देश के लिए नासूर हैं अर्बन नक्सली: विवेक अग्निहोत्री

 

अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश किए जाने की बात सामने आई है। आपने अर्बन नक्सलिज्म पर किताब भी लिखी है, आपकी नजर में अर्बन नक्सलिज्म क्या है?

देखिए, मेरी नजर में भी अर्बन नक्सली वही हैं जो कभी दलित मुद्दों पर, कभी असहिष्णुता के नाम पर, कभी महजब और पंथ पर खतरों का डर दिखाकर अपनी दुकान चलाते हैं। इस तरह के मुद्दों को हवा देने वाले कथित बुद्धिजीवी जो लगातार सरकार पर अंगुलियां उठाते रहते हैं, वह अर्बन नक्सलिज्म के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं। बस्तर जैसी जगहों से होने वाली अवैध उगाही से महंगी शराब पीकर ज्ञान बघारने वाले इस तरह के लोग वास्तव में देश के लिए नासूर हैं।

क्या आपको लगता है कि मोदी सरकार के आने के बाद ये लोग अपने एजेंडे को पूरा नहीं कर पा रहे हैं और हताश महसूस कर रहे हैं ?

जी बिल्कुल। सबसे पहली बात तो यह है कि नोटबंदी ने नक्सलवाद की पूरी कमर तोड़ दी है, क्योंकि जो वसूली इनके कैडर द्वारा की जाती है वह कैश में की जाती है। केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद नक्सलियों के खिलाफ बड़े अभियान चलाकर इनकी कमर पूरी तरह तोड़ दी गई है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास भी खूब हुआ है। हजारों करोड़ की उगाही की अवैध इंडस्ट्री ये लोग चला रहे हैं उस पर नकेल लगी है। अभी आपने देखा कि कितने बड़े पैमाने पर अर्धसैनिक बलों के अभियान में नक्सली मारे गए हैं। शहरों में रहकर अंग्रेजी बोलने वाले जो इनके झंडाबरादर हैं उनकी कमाई रूक गई है। इससे भी ये लोग हताश हैं। वैसे भी माओवादी जिस थ्योरी के तहत काम करते हैं उसमें लोकतंत्र और मानवतावाद नाम की कोई चीज नहीं होती है।

आप सिनेमा जगत से हैं। विदेश में रहकर पढ़ाई की है, फिर अर्बन नक्सलवाद पर किताब लिखने की कैसे सोची ?

देखिए, हमारे देश को खतरा बाहर से ज्यादा अंदर से है। हमारे देश के एक तरफ कम्युनिस्ट शासन वाला चीन है तो दूसरी तरफ इस्लामिक देश हैं। हम हर तरह से सक्षम हैं, लेकिन देश की अंदरूनी स्थिति यदि ठीक नहीं होगी तो बाहरी ताकतें देश पर हावी हो जाएंगी। कश्मीर में आतंकवाद हो या बस्तर जैसी जगहों पर माओवाद, सब कुछ बाहर से नियंत्रित होता है। एनजीओ के नाम पर बाहर से फंड लेकर उनके अनुसार काम किया जाता है। नक्सलवाद जिस विचारधारा पर काम करता है, उसके लिए राष्ट्र का कोई अर्थ नहीं होता है। सीधे-साधे भोले लोगों को बरगलाकर उनके हाथों में हथियार देकर समाज में विद्वेष फैलाने का काम ये अर्बन नक्सली करते हैं, जो देश के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक हैं।

क्या आप मानते हैं कि देश में असहिष्णुता, विश्वविद्यालयों में दलित उत्पीड़न जैसे मुद्दों को हवा देने में इन लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका है ?

जी हां, इसमें कोई दो राय नहीं है। दरअसल, देश में जिन मुद्दों पर वास्तव में बहस होनी चाहिए उन पर बहस न होकर असहिष्णुता जैसे मुद्दे उठाए जाते हैं। इसके पीछे इन्हीं लोगों का हाथ होता है। इसके लिए पूरा प्रोपेगेंडा रचा जाता है। गरीबी और अशिक्षा दूर करने, देश की आर्थिक स्थिति मजबूत करने जैसे मुद्दों से ध्यान भटकाकर बेकार के मुद्दे खड़े किए जाते हैं। इन सब बातों का कोई अर्थ नहीं हैं। हमें सकारात्मकता की तरफ ध्यान देना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता।

क्या सिनेमा की दुनिया में भी इस तरह की विचारधारा से प्रेरित लोग हैं ?

देखिए, कम शब्दों में बड़ी बात यह है कि सिनेमा की दुनिया में सिर्फ पैसे की भाषा चलती है। इसके लिए फंडिंग चाहिए। जिस तरह की फंडिंग होगी, उस तरह की फिल्में बनने लगेंगी।