हिन्दी संस्कृति का समुद्रपारीय मंथन

विदेश मंत्रालय द्वारा मॉरीशस सरकार के सहयोग से मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुई में आयोजित 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन को कई कारणों से याद किया जाएगा। पहला कारण भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की देहयात्रा पूरी होने से उपजी गहरी शोकांतिका थी। स्वाभाविक ही था कि इसके बाद उद्घाटन कार्यक्रम का उत्सवी उल्लास अनन्य हिन्दी-प्रेमी अटलजी की गहन-गरिमामय स्मृतियों में खो गया।

‘काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं..’ की हुंकार भरने वाले राष्ट्रनायक के देहावसान का संयोग देखिए। अंत समय में भी जहां अटलजी ने स्वाधीनता दिवस पर राष्ट्रध्वज झुकने नहीं दिया, वहीं 16 अगस्त को पोर्ट लुई में जब दोनों देशों के ध्वज झुके तोे कवि, पत्रकार, लेखक के रूप में साहित्य की सर्वतोमुखी प्रतिभा की यादें पूरी दुनिया में फैले हिन्दी के कुनबे को एक छत के नीचे समेट लार्इं। निश्चित ही ये क्षण आयोजन में सम्मिलित सभी लोगों के लिए जीवन भर की थाती बनेंगे। सम्मेलन का मुख्य विषय था ‘हिन्दी विश्व और भारतीय संस्कृति’। इस आयोजन को स्मरणीय बनाने वाली यह भी महत्वपूर्ण बात रही। ठीक ही तो है, संस्कृति के बिना भाषा क्या है? भाषा विमर्श के नाम पर उसके उत्स और स्वभाव की परतों को जाने बिना केवल मात्रा-बिंदियों की बात गूढ़ कितनी ही लगे, अंतत: होती थोथी ही है। इस थोथेपन से यह आयोजन बचा रहा। विभिन्न सत्रों में भाषा को परंपरा और भूगोल के दर्पण में देखा गया। भाषा के दायरे की परिभाषा के अतिरिक्त उसकी धुरी को पहचानने-बताने के प्रयास हुए। हिन्दी केवल भाषा नहीं है, अपितु विश्व कल्याण का उदार वैचारिक उद्गार है। भारतीय संस्कृति का केंद्रीय भाव-‘वसुधैव कुटुंबकम्’ इस आयोजन के माध्यम से एक बार पुन: रेखांकित हुआ। निश्चित ही भारत की सब बोली-बानियों को जोड़ने वाली भाषा इस देश को मजबूत करती है तो विश्व व्यवस्था का एक सकारात्मक मानवतावादी ध्रुव बनता है।

 

ये सीढ़ियां युनेस्को विश्व धरोहर हैं, इन्हीं से चलकर भारतीय मजदूरों ने कभी वीरान रहे इस टापू पर कदम रखे थे जिसे आज मॉरीशस कहा जाता है।

ये सीढ़ियां युनेस्को विश्व धरोहर हैं, इन्हीं से चलकर भारतीय मजदूरों ने कभी वीरान रहे इस टापू पर कदम रखे थे जिसे आज मॉरीशस कहा जाता है।

समारोह को यादगार बनाने वाली तीसरी बात स्थान का चयन है। गिरमिटिया देशों में हिन्दी सम्मेलन पहले भी हुए हैं। स्वयं मॉरीशस 1976 में भी दूसरे विश्व हिन्दी सम्मेलन का आतिथ्य प्रदान करने वाला साक्षी रहा है। किन्तु फिर भी किसी बौद्धिक आयोजन के व्यस्त सत्रों के बीच जरा-सी छुट्टी ‘अप्रवासी घाट’ जैसी पावन याद में डूबने की गुंजाइश देती है तो यह अनुभव न भूलने वाला है। अप्रवासी घाट की वे सीढ़ियां आज यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व धरोहर हैं जिन पर चलकर करीब 5 लाख भारतीय मजदूर गन्ने की खेती के लिए ब्रिटिश राज में इस निर्जन द्वीपे पर लाए गए थे। भय, प्रलोभन और एग्रीमेंट (इससे ही गिरमिटिया शब्द बना, क्योंकि ये भोले-अपढ़ लोग परमिट, एग्रीमेंट जैसे कठिन अंग्रेजी शब्दों का उच्चारण नहीं कर पाते थे) से बंधे इन अप्रवासी भारतीयों ने इस श्रम की पराकाष्ठा का अप्रतिम उदाहरण विश्व के सामने रखा। आज अफ्रीकी महाद्वीप में सबसे ऊंची-अच्छी आयदर और मानवाधिकारों के पैमाने पर मॉरीशस की गिनती होती है। निर्जन टापू पर आंसू बहाने की बजाय इन भारतीयों ने जमकर पसीना बहाया, रामायण तथा भारतीय संस्कृति को गले से लगाए रखा और मिट्टी को सोने में बदल दिया। कहना होगा कि मॉरीशस की मेजबानी वाला 11वां विश्व हिन्दी सम्मेलन साम्राज्यवादी दौर की क्षणिकता और संस्कृति की अटलता को उद्घोषित करने वाला महत्वपूर्ण आयोजन था।