने को लेकर भाजपा सरकार की नीयत साफ नहीं है और वह इस पर केवल राजनीति करना चाहती है। वे कहते हैं, ‘‘राज्यसभा में गुलाम नबी आजाद ने पार्टी का रुख स्पष्ट कर दिया था। हम चाहते हैं कि तीन तलाक के खिलाफ कानून बने। हमने तो आपराधिक जवाबदेही वाले पहलू का विरोध किया था। सरकार की नीयत मुस्लिम महिलाओं की रक्षा नहीं है। उनका मकसद कांग्रेस और दूसरे दलों पर निशाना साधना है।’’

यहां बता दें कि मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद तीन तलाक विधेयक को तीन संशोधनों के साथ राज्यसभा में पेश किया गया था, लेकिन मानसून सत्र के समाप्त होने के कारण यह शीतकालीन सत्र तक टल गया है। दरअसल, मोदी मंत्रिमंडल ने जिस संशोधन विधेयक को मंजूरी दी है, उसमें आरोपी को जमानत देने का अधिकार मजिस्ट्रेट के पास होगा और अदालत की इजाजत से समझौते का प्रावधान भी होगा।

विपक्ष की नित नई शर्त

हालांकि कांग्रेस इस विधेयक का प्रत्यक्ष विरोध नहीं कर रही, लेकिन लगातार नई-नई शर्तें थोपती जा रही है। पहले उसने मुआवजे की शर्त रखी ताकि वह वापस मुस्लिम वोट बैंक के करीब आ सके। अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव का कहना है कि अगर सरकार तीन तलाक विरोधी विधेयक में महिलाओं के लिए गुजारा भत्ता का प्रावधान करती है तो कांग्रेस इस विधेयक का समर्थन जरूर करेगी। साथ ही वह यह आरोप भी लगाती हैं कि सरकार महिला आरक्षण विधेयक के लिए तीन तलाक विधेयक की शर्त रख कर ‘सौदेबाजी’ कर रही है।

इसी तरह, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा। इसमें उन्होंने एक नई शर्त रख दी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने संसद के मानसून सत्र में महिला आरक्षण विधेयक लाने पर अपना समर्थन दिया था, साथ ही इस विधेयक को पारित करने की बात भी कही थी। इस पर पलटवार करते हुए केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि उन्हें पत्र लिखकर निकाह, हलाला और तीन तलाक विधेयक पर समर्थन की मांग की गई थी, लेकिन कांग्रेस महिला आरक्षण पर जोर दे रही थी। एक तरफ वह महिला आरक्षण की वकालत कर रही है, उसे पारित कराने की बात कहती है, दूसरी ओर उन्हीं दलों के साथ गठबंधन भी कर रही है, जिन्होंने महिला आरक्षण विधेयक कभी पारित नहीं होने दिया। दरअसल कांग्रेस को इस बात का डर था कि अगर तीन तलाक संशोधन विधेयक मानसून सत्र में पारित हो जाता तो इसका श्रेय भाजपा ले जाती।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस को लग रहा है कि विधेयक को चयन समिति के पास भेजने के बाद अगर इसमें संशोधन हो जाए तो इसे बजट सत्र में पारित कराकर इसका श्रेय ले सकेगी। इसी कारण उसने अपनी रणनीति बदल दी।

इतिहास गवाह है कि जब भी मुस्लिम कानूनों में सुधार की बात आती है, कांग्रेस या तो रूढ़िवादी मुल्लाओं के साथ खड़ी नजर आती है या बगलें झांकने लगती है। उसका सेकुलरिज्म सिर के बल खड़ा रहता है। आजाद भारत के बाद से उसका यही रवैया चला आ रहा है। इसलिए समान नागरिक संहिता कानून को उसने ठंडे बस्ते में डाले रखा। सुधार के नाम पर हिन्दुओं के लिए हिन्दू कोड बिल तो बना दिया, पर मुस्लिम कानून शरीयत के मुताबिक ही चलता रहा।

मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम मामले की जितनी अहमियत स्वतंत्र भारत के न्यायिक इतिहास में है, उतनी ही राजनीतिक इतिहास में भी है। इसे सांप्रदायिक तुष्टीकरण की कांग्रेसी राजनीति की मिसाल के तौर पर पेश किया जाता है। शाहबानो के पक्ष में जब सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया तो उसका भारी विरोध हुआ। आखिरकार राजीव गांधी सरकार ने कठमुल्लाओं के दबाव में आकर मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 पारित कर अदालत के फैसले को ही पलट दिया। शाहबानो की तरह ही सायरा बानो भी एक तलाकशुदा महिला हैं जो अपने अधिकारों के लिए न्यायालय पहुंचीं। इस मामले के भी न्यायिक व राजनीतिक पहलू हैं। सायराबानो का कहना है कि अन्य समुदायों में प्रचलित बहुविवाह प्रथा को समाप्त कर इसे दंडनीय बनाया गया, जबकि मुस्लिम समुदाय में यह कुरीति आज भी उसी तरह चलन में है।

उनका कहना है कि ऐसी कुरीतियों के लिए प्रगतिशील समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए, जिनमें महिलाओं को केवल निजी जायदाद समझा जाता है। ऐसी कुरीतियों का समर्थन और इनका प्रचार केवल वे इमाम और मौलवी ही करते हैं, जो अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं।

दोराहे पर पार्टी

कुल मिलाकर राहुल गांधी के सामने तीन तलाक वैसी ही चुनौती है, जैसी शाहबानो मामले में राजीव गांधी के सामने थी। कांग्रेस की मुश्किल यह है कि वह इस मसले पर भाजपा को श्रेय लेने से रोके तो कैसे? राहुल गांधी की अगुआई में कांग्रेस अब मुस्लिम तुष्टीकरण से ‘नरम हिंदुत्व’ की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही है। दरअसल, हिंदुत्व को लेकर भाजपा ने कांग्रेस को ऐसी शह दी है कि उसके लिए किसी भी रास्ते पर आगे बढ़ना मुश्किल हो रहा है। मजबूरी में उसे मध्य मार्ग चुनना पड़ रहा है।

अपने ढुलमुल रवैये के कारण कांग्रेस अपने मुस्लिम वोटबैंक को तो गवां ही चुकी है, अब हिन्दू वोट हासिल करने के लिए भी उसे हर कदम पर जूझना पड़ रहा है। यही वजह है कि तीन तलाक के मसले पर विरोध के नाम पर भी वह महज रस्मअदायगी कर रही है। अभी हाल ही में राहुल गांधी ने कहा था कि कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है। तब नरेंद्र मोदी ने चुटकी लेते हुए पूछा था कि कांग्रेस केवल मुस्लिमों की पार्टी है या मुस्लिम महिलाओं की भी पार्टी है। 

तीन तलाक मामले में कांग्रेस के रवैये को देखकर लगता है कि उसे केवल मुस्लिम पुरुषों की चिंता है। शाहबानो से लेकर सायरा बानो तक का इतिहास यही बताता है कि वह मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और सम्मान को लेकर जरा भी चिंतित नहीं है। उसे लगता है कि मुस्लिम महिलाएं वहीं वोट देंगी, जहां घर के पुरुष देने के लिए कहेंगे इसलिए उनके लिए कुछ करने की क्या जरूरत है।