काव्य की अटल-आभा
   दिनांक 30-अगस्त-2018
                                                                                                                                                              - गिरीश पंकज
अटल जी की साहित्य-साधना जबरदस्त थी। अपनी कविताओं के जरिए उन्होंने समाज-जीवन की बुराइयों पर चोट की, वहीं अच्छाइयों की तारीफ भी की, जीवन की सचाइयों को भी बताने का प्रयास किया 
अटल जी के बारे में हर कोई यह बात कहता रहा है कि वे राजनीति में नहीं होते तो हिंदी साहित्य-जगत के एक बड़े काव्य-हस्ताक्षर के रूप में प्रख्यात होते। बावजूद इसके यह भी कहा जा सकता है कि अपने साहित्यिक संस्कारों के कारण ही उन्होंने राजनीति को शुचितापूर्ण बना दिया। यही कारण है कि उनके जाने के बाद भी उनके समग्र व्यक्तित्व पर विमर्श हो रहा है और उनके साहित्यिक अवदान को भी केंद्र में रखकर विचार किया जा रहा है। मॉरीशस में संपन्न 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन (18-20 अगस्त, 2018) में भी विश्वभर से एकत्र हुए हिंदी-प्रेमियों ने अटल जी के हिंदी-प्रेम और उनके कवि-रूप का स्मरण किया। मॉरीशस सरकार ने तो अपने बन चुके सायबर टॉवर का नाम ‘अटल बिहारी वाजपेयी टॉवर’ रखने की घोषणा कर दी। जब मॉरीशस में दूसरा विश्व हिंदी सम्मेलन संपन्न हुआ था, तब अटल जी ने जो कविता लिखी थी, वह आज भी स्मरणीय है-
पोर्टलुई के घाट पर, नवपंडों की भीर,
रोली,अक्षत, नारियल, सुरसरिता का नीर।
सुरसरिता का नीर, लगा चंदन का घिस्सा,
भैयाजी ने औरों का भी हड़पा, हिस्सा।
कह कैदी कविराय,
जयतु जय शिवसागर जी, 
जय भगवती जागरण,
निरावरण जय नागर जी।
अटल जी की समग्र हिंदी कविताएं बेहद महत्वपूर्ण हैं। यह अलग बात है कि हमारी तथाकथित साहित्य-आलोचना के बदरंग चश्मे ने अटल जी की शुभ्र-भाव वाली कालजयी कविताओं की अनदेखी करने की कोशिश की लेकिन उनकी साहित्य-आभा निरंतर प्रभासित होती रही। साहित्य की वह ‘अटल-आभा’ रह-रह कर दीप्त होती रही। वे अब साहित्यिक व्यक्तित्व के धनी एवं सहज-सरल राजनीतिज्ञ के रूप में चिरस्मरणीय हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में अटल जी के भाषण के बाद से ही भारत की यह मांग जोर पकड़ने लगी कि हिंदी संयुक्त राष्ट्र की अधिकृत भाषा बने। अभी वहां छह भाषाओं को मान्यता मिली हुई है। हिंदी अब तक संघर्ष कर रही है। अटल जी की पहल से हिंदी के पक्ष में एक सकारात्मक माहौल बना। वे अपने अधिकांश भाषण हिंदी में ही देते रहे। उनके भाषण इतने रंजक होते थे कि विपक्षी नेता भी सुनकर वाह-वाह कर उठते थे। चुनावी सभाओं में विपक्षी भी उनका भाषण सुनने जाया करते थे। उनके भाषणों में तथ्य होते थे, सचाई होती थी, लालित्य होता था। परिहास भी प्रचुर मात्रा में होता था। वे अपने विरोधियों की आलोचना करते वक्त भी हमेशा मर्यादित रहे। इसीलिए आज सब उन्हें आदर से याद करते हैं। वे हमेशा याद किए जाएंगे। संयुक्त राष्ट्र में सबसे पहले हिंदी में भाषण देकर हिंदी की पताका को विश्वव्यापी बनाने वाले अटल जी उन कुछेक राजनेताओं में शामिल हैं जो अच्छे लेखक भी थे। हालांकि अनेक लेखक-नेता गद्य पर अधिक केंद्रित थे पर अटल जी का काव्य-व्यक्तित्व ही अधिक सामने आता है। उनकी ये पंक्तियां देखें-
गंूजी हिंदी विश्व में स्वप्न हुआ साकार,
राष्ट्र संघ के मंच से हिंदी का जैकार।
हिंदी का जैकार हिंदी हिंदी में बोला,
देख स्वभाषा-प्रेम विश्व अचरज में डोला।
कह कैदी कविराय मेम की माया टूटी,
भारत माता धन्य स्नेह की सरिता फूटी।
अटल जी की कविताएं भारतीय मन-मष्तिष्क को रूपायित करती हैं। वे सार्थक कविता की तरह बोधगम्य थे। जैसे सहज-सरल थे, वैसी ही उनकी कविताएं हैं। उन्होंने कालजयी कविताएं लिखीं। आपातकाल के दौरान लिखी गर्इं उनकी कविताएं ‘कैदी कविराय की कुण्डलियां’ के नाम से प्रकाशित हुर्इं। उनकी अनेक कविताएं लोगों के मानस पटल पर अंकित हैं। इन कविताओं को हम साहित्य के निकष पर भी खरा पाते हैं। उनकी एक कविता काफी लोकप्रिय हुई। जैसे - टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते।
सत्य का संघर्ष सत्ता से,
न्याय लड़ता निरंकुशता से,
अंधेरे ने दी चुनौती है,
किरण अंतिम अस्त होती है।
दीप निष्ठा का लिए निष्कंप
वज्र टूटे या उठे भूकंप,
यह बराबर का नहीं है युद्ध,
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध।
आपातकाल के दौरान देश के समस्त बड़े विपक्षी नेता विभिन्न जेलों में ठूंस दिए गए थे। भवानी प्रसाद मिश्र जैसे अनेक क्रांतिकारी कवि भी बंद कर दिए गए थे। जेल में उन्होंने कविता लेखन की ‘त्रिकाल-संध्या’ की। यानी उन्होंने प्रतिदिन तीन कविताएं लिखीं। बाद में ये कविताएं पुस्तक रूप में भी प्रकाशित हुर्इं। उनकी तरह अटल जी को जेल में अनेक कविताएं लिखने का अनुकूल अवसर मिला। उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण कविताएं रचीं, वे भी कुण्डलियों के रूप में। ये कविताएं बाद में कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर चर्चित भी हुर्इं। ‘कैदी कविराय की कुण्डलियां’- इस संग्रह को देखने से साहित्यानुरागियों को अटल जी की छांदसिक प्रतिभा का पता चलता है। कुण्डलियां छंद लिखने का काम कोई कुशल कवि ही कर सकता है। इंदिरा गांधी के तानाशाही रवैये के कारण तब देशभर में प्रशासन अन्याय-अत्याचार कर रहा था। अटल जी लिखते हैं-
दिल्ली के दरबार में कौरव का है जोर,
लोकतंत्र की द्रौपदी रोती नयन निचोर।
रोती नयन निचोर, नहीं कोई रखवाला,
नए भीष्म, द्रोणों ने मुख पर ताला डाला।
कह कैदी कविराय बजेगी रण की भेरी,
कोटि-कोटि जनता न रहेगी बनकर चेरी।
अटल जी ने अपनी विद्रोही कविताओं में कदम-कदम पर सत्ता की निरंकुशता और लोक की पीड़ा को उकेरने का काम किया। वे एक तरह से प्रतिरोध के कवि हैं। वे व्यंग्य भी खूब करते हंै। अन्याय पर तीखा प्रहार उनकी कविताओं का सहज प्रदेय रहा। जीवन को उत्साह-उमंग से भर देने वाली उनकी अनेक कविताएं अमर हैं। एक बानगी देखें -
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज,
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज।
किन्तु फिर भी जूझने का प्रण,
पुन: अंगद ने बढ़ाया चरण,
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार,
समर्पण की मांग अस्वीकार।
दांव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते;
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते।
अटल जी के जीवन में पारदर्शिता थी। उन्होंने अनेक बातें संकेतों में भी कहीं। समझने वाले उन्हें समझते भी थे। वे राजनीतिक जीवन में शुचिता और समरसता के उदाहरण थे। उन्होंने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में देश को एक दिशा दी। भारत को विकास के नूतन आयाम दिए। पाकिस्तान के साथ मधुर संबंध बनें, इस दिशा में उनकी पहल को पूरी दुनिया ने सराहा। आज भारत उसी का अनुसरण करने की कोशिश कर रहा है। अटल जी आस्था के कवि हैं। वे हारने से भी निराश नहीं होते, मुसीबतों का डट कर मुकाबला भी करते हैं। उनकी इस कविता का संदेश यही है,
बाधाएं आती हैं आएं
घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
पांवों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,
निज हाथों में हंसते-हंसते,
आग लगाकर जलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।
उनकी एक और महत्वपूर्ण कविता है जो भारत का महिमा-गान करती है-
मैं अखिल विश्व का गुरु महान,
देता विद्या का अमरदान,
मैंने दिखलाया मुक्ति मार्ग
मैंने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान।
मेरे वेदों का ज्ञान अमर,
मेरे वेदों की ज्योति प्रखर
मानव के मन का अंधकार
क्या कभी सामने सका ठहर?
आज राजनीति अलग दिशा में बह रही है। सत्ता पाने के बाद नेताओं का गुरूर देखने लायक होता है। छुटभैया भी बड़भैया बन जाता था। अटल जी इस चरित्र को समझते थे। वे राजनीति में भी नैतिक मूल्यों को स्थापित करना चाहते थे। ओहदेदार बनने के बाद अनेक लोग समाज से कटते चले जाते हैं, ऐसे लोगों पर भी उनकी एक लंबी कविता है। उसका एक अंश देखें-
मेरे प्रभु !
मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना,
गैरों को गले न लगा सकूं,
इतनी रुखाई कभी मत देना।
साहित्य क्या है, वह लोकमंगल का कार्य करता है। भटके हुए जन को राह दिखाता है। टूटे हुए व्यक्ति के अन्तस् में आस्था भरता है। जीवन में नए रंग भरने का काम कोई भी बड़ी रचना करती है। अटल जी की अनेक कविताएं इसी भावभूमि पर सृजित हुई हैं। अटल जी की चर्चित कृति ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ को देखें तो हम पाते हैं कि इस संग्रह की समस्त कविताएं आदमी को इनसान बनाने की प्रवृत्ति रखती हंै। फिर चाहे वह ‘आओ फिर से दिया जलाएं’ हो या ‘गीत नया गाता हूं’ हो। अन्य चिर स्मरणीय कविताओं के कुछ शीर्षक देखें, जो अपने कथ्य को स्वत: स्पष्ट करते चलते हैं। जैसे, ‘न मैं चुप हूं, न गाता हूं’, ‘गीत नया गाता हूं’, ‘ऊंचाई’, ‘दूध में दरार पड़ गई’, ‘मन का संतोष’, ‘झुक नहीं सकते’, ‘जीवन बीत चला’, ‘मौत से ठन गई’, ‘राह कौन-सी जाऊं’, ‘हिरोशिमा की पीड़ा’, ‘आओ मन की गांठें खोलें’ आदि समस्त कविताओं में जो विमर्श है, वह सामान्य पाठक को भी नवीन ऊर्जा से आप्लावित कर देता है। कविता का काम ही है कि वह हमें नित नवीन करती चले। अटल जी के साहित्य की यही विशेषता है कि वह संस्कार देता चलता है। उनकी कविताएं प्रवाहमान हैं। पाठक उनके साथ गहरा तादात्म्य स्थापित करके बहता चला जाता है। एक पंक्ति में कहें तो अटल जी प्रबोधन के कवि हैं। उनकी कविताएं हमें प्रबुद्ध करती हैं, अन्तस् को शुद्ध करती हैं। उनकी कविताएं हमें राष्ट्र से प्रेम करना सिखाती हैं। वे देश से अटूट प्रेम करते हैं इसलिए देश को महान भी देखना चाहते हैं। वे लोकतंत्र की विसंगतियों को देखते हुए एक जगह कहते हैं -
पंद्रह अगस्त का दिन कहता,
आजादी अभी अधूरी है
सपने सच होने बाकी हैं,
रावी की शपथ न पूरी है...
...उस स्वर्ण दिवस के लिए
आज से कमर कसें बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएं
जो खोया उसका ध्यान करें।
चंद पंक्तियों में अटल जी कितना कुछ कह जाते हैं। साहित्य से राजनीति में सक्रिय कुछ कवियों का मूल्यांकन होता रहा है लेकिन हिंदी आलोचना ने अटल जी के साहित्यिक अवदान की उपेक्षा की। उनकी कविताओं पर काम होना चाहिए, क्योंकि यह अनुकूल समय है। उनके साहित्य पर शोध हो, विमर्श हो और वे जैसी छान्दसिक कविताएं करते थे, वैसी कविताओं की वापसी का वातावरण भी बने। लता मंगेशकर और जगजीत सिंह जैसे कुछ गायकों ने उनकी रचनाओं को स्वर दिया पर आलोचकों ने उन्हें अनदेखा किया। लेकिन अब यह भूल-गलती सुधारी जानी चाहिए। अपनी एक कविता में वे जीवन के सत्य को स्वीकार भी करते हैं और कहते हैं-
जीवन की ढलने लगी सांझ
उमर घट गई
डगर कट गई
जीवन की ढलने लगी सांझ।
सपनों में मीत
बिखरा संगीत
ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ।
जीवन की ढलने लगी सांझ।
लेकिन हम लोग यही चाहते थे कि यह सांझ कभी न आए, कभी न आए, लेकिन वह आ ही गई। उनकी एक और कविता है ‘मौत से ठन गई’। इसकी शुरू की कुछ पंक्तियों में जीवन-दर्शन उतर आया है,
‘‘ठन गई
मौत से ठन गई
... मैं जी भर जिया,
मैं मन से मरूं
लौट कर आऊंगा
कूच से क्यों डरूं?
देख तेवर तूफान का,
तेवरी तन गई।
मौत से ठन गई।’’
तो ऐसे कवि थे अटल जी, जो मौत से भी टकराते थे। वे चले गए हैं लेकिन उनका रचनात्मक अवदान कालजयी है। उनकी साहित्यिक, सामाजिक, राजनीतिक स्मृतियों का संरक्षण करके ही हम भविष्य के महामानव तैयार कर सकते हैं। जिस सामाजिक-राजनीतिक शुचिता के पर्याय थे अटल जी, उसकी स्थापना तभी संभव है जब अटल-साहित्य नए बच्चे तक भी पहुंचे। एक बड़ी परियोजना बना कर उनके साहित्य का समस्त भारतीय भाषाओं में अनुवाद कराया जाना चाहिए। उनके नाम से साहित्य के विभिन्न पुरस्कार भी स्थापित किए जा सकते हैं। अंत में, साहित्य के इस अटल-काव्य-व्यक्तित्व को मैं इन शब्दों में रेखांकित कर रहा हूं-
नवल रहे, वह धवल रहे
अमर हमारे अटल रहे
अटल बिहारी नाम है जिनका
कीचड़ में भी कमल रहे
कौन हिला पाया पर्वत को
अटल हमेशा अचल रहे।
(लेखक ‘सद्भावना दर्पण’ के संपादक हैं)