आहत को राहत

दक्षिणी राज्य केरल सदी की सबसे बड़ी आपदा से जूझ रहा है। प्रलयंकारी बाढ़ से निजी और सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान हुआ है, जिससे राज्य कई बरस पीछे चला गया है। केरल में बड़ी संख्या में आहत नागरिकों को राहत पहुंचाने के लिए सेना के जवान और रा.स्व. संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले जलमग्न इलाकों में पहुंचे। उन्होंने न केवल पीड़ितों को सुरक्षित स्थानों तक पहुुंचाया बल्कि भोजन और दवाएं उपलब्ध करवार्इं

15 अगस्त से केरल में आई प्रचंड बाढ़ ने तबाही का मचा रखी है। बाढ़ की क्षुधातुर विनाशलीला मानो सबकुछ निगल जाने पर आमादा है। समूचा राज्य कई फुट पानी में डूब गया है। कई गांव, कस्बे और प्रमुख शहरों के भी कुछ हिस्से जलमग्न हो चुके हैं। केरल के इतिहास में 1924 के बाद इतनी प्रलयंकारी बारिश नहीं हुई थीं। लगातार हो रही मूसलाधार बारिश से राज्य में ऐसा जलप्रलय आया जिसकी कल्पना यहां के बुजुर्गों ने भी नहीं की थी।इस बार की भीषण बारिश ने न केवल घाटियों, गांवों और कस्बों, बल्कि राज्य के समस्त पूर्वी हिस्से में भी आतंक फैला दिया है। इन्हीं पहाड़ों के ऊपर सिंचाई और पनबिजली परियोजनाओं के सभी बांध स्थित हैं। केरल का सबसे बड़ा बांध इडुक्की करीब 850 मीटर ऊंचे पहाड़ पर बना है। मुलप्पेरियार तो और भी अधिक ऊंचाई पर स्थित है। जब पहाड़ों पर मूसलाधार बारिश होने लगी और जलस्तर तेजी से बढ़ने लगा तो केरल राज्य विद्युत बोर्ड (केएसईबी) और राज्य सरकार ने 15 अगस्त की रात और 16 अगस्त की सुबह बांध के कपाटों को खोलने का फैसला किया, जिससे पलक्कड़, त्रिशूर, कोट्टायम, इडुक्की, एर्नाकुलम, अलप्पुझा, पतनमट्टा जैसे कई जिलों में भारी बाढ़ की स्थिति पैदा हो गई। कोट्टायम, इडुक्की और एर्नाकुलम में पेरियार, त्रिशूर में चालक्कुड़ी, पलक्कड़ में नीला, मुवात्तुझा, मीनाचेल, अलप्पुझा और पतनमट्टा के कुछ हिस्से में पम्पा, वायनाड में कबानी नदियों और बनसुरसागर बांध की वजह से केरल में चारों तरफ जलप्रलय का भयावह मंजर दिखाई देने लगा। चंद घंटों के भीतर, चालक्कुडी, अलुवा, उत्तरी पारूर, कडुंगल्लूर जैसे शहर, एर्नाकुलम जिले में कोच्चि के कई उपनगर, त्रिशूर के कई हिस्से, कोट्टायम और इडुक्की जिलों के कई इलाके, अलप्पुझा जिले के चेंगन्नूर और कुट्टानाद, पतनमट्टा जिले के कोझेंचेरी व पतनमट्टा कस्बे, वायनडु और कोझिकोड तथा कन्नूर, तिरुअनंतपुरम के कई इलाके जलमग्न हो गए। राज्य के 14 जिलों में से कासरगोड और कोल्लम में बाढ़ की विनाशलीला चरम पर है। चेंगानूर, वायक्कोम, अलुवा, पारूर, चालक्कुडी, त्रिशूर, पलक्कड़ पर इंद्र का प्रकोप सबसे ज्यादा है और इन शहरों के उपनगरीय क्षेत्रों तथा वायनाडु व मलप्पुरम के करीब सभी इलाके डूब चुके हैं। इन इलाकों के साथ अंकमली, कालड़ी (आद्य शंकराचार्य का जन्म स्थान), कदुंगल्लूर और वायनाडु बाढ़ के कारण राज्य के अन्य हिस्सों से कट गए। इन इलाकों में जलस्तर लगातार बढ़ता ही जा रहा था। फसलें डूब गर्इं। केरल में धान की उपज का सबसे बड़ा केंद्र अलप्पुझा का कुट्टनाडू पूर्णत: जलमग्न हो गया। लगातार बढ़ते जलस्तर के कारण रेल और सड़क यातायात ठप पड़ गया। कोच्चि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को बंद कर दिया गया। सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के कार्यालय, दुकानें, बैंक बंद हो गए। एक तरफ बाढ़ग्रस्त इलाकों में दुकानें डूबने के कारण खाद्य सामग्री नष्ट हो गई, दूसरी ओर बाढ़ से घबराकर लोगों ने जरूरत की वस्तुओं की बेहिसाब खरीदारी शुरू कर दी। इससे दुकानों में आवश्यक वस्तुओं की किल्लत होने लगी। हालांकि खरीदारी करने वाले लोग सुरक्षित इलाकों में थे। अफवाहों से फैली दहशतदरअसल, बढ़ते जलस्तर के साथ अफवाहें भी फैल रही थीं। आशंका जताई गई कि मुलप्पेरियार बांध टूट सकता है। इससे न केवल बाढ़ प्रभावित इलाकों में फंसे लोगों, बल्कि सुरक्षित इलाकों में रहने वाले लोगों में भी दहशत फैल गई। वास्तव में अगर मुलप्पेरियार बांध टूट जाता तो अनुमान था कि चार जिले कोट्टायम, इडुक्की, अलप्पुझा और एर्नाकुलम तो डूबते ही, त्रिशूर जिले का बड़ा हिस्सा पूरी तरह से जलमग्न हो जाता और केरल के 70 लाख से अधिक लोग काल के ग्रास बन जाते। चार जिले तो लगभग 60 फुट पानी में कई हफ्ते तक डूबे रहते। इस तरह इन अफवाहों ने लाखों लोगों को मानसिक रूप से विचलित कर दिया था। आपदा से बचने के लिए काफी लोगों ने अपने घरों की पहली मंजिल पर शरण ली, जबकि अधिकांश लोगों को अपने सगे-संबंधियों और दोस्तों के घरों में शरण लेनी पड़ी। बाकी बचे लोगों ने सरकारी भवनों, रा.स्व.संघ, सेवाभारती, भाजपा और अन्य गैर सरकारी संगठनों द्वारा लगाए गए राहत शिविरों में आश्रय लिया। सबसे अधिक बेहाल वे लोग थे, जिन्होंने घर की छतों पर शरण ली थी। जलस्तर फिर से बढ़ने लगा था और मौत उनके सामने मंडरा रही थी। बिजली आपूर्ति और संचार सेवा तो पहले ही ठप पड़ चुकी थी। लोगों के मोबाइल फोन भी बंद हो चुके थे। इस कारण वे बचाव, भोजन या पानी के लिए रिश्तेदारों या अधिकारियों से मदद की गुहार भी नहीं लगा सकते थे। पूरी तरह से मुसीबत में घिरे लोगों को उम्मीद की कोई किरण नहीं दिख रही थी। एक-एक दिन भारी था। भोजन, पानी और दवा के अभाव में कई लोगों की जान चली गई। रा.स्व.संघ मदद में सबसे आगेबाढ़ में फंसे लोगों की मदद के लिए सेना के जवानों के साथ ही सबसे पहले रा.स्व.संघ, सेवाभारती तथा संघ से जुड़े कई संगठन आगे आए। बड़ी संख्या में स्वयंसेवक चर्च और मुस्लिम समूहों के शिविरों में भी पीड़ितों की मदद में जुटे रहे। रा.स्व.संघ के स्वयंसेवकों ने बचाव अभियान के लिए करीब 150 नौकाओं की व्यवस्था की है, जिन्हें भारतीय मत्स्य प्रवर्धक संघम (बीएमपीएस) और संघ के कार्यकर्ता संचालित कर रहे हैं। बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत एवं बचाव कार्य में रा.स्व.संघ से जुड़े कम से कम 20 संगठन सरकारी राहत शिविरों में अपना योगदान दे रहे हैं।सेवाभारती ने तिरुवनंतपुरम, कासरगोड और पलक्कड़ में तीन केंद्र खोले हैं, जहां राहत सामग्री एकत्र की जा रही है। उसने राज्य स्तर पर 24 घंटे काम करने वाली एक हेल्पलाइन शुरू की है, जिसका संचालन 10 स्वयंसेवक कर रहे हैं और सरकारी एजेंसियों के साथ दूसरे राज्यों व विदेशों में रहने वाले चिंतित परिजनों तक आवश्यक जानकारी पहुंचा रहे हैं। अन्य जिलों में भी हेल्पलाइन शुरू की जा रही है। सेवाभारती हेल्पलाइन से मिली जानकारी के आधार पर सरकारी एजेंसियों ने कम से कम 600 लोगों की जान बचाई है। सेवाभारती के अलावा, संघ के अन्य आनुषांगिक संगठन जैसे भारतीय मजदूर संघ, अ.भा.वि.प, बीएमपीएस और भाजपा द्वारा चलाए जा रहे सहायता कार्याें के तहत कम से कम 10,000 लोगों को बचाया गया है। बचाव अभियान में जुटे स्वयंसेवक अपनी जान तक की परवाह नहीं कर रहे। बचाव कार्य के दौरान दुर्भाग्यवश दस स्वयंसेवकों को अपने बहुमूल्य जीवन का बलिदान देना पड़ा जिनके नाम हैं- मनीष, रघुनाथ, हरिनारायणन, रंजीत, संजीव, मणिकांतन, शिवदास, अनीश, विशाल और अजीत। युवा बैंक कर्मचारी अमल स्कारिया उर्फ उन्नी की बाढ़ पीड़ितों को भोजन पहुंचाने के बाद अपने गृह नगर कुथट्टुकुलम लौटने के दौरान मौत हो गई। जिन जगहों पर गहराई कम थी और बड़ी नाव नहीं जा सकती थी, वहां स्वयंसेवकों ने गर्दन तक पानी में उतरकर नावों को खींच कर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। अभी जहां भी नजर जाती है, वहां अथाह पानी दिखाई दे रहा है। राहत एवं बचाव अभियान जारी है। सेवाभारती कुट्टानुडू और अलप्पुझा के अन्य प्रभावित क्षेत्रों में बचाव कार्य और भोजन व आवश्यक वस्तुओं को नौकाओं से पहुंचा रही है। बाद में बाढ़ ने जब विकराल रूप धारण किया तो थल सेना, नौसेना व वायु सेना के जवानों को भी बचाव एवं राहत कार्य में लगाया गया। हेलीकॉप्टरों की मदद से छतों पर फंसे सैकड़ों लोगों को बचाया गया, पर बरामदों और एल्युमीनियम की छतों वाले मकानों पर बैठे लोगों को निकालने में कठिनाई आने के कारण उन्हें नावों से सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। कोझिकोड व तिरुअनंतपुरम से आए मछुआरों ने भी लोगों की सुरक्षित निकासी में भरपूर मदद की। जुलाई के आखिर और अगस्त के शुरुआती सप्ताह में गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू ने राज्य का दौरा किरके 160 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की थी। गृह मंत्री राजनाथ सिंह के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया। गृह मंत्री ने 100 करोड़ और प्रधानमंत्री ने 500 करोड़ रुपये देने की घोषणा की। साथ ही, प्रधानमंत्री ने सड़कों और तबाह घरों के पुनर्निर्माण की भी बात कही। खास बात यह कि उन्होंने केंद्र सरकार की रोजगार योजना के तहत 5़.5 करोड़ रोजगार दिवस की घोषणा भी की। इसके अलावा, कई राज्यों ने भी मदद के लिए हाथ बढ़ाए हैं। महाराष्ट्र ने 20 करोड़, गुजरात ने 10 करोड़, उत्तर प्रदेश और बिहार ने 15-15 करोड़, हरियाणा 10 करोड़ और झारखंड ने 5 करोड़ रुपये की सहायता की घोषणा की है। पानी से सराबोर इलाकों से लोगों को निकालने के लिए स्वयंसेवकों ने जो साधन बन पड़ा उसे प्रयोग में लिया ऐसी स्थिति में भी राजनीति!राज्य सरकार और विपक्ष में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ केंद्र सरकार से बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग कर रही है। केंद्र सरकार ने इसे एल-3 स्तर की आपदा माना है। केरल उच्च न्यायालय में इससे संबंधित एक जनहित याचिका के जवाब में असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एन. नागरेश ने कहा कि कानून या मैनुअल में इस तरह की आपदा को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने का कोई प्रावधान नहीं है। गैर सरकारी संगठनों और राष्ट्रवादी विचारधारा के लोगों के साथ भाजपा और कांग्रेस की भी मांग थी कि बचाव अभियान की पूरी जिम्मेदारी सेना को सौंपी जाए ताकि राहत कार्य को बेहतर तरीके से अंजाम दिया जा सके। लेकिन माकपा के राज्य सचिव कोडियारी बालकृष्णन ने इसे राज्य में सैन्य शासन की मांग से जोड़ लिया। हालांकि इसका मकसद यह था कि राहत एवं बचाव कार्यों के लिए प्रशासन से अनुमति लेने में सेना का समय नष्ट न हो। ऐसा हुआ भी है। एक अवसर पर अनुमति पत्र पर जिला कलेक्टर के हस्ताक्षर नहीं थे इसलिए छत पर फंसे लोगों को बचाने के लिए हेलीकॉप्टर उड़ान ही नहीं भर सका। लोगों का का मानना है कि जिद पर अड़ी राज्य सरकार इस विपति में भी राजनीतिक रोटियां सेंक रही है। जनप्रतिनिधि और मंत्री विदेश मेंराज्य के लोग इस बात से भी नाराज हैं कि राज्य बाढ़ की चपेट में था और वन मंत्री के़ राजू 16 अगस्त को एक समारोह में भाग लेने के लिए जर्मनी चले गए। के. राजू इडुक्की के पड़ोसी जिला कोट्टायम के भाकपा प्रभारी हैं, जहां मुलप्पेरियार और इडुक्की बांध स्थित हैं। वे राज्य के हालात से पूरी तरह से वाकिफ थे। कोट्टायम में स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन में उन्होंने इसका स्पष्ट तौर से जिक्र भी किया था। राज्य में जब विरोध के स्वर मुखर हुए तो पार्टी ने राजू को वापस बुला लिया। अब उन्हें बर्खास्त करने की बात चल रही है। इसके बावजूद राजू का कहना है कि मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और उनकी पार्टी ने विदेश जाने की इजाजत दी थी।  मुस्लिम लीग के सांसद ई़ टी. मोहम्मद बशीर, कांग्रेस सांसद शशि थरूर, सीपीआई के विधायक और जेएनयू के पूर्व छात्र मोहम्मद मुहसिन विदेश में हैं। ऐसी भी खबरें हैं कि राज्य में मौजूद होने के बावजूद कुछ सांसद और विधायक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में गए ही नहीं। हालांकि अब जलस्तर कम होने लगा है। लेकिन बाढ़ की विभीषिका में अब तक करीब 400 लोगों की मौत हो चुकी है। आधिकारिक तौर पर 3,274 राहत शिविरों में 10,01,049 बच्चों सहित 10,28,073 लोगों ने आश्रय ले रखा है। करीब 17,343 घर और झोपड़ियां क्षतिग्रस्त हुईं हैं। राज्य सरकार के सामने ढेरों चुनौतियां हैं। जलापूर्ति, ट्रेन व बस सेवाओं की बहाली के साथ संक्रामक रोगों से बचाव के लिए बड़े पैमाने पर कार्य करने होंगे। कोच्चि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से विमानों की आवाजाही शुरू होने तक नौसैनिक हवाईअड्डे से घरेलू हवाई सेवा शुरू की जा रही है। बहरहाल, केरल को इस आपदा से उबार कर जनजीवन को पटरी पर लाने के लिए केंद्र सरकार हर संभव आर्थिक मदद कर रही है। रा.स्व.संघ, इससे जुड़े तमाम संगठनों के कार्यकर्त्ता भी तन-मन से इस कार्य में जुटे हुए हैं। बाढ़ पीड़ितों की मदद करते स्वयंसेवक रा.स्व. संघ की अपील‘संकट की घड़ी में राष्ट्रजन हों केरल की विपदा में सहभागी’केरल में बाढ़ की विभीषिका पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी ने देश से आह्वान करते हुए कहा कि केरल अभूतपूर्व और अप्रत्याशित बाढ़ की विभीषिका का सामना कर रहा है, जिसमें सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी हैं। हजारों लोगों को बेघर होना पड़ा है और लाखों लोग जगह-जगह पर फंसे हुए हैं। ऐसे में राज्य एक भयानक संकट के कगार पर है। लेकिन अनेक बाधाओं के बावजूद हमारी सेना, राष्ट्रीय आपदा राहत बल, केंद्र व राज्य सरकार बाढ़ राहत के लिए युद्धस्तर पर कार्य कर रही हैं। तो बड़ी संख्या में आमजन, संघ के स्वयंसेवक, सेवाभारती और अनेक सामाजिक, धार्मिक एवं स्वयंसेवी संगठन अपनी जान को जोखिम में डालते हुए पीड़ितों के बचाव और राहत के कार्य में दृढ़तापूर्वक सहयोग कर रहे हैं। उनकी तत्परता और सेवा प्रशंसनीय है। लेकिन संकट विकट है, साधन सीमित हैं। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ धार्मिक, सामाजिक संगठनों सहित समस्त राष्ट्रजनों से आह्वान करता है कि संकट की इस घड़ी में हम केरलवासियों के साथ खड़े हों और बाढ़ पीड़ितों की बढ़-चढ़कर हर संभव सहायता करेंजलमग्न क्षेत्रों से महिलाओं और बड़े-बुजुर्गों को हेलीकॉप्टर से सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने में वायुसेना के जवानों ने असाधारण कार्य किया जलमग्न क्षेत्रों से महिलाओं और बुजुर्गो को बाहर निकालते हुए सेना के जवान   राहत कोष से मुख्यमंत्री की हेलीकॉप्टर यात्रा का भुगतान ! जब देश में प्राकृतिक या मानवनिर्मित विभीषिका आती है तो देश-विदेश से विभिन्न माध्यमों से राहत सामग्री, दवाएं और आर्थिक सहायता मिलती है। लेकिन हैरानी होती है जब आपदा राहत के लिए मिले धन का उपयोग निजी कार्यों पर किया जाए। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन इसका उदाहरण हैं। मुख्यमंत्री 26 दिसंबर, 2017 को अपनी पार्टी के जिला स्तरीय सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए एक निजी कंपनी के हेलीकॉप्टर से त्रिशूर गए। इसके बाद वे ओखी तूफान का जायजा लेने आए एक अंतरराज्यीय मंत्री स्तरीय केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल से मिलने चले गए। इसके बाद वे फिर वापस बैठक में हिस्सा लेने के लिए त्रिशूर आए। हेलीकॉप्टर का किराया 8 लाख रुपये बैठा। 6 जनवरी, 2018 को राज्य सरकार ने तिरुअनंतपुरम के जिलाधिकारी को हेलीकॉप्टर के बिल के भुगतान के लिए 8 लाख रुपये राज्य के आपदा राहत कोष से जारी करने का आदेश दिया। लेकिन सियासी गलियारों में राहत कोष के दुरुपयोग पर विवाद बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय ने आदेश को रद्द कर दिया और यह कहकर किनारा कर लिया कि मुख्यमंत्री को इस बारे में जानकारी नहीं थी।खतरे की घंटी बजी थी, सोती रही सरकारख्यातिप्राप्त पर्यावरणविद् माधव गाडगिल ने केरल आपदा को ‘मानवनिर्मित’ आपदा कहकर राज्य सरकार की कार्यशैली पर कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि बिना किसी पूर्व सूचना के बांधों के द्वार खोलने से राज्य में जलप्रलय के हालात बने हैं। उल्लेखनीय है कि 2011 में माधव गाडगिल ने पश्चिमी घाट के पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर एक विस्तृत रपट जारी की थी, जो पूरी तरह से शोधपरक थी। रपट में स्पष्ट कहा गया था कि खनन, तेजी से वनों की कटाई, बेतहाशा बहुमंजिला इमारतों का निर्माण और अतिक्रमण आने वाले दिनों में राज्य के लिए एक बड़े खतरे का संकेत है। लेकिन राज्य सरकार ने उनकी रपट को सिरे से खारिज कर दिया था। केरल के मौजूदा हालात पर गाडगिल का कहना है कि 50 साल पुराने सभी बांधों को हटा देना चाहिए। साथ ही, पर्यावरण का दोहन भी तत्काल बंद कर देना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में और अधिक गंभीर परिणाम सामने आएंगे।पानी से सराबोर इलाकों से लोगों को निकालने के लिए स्वयंसेवकों ने जो साधन बन पड़ा उसे प्रयोग में लियाराहत शिविरों में भेजे जाने के लिए भोजन पैकेट तैयार करते सेवाभारती के कार्यकर्ताशशि थरूर की आंख मिचौलीकेरल प्रलयंकारी बाढ़ का सामना कर रहा था और शशि थरूर ने हालात का जायजा लेना भी जरूरी नहीं समझा। ऐसे में आपदाग्रस्त लोगों को उन पर गुस्सा तो आएगा ही। फिर खबरें आई कि वे संयुक्त राष्टÑ और उसकी सहयोगी संस्थाओं से राहत कार्यों के लिए सहायता मांगने जिनेवा गए हैं। पत्नी सुनंदा की मौत के मामले में जमानत पर चल रहे कांग्रेस सांसद थरूर का कहना है कि वे मुख्यमंत्री पिनराई विजयन से चर्चा करने के बाद ही सहायता मांगने निकले थे। उन्होंने ट्वीट किया कि वे केरल में आई बाढ़ पर अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय लोकोपकारी एजेंसियों से सलाह-मशविरा करने जिनेवा जा रहे हैं। उन्होंने लिखा, ‘वैसे सहायता मांगना भारत सरकार के विशेषाधिकार में आता है, लेकिन मैं यहां केरल के मुख्यमंत्री से हुई बातचीत के बाद यह पता लगाने आया हूं कि यथा संभव कैसी मदद मिल सकती है।’ हालांकि केरल के मुख्यमंत्री ने साफ इनकार करते हुए कहा कि थरूर उनके प्रतिनिधि के रूप में जिनेवा नहीं गए थे।मुख्य सचिव ने गलती स्वीकार कीराज्य के मुख्य सचिव टॉम जोस ने माना कि बांध से पानी छोड़ने से पहले लोगों को सूचना देने में कोताही बरती गई। उन्होंने मीडिया से कहा कि वायनाडु स्थित बनार्जुन सागर बांध का द्वार खोलने से पहले लोगों को ठीक से चेतावनी नहीं दी गई। बता दें कि बांध से पानी छोड़े जाने के कारण वायनाडु में भारी नुकसान हुआ है। उधर, माकपा विधायक राजू अब्राहम का आरोप है कि राजस्व विभाग और केरल राज्य विद्युत बोर्ड हालात से निपटने में असफल रहे। हालांकि विद्युत बोर्ड ने इन आरोपों को खारिज किया है। अमेजन के जरिये चंदा ले रहीं मिनशनरियां: अमेजन इंडिया लोगों से केरल की मदद के लिए चंदा मांग रहा है। यह पैसा जिन चार एनजीओ को दिया जाएगा वे हैं- हैबिटेट फॉर ह्यूमैनिटी इंडिया, वर्ल्ड विजन इंडिया, गूंज और आॅक्सफैम इंडिया। इनमें दो ईसाई मिशनरी हैं, जो विदेशी चंदे से हिंदुओं का कन्वर्जन करवाने के लिए बदनाम रही हैं। सुनामी के समय भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के नाम से यही खेल खेला था। राहत शिविरों में सीपीएम की दादागीरीआपदा की घड़ी में भी माकपा अपना बाहुबल दिखाने से बाज नहीं आ रही। उसके लोगों ने कोच्चि के पास नयारामबलम में एक राहत शिविर और भोजन सहित सभी राहत सामग्री को अपने कब्जे में ले लिया। साथ ही, अन्य शिविरों में राहत सामग्री पहुंचाने के लिए प्रयुक्त होने वाले वाहनों में अपनी पार्टी का झंडा लगा दिया। इससे माकपा और अन्य पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच तनाव की स्थिति बन गई। बाद में पुलिस आई और चेतावनी दी कि अगर राहत सामग्री के वितरण में शिकायत आई तो उसे कब्जे में ले लिया जाएगा। इस पर माकपा का स्थानीय सचिव भड़क गया और उसने अनाज से भरी बोरी एक पुलिसकर्मी के सिर पर रख दी। प्रमुख समाचार चैनलों द्वारा इस घटना का प्रसारण करने के बाद माकपा रक्षात्मक मुद्रा में है। वहीं, कोट्टायम जिले के वैकोम राहत शिविर में माकपा ने ग्रामीण अधिकारी को सेवाभारती द्वारा मुहैया कराई गई गाड़ी में जाने से रोक दिया है। इस पर ग्रामीण अधिकारी ने कहा कि अगर वे वाहन उपलब्ध करा दें तो वह सेवाभारती की गाड़ी छोड़ देंगे। लेकिन ‘कामरेडों’ ने गाड़ी उपलब्ध कराने में असमर्थता जताई। रोचक बात यह है कि ग्रामीण अधिकारियों को सरकार की ओर से गाड़ियां ही नहीं मुहैया कराई गई हैं। अधिकारी भी जानते हैं कि रा.स्व.संघ और सेवाभारती के सहयोग के बिना वे अपना काम उचित ढंग से कर ही नहीं सकते। रा.स्व.संघ के स्वयंसेवक नि:स्वार्थ भाव से लोगों की सेवा कर रहे हैं।

15 अगस्त से केरल में आई प्रचंड बाढ़ ने तबाही का मचा रखी है। बाढ़ की क्षुधातुर विनाशलीला मानो सबकुछ निगल जाने पर आमादा है। समूचा राज्य कई फुट पानी में डूब गया है। कई गांव, कस्बे और प्रमुख शहरों के भी कुछ हिस्से जलमग्न हो चुके हैं। केरल के इतिहास में 1924 के बाद इतनी प्रलयंकारी बारिश नहीं हुई थीं। लगातार हो रही मूसलाधार बारिश से राज्य में ऐसा जलप्रलय आया जिसकी कल्पना यहां के बुजुर्गों ने भी नहीं की थी।

इस बार की भीषण बारिश ने न केवल घाटियों, गांवों और कस्बों, बल्कि राज्य के समस्त पूर्वी हिस्से में भी आतंक फैला दिया है। इन्हीं पहाड़ों के ऊपर सिंचाई और पनबिजली परियोजनाओं के सभी बांध स्थित हैं। केरल का सबसे बड़ा बांध इडुक्की करीब 850 मीटर ऊंचे पहाड़ पर बना है। मुलप्पेरियार तो और भी अधिक ऊंचाई पर स्थित है। जब पहाड़ों पर मूसलाधार बारिश होने लगी और जलस्तर तेजी से बढ़ने लगा तो केरल राज्य विद्युत बोर्ड (केएसईबी) और राज्य सरकार ने 15 अगस्त की रात और 16 अगस्त की सुबह बांध के कपाटों को खोलने का फैसला किया, जिससे पलक्कड़, त्रिशूर, कोट्टायम, इडुक्की, एर्नाकुलम, अलप्पुझा, पतनमट्टा जैसे कई जिलों में भारी बाढ़ की स्थिति पैदा हो गई। कोट्टायम, इडुक्की और एर्नाकुलम में पेरियार, त्रिशूर में चालक्कुड़ी, पलक्कड़ में नीला, मुवात्तुझा, मीनाचेल, अलप्पुझा और पतनमट्टा के कुछ हिस्से में पम्पा, वायनाड में कबानी नदियों और बनसुरसागर बांध की वजह से केरल में चारों तरफ जलप्रलय का भयावह मंजर दिखाई देने लगा। चंद घंटों के भीतर, चालक्कुडी, अलुवा, उत्तरी पारूर, कडुंगल्लूर जैसे शहर, एर्नाकुलम जिले में कोच्चि के कई उपनगर, त्रिशूर के कई हिस्से, कोट्टायम और इडुक्की जिलों के कई इलाके, अलप्पुझा जिले के चेंगन्नूर और कुट्टानाद, पतनमट्टा जिले के कोझेंचेरी व पतनमट्टा कस्बे, वायनडु और कोझिकोड तथा कन्नूर, तिरुअनंतपुरम के कई इलाके जलमग्न हो गए। राज्य के 14 जिलों में से कासरगोड और कोल्लम में बाढ़ की विनाशलीला चरम पर है। चेंगानूर, वायक्कोम, अलुवा, पारूर, चालक्कुडी, त्रिशूर, पलक्कड़ पर इंद्र का प्रकोप सबसे ज्यादा है और इन शहरों के उपनगरीय क्षेत्रों तथा वायनाडु व मलप्पुरम के करीब सभी इलाके डूब चुके हैं। इन इलाकों के साथ अंकमली, कालड़ी (आद्य शंकराचार्य का जन्म स्थान), कदुंगल्लूर और वायनाडु बाढ़ के कारण राज्य के अन्य हिस्सों से कट गए। इन इलाकों में जलस्तर लगातार बढ़ता ही जा रहा था। फसलें डूब गर्इं। केरल में धान की उपज का सबसे बड़ा केंद्र अलप्पुझा का कुट्टनाडू पूर्णत: जलमग्न हो गया। लगातार बढ़ते जलस्तर के कारण रेल और सड़क यातायात ठप पड़ गया। कोच्चि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को बंद कर दिया गया। सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के कार्यालय, दुकानें, बैंक बंद हो गए। एक तरफ बाढ़ग्रस्त इलाकों में दुकानें डूबने के कारण खाद्य सामग्री नष्ट हो गई, दूसरी ओर बाढ़ से घबराकर लोगों ने जरूरत की वस्तुओं की बेहिसाब खरीदारी शुरू कर दी। इससे दुकानों में आवश्यक वस्तुओं की किल्लत होने लगी। हालांकि खरीदारी करने वाले लोग सुरक्षित इलाकों में थे।

अफवाहों से फैली दहशत

दरअसल, बढ़ते जलस्तर के साथ अफवाहें भी फैल रही थीं। आशंका जताई गई कि मुलप्पेरियार बांध टूट सकता है। इससे न केवल बाढ़ प्रभावित इलाकों में फंसे लोगों, बल्कि सुरक्षित इलाकों में रहने वाले लोगों में भी दहशत फैल गई। वास्तव में अगर मुलप्पेरियार बांध टूट जाता तो अनुमान था कि चार जिले कोट्टायम, इडुक्की, अलप्पुझा और एर्नाकुलम तो डूबते ही, त्रिशूर जिले का बड़ा हिस्सा पूरी तरह से जलमग्न हो जाता और केरल के 70 लाख से अधिक लोग काल के ग्रास बन जाते। चार जिले तो लगभग 60 फुट पानी में कई हफ्ते तक डूबे रहते। इस तरह इन अफवाहों ने लाखों लोगों को मानसिक रूप से विचलित कर दिया था।

आपदा से बचने के लिए काफी लोगों ने अपने घरों की पहली मंजिल पर शरण ली, जबकि अधिकांश लोगों को अपने सगे-संबंधियों और दोस्तों के घरों में शरण लेनी पड़ी। बाकी बचे लोगों ने सरकारी भवनों, रा.स्व.संघ, सेवाभारती, भाजपा और अन्य गैर सरकारी संगठनों द्वारा लगाए गए राहत शिविरों में आश्रय लिया। सबसे अधिक बेहाल वे लोग थे, जिन्होंने घर की छतों पर शरण ली थी। जलस्तर फिर से बढ़ने लगा था और मौत उनके सामने मंडरा रही थी। बिजली आपूर्ति और संचार सेवा तो पहले ही ठप पड़ चुकी थी। लोगों के मोबाइल फोन भी बंद हो चुके थे। इस कारण वे बचाव, भोजन या पानी के लिए रिश्तेदारों या अधिकारियों से मदद की गुहार भी नहीं लगा सकते थे। पूरी तरह से मुसीबत में घिरे लोगों को उम्मीद की कोई किरण नहीं दिख रही थी। एक-एक दिन भारी था। भोजन, पानी और दवा के अभाव में कई लोगों की जान चली गई।

रा.स्व.संघ मदद में सबसे आगे

बाढ़ में फंसे लोगों की मदद के लिए सेना के जवानों के साथ ही सबसे पहले रा.स्व.संघ, सेवाभारती तथा संघ से जुड़े कई संगठन आगे आए। बड़ी संख्या में स्वयंसेवक चर्च और मुस्लिम समूहों के शिविरों में भी पीड़ितों की मदद में जुटे रहे।

रा.स्व.संघ के स्वयंसेवकों ने बचाव अभियान के लिए करीब 150 नौकाओं की व्यवस्था की है, जिन्हें भारतीय मत्स्य प्रवर्धक संघम (बीएमपीएस) और संघ के कार्यकर्ता संचालित कर रहे हैं। बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत एवं बचाव कार्य में रा.स्व.संघ से जुड़े कम से कम 20 संगठन सरकारी राहत शिविरों में अपना योगदान दे रहे हैं।

सेवाभारती ने तिरुवनंतपुरम, कासरगोड और पलक्कड़ में तीन केंद्र खोले हैं, जहां राहत सामग्री एकत्र की जा रही है। उसने राज्य स्तर पर 24 घंटे काम करने वाली एक हेल्पलाइन शुरू की है, जिसका संचालन 10 स्वयंसेवक कर रहे हैं और सरकारी एजेंसियों के साथ दूसरे राज्यों व विदेशों में रहने वाले चिंतित परिजनों तक आवश्यक जानकारी पहुंचा रहे हैं। अन्य जिलों में भी हेल्पलाइन शुरू की जा रही है। सेवाभारती हेल्पलाइन से मिली जानकारी के आधार पर सरकारी एजेंसियों ने कम से कम 600 लोगों की जान बचाई है। सेवाभारती के अलावा, संघ के अन्य आनुषांगिक संगठन जैसे भारतीय मजदूर संघ, अ.भा.वि.प, बीएमपीएस और भाजपा द्वारा चलाए जा रहे सहायता कार्याें के तहत कम से कम 10,000 लोगों को बचाया गया है।

बचाव अभियान में जुटे स्वयंसेवक अपनी जान तक की परवाह नहीं कर रहे। बचाव कार्य के दौरान दुर्भाग्यवश दस स्वयंसेवकों को अपने बहुमूल्य जीवन का बलिदान देना पड़ा जिनके नाम हैं- मनीष, रघुनाथ, हरिनारायणन, रंजीत, संजीव, मणिकांतन, शिवदास, अनीश, विशाल और अजीत। युवा बैंक कर्मचारी अमल स्कारिया उर्फ उन्नी की बाढ़ पीड़ितों को भोजन पहुंचाने के बाद अपने गृह नगर कुथट्टुकुलम लौटने के दौरान मौत हो गई। जिन जगहों पर गहराई कम थी और बड़ी नाव नहीं जा सकती थी, वहां स्वयंसेवकों ने गर्दन तक पानी में उतरकर नावों को खींच कर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया। अभी जहां भी नजर जाती है, वहां अथाह पानी दिखाई दे रहा है। राहत एवं बचाव अभियान जारी है। सेवाभारती कुट्टानुडू और अलप्पुझा के अन्य प्रभावित क्षेत्रों में बचाव कार्य और भोजन व आवश्यक वस्तुओं को नौकाओं से पहुंचा रही है। बाद में बाढ़ ने जब विकराल रूप धारण किया तो थल सेना, नौसेना व वायु सेना के जवानों को भी बचाव एवं राहत कार्य में लगाया गया। हेलीकॉप्टरों की मदद से छतों पर फंसे सैकड़ों लोगों को बचाया गया, पर बरामदों और एल्युमीनियम की छतों वाले मकानों पर बैठे लोगों को निकालने में कठिनाई आने के कारण उन्हें नावों से सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। कोझिकोड व तिरुअनंतपुरम से आए मछुआरों ने भी लोगों की सुरक्षित निकासी में भरपूर मदद की। जुलाई के आखिर और अगस्त के शुरुआती सप्ताह में गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू ने राज्य का दौरा किरके 160 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की थी। गृह मंत्री राजनाथ सिंह के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया। गृह मंत्री ने 100 करोड़ और प्रधानमंत्री ने 500 करोड़ रुपये देने की घोषणा की। साथ ही, प्रधानमंत्री ने सड़कों और तबाह घरों के पुनर्निर्माण की भी बात कही। खास बात यह कि उन्होंने केंद्र सरकार की रोजगार योजना के तहत 5़.5 करोड़ रोजगार दिवस की घोषणा भी की। इसके अलावा, कई राज्यों ने भी मदद के लिए हाथ बढ़ाए हैं। महाराष्ट्र ने 20 करोड़, गुजरात ने 10 करोड़, उत्तर प्रदेश और बिहार ने 15-15 करोड़, हरियाणा 10 करोड़ और झारखंड ने 5 करोड़ रुपये की सहायता की घोषणा की है।

 

पानी से सराबोर इलाकों से लोगों को निकालने के लिए स्वयंसेवकों ने जो साधन बन पड़ा उसे प्रयोग में लिया 

ऐसी स्थिति में भी राजनीति!

राज्य सरकार और विपक्ष में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ केंद्र सरकार से बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग कर रही है। केंद्र सरकार ने इसे एल-3 स्तर की आपदा माना है। केरल उच्च न्यायालय में इससे संबंधित एक जनहित याचिका के जवाब में असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एन. नागरेश ने कहा कि कानून या मैनुअल में इस तरह की आपदा को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने का कोई प्रावधान नहीं है। गैर सरकारी संगठनों और राष्ट्रवादी विचारधारा के लोगों के साथ भाजपा और कांग्रेस की भी मांग थी कि बचाव अभियान की पूरी जिम्मेदारी सेना को सौंपी जाए ताकि राहत कार्य को बेहतर तरीके से अंजाम दिया जा सके। लेकिन माकपा के राज्य सचिव कोडियारी बालकृष्णन ने इसे राज्य में सैन्य शासन की मांग से जोड़ लिया। हालांकि इसका मकसद यह था कि राहत एवं बचाव कार्यों के लिए प्रशासन से अनुमति लेने में सेना का समय नष्ट न हो। ऐसा हुआ भी है। एक अवसर पर अनुमति पत्र पर जिला कलेक्टर के हस्ताक्षर नहीं थे इसलिए छत पर फंसे लोगों को बचाने के लिए हेलीकॉप्टर उड़ान ही नहीं भर सका। लोगों का का मानना है कि जिद पर अड़ी राज्य सरकार इस विपति में भी राजनीतिक रोटियां सेंक रही है।

जनप्रतिनिधि और मंत्री विदेश में

राज्य के लोग इस बात से भी नाराज हैं कि राज्य बाढ़ की चपेट में था और वन मंत्री के़ राजू 16 अगस्त को एक समारोह में भाग लेने के लिए जर्मनी चले गए। के. राजू इडुक्की के पड़ोसी जिला कोट्टायम के भाकपा प्रभारी हैं, जहां मुलप्पेरियार और इडुक्की बांध स्थित हैं। वे राज्य के हालात से पूरी तरह से वाकिफ थे। कोट्टायम में स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन में उन्होंने इसका स्पष्ट तौर से जिक्र भी किया था। राज्य में जब विरोध के स्वर मुखर हुए तो पार्टी ने राजू को वापस बुला लिया। अब उन्हें बर्खास्त करने की बात चल रही है। इसके बावजूद राजू का कहना है कि मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और उनकी पार्टी ने विदेश जाने की इजाजत दी थी।  मुस्लिम लीग के सांसद ई़ टी. मोहम्मद बशीर, कांग्रेस सांसद शशि थरूर, सीपीआई के विधायक और जेएनयू के पूर्व छात्र मोहम्मद मुहसिन विदेश में हैं। ऐसी भी खबरें हैं कि राज्य में मौजूद होने के बावजूद कुछ सांसद और विधायक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में गए ही नहीं। 

हालांकि अब जलस्तर कम होने लगा है। लेकिन बाढ़ की विभीषिका में अब तक करीब 400 लोगों की मौत हो चुकी है। आधिकारिक तौर पर 3,274 राहत शिविरों में 10,01,049 बच्चों सहित 10,28,073 लोगों ने आश्रय ले रखा है। करीब 17,343 घर और झोपड़ियां क्षतिग्रस्त हुईं हैं। राज्य सरकार के सामने ढेरों चुनौतियां हैं। जलापूर्ति, ट्रेन व बस सेवाओं की बहाली के साथ संक्रामक रोगों से बचाव के लिए बड़े पैमाने पर कार्य करने होंगे। कोच्चि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से विमानों की आवाजाही शुरू होने तक नौसैनिक हवाईअड्डे से घरेलू हवाई सेवा शुरू की जा रही है।

बहरहाल, केरल को इस आपदा से उबार कर जनजीवन को पटरी पर लाने के लिए केंद्र सरकार हर संभव आर्थिक मदद कर रही है। रा.स्व.संघ, इससे जुड़े तमाम संगठनों के कार्यकर्त्ता भी तन-मन से इस कार्य में जुटे हुए हैं।

 

बाढ़ पीड़ितों की मदद करते स्वयंसेवक 

रा.स्व. संघ की अपील

‘संकट की घड़ी में राष्ट्रजन हों केरल की विपदा में सहभागी’

केरल में बाढ़ की विभीषिका पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी ने देश से आह्वान करते हुए कहा कि केरल अभूतपूर्व और अप्रत्याशित बाढ़ की विभीषिका का सामना कर रहा है, जिसमें सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी हैं। हजारों लोगों को बेघर होना पड़ा है और लाखों लोग जगह-जगह पर फंसे हुए हैं। ऐसे में राज्य एक भयानक संकट के कगार पर है। लेकिन अनेक बाधाओं के बावजूद हमारी सेना, राष्ट्रीय आपदा राहत बल, केंद्र व राज्य सरकार बाढ़ राहत के लिए युद्धस्तर पर कार्य कर रही हैं। तो बड़ी संख्या में आमजन, संघ के स्वयंसेवक, सेवाभारती और अनेक सामाजिक, धार्मिक एवं स्वयंसेवी संगठन अपनी जान को जोखिम में डालते हुए पीड़ितों के बचाव और राहत के कार्य में दृढ़तापूर्वक सहयोग कर रहे हैं। उनकी तत्परता और सेवा प्रशंसनीय है। लेकिन संकट विकट है, साधन सीमित हैं। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ धार्मिक, सामाजिक संगठनों सहित समस्त राष्ट्रजनों से आह्वान करता है कि संकट की इस घड़ी में हम केरलवासियों के साथ खड़े हों और बाढ़ पीड़ितों की बढ़-चढ़कर हर संभव सहायता करें

जलमग्न क्षेत्रों से महिलाओं और बड़े-बुजुर्गों को हेलीकॉप्टर से सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने में वायुसेना के जवानों ने असाधारण कार्य किया

 

जलमग्न क्षेत्रों से महिलाओं और बुजुर्गो को बाहर निकालते हुए सेना के जवान 

 

 राहत कोष से मुख्यमंत्री की हेलीकॉप्टर यात्रा का भुगतान !

जब देश में प्राकृतिक या मानवनिर्मित विभीषिका आती है तो देश-विदेश से विभिन्न माध्यमों से राहत सामग्री, दवाएं और आर्थिक सहायता मिलती है। लेकिन हैरानी होती है जब आपदा राहत के लिए मिले धन का उपयोग निजी कार्यों पर किया जाए। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन इसका उदाहरण हैं। मुख्यमंत्री 26 दिसंबर, 2017 को अपनी पार्टी के जिला स्तरीय सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए एक निजी कंपनी के हेलीकॉप्टर से त्रिशूर गए। इसके बाद वे ओखी तूफान का जायजा लेने आए एक अंतरराज्यीय मंत्री स्तरीय केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल से मिलने चले गए। इसके बाद वे फिर वापस बैठक में हिस्सा लेने के लिए त्रिशूर आए। हेलीकॉप्टर का किराया 8 लाख रुपये बैठा। 6 जनवरी, 2018 को राज्य सरकार ने तिरुअनंतपुरम के जिलाधिकारी को हेलीकॉप्टर के बिल के भुगतान के लिए 8 लाख रुपये राज्य के आपदा राहत कोष से जारी करने का आदेश दिया। लेकिन सियासी गलियारों में राहत कोष के दुरुपयोग पर विवाद बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय ने आदेश को रद्द कर दिया और यह कहकर किनारा कर लिया कि मुख्यमंत्री को इस बारे में जानकारी नहीं थी।

खतरे की घंटी बजी थी, सोती रही सरकार

ख्यातिप्राप्त पर्यावरणविद् माधव गाडगिल ने केरल आपदा को ‘मानवनिर्मित’ आपदा कहकर राज्य सरकार की कार्यशैली पर कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि बिना किसी पूर्व सूचना के बांधों के द्वार खोलने से राज्य में जलप्रलय के हालात बने हैं। उल्लेखनीय है कि 2011 में माधव गाडगिल ने पश्चिमी घाट के पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर एक विस्तृत रपट जारी की थी, जो पूरी तरह से शोधपरक थी। रपट में स्पष्ट कहा गया था कि खनन, तेजी से वनों की कटाई, बेतहाशा बहुमंजिला इमारतों का निर्माण और अतिक्रमण आने वाले दिनों में राज्य के लिए एक बड़े खतरे का संकेत है। लेकिन राज्य सरकार ने उनकी रपट को सिरे से खारिज कर दिया था। केरल के मौजूदा हालात पर गाडगिल का कहना है कि 50 साल पुराने सभी बांधों को हटा देना चाहिए। साथ ही, पर्यावरण का दोहन भी तत्काल बंद कर देना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में और अधिक गंभीर परिणाम सामने आएंगे।

पानी से सराबोर इलाकों से लोगों को निकालने के लिए स्वयंसेवकों ने जो साधन बन पड़ा उसे प्रयोग में लिया

राहत शिविरों में भेजे जाने के लिए भोजन पैकेट तैयार करते सेवाभारती के कार्यकर्ता

शशि थरूर की आंख मिचौली

केरल प्रलयंकारी बाढ़ का सामना कर रहा था और शशि थरूर ने हालात का जायजा लेना भी जरूरी नहीं समझा। ऐसे में आपदाग्रस्त लोगों को उन पर गुस्सा तो आएगा ही। फिर खबरें आई कि वे संयुक्त राष्टÑ और उसकी सहयोगी संस्थाओं से राहत कार्यों के लिए सहायता मांगने जिनेवा गए हैं। पत्नी सुनंदा की मौत के मामले में जमानत पर चल रहे कांग्रेस सांसद थरूर का कहना है कि वे मुख्यमंत्री पिनराई विजयन से चर्चा करने के बाद ही सहायता मांगने निकले थे। उन्होंने ट्वीट किया कि वे केरल में आई बाढ़ पर अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय लोकोपकारी एजेंसियों से सलाह-मशविरा करने जिनेवा जा रहे हैं। उन्होंने लिखा, ‘वैसे सहायता मांगना भारत सरकार के विशेषाधिकार में आता है, लेकिन मैं यहां केरल के मुख्यमंत्री से हुई बातचीत के बाद यह पता लगाने आया हूं कि यथा संभव कैसी मदद मिल सकती है।’ हालांकि केरल के मुख्यमंत्री ने साफ इनकार करते हुए कहा कि थरूर उनके प्रतिनिधि के रूप में जिनेवा नहीं गए थे।

मुख्य सचिव ने गलती स्वीकार की

राज्य के मुख्य सचिव टॉम जोस ने माना कि बांध से पानी छोड़ने से पहले लोगों को सूचना देने में कोताही बरती गई। उन्होंने मीडिया से कहा कि वायनाडु स्थित बनार्जुन सागर बांध का द्वार खोलने से पहले लोगों को ठीक से चेतावनी नहीं दी गई। बता दें कि बांध से पानी छोड़े जाने के कारण वायनाडु में भारी नुकसान हुआ है। उधर, माकपा विधायक राजू अब्राहम का आरोप है कि राजस्व विभाग और केरल राज्य विद्युत बोर्ड हालात से निपटने में असफल रहे। हालांकि विद्युत बोर्ड ने इन आरोपों को खारिज किया है।

अमेजन के जरिये चंदा ले रहीं मिनशनरियां: अमेजन इंडिया लोगों से केरल की मदद के लिए चंदा मांग रहा है। यह पैसा जिन चार एनजीओ को दिया जाएगा वे हैं- हैबिटेट फॉर ह्यूमैनिटी इंडिया, वर्ल्ड विजन इंडिया, गूंज और आॅक्सफैम इंडिया। इनमें दो ईसाई मिशनरी हैं, जो विदेशी चंदे से हिंदुओं का कन्वर्जन करवाने के लिए बदनाम रही हैं। सुनामी के समय भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के नाम से यही खेल खेला था।

राहत शिविरों में सीपीएम की दादागीरी

आपदा की घड़ी में भी माकपा अपना बाहुबल दिखाने से बाज नहीं आ रही। उसके लोगों ने कोच्चि के पास नयारामबलम में एक राहत शिविर और भोजन सहित सभी राहत सामग्री को अपने कब्जे में ले लिया। साथ ही, अन्य शिविरों में राहत सामग्री पहुंचाने के लिए प्रयुक्त होने वाले वाहनों में अपनी पार्टी का झंडा लगा दिया। इससे माकपा और अन्य पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच तनाव की स्थिति बन गई। बाद में पुलिस आई और चेतावनी दी कि अगर राहत सामग्री के वितरण में शिकायत आई तो उसे कब्जे में ले लिया जाएगा। इस पर माकपा का स्थानीय सचिव भड़क गया और उसने अनाज से भरी बोरी एक पुलिसकर्मी के सिर पर रख दी। प्रमुख समाचार चैनलों द्वारा इस घटना का प्रसारण करने के बाद माकपा रक्षात्मक मुद्रा में है। वहीं, कोट्टायम जिले के वैकोम राहत शिविर में माकपा ने ग्रामीण अधिकारी को सेवाभारती द्वारा मुहैया कराई गई गाड़ी में जाने से रोक दिया है। इस पर ग्रामीण अधिकारी ने कहा कि अगर वे वाहन उपलब्ध करा दें तो वह सेवाभारती की गाड़ी छोड़ देंगे। लेकिन ‘कामरेडों’ ने गाड़ी उपलब्ध कराने में असमर्थता जताई। रोचक बात यह है कि ग्रामीण अधिकारियों को सरकार की ओर से गाड़ियां ही नहीं मुहैया कराई गई हैं। अधिकारी भी जानते हैं कि रा.स्व.संघ और सेवाभारती के सहयोग के बिना वे अपना काम उचित ढंग से कर ही नहीं सकते। रा.स्व.संघ के स्वयंसेवक नि:स्वार्थ भाव से लोगों की सेवा कर रहे हैं।