तकनीकी विकास से समृद्ध होगी हिन्दी
   दिनांक 28-अगस्त-2018
 
बालेन्दु शर्मा दाधीच भारतीय भाषाओं के तकनीकी विकास में निरंतर योगदान के लिए चर्चित तकनीकविद् वरिष्ठ पत्रकार हैं। भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक तथा तकनीकी प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित श्री दाधीच वर्तमान में माइक्रोसॉफ्ट में निदेशक-स्थानीयकरण के पद पर कार्यरत हैं। 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान पत्रकारिता, साहित्य और सोशल मीडिया पर हिंदी की स्थिति और भविष्य तथा भविष्य की तकनीक को लेकर पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर से उनकी लंबी वार्ता हुई। प्रस्तुत हैं उसके प्रमुख अंश:—
हिंदी में तकनीकी विकास की स्थिति पर दो तरह की चर्चाएं सुनाई देती हैं। एक वर्ग है जो भाषा के भविष्य को लेकर अत्याधिक चिंतित है तथा एक अन्य वर्ग है जो उसे लेकर बहुत अधिक आश्वस्त है। आप क्या सोचते हैं?
हिंदी में तकनीकी विकास होना अवश्वयंभावी है और वह तकनीकी कारणों की तुलना में आर्थिक-सामाजिक-राजनैतिक परिस्थितियों से अधिक प्रेरित है। वैश्विक स्तर पर भारत का आर्थिक तथा भू-राजनैतिक दृष्टि से मजबूत होकर उभरना और उसके साथ-साथ हमारे यहां पर उपभोक्ता का समृद्ध, सशक्त व जागरूक होना इसका अहम कारण है। आज जो देश आर्थिक दृष्टि से मजबूत हैं और जहां पर बाजार है, वैश्विक परिदृश्य में उसका उतना ही महत्व है। विश्व बैंक के अनुसार इस वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था 7.3 की वार्षिक वृद्धि दर हासिल करने जा रही है जो बड़े देशों में सर्वाधिक है। भारत फ्रांस को पीछे छोड़कर इसी साल दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। आर्थिक ठहराव से चिंतित वैश्विक कंपनियों के लिए भारत संभावनाओं का नया स्रोत बनकर उभरा है। उन्हें बाजार की तलाश है और हम बाजार उपलब्ध करा रहे हैं। ऐसे में हर क्षेत्र की बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत की ओर आकर्षित हो रही हैं और तकनीकी कंपनियां इसका अपवाद नहीं हैं। सीधे शब्दों में कहें तो भारत के पास अब संख्याबल भी है और खर्च करने के लिए पैसा भी। पिछले वित्त वर्ष में भारत की प्रति व्यक्ति सालाना आय 8.6 प्रतिशत से बढ़कर 1.13 लाख रुपए हो गई। 2000-2001 में यह महज 16,173 रुपए हुआ करती थी। यानी आम भारतीय की आय औसतन हर 6 साल में दोगुनी हो रही है। इधर शिक्षा का स्तर भी बेहतर हुआ है, तकनीकी जागरूकता भी बढ़ी है। आर्थिक क्षमता बढ़ने के साथ ही भारतीय नागरिकों की जरूरतें भी बढ़ी हैं और महत्वाकांक्षाएं भी। बेहतर जीवनशैली की ओर उनकी यात्रा बाजार में मांग पैदा कर रही है। यह मांग तमाम क्षेत्रों में है, जिनमें तकनीकी उत्पाद और सेवाएं भी शामिल हैं। बाजार मांग और आपूर्ति के नियम के आधार पर चलता है। मांग पैदा हो रही है तो नए उत्पाद भी आएंगे और चूंकि बाजार में ग्राहक ही राजा है इसलिए आपूर्तिकर्ता को ग्राहक की जरूरतों के लिहाज से ढलना पड़ेगा। इस लिहाज से मैं हिंदी में तकनीकी विकास को लेकर आश्वस्त हूं।
सवाल है कि कंपनियों के स्तर पर तो ठीक है लेकिन अपने स्तर पर हम, यानी उपभोक्ता, इस स्थिति का कितना लाभ उठा रहे हैं? क्या हमारी आवश्यकताएं मोबाइल, कंप्यूटर आदि को खरीदने और संचार तथा ई-कॉमर्स जैसी सेवाओं के प्रयोग तक सीमित रहेंगी?
ठीक बात। सब कुछ बाजार के रहमोकरम पर नहीं छोड़ा जा सकता। तकनीकी कंपनियां अपनी ओर से उन तमाम क्षेत्रों में विकास करेंगी जो उनकी दृष्टि में आवश्यक हैं या प्रयोक्ता की बुनियादी जरूरतें हैं। लेकिन इससे आगे वे तभी बढ़ेंगी जब हम उत्पादों को खरीदेंगे और इस्तेमाल करेंगे। मोबाइल और कंप्यूटर खरीदना तो एक बुनियादी जरूरत है लेकिन हम उनका कितना और कैसे उपभोग करते हैं, आगे का तकनीकी विकास इस पर निर्भर करेगा। अगर हम अपने आपको सिर्फ कन्टेन्ट के उपभोग तक सीमित रखते हैं, अर्थात् वीडियो आदि देखना, खबरें पढ़ना और संगीत सुनना, तो उसकी बदौलत आप भविष्य में तकनीकी लिहाज से बहुत अधिक आगे जाने की उम्मीद नहीं लगा सकते। जरूरत इस बात की है कि आप इन संसाधनों का कितना उत्पादकतापूर्ण प्रयोग करते हैं। आप कितने तथा किस किस्म के सॉफ्टवेयर खरीदते हैं, अपने प्रधान कामकाज में भारतीय भाषाओं में तकनीक का किस तरह प्रयोग करते हैं, आपकी उत्पादकता में इनसे किस तरह वृद्धि होती है, शिक्षण तथा सरकारी-गैर-सरकारी सेवाओं से जुड़े तकनीकी अनुप्रयोगों में आप कितनी दिलचस्पी रखते हैं आदि-आदि। मैं यहां पर भाषा तकनीकों के गुणवत्तापूर्ण तथा उत्पादकतापूर्ण प्रयोग की बात कर रहा हूं। चाहे जितना तकनीक विकास हो जाए, यदि उपभोक्ता उसे समर्थन नहीं देंगे तो भारतीय भाषाएं उस किस्म की तकनीकी सक्षमता प्राप्त नहीं कर सकेंगी जैसी हमारी आकांक्षा है।
इस दिशा में हम कितने आगे बढ़े हैं? मनोरंजन तथा संचार के प्रति भाषायी उपभोक्ता की दिलचस्पी शुरू से रही है लेकिन नए ट्रेंड क्या कहते हैं—क्या जागरूकता बढ़ने के साथ-साथ तकनीकी प्रयोग की विविधता बढ़ी है?
जी हां, वह बढ़ी अवश्य है और इसके पीछे नई पीढ़ी का सर्वाधिक योगदान है, जिसके लिए तकनीक कोई हौवा नहीं है। लेकिन भारत में तकनीकी दृष्टि से बड़ी शक्ति बनाने के लिए जिस तरह का उत्साह और दीवानगी होनी चाहिए थी, वैसी कहीं नहीं दिखती। भारतीय भाषाओं में हमारा ज्यादा ध्यान कंटेन्ट के उपभोग, संचार और सोशल नेटवर्किंग पर है। जैसे भारत में यू-ट्यूब पर देखे जाने वाले कुल वीडियो में से 90 प्रतिशत भारतीय भाषाओं में होते हैं। फेसबुक के उपभोक्ताओं की दृष्टि से भारत का पहला स्थान है जहां पर उसके 27 करोड़ प्रयोक्ता हैं। व्हाट्सएप के बीस करोड़ सक्रिय मासिक प्रयोक्ता भारत से आते हैं। भारतीय भाषाओं के स्मार्टफोन एप डेली हंट के नौ करोड़ से अधिक प्रयोक्ता हैं। इस तरह के प्लेटफॉर्मों के अपने लाभ हैं, जैसे यू-ट्यूब जैसे माध्यम न सिर्फ मनोरंजन के प्रधान माध्यम बन रहे हैं बल्कि शिक्षण, कौशल विकास और जागरूकता बढ़ाने में भी उनकी भूमिका है। अब जरूरत है कि भारतीय भाषाओं के प्रयोक्ता तकनीक का उत्पादकता के लिए भी जमकर इस्तेमाल करें-यानी अपने दफ्तर के कामकाज में, बेहतर शिक्षा पाने के लिए, सरकारी-गैर-सरकारी सेवाओं के प्रयोग के लिए। एक और सवाल जो मुझे कचोटता है वह यह कि हिंदी का उपभोक्ता भला टेबल के दूसरी तरफ ही क्यों रहे, यानी उपभोक्ता के रूप में ही? वह खुद सप्लायर या प्रदाता क्यों न बने? वह खुद तकनीकें निर्मित क्यों न करे, खुद ई-शिक्षा प्रदान क्यों न करे, खुद सेवाओं का निर्माता क्यों न बने? संक्षेप में कहें तो टिकाऊ तकनीकी विकास और डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाने के लिए जरूरी है कि हम भारतीय नई तकनीकों में निहित संभावनाओं का समग्रता से लाभ उठाएं। हमारे पास मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसे प्लेटफॉर्म मौजूद हैं ही। भारत जितनी बड़ी तकनीकी शक्तिआज है, उससे कई गुना बड़ी शक्ति बन सकता है यदि हम भारतीय भाषाओं के संख्याबल को सेवा प्राप्तकर्ता से सेवा प्रदाता में तब्दील कर दें।
संख्या बल हमारी सबसे बड़ी ताकत है इसलिए तकनीकें बनती रहेंगी और हिंदी समृद्ध होती रहेगी। लेकिन खुद को महज बाजार मानकर बैठे रहना और विकास का काम दूसरों पर छोड़ देना कोई आदर्श स्थिति नहीं है। दूसरे लोगों के सहारे नैया पार नहीं होती। वे उतना ही करेंगे जितनी कि उनकी अनिवार्यता होगी। संख्याबल का उत्सव मनाने से आगे बढ़कर हमें खुद अपनी भाषाओं में तकनीकी प्रगति का नियंत्रण संभालना होगा। एक उदाहरण देखिए- बोलने वालों की संख्या के लिहाज से दुनिया की शीर्ष 200 भाषाओं में से 6 भारत की हैं जिनमें हिंदी तीसरे नंबर पर है (हममें से बहुत से लोग इसे दूसरे नंबर पर मानते हैं)। लेकिन इंटरनेट पर कंटेन्ट के लिहाज से हिंदी का स्थान 41वां है। लगभग 15 साल पहले गूगल के तत्कालीन सीईओ एरिक श्मिट ने कहा था कि आने वाले 5-10 साल में इंटरनेट पर जिन दो भाषाओं का प्रभुत्व होगा, वे हैं-मंदारिन और हिंदी। खुश होने के लिए बहुत अच्छा उद्धरण है यह, लेकिन वह अवधि कब की निकल चुकी है और जहां इस बीच मंदारिन इंटरनेट की 10वीं सबसे बड़ी भाषा बन चुकी है, हिंदी अभी भी 41वें नंबर पर है। महत्वपूर्ण बात यह है कि हम बातों से आगे बढ़ें और वर्तमान अनुकूल परिस्थितियों का अधिकतम लाभ उठाते हुए आगे के लिए सुदृढ़ आधारशिला के निर्माण में जुटें। हमें भारतीय भाषाओं में तकनीकी उद्यमिता और टिकाऊ विकास का एक इको-सिस्टम (पारिस्थितिकीय ढांचा) तैयार करना होगा, जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ-साथ भारतीय कंपनियों, छोटे स्टार्टअप्स, स्वतंत्र विकासकर्ताओें, सरकारी तकनीकी संस्थानों और अकादमिक संस्थानों की भूमिका हो। तेजी से परिणाम लाने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) एक अच्छा मार्ग सिद्ध हो सकता है 
 
तकनीकी क्षेत्र में हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में इस बीच क्या कुछ खास हुआ है और क्यों? क्या आपको वहां कोई सिनर्जी दिखाई देती है? वहां किस किस्म के नए अवसर पैदा हो रहे हैं?
यकीनन, जैसा कि मैंने पहले भी जिक्र किया, तकनीकी क्षेत्र में हिंदी का दखल मजबूती से बढ़ रहा है, भले ही उसमें निहित संभावनाएं और भी अधिक हैं। 5 साल पहले के दौर से तुलना करें तो आज का समय एक सपने जैसा दिखाई देता है। हाल के वर्षों में मोबाइल भाषायी तकनीकों के विकास का बड़ा उत्प्रेरक बनकर उभरा है। कारण भी स्पष्ट है-कुछ ताजा अध्ययन और सर्वेक्षण इस तरफ इशारा करते हैं कि भारत में इंटरनेट स्थित कंटेन्ट का सर्वाधिक प्रयोग भारतीय भाषाओं में किया जा रहा है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार 2020 तक और कुछ के अनुसार एक साल बाद, भारत में इंटरनेट सेवाओं की खपत के मामले में भारतीय भाषाओं की हिस्सेदारी 75 फीसदी के आसपास होगी। लगभग इसी अवधि में मोबाइल फोन खरीदने वाले हर दस में से नौ लोग अपनी प्रधान भाषा के रूप में भारतीय भाषाओं का प्रयोग कर रहे होंगे। इतनी बड़ी संख्या में उपभोक्ता आ रहे हैं तो उनकी तकनीकी जरूरतें भी हैं जिन्हें पूरा करना किसी भी कारोबारी संस्थान के लिए समझदारी का काम है।
रिलायंस जियो जैसी कंपनियों ने इस संकेत को समझा है और उन्होंने इसी मोबाइल उपभोक्ता के अनुकूल परिस्थितियां पैदा करने में बड़ा योगदान दिया है। हालांकि यह उनके अपने व्यावसायिक हितों के भी अनुकूल है। किंतु इससे हुआ यह है कि बहुत बड़ी संख्या में लोगों के पास मोबाइल के जरिए ठीक-ठाक बैंडविड्थ के साथ किफायती दरों पर इंटरनेट सेवाओं का प्रयोग करने की क्षमता आ गई है। इसका प्रभाव कंटेंट के उपभोग और संचार आधारित एप्स की लोकप्रियता में दिखता है। देश में बिजली और दूरसंचार सुविधाओं की स्थिति बेहतर हुई है जिससे निचले स्तर पर कंप्यूटरों के प्रयोग के लिए भी परिस्थितियां अनुकूल हुई हैं। 
इधर माइक्रोसॉफ़्ट और गूगल जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भी बढ़ती मांग और जनाकांक्षाओं के मद्देनजर भाषायी तकनीकी विकास पर ध्यान केंद्रित किया है। लगभग हर दूसरे महीने माइक्रोसॉफ़्ट या गूगल की ओर से कोई न कोई नया भाषायी अनुप्रयोग, फीचर या सेवा जारी की जा रही है। भारत सरकार ने भी राष्ट्रव्यापी फाइबर आॅप्टिक नेटवर्क की स्थापना, मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से अनुकूल संदेश दिया है। डिजिटल इंडिया के नौ में से तीन स्तंभों में भाषायी तकनीकी विकास की प्रासंगिकता है। इसका परिणाम यह हुआ है कि अब निजी कंप्यूटर पर लगभग वह सब कुछ करना संभव है जो अंग्रेजी या दूसरी यूरोपीय भाषाओं में किया जा सकता है।
बात टेक्स्ट इनपुट, फॉन्ट और यूनिकोड समर्थन से बहुत आगे जा निकली है। अब आप विभिन्न आकार के उपकरणों में (डेस्कटॉप, लैपटॉप,टैबलेट, मोबाइल) तथा आॅनलाइन-आॅफलाइन भारतीय भाषाओं का उत्पादकतापूर्ण प्रयोग कर सकते हैं। स्पेलचेक से लेकर आॅटोकरेक्ट, हिंदी थिसॉरस से लेकर पूरे आॅपरेटिंग सिस्टम तथा आॅफिससूट के यूजर इंटरफेस (मुखावरण, संदेशों, मेनू आदि) को हिंदी या दूसरी भाषाओं में परिवर्तित किया जा सकता है। माइक्रोसॉफ्ट ने दृष्टिहीनों के लिए प्रयुक्त होने वाले नैरेटर नामक सॉफ्टवेयर में भी हिंदी का समर्थन दे दिया है और 15 भारतीय भाषाओं में ईमेल पतों के इस्तेमाल की सुविधा भी अपने इको-सिस्टम में दी है। उधर गूगल ने द्विभाषीय वेब सर्च, भारतीय भाषाओं में ऐड-सेन्स जैसी सुविधाएं शुरू की हैं। फेसबुक, ट्विटर आदि ने अपना स्थानीयकरण किया है तो बहुत सारे ई-कॉमर्स पोर्टल भी भारतीय भाषाओं को अपना रहे हैं।
बहुत-सी भारतीय कंपनियां भी भाषायी तकनीकी विकास में योगदान दे रही हैं। इनमें रेवरी, प्रोसेस 9, इंडस ओएस, शेयर चैट, क्विलपैड, शब्दकोश, पाणिनि कीबोर्ड आदि के नाम लिए जा सकते हैं। इंटरनेट सामग्री के क्षेत्र में भी अधिकांश प्रधान अखबार, पोर्टल आदि भारतीय भाषाओं में सामग्री प्रस्तुत कर रहे हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने हाल ही में अपने लोकप्रिय एमएसएन पोर्टल को हिंदी में प्रस्तुत किया है, गूगल समाचार और बिंग (माइक्रोसॉफ़्ट) समाचार तो पहले से ही हिंदी तथा अनेक दूसरी भाषाओं में उपलब्ध हैं ही।
भविष्य में भाषायी तकनीकों की क्या दिशा रहेगी?
भाषायी तकनीकी विकास की अगली सीढ़ी है—कृत्रिम मेधा या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। किसी समय पर जो काम बहुत मुश्किल हुआ करते थे, मसलन बड़ी मात्रा में डेटा इकट्ठा करना और उसका विश्लेषण, वे नई परिस्थितियों में अपेक्षाकृत काफी आसान हो गए हैं। नई परिस्थितियों से मेरा आशय-क्लाउड कंप्यूटिंग की बढ़ती लोकप्रियता, बिग डेटा जैसी अवधारणों का घटित होना, जिनमें हमारी कल्पनाओं से भी अधिक सूचनाएं एकत्र तथा प्रोसेस की जा रही हैं और कंप्यूटरों का ज्यादा से ज्यादा मेधावी या इंटेलिजेंट होते चले जाना है। एक ओर जहां हम तकनीकों को सीख रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ तकनीकें हमें सीख रही हैं। वे हमारे आचरण, कामकाज, पसंद-नापसंद, सूचनाओं के निर्माण व प्रयोग, संचार आदि से सीखकर नई क्षमताएं उत्पन्न कर रही हैं जिनका इस्तेमाल हमारी मदद के लिए किया जा सके। आने वाले वर्षों में मेधावी तकनीक लगभग हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन जाएगी। वे हमारी भाषाओं को भी लाभान्वित करने वाली हैं। आप अपनी भाषाओं का प्रयोग करते हुए ही विश्व की अन्य भाषाओं के साथ संपर्क कर सकेंगे और उनकी सामग्री का उपभोग कर सकेंगे।
यानी तकनीकी जागरूकता अगले पड़ाव की सीढ़ी है?
देश में तकनीकी जागरूकता का बड़े पैमाने पर प्रसार जरूरी है। विश्व हिंदी सम्मेलन जैसे आयोजन इस दिशा में अहम भूमिका निभा सकते हैं। लोगों को आज भी उन अनुप्रयोगों की जानकारी नहीं है जो पहले से मौजूद हैं और उनकी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं, जैसे कि इनपुट माध्यम (टाइपिंग, फॉन्ट आदि)। हम जागरूक होंगे तभी इन सीमाओं से आगे बढ़कर तकनीक का पूरा लाभ उठा सकेंगे। जरूरत है कि हम न सिर्फ सामान्य उत्पादकता सॉफ्टवेयरों, इंटरनेट, मोबाइल सेवाओं तथा क्लाउड सेवाओं के प्रयोग में निष्णात हों बल्कि उनसे आगे की भी सोचें। हमें भारत को सिर्फ बीपीओ और आउटसोर्सिंग के जरिए तकनीकी विश्व शक्ति नहीं बनाना है बल्कि उसे एक ज्ञान समाज में तब्दील करना है। तकनीक भारत में सामाजिक परिवर्तनों तथा आर्थिक विकास का निरंतर चलने वाला जरिया बन सकती है, और भाषाओं की इसमें बड़ी भूमिका होने वाली है।